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कृषि विकास 0.02%, ग्रामीण- शहरी के बीच बढ़ता फासला

सौम्या तिवारी,

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2014-15 की आखिरी तिमाही रिपोर्ट में भारत की कृषि विकास दर गिर कर 0.02% रह गई है। साथ ही इस बार बारिश के भी बहुत कम होने की संभावना जताई जा रही है।

 

2 जून 2015 को मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की थी कि इस बार मानसून 88 फीसदी ही रहेगा। अगर मौसम विभाग की भविष्यवाणी सच साबित होती है तो साल 2015 को  आधिकारिक रुप से सूखा घोषित कर दिया जाएगा।

 

किसान पहले की खराब मौसम की मार झेल रहे हैं। बेमौसम बरसात ने इस साल की फसल को खासा नुकसान पहुंचाया है। जिसका नतीजा यह रहा कि इस बार गेहूं हमें ऑस्ट्रेलिया से आयात कराने पड़े।

 

भारत में 600 मिलियन लोग जीविका के लिए कृषि पर ही निर्भर हैं। बावजूद इसके पिछले कई सालों से कृषि क्षेत्र संकट की स्थिति में है। पिछले पांच सालों में कृषि का विकास न के बराबर रहा। बीते 20 सालो में से 3 साल सूखा घोषित किया गया।

 

भारत में खाद्य आपूर्ति मूलत: दो बातों पर निर्भर करती है – एक खाद्य उत्पादनऔर दूसरी प्रति व्यक्ति खद्य उपलब्धता।

 

हालांकि पिछले दो दशकों में खाद्य  उत्पादन में 32% की वृद्धि दर्ज की गई है। लेकिन उसी समय देश की आबादी में भी 42% बढ़ी है। प्रति व्यक्ति खाद्य की उपलब्धता  सीमांत रुप से वृद्धि हुई है। 1994 -95 में प्रति व्यक्ति खद्य  उपलब्धिता 471 ग्राम दर्ज की गई थी जबकि 2013-14 में यह आंकड़ा 511 ग्राम की बढ़ पाया।

 

साल 2014-15 के आंकड़े अब तक नहीं आए हैं…हम एक नज़र पिछले 20 सालों में हुए  कृषि विकास पर डालते हैं।

 

साल 1995 से 2014 तक हुए कृषि जीडीपी में हुए विकास

 

 

1995 से 2011 तक हुए खाद्य उत्पाद और उपलब्धिता

 

Sources: NITI Aayog, Economic Survey 2014-15

 

भारत में कृषि मौसम पर निर्भर होता है। यही वजह है कि कृषि विकास में इतनी अस्थिरता देखी जाती है।

 

कृषि और उत्पादकता की दृष्टी से साल 2014-15 कुछ खास नहीं रहा। इंडियास्पेंड ने हाल ही के अपने रिपोर्ट में बाताया था कि किस प्रकार भारत में भुखमरी और अल्पपोषण की लगातार वृद्धि हो रही है। और क्यों हमें कृषि और उत्पादन में बेहतरी की ओर ध्यान देने की ज़रुरत है।

 

क्यों हमारे किसान मजदूर बन रहे हैं-

 

पिछले तीन बार, 1991, 2001, 2011, की जनगणना को देख कर ये साफ है कि किसानों की संख्या में लगातार कमी हो रही है जबकि खेतों पर काम करने वाले मजदूरों की गिनती में वृद्धि देखी गई है। ये आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि कृषि से जुड़े ज़्यादातर लोगों के पास अपनी ज़मीन नहीं है बल्कि वे दूसरो के खेतो में काम कर पैसे कमाते हैं।

 

सेंसस के अनुसार खेतों में काम करने वाले दो प्रकार के लोग होते हैं – एक खेतिहर और दूसरे खेतिहर मजदूर। खेतिहरों के पास खुद के खेत होते हैं जबकि खेतिहर मजदूर दूसरों के खेत पर काम करते हैं।

 

कृषि क्षेत्र से जुड़े ज़्यादातर श्रमिक अप्रशिक्षित होते हैं।

 

खेती से जुड़े श्रमिक: खेतिहर और खेतिहर मजदूर

 

Sources: National Commission for Women, Census

 

1993-94 से 2011-2012 के दौरान ग्रामीण और शहरीके बीच का फासला बढ़ता दिखा है। आई आई एम अहमदाबाद की एक स्टडी  के अनुसार ग्रामीण भारत के लिए प्रति व्यक्ति जीडीपी 7 गुना बढ़ा है जबकि शाहरी भारत के लिए यह  8 गुना ज़्यादा रहा। साल 1993-94 में ग्रामीण के मुकाबले शहरी जीडीपी 2.3 गुना ज़्यादा रही, वहीं यह अंतर 2011-12 में 2.5 गुना रहा।

 

दोनो के बीच बढ़ता अंतर इस बात का संकेत है कि  बेहतर आर्थिक उत्पादकता में योगदान देने के बजाए ग्रामीण भारत मजदूरी करने में ज्यादा लगा हुआ हैं।

 

(तिवारी  इंडिआस्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं।)

 

Image credit: Flickr/Mathieu Schoutteten

 


 

 

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