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एक साल में बैंक धोखाधड़ी के मामले दोगुने

गंगाधर एस पाटिल,

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बैंगलुरु – बढ़ते बैंक धोखाधड़ी पर नियंत्रण पाने के उदेश्य से मई 2015 में भारतीय रिजर्व बैंक ( आरबीआई ) ने केंद्रीय धोखाधड़ी रजिस्ट्री की स्थापना की है। इसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने धोखाधड़ी का पता लगाने की प्रणाली की समीक्षा करने के लिए एक बैठक भी बुलाई थी। इससे स्पष्ट है कि बढ़ते बैंक धोखाधड़ी के मामले सरकार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

 

बैंक धोखाधड़ी केवल कुछ चेक के बाउंस होने तक ही सीमित नहीं है।

 

मीडिया ने इन धोखाधड़ियो को रिपोर्ट करने का प्रयास किया है लेकिन मोटे तौर पर , बैंक की गैर निष्पादित आस्तियों में वृद्धि (एनपीए) पर दोष लाद दी जाती है।

 

अब बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप,  onlineRTI.com द्वारा प्राप्त आंकड़ों से नागरिकों को सूचना के अधिकार (आरटीआई ) अधिनियम के तहत प्रश्न पूछने या पूछताछ दाखिल करने में मदद कर रही है। आरटीआई के माध्यम से पता चलता है कि इन धोखाधड़ियों के लिए केवल एनपीए को ही दोष नहीं ठहराया जा सकता है।

 

भारत की बैंकिंग प्रणाली के लिए चेतावनी बनते हुए 2013-14 और 2014-15 के बीच एनपीए में 23 फीसदी की वृद्धि हुई है लेकिन एक सत्य यह भी है कि जब से नरेंद्र मोदी की सरकार ने कार्य भार संभाला है, बैंक धोखाधड़ी में 100 फीसदी की वृद्धि हुई है ( रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार)। दरअसल इस कारण से ही आरबीआई ने धोखाधड़ी रजिस्ट्री की स्थापना एवं  पीएमओ ने धोखाधड़ी का पता लगाने प्रणाली की समीक्षा की है।

 
भारत की बैंकिंग प्रणाली में गैर-निष्पादित संपत्ति
 

 

मोदी सरकार के कार्य भार संभालने के बाद एक साल से वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान बैंक धोखाधड़ी में शामिल राशि 10,170 करोड़ रुपए (1.6 बिलियन डॉलर) से बढ़ कर 2014-15 में 19,361 करोड़ रुपए ( 3 बिलियन डॉलर) यानि लगभग 100 फीसदी हो गया है।

 
एक लाख रुपए से अधिक राशि शामिल होने वाली धोखाधड़ी
 

 

इनमें फर्जी ऋण से लेकर डेबिट / क्रेडिट कार्ड के जरिए धोखाधड़ी एवं साइबर धोखाधड़ी शामिल है।

 

बैंक धोखाधड़ी के संबंध में महाराष्ट्र एवं पश्चिम बंगाल सबसे आगे

 

महाराष्ट्र एवं पश्चिम बंगाल के बैंकों द्वारा धोखाधड़ी के मामलों में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है। गौरतलब है कि दोनों राज्यों में हुए धोखाधड़ी के माध्यम से कम से कम 50 फीसदी कुल नुकसान के लिए ज़िम्मेदार है। महाराष्ट्र में बैंक धोखाधड़ी में 150 फीसदी की वृद्धि हुई है। गौरतलब है कि 2013-14 के दौरान महाराष्ट्र के बैंकों को धोखाधड़ी के माध्यम से 2445 करोड़ रुपए ( 376 मिलियन डॉलर ) का नुकसान हुआ था वही वर्ष 2014-15 में यह बढ़ कर 6115 करोड़ रुपए ( 940 मिलियन डॉलर ) हो गया है। यदि बात पश्चिम बंगाल की की जाए तो बैंकों में धोखाधड़ी के संबंध में छह गुना की वृद्धि हुई है। 2013-14 में जहां 773 करोड़ रुपए ( 118 मिलियन डॉलर ) का नुकसान हुआ था वहीं 2014-15 में यह आंकड़े 5,930 करोड़ रुपए ( 912 मिलियन डॉलर ) दर्ज की गई है।

 

आरबीआई प्रत्येक वर्ष 30 फीसदी मामले ही बंद करने में सफल हो पाई है।

 
भारत में एक लाख रुपए की धोखाधड़ी
 

 

बैंक धोखाधड़ी का सबसे अधिक खामियाज़ा सार्वजनिक बैंकों को उठाना पड़ रहा है। यदि 2014-15 की नुकसान सूची को देखा जाए तो 2,310 करोड़ रुपए ( 355 मिलियन डॉलर ) के आंकड़ों के साथ इसमें सबसे उपर नाम पंजाब नेश्नल बैंक का है। 2,150 करोड़ रुपए ( 330 मिलियन डॉलर ) की नुकसान राशि के साथ इस सूची में दूसरा नाम भारतीय केंद्रीय बैंक का है। आंकड़ों के अनुसार 2012-13 के बाद से धोखाधड़ी के संबंध में दोनों बैंकों में 200 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 
एक लाख रुपयों से अधिक राशि की धोखाधड़ी
 

पश्चिम बंगाल में होने वाले बैंक धोखाधड़ी के मामलों के देख कर विशेषज्ञ भी परेशान हैं। कुछ का मानना है कि अब धोखाधड़ी के अधिक मामले रिपोर्ट होने लगे हैं वहीं कुछ का कहना है कि बैंकिंग लेनदेन में वृद्धि के कारण इन मामलों में बढ़ोतरी हो रही है।

 

राजेश गोयल , एक पूर्व बैंकर और allbankingsolution.com के संस्थापक, एक बैंकिंग प्रहरी पोर्टल, का कहना है कि पश्चिम बंगाल में बढ़ते बैंक धोखाधड़ी के मामलों की एक गहन जांच होनी चाहिए।

 

गोयल कहते हैं कि, “पीएनबी के मामले में धोखाधड़ी में वृद्धि अभूतपूर्व है और हो सकता है या तो आंकड़े गलत हैं या यह इनसे पहले के वर्षों में दबे मामले थे जिनकी सूचना अब की जा रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने इनके मूल कारणों को जानने या धोखेबाजों के काम करने का ढंग खोजने के लिए तात्कालिकता कभी नहीं दिखाया गया है। जैसे ही मामलों की जांच शुरु होती है बैंक आगे कोई सुराग उपलब्ध हैं कि याचिका के साथ जांच बंद कर देती है।”

 

अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ के महासचिव विश्वास उतागी के अनुसार सरकार को इन मामलों को फास्ट ट्रैक से सुलझाना चाहिए क्योंकि ऐसे मामलों में जनता के पैसों के साथ खिलवाड़ किया जाता है।

 

निजी बैंकों की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों धोखाधड़ी मामले को बेहतर संभालते हैं

 

आम धारणा के विपरीत, निजी बैंकों की तुलना में सार्वजनिक बैंकों ने धोखाधड़ी के मामलों के बेहतर ढ़ंग से संभाला है।

 

निजी बैंकों की बाज़ार में 30 फीसदी हिस्सेदारी होने का बावजूद सामूहिक रुप से बैंक धोखाधड़ी से होने वाले नुकसान 40 फीसदी है। भारत में 20 निजी बैंक , 26 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और 30 विदेशी बैंक हैं।

 

 

जुलाई में आरबीआई द्वारा जारी एक परिपत्र के अनुसार यदि बैंकों में धोखाधड़ी होने का पता चलता है तो उन्हें मामले की जानकारी केंद्रीय जांच ब्यूरो, पुलिस या गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय  को देनी चाहिए।

 

कुछ मामलों में बैंक कर्मचारियों के भी शामिल होने की बात सामने आई है। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014-15 में धोखाधड़ी के ऐसे 47 मामले ( कुल 177 करोड़ रुपए ) सामने आए हैं।

 

उतगी का आरोप है कि जब भी किसी धोखाधड़ी में मामले में बैंक कर्मचारियों के शामिल होने की बात सामने आती है, बैंक उस मामले को दबाने की कोशिश करता है एवं उसे एनपीए के रुप में वर्गीकृत करता है ( यह दिखाने के लिए कि व्यापार में नुकसान हुआ है)।

 

राज्य मंत्री ( वित्त) जयंत सिन्हा के जुलाई में संसद में दिए गए एक बयान के अनुसार एनपीए, एक ऐसी खाल जिनके पीछे धोखाधड़ी के मामलों को छुपाया जाता है, में 23 फीसदी की वृद्धी हुई है। मार्च 2014 2,51,060 करोड़ रुपए ( 38 बिलियन डॉलर ) से बढ़कर मार्च 2015 में यह 3,09,409 करोड़ रुपए ( 48 बिलियन डॉलर ) हो गई है।

 

( गंगाधर एस पाटिल www.101reporters.com के संस्थापक हैं। यह जमीनी पत्रकारों का भारतीय नेटवर्क है। पाटिल इकोनोमिक टाइम्स, डीएनए और न्यू इंडियन एक्सप्रेस के साथ काम कर चुके हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 17 नवंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 


 

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