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कभी सोचा आपने, स्कूलों में अनुपस्थित क्यों रहते हैं शिक्षक?

अनिश माधवन,

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36 वर्षीय हीरालाल राजस्थान के बसरापुर के गांव के छोटे से सरकारी स्कूल में हेड टीचर हैं। हीरालाल शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम द्वारा निर्धारित 200 दिनों के स्कूल के समय में से 45 दिन ( 22.5 फीसदी ) अनुपस्थित थे। ( गोपनीयता बनाए रखने के लिए शिक्षक और स्कूल का नाम बदल दिया गया है। )

 

एक ऐसे देश में जहां सरकार की ओर से राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण के मुताबिक, कक्षा 3 के 59 फीसदी बच्चे पढ़ और समझ सकते हैं, स्कूल के वातावरण को बदलने और सीखने को प्रोत्साहित करने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले शिक्षण कार्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

 

हीरालाल के अनुपस्थित होने का कारणों पर भी गौर करने की जरूरत है। हीरालाल परीक्षा ड्यूटी, प्रशिक्षण और चुनाव संबंधित ड्यूटी के कारण 21 दिन अनुपस्थित थे, जबकि अन्य 15 दिन न आने का कारण व्यक्तिगत था। इनमें 10 दिन की छुट्टी चिकित्सा कारणों से थी, जिसके लिए वे अनुबंध के हिस्से के रूप में भी हकदार हैं। औसतन, बसरापुर के विद्यालय में 200 दिनों में से 16 दिन ( 8.4 फीसदी ) शिक्षक किसी दूसरे आधिकारिक ड्यूटी पर थे।

 

जबकि कुल शिक्षकों की अनुपस्थिति 18.9 फीसदी थी। बिना कारण के शिक्षकों की अनुपस्थिति 2.5 फीसदी थी, जैसा कि अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में सामने आया है। यह एक गैर लाभकारी संस्था है जो छह राज्यों- छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में शिक्षा पर काम करता है। हीरालाल मामले का अध्ययन इस शोध का एक हिस्सा था, जिसमें 619 सरकारी स्कूलों में 2,861 शिक्षकों को शामिल किया गया था।

 

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Source: Azim Premji UniversityNote: As ‘overall absence’ and ‘reasons for absence’ are calculated based on the bases/counts of properly recorded responses for the relevant variables, there are small differences in the respective totals.

 

यह अध्ययन भारत में सभी सरकारी स्कूलों के लिए एक तरह का नहीं हो सकता है। ये स्कूल उन जिलों और ब्लॉक से थे जहां अजीम प्रेमजी फाउंडेशन काम करता है। इनमें देश के सबसे अधिक वंचित लोग शामिल हैं।

 

विद्यालय में शिक्षक के न होने के संबंध में आंकड़े और सूचना को अक्सर शिक्षकों की अनुपस्थिति के रूप में देखा जाता है। विद्यालय में शिक्षक के न होने के कई कारण हो सकते हैं, कभी-कभी किसी उपयोगी कारण से भी ऐसा हो सकता है। दूसरी ओर, ‘शिक्षक अनुपस्थिति’ का अर्थ है शिक्षकों का किसी वैध कारण के बिना विद्यालय से अनुपस्थित रहना । इसे अकारण गैरहाजिर भी समझा जा सकता है। । शिक्षकों के क्लास में  न होने को शिक्षक की अनुपस्थिति के साथ जोड़कर देखने का परिणाम घातक भी हो सकता है और यह कई तरह के भ्रष्टाचार को जन्म दे सकता है।

 

अधिकतर ‘आधिकारिक’ कारणों से शिक्षक अनुपस्थित

 

अध्ययन में पाया गया कि, अक्सर जब शिक्षक शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित नहीं थे, तो उसके पीछे आधिकारिक कारण जैसे प्रशिक्षण, डेटा संग्रह या अधिकृत छुट्टी है।

 

अनुपस्थिति के लिए सरकारी कारणों में ‘आधिकारिक शैक्षणिक ड्यूटी’ शामिल हैं, जैसे  प्रशिक्षण और क्लस्टर मीटिंग। ‘आधिकारिक स्कूल प्रशासनिक ड्यूटी’  में डेटा संग्रह, मिड डे मील प्रोग्राम से संबंधित रिपोर्ट या डेटा प्रस्तुत करना, विशेष जरूरत वाले बच्चे, और पाठ्यपुस्तकों के वितरण जैसे विभिन्न छात्र-प्रोत्साहन कार्यक्रमों से संबंधित काम और अन्य विभागीय काम जैसे चुनाव से संबंधित कार्य, जनगणना सर्वेक्षण आदि शामिल हैं।

 

कई अध्ययनों में शिक्षक का गैर हाजिर होना और शिक्षक अनुपस्थिति के बीच एक बड़ा अंतर पाया गया है।

 

उदाहरण के लिए, वर्ष 2016 में विश्व बैंक समूह के एक अध्ययन में, शिक्षकों की अनुपस्थिति 23.64 फीसदी थी, जबकि बिना कारण उपस्थित न रहने वाले शिक्षकों के लिए आंकड़े 4.7 फीसदी थे।

 

इसके बावजूद,  बिना किसी ठोस आधार के शिक्षकों की जवाबदेही और अनुपस्थिति पर अक्सर वरिष्ठ सरकारी अधिकारी उच्च आंकड़े बताते हैं- लगभग 25 फीसदी और कभी-कभी तो 50 फीसदी के बराबर भी।

 

स्कूलों में शिक्षक कठिन परिस्थितियों में करते हैं काम

 

स्कूल के एक सामान्य दिन पर एक शांत स्वभाव वाला दुबला-पतला सा आदमी हीरालाल अपनी मोटर साईकल से बसरापुर के अपने स्कूल जाता है, जो कि देश के 10 लाख से अधिक प्राथमिक विद्यालयों में से एक है।

 

आमतौर पर हीरालाल स्कूल शुरु होने के 15 मिनट पहले पहुंच जाते हैं। स्कूल में कक्षा 1 से 5 तक में 82 छात्र हैं। तीन पूर्णकालिक शिक्षक और एक अस्थायी शिक्षक हैं।

 

समुदाय के सदस्यों के मुताबिक, इसके छात्र ज्यादातर कनजार हैं। यह एक ऐतिहासिक रूप से खानाबदोश समुदाय है, जो मुख्यतः शराब का उत्पादन करता है।

 

हीरालाल कहते हैं, इस समुदाय के लोगों में बच्चों की शिक्षा को जरूरी बता पाना कठिन है।

 

हीरालाल के प्रयासों के कारण वर्ष 2001 में यह स्कूल स्थापित हुआ था । तब से इस स्कूल में  नामांकन बढ़ रहा है। हीरालाल गणित और पर्यावरण विज्ञान पढ़ाते हैं। वर्ष 2007 तक, जब तक स्कूल की इमारत मंजूर नहीं हुई थी, तब तक हिरालाल ने अपनी जेब से स्कूल के लिए 200 रुपए का मासिक किराया चुकाया है।

 

स्कूल में शिक्षक कई तरह की चुनौतियों का सामना करते हैं। स्कूल मुख्य रूप से हाशिए वाले ऐसे समुदायों पर केंद्रित है, जो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसे नहीं जुटा सकते। बच्चों को पढ़ाना उनकी प्राथमिकता में नहीं है।

 

हालांकि इस स्कूल में पर्याप्त बुनियादी ढांचा नहीं है। कक्षाओं की संख्या की तुलना में शिक्षकों की संख्या कम है । जिला और ब्लॉक-स्तर के शिक्षा अधिकारियों द्वारा इस स्कूल को बहुत सुविधा या सहायता नहीं मिल पाती।

 

यहां के दो शिक्षकों को स्कूल तक पहुंचने में एक से दो घंटे का समय लगता है ( यात्रा के लिए लगने वाले अधिक समय का शिक्षकों की अनुपस्थिति के साथ रिश्ता है।) फिर भी वे नियमित रूप से स्कूल आते हैं और लगभग 11 अधिकृत व्यक्तिगत छुट्टी ही लेते हैं।

 

क्या हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि शिक्षण की प्रकृति ही शिक्षकों को प्रतिबद्ध, और प्रेरित करती है। ऐसे में बाहरी बाहरी निगरानी के बिना भी वे खुद ही अपनी जवाबदेही तय करते हैं।इसके लिए एक सक्षम वातावरण बनाने की हमें कोशिश करनी चाहिए जिससे शिक्षकों पर हमारा विश्वास बढ़े।

 

यह जानना महत्वपूर्ण है कि शिक्षक अनुपस्थित क्यों हैं?

 

शिक्षक अनुपस्थिति को अक्सर एक सबसे महत्वपूर्ण समस्या के रूप में देखा जाना, सरकारी स्कूल प्रणाली की स्थिति को और बद्तर बनाता है।

 

उदाहरण के लिए, सरकार के 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में शिक्षकों की अनुपस्थिति को रोकने के लिए बॉयोमेट्रिक सिस्टम का सुझाव दिया गया है।

 

इस अध्ययन में दिए गए साक्ष्यों और पहले के साक्ष्यों से कुछ सवाल उठते हैं। क्या हमें शिक्षा के क्षेत्र में व्यवस्थित सुधार पर ध्यान केंद्रित करते हुए पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित नहीं करनी चाहिए? हमें कुछ ऐसा भी करना चाहिए कि शिक्षकों को  निरंतर व्यावसायिक विकास के अवसर मिले। क्या उत्तम परिणाम के लिए शिक्षकों के गैर-शैक्षणिक कार्यों से दूर रखने की जरूरत नहीं है?

 

शिक्षा को लेकर हमने जो संस्कृति बना ली है, उसमे हर बात के लिए शिक्षकों पर दोष देने की हमें आदत सी हो गई है। तब हम यह भूल जाते हैं कि देश में शिक्षक किस तरह से चुनौतीपूर्ण स्थितियों में काम करते हैं। कई बार तो हम शिक्षकों को ऐसे मामले के लिए कोसते हैं, जो उनके नियंत्रण में नहीं होता। हमें इस बात पर ध्यान  देने की जरूरत है कि इस तरह के दोषारोपण और सरकारी स्कूल प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

 

(अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़े माधवन फील्ड रिसर्च के प्रमुख हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 26 अप्रैल 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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