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कैसे बनेंगी भारतीय महिलाएं श्रम शक्ति का हिस्सा?

रोहिणी पांडे, जेनिफर जॉनसन और एरिक डॉज,

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अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत, राजनीतिक कार्यालय में कार्यरत महिलाओं के बेहतर दरों का दावा करता है: हाल ही में, राष्ट्र में 16 वीं महिला मुख्यमंत्री, महबूबा मुफ्ती ने कार्य भार संभाला है। हालांकि, यह अब तक महिलाओं की श्रम शक्ति की भागीदारी के अपने दर में पीछे छूटा हुआ है। और इसका कारण बताने के लिए आश्चर्यजनक रुप से आंकड़े काफी कम है। लेकिन एक मुख्य कारण है महिलाओं को काम नहीं मिलना।

 

भारत उस स्थिति से परे है जब अर्थशास्त्री उम्मीद कर सकते हैं कि महिलाओं की उच्च संख्या श्रम शक्ति की भागीदार बनेंगी। लेकिन इसके बजाय, 25 मिलियन (या 250 लाख) महिलाओं ने पिछले 10 वर्षों में भारतीय श्रम शक्ति को छोड़ दिया है । वर्तमान में, केवल 27 फीसदी भारतीय महिलाएं श्रम शक्ति का हिस्सा है, दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद महिलाओं की श्रम शक्ति में दूसरी सबसे कम दर है। और जब उस देश की महिला श्रम शक्ति की भागीदारी बढ़ रही है, भारत में गिर रही है।

 

भारत में महिलाएं अधिक स्वस्थ्य और अधिक शिक्षित हो रही हैं, लेकिन कम संख्या में काम कर रही हैं।

 

 

महिलाओं के बाहर नौकरी ढूंढने की राह में सीमित परिवर्तनीयता, प्रमुख चुनौतियों में से एक है। भारत के सड़क नेटवर्क अब 4.69 मिलियन किलोमीटर तक फैली है- पिछले दस वर्षों में 39 फीसदी की वृद्धि हुई है।  2007 से 2011 के बीच अकेले, अतिरिक्त 600,074 किमी बनाया गया है। पिछले वर्ष 2 मिलियन कारों की बिक्री के साथ (2014 से 9.8 फीसदी की वृद्धि) कार स्वामित्व की दर में भी वृद्धि हो रही है।

 

सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का भी विस्तार हो रहा है। लेकिन इन बुनियादी ढांचे में सुधार, महिलाओं की गतिशीलता और काम करने की क्षमता में, ठोस लाभ में परिवर्तित नहीं हो रहे हैं। और जब महिलाएं घर के बाहर काम करती हैं, औसतन, वह उतनी दूर यात्रा नहीं करती जितना पुरुष करते हैं। संक्षेप में, घर से जितनी दूर काम करने का अवसर मिलता है उतना ही महिलाओं के काम करने की संभावना कम होती है।

 

भारतीय महिलाएं काम करना चाहती हैं लेकिन कौशल, सामाजिक मानदंडों की कमी के कारण पीछे होती हैं

 

एविडेंस फॉस पॉलिसी डिज़ाइन में किए गए हमारे शोध संकेत देते हैं कि भारत की महिलाएं उच्च दरों पर श्रम शक्ति में भाग लेना चाहती हैं। लेकिन वे कौशल की कमी के कारण पीछे होती हैं एवं सामाजिक मानदंडों के कारण उनकी गतिशीलता सीमित होती है।

 

महिलाएं जो कृषि से बाहर काम करती हैं वह आमतौर पर अनौपचारिक, घर आधारित काम ही करती हैं। ज़रुरी नहीं कि यह उनके वरीयताओं को प्रतिबिंबित करता है, यह संरचनात्मक कारक की ओर भी संकेत देता है जो महिलाओं को घर के बाहर रोज़गार के लिए अनुसरण करता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े इन असमानता पर प्रकाश डालते हैं एवं हमारे द्वारा किया गया भोपाल और सीहोर में ग्रामीण युवाओं पर पायलट सर्वेक्षण इसका समर्थन करता है: गरीबी रेखा से नीचे के 91 फीसदी, महिला उत्तरदाताओं (18-25 आयु वर्ग) को लगता है कि महिलाओं घर के बाहर जाना चाहिए – हालांकि इनमें से 70 फीसदी महिलाएं, पिछले वर्ष बेरोज़गार थीं।

    भारत की महिलाओं का सीमित गतिशीलता का सामना जारी    

 

भारत में, महिलाओं के घर छोड़ कर बाहर काम करने का निर्णय एवं बाहर किसी के साथ जाने का निर्णय के संबंध में सांस्कृतिक दृष्टिकोण, क्षेत्र के अनुसार भिन्न है।

 

कैसे भारतीय पुरुष, महिलाओं को करते हैं विवश

 

भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण (IHDS) के दो दौर के प्रयोग में हमने पाया है कि  79.9 फीसदी महिलाओं अपने पति या परिवार के अन्य सदस्यों से अनुमति के बिना स्वास्थ्य केंद्र नहीं जा सकती हैं। 2012 में, 33 फीसदी महिलाओं को बिना अनुमति के अकेले स्वास्थ्य केंद्र नहीं जा सकती थी, 2005 की तुलना में मामूली सुधार (35 फीसदी) देखा गया था।

 

राष्ट्रीय स्तर पर, IHDS सर्वेक्षण में यह भी पता चलता है कि 51.7 फीसदी महिलाओं को लगता है कि समुदाय यदि महिलाएं बिना अनुमति के काम के लिए बाहर जाती हैं को पति को पत्नी पर हाथ उठाना आम बात है। यहां तक कि यदि महिलाओं को बाहर जा कर काम करने की स्वतंत्रता है तो फिर भी यात्रा की दूरी उनकी राह में मुख्य बाधा है। कौशल भारत प्रतिभागियों में से एक नमूने में, 62 फीसदी महिलाओं ने माना कि वह काम के सिलसिल में विस्थापित होने के लिए तैयार हैं लेकिन 70 फीसदी ने कहा कि वे घर से दूर काम करने में असुरक्षित महसूस करती है।

 

सीमित गतिशीलता के साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए, तेजी से होता औद्योगीकरण और भारत के शहरीकरण का निहितार्थ, चिंता का विषय है। अनुमानों से संकेत मिलता है कि अगले 15 साल में, शहरी क्षेत्रों में ही, भारत का आर्थिक विकास होगा: 2010 में, मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान था कि भारत के शहर भारतीय सकल घरेलू उत्पाद का 70 फीसदी का उत्पादन कर सकते हैं एवं 2030 तक 70 फीसदी शुद्ध नए रोजगार उत्पन्न होंगे और प्रति व्यक्ति आय में करीब चार गुना की वृद्धि होगी। जैसा की यह है।

 

उत्पादक कार्य के लिए महिलाओं की इच्छा बस बयानबाजी नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कई स्थान हैं जहां  महिलाएं श्रम बल में अच्छी तरह से प्रतिनिधित्व कर रही हैं लेकिन यह वह क्षेत्र हैं जहां महिलाएं घर के पास काम कर सकती हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत बनाई गई परियोजनाएं, महिला कर्मचारियों की अच्छी संख्या आकर्षित करने में काफी सफल रहा है। जहां केवल 27 फीसदी ग्रामीण महिलाएं घर के बाहर काम करती हैं, 2014 में मनरेगा के तहत 51 फीसदी महिलाएं कार्यरत थीं।

 

महिलाओं के लिए 30 फीसदी आरक्षण सहित कई कारक हैं जो महिलाओं को मनरेगा की ओर आकर्षित करता है। डिजाइन की बजाए, दुर्घटनापूर्वक मनरेगा में बड़े पैमाने पर गतिशीलता की कमी समाप्त होती है। इसका कारण समुदाय आधारित परियोजना स्थलों के आसपास संरचित किया जाना है। ग्रामीण महिलाओं के रहने के स्थान के करीब परियोजना स्थलों स्थानीयकरण के अलावा मनरेगा पुरुष और महिला श्रमिकों, दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन प्रदान करता है। अंत में: मनरेगा परियोजनाओं कम कुशल काम करते हैं, और इस तरह से अनुभव के बिना महिलाओं की भी पहुंच बनती है।

 

जैसा कि हमने दिसंबर में, इंडियास्पेंड में चर्चा की है कि कई महिलाएं – विशेष कर ग्रामीण महिलाएं – ने कि नौकरी के लिए आवश्यक कौशल की कमी होने की चिंता व्यक्त की है। भारतीय सरकार ने हाल ही में, मेक इन इंडिया एवं स्किल इंडिया कार्यक्रम के ज़रिए श्रम शक्ति और शहरों में भारत के युवाओं की बड़ी संख्या की प्राथमिकता को संबोधित करने का प्रयास किया है।

 

यह सुनिश्चत करने के लिए कि प्रशिक्षुओं की एक निश्चित अनुपात महिलाएं हैं, दोनों कार्यक्रमों में कोटा शामिल किया गया है। यह योजनाएं, श्रम बल में कई युवा महिलाओं को लाने के लिए एक अभूतपूर्व अवसर पेश करती हैं लेकिन अक्सर महिलाओं को प्रशिक्षण के बाद काम के लिए घर से दूर जाने की आवश्यकता होती है और वर्तमान में, काम के लिए घर से दूर गई महिलाओं के लिए वर्तमान में कोई तंत्र नहीं है।

 

काम के लिए महिलाओं का घर से बाहर निकलने में मनरेगा पहला कदम हो सकता है। स्किल इंडिया की चुनौती भिन्न क्षेत्रों में महिलाओं को सफल बनाना है, जहां अधिक आर्थिक और अन्य अवसर निहित हो सकते हैं। महिलाओं का शिक्षा स्तर बढ़ रहा है, और महिलाओं का वित्तीय समावेश भी। लेकिन महिलाओं की श्रम शक्ति की भागीदारी गिरावट हो रही है – और हमारे आंकड़ों से पता चलता महिलाओं की गतिशीलता में भी कमी हो सकती है। यहि भारत की महिलाओं को, पुरुषों की तरह ही समान आर्थिक अवसरों तक पहुंच हो तो इन मुद्दों को संबोधित करना होगा।

 

(पांडे पब्लिक पॉलिसी की मोहम्मद कमल प्रोफेसर एवं हार्वर्ड केनेडी स्कूल में एविडेंस फॉर पॉलिसी डिज़ाइन (EPoD) की सह- निर्देशक हैं। जॉनसन EPoD की भारत कार्यक्रमों के प्रबंधन के लिए एक कार्यक्रम एसोसिएट है। डॉज एविडेंस फॉर पॉलिसी डिज़ाइन में डाटा एनालिटिक्ल लीड हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 9 अप्रैल 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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