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क्या पुलिस के खिलाफ शिकायतें वास्तव में कम हो रहीं ?

तृषा जलान,

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तमिलनाडु में जनता ने  7 अप्रैल को उग्र प्रदर्शन-आंध्र प्रदेश की पुलिस के खिलाफ किया , जब वहाँ की पुलिस ने चन्दन के 20 तस्करों को गोली मार दिया |

 

31 मार्च 2015 को केन्द्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के पटियाला कोर्ट, पंजाब ने 1992 में  दो फर्जी एनकाउंटर मामले में एक रिटायर्ड पुलिस अधीक्षक सहित 8 अन्य पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी |

 

इसके बाद हाशिमपुरा में हुए नर संहार में आरोपित 16 सेवानिवृत्त पुलिस कर्मचारियों को दोष मुक्त करने का निर्णय आया, उक्त 16 पुलिस कर्मचारियों के ऊपर मुस्लिम युवकों को जान से मारने का आरोप था |

 

भारत मे पुलिस द्वारा किए गए कृत्य ज़्यादातर सवालों के घेरें में रहे हैं– कुछ ऐसे ही शंका भरे प्रश्न–आंध्र प्रदेश और तेलंगाना पुलिस के उक्त कार्य पर जनता द्वारा उठाये जा रहे हैं | लेकिन सब मिलाकर आकड़ें बताते हैं कि पुलिस तथा महिला पुलिस के खिलाफ दर्ज होने वाले मुकदमें में कमी आयी है |

 

भारत सरकार के गृहमंत्रालय के अंतर्गत कार्यशील राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार पुलिस के खिलाफ शिकायतों की संख्या में 7% की कमी आई है, वर्ष 2013 में 51,120 शिकायतें दर्ज हुईं, जबकि वर्ष 2009 में 54,873 हुई थीं |

 

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Source: National Crime Records Bureau

 

पुलिस के खिलाफ दर्ज होने वाली शिकायतों में 37% की गिरावट आयी है | जो वर्ष 2009 में 25,394 हुई, वहीँ  वर्ष 2013 में यह संख्या घटकर 15,830 हो गई |

 

देश में पुलिस के खिलाफ शिकायतों का प्रतिशत 24% है, यानि कि दिल्ली में प्रत्येक चार दर्ज शिकायतों में से एक शिकायत पुलिसकर्मी के खिलाफ होती है, ऐसा देश की  राजधानी में है, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में दोनों को मिलाकर पुलिस के खिलाफ शिकायतों का प्रतिशत कुल शिकायतों की तुलना में 32% है |

 

दिल्ली की 16 मिलियन जनता के लिए कुल पुलिस बल की संख्या 75,704 है | क्या यह माने कि दिल्ली पुलिस देश में सबसे अनैतिक पुलिस है, या दिल्ली सरकार उपरोक्त अपर्याप्त संख्या के प्रति खुद अनैतिक / पक्षपात पूर्ण है ?

 

उक्त आंकड़े जरूर कुछ संकेत करते है पर ये भ्रामक प्रतीत होते है |

 

ये आंकड़े पुलिस थानों में दर्ज केसों का न्यायसंगत समय में निस्तारण की ओर संकेत  नहीं करते |

 

पुलिस बल के खिलाफ कम शिकायतों का दर्ज होना, या महिला-पुलिस के खिलाफ कम शिकायतें दर्ज करने का निहितार्थ यह नहीं लगता कि पुलिस बल के आचरण में सुधार हो रहा है, और साथ ही दिल्ली पुलिस के खिलाफ जबर्दस्त शिकायतों का दर्ज होने का मतलब यह नहीं कि दिल्ली पुलिस भारत की सबसे अनैतिक पुलिस फोर्स है |

 

वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को पुलिस द्वारा किये गए अपराध और जांच के लिए एक स्वायत्त संस्था पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी (पीसीए) के गठन का आदेश दिया लेकिन केवल १४ राज्यों ने ही इसका गठन किया |

 

पीसीए अपनी क्षमतानुसार काम नहीं कर पा रहे हैं– कारण समस्त भारतीय पुलिस व्यवस्था में एक ही बीमारी फैली है– जिसके ये नाम हो सकते हैं– जवानों की कमी, संसाधनों का अभाव, अपराधियों को पकड़ने के लिए समुचित आदेश नहीं|

 

पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा और परिणाम स्वरूप दोषारोपण की संख्या (2009-13)

पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमों में दोषारोपित पाए जाने वाले निर्णयों की संख्या, 2009-13

 

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Source: National Crime Records Bureau

 

पीसीए में दायर किए गए शिकायती दावों में अगर पुलिसकर्मियों के खिलाफ उचित साक्ष्य नहीं पाये जाते तो वो मामले निरस्त कर दिये जाते हैं, या अगर वो मामला किसी न्यायालय में लंबित है– तो भी पुलिस के खिलाफ केस निरस्त कर दिया जाता है | पुलिस के खिलाफ कौन गवाही देता है– यह जांच का विषय है|

 

यदि भूले भटके पुलिस के खिलाफ दोष साबित भी हो जाता है– तो पीसीए शिकायतकर्ता से उस पुलिस कर्मी के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने का दुसाध्य आदेश देती है | जोकि लगभग असंभव है – आज की भारत की पुलिस-प्रशासनिक व्यवस्था में |

 

बमुश्किल जब पुलिस के खिलाफ मुकदमों का निस्तारण होता है– तो दोषरहित अधिक होते हैं (65% से 89% तक ) अपेक्षाकृत दोषी सिद्ध होने के (11% से 35 % तक ) |

 

Source: National Crime Records Bureau

 

(त्रिशा जालान मानविकी में स्नातक की छात्रा हैं और इंडिया स्पेंड की इंटर्न हैं | )

 

Image Credit: Flickr/Austin Yoder
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