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‘एक असफल जैव शौचालय मॉडल के साथ रेलवे बढ़ रहा है आगे ‘

श्रीनंद झा,

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24 वर्षों से, भारतीय रेलवे ने हर दिन ट्रैक पर ट्रेनों से निकलने वाली 3980 टन ( 497 ट्रक लोड -8 टन प्रति ट्रक पर) मलमूत्र के लिए समाधान खोजने की कोशिश में है। नवीनतम योजना ट्रेन शौचालय सीटों के नीचे रहने वाला ‘जैव डाइजेस्टर्स’ है,  जहां कंपोस्ट चैंबर में बैक्टीरिया का संग्रह किया जाता है।

 

लेकिन जैव-शौचालय ‘सेप्टिक टैंक’ से बेहतर नहीं हैं और जो पानी वहां से बाहर निकलता है वे ‘कच्चे मल’ से बेहतर नहीं हैं, जैसा कि ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (आईआईटी) मद्रास द्वारा एक अध्ययन का हवाला देते हुए इंडियास्पेंड ने 23 नवंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है। सरकार के लेखापरीक्षक, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने भी इन शौचालयों में कई खामियों की ओर इशारा किया है, जैसा कि इंडियस्पेंड ने 6 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

पहली बार नहीं है कि आईआईटी मद्रास के अध्ययन में 1,305 करोड़ रुपए की लागत से भारतीय रेलवे में लगाए गए जैव शौचालयों की आलोचना की गई है।

 

लखनऊ स्थित ‘रिसर्च डिजाइन और स्टैनडर्ड ऑर्गेनईजेशन’ (आरडीएसओ) और ‘आईआईटी’ कानपुर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 2007 के एक अध्ययन में यह भी निष्कर्ष निकाला है कि जैव-डाइजेस्टर्स में मल पदार्थ को उपचारित नहीं किया जा रहा है।  रेलवे ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है।

 

इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले आईआईटी के प्रोफेसर विनोद तारे वर्तमान में ‘आईआईटी’ कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं। वर्ष 2004 और वर्ष 2006 के बीच, वह ‘पर्यावरण के अनुकूल शौचालय’ विकसित करने के लिए भारतीय रेलवे की योजना के लिए परियोजना अन्वेषक थे।

 

तारा के रुचि का क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन संरक्षण और उत्थान है। वर्तमान में सरकार के विचार मंच ‘सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज’ (सी-गंगा) के प्रमुख हैं और गंगा संरक्षण के लिए सरकार के प्रमुख कार्यक्रम ‘नमामी गंगे’ के सलाहकार हैं।

 

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इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले आईआईटी के प्रोफेसर विनोद तारे वर्तमान में आईआईटी कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं। 2004 और 2006 के बीच, वह ‘पर्यावरण के अनुकूल शौचालय’ विकसित करने के लिए भारतीय रेलवे की योजना के लिए परियोजना अन्वेषक थे।

 

इंडियास्पेंड के साथ इस साक्षात्कार में, तारे ने भारतीय रेल गाड़ियों में कचरे के प्रबंधन की समस्याओं और उन कारणों को समझाया कि यह असफल क्यों है।

 

24 वर्षों के प्रयोग के बाद, भारतीय वैज्ञानिक समुदाय रेल जैव शौचालयों पर एक व्यावहारिक मॉडल विकसित करने में असमर्थ रहा है। अब जैव-शौचालयों के ऊपर वैक्यूम शौचालयों को फिट करने की नई योजना है। इसमें कई पेंच हैं। आप स्थिति का विश्लेषण कैसे करते हैं?

 

भारतीय संदर्भ में चुनौतियां कई हैं। जैसे कि पश्चिमी देशों में ‘सूखी सफाई’ प्रथाओं के विपरीत भारतीयों को ‘गीली सफाई’ (शौचालयों में) की आदत है। इसलिए, भारतीय ट्रेनों में अपशिष्टों की मात्रा काफी अधिक है।

 

इसके अलावा, भारत में रेल कोच (72 बर्थ के औसत के साथ ) एक बड़ा भार ले जाते हैं और यात्रियों को दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में लंबी दूरी पर ले जाया जाता है। भारतीय गाड़ियों में तापमान भिन्नताएं 45 डिग्री सेल्सियस (डिग्री सेल्सियस) से 4 डिग्री सेल्सियस तक होती है।

 

मेरे नेतृत्व में एक विशेषज्ञ समिति ने 2007 में यह निष्कर्ष निकाला था कि ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन’ (डीआरडीओ) द्वारा विकसित जैव-शौचालय आदर्श नहीं थे। फिर भी, भारतीय रेल इस मॉडल को उदय करने के निर्णय के साथ आगे बढ़ गया। इलाहाबाद में वर्ष 2013 कुंभ मेले में ये शौचालय विफल रहे थे।

 

बाद में, सेना के लोगों ने मुझे एक सेमिनार में बताया कि सियाचिन ग्लेशियर में स्थापित शौचालय गैर-कार्यात्मक थे। सभी प्रकार के मुद्दे अब रेल बायो-शौचालयों के साथ उभर रहे हैं, जो सेप्टिक टैंक से बेहतर नहीं हैं। हाल ही के एक अध्ययन में आईआईटी मद्रास ने इसी तरह के निष्कर्ष निकाले हैं।जैव-शौचालयों के ऊपर वैक्यूम शौचालयों को ढंकने से समस्या हल हो जाने की संभावना नहीं है। यार्डों पर अभी भी निकास व्यवस्था की आवश्यकता होगी।

 

तकनीकी समाधान मौजूद हैं, लेकिन स्थायी समाधान खोजने का इरादा नजर नहीं आता है। नौकरशाहों के विभिन्न समूहों को केवल लक्ष्य को पूरा करने में और उनके कार्यकाल को एक मुसीबत से मुक्त करने में रुचि रही है। यही कारण है कि यह योजना इस हालात में है।

 

इंडियास्पेंड लेख के जवाब में, भारतीय रेलवे ने दावा किया है कि रेल जैव-शौचालय, डीआरडीओ स्थिर शौचालयों की तुलना में और शायद अधिक कुशल थे। क्या आप इसे समझा सकते हैं?

 

यह नहीं हो सकता। दरअसल, स्थिति काफी विपरीत है। स्थिर शौचालयों की तुलना में एक ट्रेन शौचालय में मल पदार्थ का प्रतिधारण समय बहुत कम है। ट्रेन की गति में होने और अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में यात्रा करने के दौरान बायो-डिग्रेडेशन प्रक्रिया को पूरा करना आवश्यक है। यह एक बड़ी चुनौती है।

 

किसी भी स्थिति में, एक स्थिर या एक ट्रेन शौचालय की डिजाइन या तकनीक में कोई अंतर नहीं है। देखिए, यह समस्या है। स्थायी समाधानों की दिशा में काम करने की जरूरत है।

 

डीआरडीओ के शौचालयों के साथ वास्तव में क्या समस्याएं हैं?

 

ये शौचालय टैंकों को रखने से बेहतर नहीं हैं बहुत कम जैविक उपचार हो रहा है। यह दावा कि अंटार्कटिका से प्राप्त जीवाणु के एक यौगिक का उपयोग कर मानव मलों को गैसों (मीथेन) और और तरल में तोड़ा जा रहा है, वह वैज्ञानिक डेटा पर आधारित नहीं हैं।

 

अगर, दावे के अनुसार, मीथेन का उत्पादन किया जा रहा है, यह एक समस्या है-जैसा कि मीथेन खतरनाक और ज्वलनशील पदार्थ है। यदि मीथेन का उत्पादन नहीं हो रहा है, तो इसका मतलब है कि किसी भी मामले में शौचालय के टैंकों में कोई जैविक उपचार नहीं हो रहा है। दोनों तरीकों से यह एक समस्या है।

 

बायो-शौचालयों की स्थापना पर पर्याप्त खर्च होना जारी है। रेल यार्ड में खाद या बायोगैस के लिए निकासी सुविधाएं और उपचार संयंत्र- स्थापित किए जा सकते हैं। रेलवे सुरक्षा के प्रौद्योगिकी मिशन की जैव-शौचालय समिति के प्रमुख के रूप में, मैंने 2009 में यह सुझाव दिया था। मैंने वर्ष 2015 में रेलवे मंत्री सुरेश प्रभु के साथ बैठक में इस विचार पर भी चर्चा की थी।

 

दो लेखों की श्रृंखला यहां समाप्त होती है। पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

(झा स्वतंत्र पत्रकार हैं, नई दिल्ली में रहते हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 7 जनवरी 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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