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केरल में हर घंटे 5 तलाक के मामले पर निर्णय

सौम्या तिवारी,

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वर्ष 2014 में, समृद्ध दक्षिणी राज्य, केरल में परिवार अदालतों ने हरेक घंटे पांच तलाक के मामलों पर निर्णय सुनाया है यानि प्रतिदिन 130 मामलों पर फैसले हुए हैं। यह आंकड़े, इस तरह के डाटा संकलित करने वाले 12 राज्यों में सबसे अधिक है। यह जानकारी सरकारी आंकड़ों में सामने आई है।

 

हालांकि, वैश्विक सांख्यिकी आंकड़ों, एक वैश्विक तलाक संग्राहक (इलिनोइस विश्वविद्यालय , संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा संकलित), में भारत का नाम प्रकट नहीं होता है क्योंकि देश भर के आंकड़े उपलब्ध नहीं है, लेकिन केरल एवं अन्य 11 राज्यों के अदातलों द्वारा निपटाए गए तलाक के मामलों की संख्या से संकेत मिलता है कि अधिक दंपत्ति बुरे विवाह को निभाने एवं एक साथ रहने की बजाए अलग होने के लिए तैयार हैं।

 

एक राष्ट्र जहां अदालत कानूनी विच्छेद कराने में रूढ़िवादी होते हैं लेकिन फिर भी तलाक के मामले अधिक प्रतीत होते हैं  लेकिन यह नाकाम या असफल विवाह का एक अंश हो सकता है क्योंकि बुरी शादी होने के बावजूद भारतीय महिलाएं शादी में रहना चाहती हैं, जैसा कि हम आगे विस्तार से बताएंगे।

 

यह आंकड़े – मार्च 2016 में लोकसभा में सरकार का दिया जवाब – 12 राज्यों में परिवार अदालतों से संकलित किए गए हैं और अन्य देशों या राज्यों के साथ स्पष्ट रुप से भारत की तलाक दर की तुलना करने के लिए अपर्याप्त है। सरकार तलाक के आंकड़े नहीं रखती है।

 

तलाक की दर का अनुमान करना कठिन है क्योंकि भारत तलाक के आंकड़े नहीं रखता है। भारत में शब्द ” तलाक की दर ” का इस्तेमाल अधिकांश अव्यवस्थित रुप से होता है क्योंकि आंकड़ों से तलाक का खुलासा नहीं होता है, केवल अदालत के सामने आए मामलों का पता चलता है।

 

एक बात जो स्पष्ट है वह यह कि परिवार अदालतों के सामने तलाक के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है।

 

इसे कैसे भी देखा जाए, केरल में हुए हैं सबसे अधिक तलाक

 

संसद में सरकार के जवाब के अनुसार, 2014 में निपटाए गए मामलों की तुलना में, वर्ष 2014-15 में, लगभग हर राज्य में अधिक तलाक के मामले फैसले के इंतज़ार में हैं।

 

हालांकि, 11 राज्यों में से एक भी राज्य में – जिनमें से पांच सबसे अधिक आबादी वाले राज्य हैं – केरल से अधिक तलाक के मामले नहीं हुए हैं: 2014 में 47,525 मामले हुए हैं।

 

केरल के आंकड़ों के मुकाबले महाराष्ट्र में आधे तलाक देखे गए हैं, जबकि महाराष्ट्र की तुलना में केरल की आबादी तीन गुना है।

 

तलाक पर फैसले, लंबित तलाक : टॉप 5 राज्य

Source: Lok Sabha

 

शिक्षा और रोज़गार की क्या है भूमिका?

 

जैसा कि हमने आगाह किया था, 36 में से 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आंकड़ों के विश्लेषण के बाद यह तलाक के बढ़ते कारणों को बताया मुश्किल है।

 

हमने पाया कि टॉप पांच राज्य – केरल, महाराष्ट्र और कर्नाटक – जहां तलाक के सबसे अधिक मामले रिपोर्ट किए गए हैं. उन राज्यों में भारतीय औसत की तुलना में अधिक शिक्षित महिलाएं हैं ; इन राज्यों में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी भी भारतीय औसत की तुलना में थोड़ी अधिक है।

 

सहसंबंध हमेशा स्पष्ट नहीं होते हैं।

 

उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में महिला साक्षरता – तलाक के मामलों में तीसरे स्थान पर – राष्ट्रीय औसत से 6 प्रतिशत अंक कम है और महिला श्रम शक्ति की भागीदारी दर राष्ट्रीय औसत के बराबर है।

 

हरियाणा में –  तलाक के मामलों में पांचवें स्थान पर – महिला साक्षरता दर 65 फीसदी के राष्ट्रीय औसत के बराबर है, लेकिन महिला कार्यबल की भागीदारी राष्ट्रीय औसत से 12 प्रतिशत अंक कम है। राज्य, उन टॉप पांच राज्यों में से एक हैं जहां तलाक के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, क्योंकि आंकड़े 12 राज्यों से ही उपलब्ध हैं – केरल की तुलना में हरियाणा में 80 फीसदी कम तलाक के मामले हैं।

 

महिला साक्षरता और श्रम शक्ति की भागीदारी : तलाक के लिए टॉप 5 राज्य

Source: Census 2011, NSSO 68th round Key Indicators of Employment and Unemployment in India 2011-12

 

यदि महिलाओं के पास विकल्प हो तो अधिक तलाक की संभावनाएं

 

भारत में महिलाएं अपने बुरे विवाह में अक्सर कई कारणों से बनी रहती हैं जिसमें आर्थिक स्वतंत्रता की कमी, कानूनी अधिकारों के ज्ञान का आभाव एवं पारिवारिक दबाव शामिल है।

 

भारत में सर्वेक्षण किए गए 10 पुरुषों में से 6 ने किसी समय में अपनी पत्नियों के खिलाफ हिंसा को अंजाम देने की बात स्वीकार किया है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष एवं इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमन द्वारा किए गए व्यापक अध्ययन का हवाला देते हुए इंडियास्पेंड ने 2014 में विस्तार से बताया है।

 

मीडिया के रिपोर्ट के अनुसार, अहम में टकराव एवं अपेक्षाओं में मतभेद तलाक के मुख्य कारण हैं।

 

(तिवारी इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 22 जून 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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