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कैसे करेगा भारत कार्बन उत्सर्जन में 70% कटौती

डैरेल डी’ मौंटे,

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भारत अपने ग्रीन हाउस गैस ( जीएचजी ) की उत्सर्जन को स्वेच्छा से कम करने को तैयार है। इसी विषय पर भारतीय विशेषज्ञों ने विस्तार से बताया है कि किस प्रकार कम लागत वाली विधियों से देश जलवायु में से करीब तीन-चौथाई कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जा सकती है। साथ ही विशेषज्ञों ने इस प्रक्रिया में गरीबों के जीवन में होने वाले बदलाव के विषय की ओर भी ध्यान केंद्रित किया है।

 

अमेरिका , यूरोपीय संघ और चीन उन प्रमुख देशों में से हैं जिंहोने कार्बन उत्सर्जन को कम करने की अपनी प्रतिबद्धताओं की घोषणा की है। इस संबंध में वैश्विक समुदाय भारत की भूमिका देखने का इंतज़ार कर रहा है।

 

जैसा कि पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि इस संबंध में भारत“राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान का ईरादा ” या आईएनडीसी ( जैसा संयुक्त राष्ट्र वार्ता में जाना जाता है )के रुप में न्यूनतम कदमउठाएगा।

 

पेरिस में इस साल के आखिर में होने वाले संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्तासे पहले मुंबई में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान ( टीआईएसएस ) द्वारा आयोजित छठे वार्षिक जलवायु सम्मेलनका आयोजन किया गया है। इस सम्मलेन में वक्ताओं ने पाया किजलवायु परिवर्तन पर मौजूदा विज्ञान की नीति काफी हद तक सही है।

 

टीआईएसएस ने औद्योगिक और विकासशील देशों के लिए एक ” कार्बन बजट” विकसित किया हैजोकि न्यायसंगत ढ़ांचे में विकीर्ण करने की स्पष्ट झलक दिखलाता है।

 

टीआईएसएस के जलवायु परिवर्तन केंद्र के तेजल कानिंतकर के अनुसार वर्ष 1850 में अद्योगिक क्रांति की शुरुआत से 2100 तक कुल उत्सर्जन मात्रा 641 गीगाटन कार्बन दर्ज की गई है ( जीटीसी, 1 गीगाटन = 1 बिलियन टन )।

 

विश्व का जलवायु परिवर्तन नियंत्रण से बाहर नहीं जाता यदि औसत तापमानमें 2 डीग्री सेल्सियस की वृद्धि नहीं होती, 2100 तक जीटीसी का कुल बजट 270 था ( 2011 तक 371 जीटीसी पहले ही बेसलाइन से उत्सर्जित किया जा चुका है )।

 

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Source: Tejal Kanitkar, TISS

 

अब तक विकासशील देशों ने 371 जीटीसी में से केवल 97 जीटीसी खर्च किया है।

 

2100 तक अद्योगिक देशों के पास खर्च करने के लिए केवल 50 जीटीसी है जबकि विकासशील देशों के पास 220 जीटीसी बची हुई है।

 

हालांकि, पेरिस वर्ता से पहले अब तक किए गए उनके आईईएनजीसी के आधार पर, 2030 तक अमीर देश पहले ही अपने बजट के पार चले जाएंगे।

 

यदि टीआईएसएस, दिल्ली साइंस फोरम के साथ मिलकर बनाये गए मॉडल को लागू किया जाता है तो 2100 तक अमीर देश केवल 39 जीटीसी खर्च कर सकेंगे।

 

कनिंतकर के मुताबिक यदि विकासशील देश इसे सामान्य रुप से छोड़ दे एवं वो करने के लिए प्रतिबद्ध  करे जो “हमें लगता है कि यथोचित संभव है”, तापमान में 2 डीग्री सेल्सियस की वृद्धि होना कोई बड़ी बात नहीं है।

 

लेकिन विकासशील देश तेजी से उत्सर्जन में कटौती करते हैं तो उनकी विकास की योजनाओं में गड़बड़ी आ सकती है, जिसे कनिंतकर घाटे की स्थिति ही बताते हैं।

 

भारत की ऊर्जा विकल्प

 

विश्व की जलवायु वापस सही करने की ज़िम्मेदारी औद्योगिक देशों पर डालते हुए कानिकर को लगता है कि घरेलू स्तर पर कटौती उपक्रम में वास्तविक रुप से मात्रा निरधारण करना दुविधापूर्ण है।

 

कनिकर कहती हैं “हम इस संबंध में लापरवाह नहीं हो सकते….होमवर्क बहुत ज़रुरी है। ”

 

देश के ऊर्जा विकल्पों का परिक्षण करना बेहद आवश्यक है।। अशोक श्रीनिवास, पुणे स्थित ऊर्जा पर काम करने वाली गैर सरकारी संगठन-प्रयास, के मुताबिक क्षमता का आक्रमक लक्ष्य रखने से स्थिति बेहतर हो सकती है।

 

उपकरणों से बिजली की बचत की क्षमता का मूल्य 2.50 रुपये / किलोवाट घंटा है (किलोवाट प्रति घंटे , बिजली की एक इकाई)।

 

इमारतों को बेहतर बनाया जा सकता है। औद्योगिक प्रक्रियाओं, वाहन प्रौद्योगिकी और कृषि पंपों में सुधार किया जा सकता है।

 

इसके लिए ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिसियंसी द्वारा शुरु किए मानकों की तरह ही दूसरे मानकों का आरोपण करने की कि आवश्यकता है। प्रोत्साहन एवं दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे ऊर्जा कुशल प्रक्रियाओं और उत्पादों के लिए बाजार भी पैदा होगा।

 

भारत के जीएचजी उत्सर्जन के लिए परिवहन की हिस्सेदारी दसवें भाग की है। देश भर में सड़कों की जगह रेलवे का इस्तेमाल एवं शहरों में सार्वजनिक और गैर मोटर चालित परिवहन और बेहतर स्थानिक योजना का अधिक से अधिक उपयोग करना सहायक सिद्ध हो सकता है।

 

यह सारे विकल्प न केवल जीएचजी उत्सर्जन को कम करेंगे बल्कि लागत को कम करने, गतिशीलता में सुधार ( और इसलिए, शिक्षा आदि के लिए रोजगार के अवसर तक पहुंच ) आयात को कम करने औरहवा की गुणवत्ता में सुधार होगा।

 

गैर सरकारी संगठन प्रयास के अनुसार, भारत में कार्बन उत्सर्जन की कटौती कम करने के अलावा भारत के लिए अक्षय ऊर्जा भी अति आवश्यक है। यह स्थानीय संसाधनों का उपयोग करता है, स्थानीय पर्यावरण पर प्रभाव डालता है साथ ही लंबी अवधि के लिए लागत कुशल भी है।

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही अपनी खास रिपोर्ट में बताया है कि सरकार ने साल 2022 तक 175 गीगावॉट की क्षमता वाली कुछ आक्रमक योजनाओं की घोषणा की है।

 

रुफटॉप फोटोवोल्टिक (पीवी) सेट स्थापित करने वाले गृहस्वामियों को ग्रिड के लिए उपलब्ध कराने के अधिशेष बिजली के लिए राजस्व कमाने की अनुमती दे कर भारत नीतियों में कई सुधार ला सकती है।ऐसे शुल्क सूक्ष्मदर्शी हो सकते हैं – बिजली की आपूर्ति के लिए बेची गई हरेक किलोवॉट प्रति घंटा में वृद्धि होती है।

 

इस तरह से उपभोक्ता पारंपरिक ग्रिड पर उच्च लागत संसाधन के लिए भुगतान करते हैं। इस मामले में पीवी ऊर्जा को स्टोर करने के लिए किसी बैटरी की आवश्यकता नहीं होती है। साथ ही यह सस्ती एवं पर्यावरण अनुकूल भी होती है।

 

गरीबों की मदद कैसे बनेगा भारत के लिए उपयोगी

 

कम से कम 8 मिलियन गरीब परिवारों को खाना बनाने के लिए ईंधन की आवश्यकता होती है- ऊर्जा का एक ऐसा रुप जो बिजली से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। यह दोनों ही घरेलू स्तर पर प्रदूषण फैला रही हैं एवं जलवायु को नुकसान पहुंचा रही हैं।

 

गैर सरकारी संगठन, प्रज्ञा ने इससे होने वाले स्वास्थय पर बुरे प्रभाव के संबंध में भी इंगित किया है। घरेलू वायु प्रदूषण से कम से कम 1.5 मिलियन लोगों की जान समय से पहले चली जाती है। इससे करीब 25 लाख बिमारियां होती हैं।

 

ग्रामीण इलाकों में महिलाओं एवं बच्चों पर इसका सबसे बुरा असर होता है।

 

चूल्हे पर खाना पकाने के बाद ईंधन का बचा हुआ अवशेष एवं राख एक वायुमण्डलीय घटना के रुप में एशियन ब्रॉउन क्लाउड के नाम से जाना जाता है। यह हिमालय की उचाईयों पर जाकर जमा होती हैं। बर्फ पर जमा काले कण अधिक गर्मी अवशोषित करते हैं जिससे बर्फ पिघलते हैं।

 

प्रज्ञा संस्था मानती है कि पारंपरिक चूल्हों को अधिक कुशल चूल्हों जैसे कि तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी ) , बिजली और बायोगैस से बदलने से स्वच्छता के साथ-साथ विकास भी होगा।

 

चंद्र वेंकटरमण और आईआईटी बॉम्बे से दो सहयोगियों का मानना है कि अल्पकालिक जलवायु प्रदूषण के नियंत्रण जैसे कि एयरोसौल्ज़ या कार्बन ब्लैक और क्षोभ मंडलीय ओजोन जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम कर सकते हैं।

 

ये क्योटो प्रोटोकॉल के तहत शामिल नहीं हैंक्योंकि इनके अल्पीकरण से कोई मुनाफा उत्पन्न नहीं होता है। हालांकि यह “रेडियल फोर्सिंग” को गति प्रदान करती है जोकि ग्रीन हाउस गैसों को वातावरण में परिवर्तन करती है जिससे सागर के स्तर में वृद्धि हो रही है।

 

काला कार्बन बढ़ने से वातावरण अस्थिर होता है जिसके कारण वर्षा कम होती है।

 

आईआईटी के तीन लेखकोंने 2015 में प्रकृति पर किए गएअध्ययन “सूट एंड शॉर्ट लिवड पॉल्यूटेंट्स प्रोवाइड  ए पॉलिटिकल ऑपरट्यूनिटी” का उल्लेख किया है। यह अध्ययन दो अमरिकी एवं सैन डिएगो में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन से वीरभद्ररामनाथन द्वारा किया गया है।

 

रामनाथन, जिन्होंने 2009 में कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन से पहले दिल्ली में पर्यावरण पत्रकारों कांग्रेस के एक इंटरनेशनल फेडरेशन को संबोधित किया,एशियन ब्राउन क्लाउड पर दुनिया कासर्वश्रेष्ठ अधिकार है।

 

अमरिकी लेखकों का मानना है कि राखएवं अवशेष में कटौती करने से ठोस लाभ मिलेगा एवं पेरिस को दिखा सकेंगें कि दुनिया द्वारा सामूहिक प्रयास संभव है। दिसंबर के बाद, उनका मानना हैकि इस तरह की कार्रवाई का प्रदर्शन जलवायु वार्ता में संयुक्त राष्ट्र के राजनयिक प्रक्रिया पर विश्वसनीयता प्रदान करेंगे।

 

आईआईटी- बी के मुताबिक ग्रीन हाउस गैसों के लिए क्षेत्र द्वारा उत्सर्जन स्रोत से भारत में अल्पकालिक प्रदूषण काफी अलग हैं। देश के ग्रीन हाउस गैसों में थर्मल पावर स्टेशनों और भारी उद्योग का योगदान 65 फीसदी है जबकि घरों का योगदान 53 फीसदी है।

 

प्रदूषण के अन्य श्रोत जैसे परिवहन , कृषि और ईंट उत्पादन भी भिन्न हैं।

 

प्रदूषण में 53 फीसदी योगदान घरों से निकलने वाला धुएं का है। घरों में इस्तेमाल होने वाले चूल्हेएवं मिट्टी तेल से जलने वाला लैंप दूषण के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार हैं। जलवायु प्रदूषित करने के लिए जले हुए फसल के अवशेष का 14 फीसदी जबकि डीज़ल एवं पेट्रोल का 13 फीसदी योगदान है।

 

लेखक का मानना है कि ट्रैक्टर मशीन धान की कटाई एवं छोटे दाने उठा सकता है, मिट्टी में गेहूं बुवाई हो सकती है एवं बुवाई क्षेत्र के ऊपर गीली घास का पुआल जमा (मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए मदद होती है) कर सकता है।

 

इससे पुआल अवशेष के जलाए बिना, गेहूं बोने में कम समय लगेगा। हालांकि इस तकनीक से उत्पादन या लाभ में वृद्धि नहीं होगी। यह तकनीक अपनाने से अवशेषों को जलाने में रोक एवं नीतिगत समर्थन में मदद मिलेगी।

 

पारंपरिक तरीकों के अलावा ऐसी कुछ तकनीक हैं जिसे अपनाकर बेहतर परिणाम लाया जा सकता है।

 

ईंट भट्टियों कापारंपरिक तकनीकों की बजाए“ज़िगजैग” लाइन में अभिकल्पन करने से भी काफी सहायता मिलेगी। वर्तमान में देश में केवल 2 फीसदी द्वारा ही इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।

 
फ्लाई एश, कोयला आधारित बिजली स्टेशनों से निकला अवशेष द्वारा भी बिना जलाए ईंटों का निर्माण किया जा सकता है। वर्तमान में देश में केवल 12 फीसदी फ्लाई एश ईंट बनाने के काम में लाया जाता है।
 

पारंपरिक तकनीक से बनेगा भारत स्वच्छ

 

घरों, खेतों और ईंट उत्पादन में कम ऊर्जा की क्षमता और उच्च उत्सर्जन के साथ परंपरागत तकनीकों का उपयोग करते हुए अल्पकालिक प्रदूषण विविध क्षेत्रों से उत्पन्न हो रहे हैं।

 

प्रदूषक उत्सर्जन में जैव ईंधन चूल्हा, मिट्टी के तेल वाला लैंप और फसल अवशेषों को जलाने से 65 फीसदी का योगदान है जबकि डीज़ल से चलने वाले वाहन अकेले ही उत्सर्जन में 10 फीसदी का योगदान करता है, जोकि कुल 3,800 टेराग्राम कार्बनडाईऑक्साइट के बराबर है या  Tg CO2 eq (1Tg=1 मिलियन मेटरिक टन) प्रति वर्ष।

 

मौजूदा स्थिति में उपलब्ध तकनीकों का प्रयोग कर अल्पीकरण क्रिया द्वारा इन सभी क्षेत्रों से वर्तमान तारीख में 70 फीसदी उत्सर्जन कम कर सकते हैं।

 

लेखको का सवाल है कि अल्पकालिक प्रदूषकों के उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए इन घरेलू कार्यों को संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता के तहत, स्वैच्छिक ” आम, लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं” के रुप में अर्हता प्राप्त होगा।

 

टीआईएसएस की अंजलि शर्मा एवं तेजल कानिंतर द्वारा वर्ष 2014 में महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित मराठवाड़ा क्षेत्र के रायखेलगांव में 73 परिवारों के एक सर्वेक्षण पाया कि 90 फीसदी लोग केवल एक ही स्टोव इस्तेमाल करते हैं।

 

लगभग स्टोव का तिहाई इस्तेमाल पानी गर्म करने के लिए किया गया; 35 फीसदी के पास कोई निकास यंत्र नहीं था जबकि 40 फीसदी घर के बाहर रखा गया।

 

आधे से अधिक लोगो ईंधन के लिए लकड़ियां खरीदते पाए गए। मौसम के कारण खेतों से निकले अवशेष का इस्तेमाल कम था।

 

यदि परिवार समर्थ हो तो टीआईएसएस के शोधकर्ताओं ने एलपीजी के उपयोग को बेहतर बताया है।

 

जलाऊ लकड़ियांएवं घर के भीतर होने वाला प्रदूषण महत्वपूर्ण कारक हैं जिसे पुरुष प्रधान परिवार विचार नहीं करता।

 
जैसा कि टीआईएसएस सम्मेलन में वक्ताओं ने ध्यान केंद्रित किया कि पेरिस में भारत को औद्योगिक देशों से अधिक योगदान की मांग करना है जबकि भारत स्वेच्छा से, कम लागत वाली विधियों के साथ, अपनी विकास प्रगति के अनुसार ही उत्सर्जन कटौती करेगा।

 

( डी मोंटे भारत के पर्यावरण पत्रकारों के फोरम के अध्यक्ष है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 24 अगस्त 15 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 


 

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