Home » Cover Story » कम हो रहा है कुपोषण लेकिन अल्पपोषितों की संख्या है अधिक

कम हो रहा है कुपोषण लेकिन अल्पपोषितों की संख्या है अधिक

प्राची सालवे एवं सौम्या तिवारी,

620_malnut

 

भारत में 2006 से 2014 के दौरान, पांच साल से कम उम्र के अविकसित (कम कद के) बच्चों की दर 48 फीसदी से गिरकर 39 फीसदी हो गई है। कम वज़न वाले बच्चों की संख्या में 35 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन भारत में अब भी अविकसित बच्चों की संख्या 40 मिलियन एवं पांच वर्ष से कम उम्र के कमज़ोर बच्चों की संख्या करीब 17 मिलियन है।

 

यह कुछ निष्कर्ष हैं जो भारत में पोषण सुरक्षा के लिए भारत स्वास्थ्य रिपोर्ट, 2015 में सामने आए हैं। यह रिपोर्ट भारत पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ( पीएचएफआई ) द्वारा 10 दिसंबर 2015 को जारी किया गया है।

 

इंडियास्पेंड ने देश भर में सामान आय वाले लोगों के पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के एक नमूने की तुलना की है। हमने अपने अध्ययन में पाया कि हमारे दक्षिण एशियाई पड़ोसी, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में कम वज़न वाले बच्चों की संख्या अधिक है।

 

लेकिन भारत की समस्या, इसके 1.2 बिलियन लोग है, यनि कि दूसरे देशों की तुलना में हमारे देश में कमज़ोर बच्चों ( कम वज़न एवं कम कद ) एवं अविकसित बच्चों ( उम्र के लिए सामान्य कद से नीचे ) की संख्या अधिक है।

 
देश अनुसार पांच वर्ष से कम उम्र के कम वज़न वाले बच्चों का अनुपात
 

 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों से बच्चों की स्वास्थ्य आंकड़ों में सुधार होना इस बात का प्रमाण है। यह सर्वेक्षण हर दस वर्ष के अंतराल पर किया जाता है – 1995-95, 2005-06 और हाल ही में यह रैपिड सर्वे 2013-14 में की गई है ( आरएसओसी )।

 

भारत में कुपोषण की प्रवृति

 

 

पीएचएफआई पोषण अध्ययन का निष्कर्ष है पिछले दो दशकों में, आय में वृद्धि एवं बढ़ती कृषि उत्पादकता का कुपोषण की दर में गिरावट होने का योगदान रहा है।

 

अध्ययन के अनुसार, लेकिन गरीबी  व्यापक है एवं विभिन्न प्रथाएं, भोजन संबंधी आदतें, वर्ग और जाति विभाजित सांस्कृतिक एवं आय की असमानता ही अल्पपोषण के मुख्य कारण हैं।

 

( सालवे एवं तिवारी इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 11 दिसंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 


 

“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

 

Views
6250

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *