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उत्तर प्रदेश: स्वास्थ्य में भारी असमानताएं, कहीं कैरिबियन देश हैती से बद्तर, कहीं भारत से बेहतर

ओमन सी कुरियन,

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ऐसे समय में जब भारत में जन्म के समय का लिंग अनुपात कम है और इसमें गिरावट हो रही है ( वर्ष 2011 में 909 से 2014 में 887 ) तब भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य, उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, मुरादाबाद, मैनपुरी, देवरिया और बलरामपुर जैसे जिलों में जन्म के समय लिंग अनुपात 1000 से भी ज्यादा है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह देश की किसी भी अन्य राज्य की तुलना में बेहतर है।

 

यह सुधार बेहतर शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) के साथ है। वर्ष 2012-13 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कानपुर नगर जिले का आईएमआर 37 था जो 42 के राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। उत्तर प्रदेश का मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) 258 है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश (ग्रामीण) में मेरठ मंडल का एमएमआर 151 था जो कि राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। हालांकि 600 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित फैजाबाद मंडल (ग्रामीण) का एमएमआर 364 था जो इथियोपिया और हैती जैसे देशों से भी बदतर है।

 

हालांकि, उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में स्वास्थ्य मापदंडों की बद्तर हालत देखी गई है, जैसा कि इस श्रृंखला के दूसरे लेख में हमने बताया है। वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों ( एएचएस 2012-13) पर ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ द्वारा एक जिला स्तरीय विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के सबसे अधिक आबादी वाले इस राज्य में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली और संकेतक में लगभग योरोपीय शैली जैसी भिन्नता है। उत्तर प्रदेश के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-2015-16) के ताजा आंकड़ों केवल चुनाव के बाद ही जारी किए जाएंगे। हम बता दें कि उत्तर प्रदेश में चुनाव 11 फरवरी से होना निर्धारित है।

 

वर्ष 2012-13 में, उत्तर प्रदेश में अकेले वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण ( एएचएस ) में 50 लाख लोगों और 10 लाख परिवार को शामिल किया गया है। यह श्रीलंका की आबादी से अधिक है। एएचएस दुनिया का सबसे बड़ा घरेलू नमूना सर्वेक्षण बना हुआ है। हम बता दें कि यह सर्वेक्षण नौ बड़े और खराब प्रदर्शन करने वाले भारतीय राज्यों में आयोजित किया गया है।

 

एएचएस जिला स्तर पर प्रमुख स्वास्थ्य संकेतक देता है। एएचएस द्वारा एकत्र आंकड़े उपयोगी संसाधन की तरह हैं। राज्य में कल्याण के बढ़ावे के लिए इसकी नीतियों को उभारने के लिए विधानसभा चुनाव एक अच्छा अवसर साबित हो सकता है। जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 में पाया गया है। स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में निवेश किसी भी राज्य की उत्पादक क्षमता को बढ़ाने के दो बेहतर उपाय हैं।

 

जन्म के समय लिंग अनुपात: कुछ जिलों में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं

 

उत्तर प्रदेश में, एएचएस 2012-13 के सर्वेक्षण में 75 में से 70 जिलों को शामिल किया गया है। यह अलीगढ़, मुरादाबाद, मैनपुरी, देवरिया और बलरामपुर जैसे जिले हैं, जहां 1000 से अधिक का लिंग अनुपात है । सर्वेक्षण में राणसी, फिरोजाबाद, आगरा, बिजनौर और बदाऊं जैसे जिले भी हैं,जहां जन्म के समय लिंग अनुपात 850 के भीतर है।

 

उत्तर प्रदेश के जिलों में लिंग अनुपात , 2012-13

Source: Annual Health Survey 2012-13. Click on individual districts for data.

 

बच्चो को नहीं मिलता पूरा टीकाकरण, बीमारी और मौत का जोखिम अधिक

 

उत्तरप्रदेश में टीकाकरण कम होता है। इससे कई बच्चों पर रोग और मृत्यु का जोखिम अधिक रहता है। वर्ष 2012-13 में, उत्तर प्रदेश में 52.7 फीसदी से अधिक बच्चों का पूरी तरह से टीकाकरण नहीं हुआ है। जबकि 7.6 फीसदी बच्चों का किसी भी तरह का टीकाकरण नहीं हुआ है। वर्ष 2013-14 के लिए पूर्ण टीकाकरण का राष्ट्रीय औसत 65.3 फीसदी है। टीकाकरण नहीं कराने के आंकड़े 6.6 फीसदी हैं।

 

उत्तर प्रदेश के बच्चे जिन्हें कोई टीकाकरण प्राप्त नहीं हुआ

Source: Annual Health Survey 2012-13. Click on individual districts for data.

 

पूरी तरह से प्रतिरक्षित बच्चों के कम अनुपात वाले जिले जैसे कि श्रावस्ती (24.9 फीसदी), बहराइच (27.5 फीसदी), बलरामपुर (36.4 फीसदी), शाहजहांपुर (30.7 फीसदी), खीरी (37.8 फीसदी), सीतापुर (35.4 फीसदी) और सोनभद्र (32.4 फीसदी) में आने वाले कल में महामारी का टाइम बम हैं।

 

जिला अनुसार जन्म के समय बच्चों को मिलने वाला पोलियो डोज

Source: Annual Health Survey 2012-13. Click on individual districts for data.

 

श्रावस्ती, बलरामपुर और सोनभद्र जिलों में आधे से अधिक बच्चों को जन्म के समय पोलियो खुराक प्राप्त नहीं होती है। हालांकि, भारत छह वर्षों में पोलियो मुक्त होने की बात कहता है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पोलियो का प्रकोप जारी है।

 

उत्तर प्रदेश में जिला स्तर पर शिशु मृत्यु दर क्षेत्रीय असमानताओं की एक तस्वीर

 

वर्ष 2012-13 एएचएस रिपोर्ट के अनुसार, आईएमआर गरीबी और एक समुदाय के अन्य सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं के बारे में संकेत प्रदान करता है।

 

वर्ष 2012-13 में प्रति 1000 जीवित जन्मों 68 मौतों की आईएमआर के साथ,  एएचएस सर्वेक्षण में शामिल राज्यों में उत्तर प्रदेश लगातार पीछे है।

 

जिला अनुसार उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु दर

Source: Annual Health Survey 2012-13. Click on individual districts for data.

 

यहां जिला स्तर का विश्लेषण व्यापक असमानता दर्शाता है : उत्तर-पूर्वी श्रावस्ती जिले में शिशु मृत्यु दर 96 है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर की आईएमआर (37) से करीब तीन गुना है।

 

एएचएस राज्यों में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) भी है। झारखंड के लिए ये आंकड़े सबसे कम हैं। झारखंड के लिए ये आंकड़े प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 23 मृत्यु का है। उत्तर प्रदेश के उच्च एनएमआर के भीतर,  व्यापक भिन्नता, राज्य के बड़े हिस्से में स्वास्थ्य सेवा की अनिश्चित स्थिति का संकेत दे रहे हैं। प्रति जीवित जन्म पर 24 मृत्यु के आंकड़ों के साथ कानपुर नगर (शहर) का एनएमआर सबसे कम है, जबकि सिद्धार्थनगर  पूर्व में  प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 70 मृत्यु के साथ एनएमआर सबसे ज्यादा है।

 

जैसा कि ग्राफ में दिखाया गया है, नई सरकार को हमारे द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आए जिला स्तरीय असमानताओं पर ध्यान देने की जरूरत होगी। विशेष रुप से उन क्षेत्रों में जहां शिशु मृत्यु दर अधिक है।

 

खराब प्रदर्शन करने वाले नौ राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश में हैं ज्यादा स्टंट बच्चे

 

पांच वर्ष की आयु के भीतर बच्चों में स्टंट ( उम्र की तुलना में कम कम ), वेस्टिंग ( कद की तुलना में कम वजन ) कम वजन कुपोषित (कम बॉडी मास इंडेक्स, या बीएमआई) के संबंध में उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन देश भर में सबसे बद्तर है।

 

‘क्लिनिकल, ऐन्थ्रपमेट्रिक एंड बायोकेमिकल सर्वे-2014’ (सीएबी) के सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में पांच वर्ष की आयु के बच्चों में स्टंटिंग में मामले उच्च हैं। इस संबंध में ये आंकड़े 62 फीसदी है जबकि गंभीर स्टंटिंग के लिए आंकड़े 35.6 फीसदी हैं। एएचएस सर्वेक्षण में नौ राज्यों के 284 जिलों को शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश में शामिल 70 जिलों में से एक भी जिला, देश में 10 सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले जिले में से नहीं है।

 

जबकि, सबसे ज्यादा स्टंट बच्चों की संख्या के साथ 10 सबसे बद्तर जिलों में से पांच जिले उत्तर प्रदेश से हैं।

 

284 एएचएस जिलों में सबसे खराब स्टंटिंग उत्तर प्रदेश के रायबरेली में पाए गए हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में कम वजन के बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा देखे गए।

सर्वेक्षण में पाया गया कि रायबरेली के 77.4 फीसदी बच्चे स्टंट हैं और हमीरपुर के 70.2 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं।

रायबरेली का मामला ही सिर्फ ‘अति’ का उदाहरण नहीं है। उत्तर प्रदेश के 70 में से 55 जिलों में स्टंटिग दर 55 फीसदी से ज्यादा है। उत्तर प्रदेश के 23 जिलों में 50 फीसदी से ज्यादा बच्चे कम वजन के हैं।

 

कहीं अल्पपोषण तो कहीं अधिक पोषण

 

उत्तर प्रदेश, विशेष रुप से पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई जिलों में अधिक पोषण का उच्च अनुपात है। जैसे पीलीभीत में 24.6 फीसदी, बुलंदशहर में 21.8 फीसदी, शाहजहांपुर में 21.7 फीसदी, औरैया में 21.4 फीसदी और अलीगढ़ में 21.1 फीसदी। दूसरे शब्दों में कहें तो उत्तर प्रदेश पर अल्पपोषण और अधिक पोषण दोनों का बोझ है जिसके कुप्रभाव से बीमारियां फैलती हैं और इस राज्य की आर्थिक प्रगति की रफ्तार धीमी हो रही है।

 

स्वास्थ्य और पोषण को लेकर अपने प्रदर्शन में सुधार करने के लिए उत्तर प्रदेश को व्यापक नीति निरीक्षण की आवश्यकता है।

 

आने वाला राज्य विधानसभा चुनाव राजनीतिक दलों को उत्तर प्रदेश के विकास के प्रति उनकी दृष्टि को मतदाताओं के साथ साझा करने के लिए एक अवसर प्रदान करती है।

 

स्थिति में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं। पोषण मिशन के साथ छह भारतीय राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश है। यह वर्ष 2013 में बनाया गया था। इसका उदेश्य स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास है। ‘इसे इन्टग्रेटिड चाइल्ड डिवेलप्मन्ट सर्विसिज’ (आईसीडीएस) चलाता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी ‘बाल-पोषण योजना’ है। इस योजना के तहत तीन साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण को कम करने के लिए लगातार लड़ाई लड़ी जा रही है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में बच्चों के पोषण स्तर पर इस योजना के प्रभाव का मूल्यांकन नहीं हुआ है।

 
छह लेखों की श्रृंखला का यह अंतिम लेख है। आप पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा और पांचवा भाग यहां पढ़ सकते हैं
 

(कुरियन नई दिल्ली के ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ के ‘हेल्थ इनिशिएटिव’ में फेलो हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 09 फरवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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