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किस प्रकार वंचित जातियों के छात्रों को उच्च शिक्षा पाने में आरक्षण करता है मदद

चारु बाहरी,

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दिल्ली में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान बाड़ पार करने की कोशिश में पुलिस से हाथापाई करते भारतीय आरक्षण समर्थक कार्यकर्ता। शिक्षा आंकड़ों की समीक्षा इस बात की पुष्टि करता है कि उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों की संख्या बढ़ रही है लेकिन उनकी संख्या अब भी सामान्य जनसंख्या के अनुपात में पीछे है।

 

245 इंजीनियरिंग कॉलेजों में भारत की सबसे वंचित जातियों एवं जनजातियों से कम से कम 26 फीसदी पुरुष और 35 फीसदी महिला छात्रों का प्रवेश आरक्षण के बिना नहीं हो सकता था। यह जानकारी नई अध्ययन में सामने आई है जो कहती है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक कार्रवाई नीति काफी हद तक काम करता है।

 

अमेरिकी आर्थिक समीक्षा में प्रकाशित, अमेरिका ‘ कार्नेगी मेलॉन विश्वविद्यालय से शोधकर्ताओं द्वारा 53374 अनुसूचित जाति (एससी) , अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) और सामान्य छात्रों पर किए गए अध्ययन कहती है कि, हालांकि प्रतिकूल परिस्थिति में, आरक्षण उन लोगों को जगह देता है जो सकारात्मक कार्रवाई के लिए योग्य नहीं है।

 

इंडियास्पेंड के तीन भाग के श्रृंखला जो उच्च शिक्षा में वंचित भारतीय समुदायों की स्थिति की जांच करेगा, के इस पहले भाग में शिक्षा आंकड़ों की समीक्षा इस बात की पुष्टि करता है कि उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या बढ़ रही है लेकिन अब भी सामान्य जनसंख्या के अनुपात में पीछे है।

 

लेख के दूसरे भाग में हम समझाएंगे कि,वंचित पृष्ठभूमि से अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों के लाभ के लिए क्यों सरकार को ओबीसी आरक्षण के पुनर्गठन पर विचार करना चाहिए, जैसा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में सामान्य जनसंख्या के अनुपात के करीब होते उनके अनुपात के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी है। तीसरे भाग में हम बताएंगे किस प्रकार मुस्लमान उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हर वंचित समूह में यहां तक ​​कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में पीछे है।

 

वंचित जातियों के अनुसार अनुमानित इंजीनियरिंग कॉलेज नामांकन

Source: American Economic ReviewHover over the chart for more details.BC-A, BC-B, BC-C, BC-D refer to sub-categories A, B, C, D of Backward Caste. SC: Scheduled Caste, ST: Scheduled Tribe.

 

नवीन गुराप्पु की कहानी: आत्मसंशय से आत्मविश्वास तक

 

25 वर्षीय नवीन गुराप्पु एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है और मुंबई में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में डॉक्टरेट के छात्र हैं। नवीन, भारत के 34 वर्षीय पुरानी सबसे वंचित समूहों के लिए आरक्षण व्यवस्था की अभिव्यक्ति हैं।

 

हैदराबाद के रहनेवाले गुराप्पु के पिता बैंक में क्लर्क हैं और उन्हें में नौकरी आरक्षण के ज़रिए मिली है। गुराप्पु कहते हैं, “यह अनुसूचित जाति का कोटा नहीं होता तो मैं और मेरे पिता इतनी दूर तक नहीं आ पाते।”

 

मलस जाति से संबंध रखने वाले गुराप्पु कहते हैं, “मेरे पिताजी ने  हैदराबाद के एक अच्छे स्कूल, सेंट मार्टिन हाई स्कूल में मेरे दाखिला दिलाया क्योंकि वह चाहते थे कि मैं अच्छी पढ़ाई करुं। एसबीआई (भारतीय स्टेट बैंक) ने स्टेशनरी आदि के लिए सालाना 500 रुपए का फेलोशिप की सहायता दी। हम अतिरिक्त ट्यूशन या घर पर इंटरनेट का खर्चा वहन नहीं कर सकते थे हालांकि मुझे इसकी सख्त ज़रुरत थी। पिताजी मेरे कॉलेज, कोचिंग और किताबों का खर्चा उठाया। उन्होंने मुझे पहली फिल्म तब दिखाई जब मैं 11वीं में था।” गुराप्पु की आईआईटी की पढ़ाई के लिए परिवार ने बैंक से कर्जा लिया है जो इसे अब भी चुका रहे हैं। इंजीनियरिंग कार्यक्रम और पीएचडी के लिए अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के छात्रों को लगभग 60,000 रुपए देते पड़ते हैं।

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नवीन गुराप्पु, 25, आईआईटी बॉम्बे में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर और डॉक्टरेट के छात्र हैं। वे आईआईटी में प्रवेश नहीं ले पाते यदि स्नातक इंजीनियरिंग की डिग्री के लिए यह सकारात्मक कार्रवाई नहीं होती। 53,374 छात्रों के एक नए अध्ययन के अनुसार, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति से कम से कम 26 फीसदी पुरुष और 35 फीसदी महिला छात्रों 245 इंजीनियरिंग कॉलेजों में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण से लाभान्वित हुए हैं।

 

आईआईटी में अपने पहले वर्ष में, सवर्ण साथियों के विपरीत गुराप्पु को पाठ समझने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी है। वह कहते हैं, “फिर भी मैं अन्य वंचित जाति के छात्रों की तुलना में बेहतर था क्योंकि मैं एक शहर से आया था।”

 

आरक्षण वंचितों को मदद और प्रेरित करता है

 

कार्नेगी मेलॉन अध्ययन, जिसमें 42,914 छात्रों के पहले वर्ष के स्कोर की हाई स्कूल के स्कोर के साथ तुलना की गई है, कहती है सकारात्मक कार्रवाई वंचित जातियों को, जो सवर्ण से पीछे हैं, उनको स्कूलों से कॉलेज में बेहतर प्रदर्शन के लिए बढ़ावा देते हैं।

 

गुराप्पु, जिन्हें गांधीनगर आईआईटी के शुरु के वर्ष में काफी संघर्ष करना पड़ा था, इस मूल्यांकन से सहमती रखते हैं। वह कहते हैं, “समय के साथ मैं आईआईटी की प्रणाली और स्तर के साथ समायोजित हो गया और यहां तक कि कुछ विषयों में मैं टॉपर के बराबर हो गया। सही मानसिकता और अवसर के साथ, सामाजिक स्तर पर वंचित कोई भी छात्र, उच्च शिक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।”

 

अन्य छात्रों की तुलना में वंचित छात्र अधिकतर प्रतियोगी विषयों जैसे कि इलोक्ट्रोनिक्स, कंम्यूनिकेशन और कंमप्यूटर साइंस चुनते हैं। आरक्षण एक तुल्यकारक है, लेकिन यह उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों को पर्याप्त नहीं मिलता है।

 

डेनिस एप्पल, अमेरिकी आर्थिक समीक्षा अध्ययन के सह लेखक ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “यहां तक कि सकारात्मक कार्रवाई से उपस्थिति में बढ़त के साथ अपनी जनसंख्या के शेयरों की तुलना में सबसे वंचित जातियां अब भी छोटे अनुपात में भाग ले रही हैं।”

 

एप्पल कहते हैं, “हमारा काम इस बात की ओर भी इशारा करता है कि क्यों सकारात्मक कार्रवाई नीतियां बहस उत्पन्न करती हैं। हमने पाया कि वंचित छात्रों के लिए बेहतर शैक्षिक परिणाम उनलोगों की कीमत पर मिलती है जो सकारात्मक कार्रवाई प्राप्त नहीं कर पाते हैं।”

 

तो आधार-रेखा यह है कि: उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण से लाभ मिला है, लेकिन सकारात्मक कार्रवाई सावधानी से लागू किया जाना चाहिए , समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए और सबसे अच्छे परिणाम के लिए समायोजित करना चाहिए।

 

यह निर्धारित करने के लिए कि क्या भारत में आरक्षण अब भी जायज़ है, इंडियास्पेंड ने उच्च शिक्षा में नामांकन डेटा विच्छेदित किया है।

 

आरक्षण और उच्च शिक्षा के विस्तार से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति नामांकन में बढ़ावा, लेकिन पर्याप्त नहीं

 

1982 में, भारत सरकार ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए 15 फीसदी और 7.5 फीसदी आरक्षण की शुरुआत की है। कुछ राज्यों में स्थानीय जनसांख्यिकी के भाग में प्रतिशत में सुधार किया है, जैसा कि संविधान अनुमति देता है। इसलिए, तमिलनाडु में, उच्च शिक्षा में अनुसूचित जनजातियों के लिए 18 फीसदी, अनुसूचित जनजातियों के लिए 1 फीसदी आरक्षित है। आदिवासी बहुल उत्तर-पूर्व के कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए 60 फीसदी सीटें आरक्षित हैं।

 

2000 और 2014 के बीच, अनुसूचित जाति की सकल नामांकन दर (जीईआर), उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक नामांकन का प्रतिशत का एक माप, किसी भी उम्र में, दिए गए शैक्षणिक वर्ष में, उस वर्ष उच्च शिक्षा के लिए 18- 23 वर्षीय आबादी – दोगुना से भी अधिक है जबकि अनुसूचित जनजाति की दोगुनी है।
 

उच्च शिक्षा में आरक्षण –  बड़ी संख्या

 

Source: SAGE Publications, All India Survey on Higher Education, , Ministry of Tribal Affairs, Sikh Institute, UNESCO, National Sample Survey Office

 

Notes:1. Gross Enrolment Ratio for Other Backward Classes and Muslims shown for 2000-01 is from 1999-2000.2. Gross Enrolment Ratio for Other Backward Classes and Muslims shown for 2014-15 is from 2009-10.3. OBC share of population: Kaka Kalelkar Commission estimate. OBC share in population has been variously reported since Independence, with no definite assessment as the last caste census in India was done in 1931.4. SC and ST literacy rates for 2014-2015 are from NSS 55th Round.5. OBC Literacy Rate: 54.8% rural, 75.3% urban6. Muslim Literacy rate: rural male 69.1%, urban male 81%, rural female 47.4%, rural male 65.5%

 

आरक्षण का दूरगामी प्रभाव पड़ा है,खुद को शिक्षित करने के लिए नई पीढ़ी में तेजी हुई है।

 

मिशिगन विश्वविद्यालय में,अर्थशास्त्र के प्रोफेसर, थॉमस ई वेइसकोप्फ, जिन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हाशिए पर भारतीय सामाजिक समूहों के लिए आरक्षण के पक्ष में तर्क दिया है, कहते हैं, “पिछले दशकों में आरक्षण से उच्च शिक्षित सदस्यों के साथ अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के परिवारों की संख्या में वृद्धि हुई है जो परिवार के सदस्यों को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए प्रोत्साहित और समर्थन प्रदान करते हैं।”

 

यदि सामान्य जनसंख्या और उच्च शिक्षा में भागीदारी में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी के बीच समानता होती है तो अभी की तुलना में अनुसूचित जाति एक तिहाई से अधिक सीटों पर कब्ज़ा कर सकते हैं जबकि अनुसूचित जनजाति का कब्जा दोगुने के करीब होगा।

 

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति उच्च शिक्षा नामांकन में वृद्धि के लिए 5 तरीके

 

1. अधिक बुनियादी ढांचे बनाएं: सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रिजनल डेवलप्मेंट, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सच्चिदानंद सिन्हा कहते हैं अधिक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों बना कर उच्च शिक्षा में निवेश कर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नामांकन में मदद मिलेगी।

 

आइडेन्टफकेशन ऑफ एडुकेश्नली बैकवॉर्ड डिस्ट्रिक्ट, 2007 में सिन्हा द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के लिया किया गया एक अध्ययन, के अनुसार उच्च कॉलेज जनसंख्या सूचकांक (सी- पीआई) –  18 से 23 वर्ष के बीच  हर 100,000 लोग के लिए एक जिले में कॉलेजों की संख्या – के साथ वाले ज़िलों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उच्च शिक्षा में नामांकन अधिक है।

 

वह कहते हैं, “जैसा कि वंचित युवा सरकार द्वारा चलाए जा रहे और मिशनरी / सीएसआर (कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) संचालित संस्थानों की ओर आकर्षित होते हैं, भारत में इसकी आवश्यकता अधिक है।”

 

हालांकि, 2000 के बाद से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या में 24 फीसदी की वृद्धि हुई है, 11146 से बढ़ कर 38813 हुए हैं, अधिकतर  नए संस्थान निजी तौर पर चलाए जा रहे हैं, जिसका मतलब है कि वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए बाध्य नहीं हैं।

 

2. निजी क्षेत्र के संस्थानों के लिए सकारात्मक कार्रवाई का विस्तार: भूषण पटवर्धन, पूर्व कुलपति, सिम्बायोसिस इंटरनेशनल विश्वविद्यालय, औरस्वास्थ्य विज्ञान के अंतःविषय स्कूल, पुणे में सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, कहते हैं निजी क्षेत्र के संस्थानों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नामांकन को बढ़ावा देने के लिए वे आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के लिए सीटे आरक्षित करने और छात्रवृत्ति का प्रस्ताव रख सकते हैं।

 

3. मध्यवर्ती स्तर पर छात्रों का समर्थन : गुराप्पु कहता है, “अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के मध्यवर्ती स्तर पर और अधिक समर्थन की जरूरत है। दसवीं कक्षा और स्नातक तक छात्रवृत्ति मिलती है लेकिन मध्यस्थ महंगी तैयारी के समय के लिए वित्तीय सहायता का अभाव है।”

 

यगती चिन्ना राव, सेंटर फॉर का स्टडी ऑफ डिस्क्रिमनेशन एंड इक्स्क्लूश़न, स्कूल ऑफ सोशल साइंस, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के अध्ययक्ष कहते हैं, पोस्ट- मैट्रिक छात्रवृत्ति उच्च शिक्षा में दाखिले के बाद शुरू होती है। “बीच स्कूल छोड़ने और प्रवेश के बीच, छात्र अपने दम पर रहते हैं। निवास खर्च, केंद्र तक यात्रा आदि का खर्च परिवार पर पड़ता है, जो अधिकांश वहन नहीं कर पाते।”

 

4. अवसरों के बारे में छात्रों से परामर्श: राव कहते हैं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के परिवारों के अधिकांश बच्चे कई उच्च शिक्षा के अवसरों से अनजान हैं, विशेष रुप से वहां जहां किसी ने स्नातक की डिग्री या इससे अधिक हासिल नहीं की है।

 

गुराप्पु कहता है, इसलिए छात्रों के लिए परामर्श की ज़रुरत है ताकि वे जल्द काम करने की बजाए शिक्षा की महत्व को समझें और अवसरों को जाने। वह कहता है, “शहरों में छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के बारे में बहुत जल्दी सुनते हैं, लेकिन ग्रामीण पृष्ठभूमि से उन अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं के बारे में 12वीं के बाद पता चलता है, तब तैयारी शुरू करने के लिए बहुत देर हो चुकी होती है।”

 

5. वंचित छात्रों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में सीएसआर पहल के लिए प्रोत्साहन: गुराप्पु कहते हैं, “सभी के लिए प्राथमिक शिक्षा कई गैर सरकारी संगठनों का उद्देश्य है, लेकिन वंचित के लिए उच्च शिक्षा उदेश्य नहीं है जबकि उच्च शिक्षा से प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी, जब इसके लाभार्थि अगली पीढ़ी को बढ़ाएंगे।”

 

मिशिगन यूनिवर्सिटी के शेल्डन डैनज़िगर और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स के जेन वॉल्डफोजेल, सेक्योरिंग द फ्यूचर :  इंवेस्टिंग इन चिल्ड्रेन फ्रॉम बर्थ टू कॉलेज में कहते हैं,  निश्चित रूप से, शिक्षा ही शिक्षा को जन्म देती है।

 

डैनज़िगर और वॉल्डफोजेल कहते हैं, “शिक्षा घर पर शुरू होता है; माता-पिता के शैक्षिक स्तर यह निर्धारित करता है कि बच्चे को कितनी शिक्षा मिलेगी और वह स्कूल में कैसा करेगा”।”

 

तीन श्रृंखला लेख का यह पहला भाग है। दूसरा भाग कल प्रकाशित किया जाएगा।

 

(बाहरी, माउंट आबू, राजस्थान स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 20 जुलाई 16 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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