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केरल में खाना पकाने की पुरानी परंपरा जारी, नए स्वच्छ-ईंधन स्टोव का प्रचार प्रसार कमजोर

सारा आर्मीटेज, एन्का बालीएटी, जियोर्जिया बारबोनी, और सोन्या स्यूटर,

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बोस्टन: केरल में सर्वेक्षण किए गए अधिकांश घरों में पाया गया कि वे लोग अभी भी खाना बनाने के लिए एक खास तरह के चूल्हे ( एक प्रक्रिया जिसे स्टैकिंग कहते हैं ) का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी आदतें स्वच्छ चूल्हों के प्रचार-प्रसार और आंतरिक वायु प्रदूषण को कम करने के प्रयासों को कमजोर करती है, जैसा कि 2016 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया है।

 

‘हार्वर्ड केनेडी स्कूल’ और ‘प्रिंसटन यूनिवर्सिटी’ में, एविडेंस फॉर पालिसी डिजाइन पर हम शोधकर्ताओं ने केरल में सर्वेक्षण किया है। केरल एक ऐसा राज्य है, जहां अपेक्षाकृत उच्च स्तर का स्वच्छ ईंधन का उपयोग किया जाता है। चार (24 फीसदी) में से एक के राष्ट्रीय औसत की तुलना में केरल में दो ग्रामीण घरों में से एक (51 फीसदी) स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन का उपयोग करते हैं, जैसा कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16 (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों से पता चलता है।

 

हालांकि, हमारे 124 लोगों के सर्वेक्षण ( जिनमें से 47 ने साक्षात्कार से पहले खाना बनाने का चूल्हा कुशल खरीदा था ) के अनुसार केवल 38 फीसदी प्रतिभागियों ने विशेष रूप से स्वच्छ ईंधन का उपयोग किया, जबकि बहुमत (64 फीसदी), सुरक्षित और अधिक खतरनाक तरीकों, दोनों पर निर्भर थे।

 

ठोस ईंधन से उपजा घरेलू वायु प्रदूषण भारत में प्रति वर्ष 750,000 से ज्यादा मौतों का कारण बनता है। सालों से भारत और दुनिया भर दोनों में, पर्यावरण की वकालत करने वाले कार्यकर्ताओं, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने स्वास्थ्य सुधारने और पर्यावरण के दबाव को कम करने के लिए स्वच्छ विकल्पों को डिजाइन और तैनात करने की मांग की है।

 

फिर भी, परंपरागत तरीकों को हटाना मुश्किल है। सुरक्षित खाना बनाने के चूल्हे के प्रमोटरों को दक्षता, मूल्य और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजाइन के सही संतुलन को खोजने के लिए संघर्ष करना पड़ा है, जो व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार के लिए जरूरी है।

 

स्वच्छ इंधन वाले चूल्हे स्वच्छ हवा की लड़ाई में हो सकते हैं मदददगार

 

अच्छी खबर यह है कि, तेजी से खाना बनाने के चूल्हे के  निर्माता ने कई डिजाइन और रखरखाव की समस्याओं को संबोधित करने में सक्षम रहे हैं। इस वजह से अतीत में चूल्हे को परिनियोजन करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। लेकिन अब दुनिया भर में कुशल खाना बनाने के चूल्हे की संख्या में वृद्धि हुई है।

 

2016 में वितरित 38 मिलियन स्टोवों में से 31 मिलियन ‘स्वच्छ’ थे, जैसा कि ‘ग्लोबल एलाइन्स फॉर क्लीन कुकस्टोव’ का अनुमान है। और अब भारतीय परिवार का 44 फीसदी खाना बनाने के लिए स्वच्छ ईंधन का उपयोग करते हैं, जो एक दशक पहले की तुलना में 26 फीसदी ज्यादा है, जैसा कि एनएफएचएस -4 के आंकड़ों से पता चलता है।

 

एक खाना बनाने वाले चूल्हे को क्या ‘स्वच्छ’ बनाता है। सबसे पहले तो यह कि परंपरागत खुली आग या चूल्हे की तुलना में इस नए चूल्हे से क्या मिलता है। इसकी विशेषताएं क्या हैं?

 

जैसे कि कम ईंधन जलना, कम धुआं उत्सर्जित होना और आदर्श रूप से, खाना बनाने पर कम संसाधन (समय और / या पैसा) और चारकोल, लकड़ी, गोबर, या अन्य बायोमास खरीदने पर कम खर्च करना।

 
इन सभी लाभों को देखते हुए लगता है कि लोग नए स्टोव का चयन करेंगे और वे अक्सर ऐसा करते हैं,लेकिन पुराने को हटाए बिना।
 

खाना बनाने के कई तरह के चूल्हों का संग्रह

 

हमें इस तरह के साक्ष्य मिले हैं कि जब भी लोग एक नया साफ स्टोव इंधन वाला खरीदना चुनते हैं, तब भी वे आमतौर पर अन्य, अक्सर गंदे, विकल्पों को प्रतिस्थापित नहीं करते हैं।

 

केरल में, हमने 124 घरों का सर्वक्षण किया, जिन्होंने राज्य पर केंद्रित एक सतत कार्यक्रम के हिस्से के रूप में उनके स्थानीय अल्पसंख्यक संस्थान के माध्यम से जिन्होंने कुशल खाना बनाने का चूल्हा ( पारंपरिक चल्हा की तुलना में काफी कम बायोमास की आवश्यकता होती है और कम प्रदूषण पैदा होता है ) खरीदा था।

 

हमने उनके खाना पकाने के पैटर्न के साथ-साथ उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रोफ़ाइल का भी दस्तावेज बनाया। हमने पाया कि 92 फीसदी परिवारों ने कई प्रकार के चूल्हे या स्टोव स्टैकिंग का इस्तेमाल किया था। विशेष रूप से, कुशल स्टोव के स्वामित्व वाले परिवारों का अधिक उपयोग करने की संभावना अधिक थी।

 

जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है एक घर अक्सर तीन या अधिक प्रकार के स्टोव या आग का उपयोग करता है। जबकि कुछ ने एलपीजी स्टोव के पूरक के लिए एक स्वच्छ चूल्हे का इस्तेमाल किया है ( जो अधिक स्वच्छ विकल्प है ) आधे से अधिक (लगभग 64 फीसदी) कभी-कभी पारंपरिक स्टोव (बायोमास या खुली आग) का उपयोग जारी रखते थे।

 

केरल में परिवार किन चूल्हों के प्रकार का उपयोग करते हैं?

पारंपरिक स्टोव या खुली आग से उत्पादित धुआं विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित एक्सपोजर स्तरों से 100 गुना अधिक हो सकता है इसलिए ऐसे घर जो अधिक प्रदूषण वाले चूल्हे के साथ कुशल चूल्हे को वैकल्पिक करते हैं, वो अब भी खतरनाक कणों की अत्यधिक मात्रा में उजागर हैं।

 

क्यों एक घर में कई चूल्हे ?

 

हमारे सर्वेक्षण ने स्टोव स्टैकिंग के कई कारणों का संकेत दिया, और यह स्वच्छ चूल्हों के कम उपयोग में योगदान देने वाले कारकों की विविधता को दिखाता है। कुछ सुझाव देते हैं कि कुशल चूल्हे पारंपरिक परंपरागत खाना पकाने के तरीकों से पूरी तरह से संगत नहीं हैं, अन्य सुरक्षा ईंधन को एक प्रमुख चिंता के रुप में बताते है, और फिर भी अन्य लोग घरेलू आकार और अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारक भूमिका निभाते हैं।

 

हमारे अध्ययन में सर्वेक्षण आंकड़े बताते हैं कि घरों में से अधिकांश लोग दो प्रकार के रसोई उपकरण के साथ क्या करते हैं। आमतौर पर कार्य के आधार पर दोनों का उपयोग होता है। उदाहरण के लिए, महिलाओं को उबलते पानी के लिए कुशल चूल्हे का उपयोग करने की अधिक संभावना थी, लेकिन भोजन के लिए खुली आग या एलपीजी स्टोव। हालांकि, इन प्रथाओं को समझने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है ।

 

तेजी से काम करने वाले, कम लागत वाले सेंसर स्टोव स्टैकिंग कारण और परिणाम को समझने में मदद कर सकते हैं। अब हम कूकस्टोव के उपयोग की निगरानी और जब ऐसा होता है तो स्टोव स्टैकिंग का पता लगाने के लिए एमआईटी में शोधकर्ताओं के साथ काम कर रहे हैं। परिणाम से यह समझ सुधारने में मदद मिलेगी कि कब और कैसे स्टोव का उपयोग किया जाता है और संभवत: कुछ संकेत देंगे कि ऐसा क्या किया जाए कि खाना बनाने वाले को यह महसूस हो कि दो स्टोव हमेशा एक से बेहतर नहीं होते हैं।

 

अध्ययन का नेतृत्व केरल के ग्रामीण क्षेत्रों में जून-अगस्त 2016 में आईएफएमआर-लीड के सहयोग से किया गया था। इस अध्ययन में प्रमुख जांचकर्ता पारुल अग्रवाल (आईएफएमआर-लीड), एन्का बालीएटी (एचकेएस), जियोर्जिया बारबोनी (प्रिंसटन यूनिवर्सिटी), और रोहिणी पांडे (एचकेएस) थे।

 

(आर्मीटेज हार्वर्ड केनेडी स्कूल में ‘पॉलिटिकल इकोनोमी एंड गवर्नमेंट’ में पीएचडी की छात्र हैं। बालीएटी हावर्ड केनेडी स्कूल में ‘एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन’ (ईपीओडी) में पोस्टडॉक्टरल रिसर्च फेलो हैं। बारबोनी ग्रिसवॉल्ड सेंटर फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी स्टडीज, अर्थशास्त्र विभाग, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में एक पोस्टडॉक्टरल रिसर्च विद्वान है। स्यूटर ईपीओडी, हार्वर्ड केनेडी स्कूल में एक वरिष्ठ कार्यक्रम प्रबंधक है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 13 अप्रैल 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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