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क्या 5% बनेगा लालू के लिए ज़हर का घूंट

प्रवीन चक्रवर्ती,

Lalu 620

 

बिहार विधानसभा चुनावों के लिए आरजेडी और जेडीयू के बीच गठबंधन होगा। राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो, लालू यादव ने गठबंधन पर मुहर लगाते हुए कहा कि वह इस गठबंधन से काफी खुश हैं और आने वाले चुनाव में दोनों पार्टियां एकजुट होकर लड़ेंगी। बीजेपी को निशाना बनाते हुए लालू यादव ने कहा कि ‘सांप्रदायिकता के ‘सांप’ का फन कुचलने के लिए मैं सब तरह का जहर पीने को तैयार हूं।’

 

जनता दल ( यूनाइटेड) , राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पार्टी ने मिलकर बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए नितीश कुमार को अपना नेता चुना है। लालू यादव ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए साफ किया कि बिहार में सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए समान विचारधाराओं वाली पार्टियां एकजुट होकर काम करने के लिए तैयार हैं। राज्य में सेक्यूलरिज़म कायम रखने के लिए उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी और बिहार के मुख्यमंत्री, नितीश कुमार का नेतृत्व भी स्वीकार है।  

 

साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर मचे सियास शोर छोड़, अगर हम सिर्फ आंकड़ो के गणित को देखे तो 2014 के लोकसभा चुनाव में अगर उनके वोट जुड़ जाते तो बीजेपी के अगुवाई वाली एनडीए मौजूदा 31 सीटों के बजाए सिर्फ 11 सीटों पर सिमट कर रह जाती। और यही वजह रही होगी कि लालू ने नितीश को गले लगाया है।

 

एक नजर 2014 के हुए चुनावों और इन समान विचारधारों वाली पार्टियों के वोट शेयर पर डाली जाए तो स्पष्ट है कि इन्हें लुभाने के लिए किसी सपेरे की ज़रुरत नहीं है। हालांकि पिछले एक दशक में बिहार के मतदाता विकल्पों का विश्लेषण करें तो लगता है कि संभावित भाजपा विरोधी वोटों के समेकन के बावजूद आगामी चुनाव किसी सांप-सीढ़ी के दिलचस्प खेल से कम नहीं होगा।

 

2004 के बाद से बिहार के 243 निर्वाचन क्षेत्रों से लगभग 155 मिलियन मतदाताओं ने तीन विधान सभा और तीन लोकसभा चुनावों में अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल किया है। भाजपा, जेडीयू, राजद, कांग्रेस और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने विभिन्न संयोजनों के साथ बिहार में चुनावी लड़ाई लड़ी है। भाजपा, जेडीयू, राजद और कांग्रेस के उम्मीदवारों का एक साथ यदि मतपत्र देखा जाए तो साफ होता है कि बिहार के वोटर इन तीन पार्टियों के मुकाबले बीजेपी को चुनना ज़्यादा पसंद करती है।

 

2004 में हुए लोक सभा चुनाव को देखा जाए तो कुछ बातें और स्पष्ट होती हैं। बिहार के 100 वोटरों, जिन्होंने भाजपा, जद(यू), राजद और कांग्रेस के उम्मीदवारो को चुना, में से 36 की पसंद बीजेपी रही। जबकि 63 लोगों ने इन तीन पार्टियों में से किसी एक पार्टी के उम्मीदवार को वोट दिया।

 

वहीं अगर 2014 के चुनावों पर नज़र डाले तो देखते हैं कि 100 वोटरों में से 40 वोटर की पसंद बीजेपी रही जबकि 45 वोटरों ने तीन पार्टियों में से किसी एक को चुना और बाकी बचे वोटरों ने अन्य पार्टियों के उम्मीदवारों को चुना। भारतीय जनता पार्टी और तीन पार्टियों के बीच वोट शेयरों में अंतर कम होता साफ दिख रहा है।

 

2004 के लोक सभा चुनाव में जहां यह अंतर 26 फीसदी था वहीं 2014 के चुनाव में यह 5 फीसदी ही रहा। गौरतलब है कि उक्त दिया गया डाटा निर्वाचन आयोग द्वारा उपलब्ध कराया गया प्रत्येक पार्टी के समग्र वोट शेयर का वर्णन नहीं है। बल्कि यह एक विश्लेषण मात्र है कि 2004 के बाद से पिछले छह चुनावों के दौरान बिहार के मतदाताओं का वोट किस पार्टी के खाते में गया।

 

 

अक्टूबर 2005 के विधान सभा चुनाव के बाद हुए हर चुनाव में आजेडी, जद ( यू ) या सामान विचारधाराओं वाली पार्टी को चुनने वाले मतदाताओं के प्रतिशत में काफी गिरावट आई है। हाल ही में हुए 2014 के लोक सभा चुनावों के नतीजों के देख कर तो यही लगता है।

 

औसतन 2005 के विधानसभा चुनावों में, 100 वोटरों में से 53 मतदाताओं ने आरजेडी, जेडीयू या कांग्रेस कंबाईंड को चुना। जबकि 2009 के लोकसभा चुनावों में इन तीन पार्टियों में से किसी एक को चुनने वाले मतदाताओं का संख्या 54 रही। वहीं 2010 के विधानसभा चुनाव में ऐसे 50 वोटर रहे जिन्होंने इन समान विचारधाराओं वाली पार्टी को चुना और 2014 के लोकसभा चुनावों में ऐसे वोटरों की संख्या 45 रही।

 

आरजेडी और जेडीयू कितना भी अलग विचारों की दुहाई दें लेकिन वोटरों की गिरती हुई संख्या को देखते हुए लगता है कि बीजेपी के खिलाफ खड़े होने का इन दोनों पार्टियों के पास सिवाय गठबंधन के कोई और चारा नहीं है। उपर दिए गए चार्ट से साफ ज़ाहिर है कि समान विचारधारा वाले राजनीतिक पार्टियां और बीजेपी के वोट शेयर की खाई लगातार कम हो रही है। 2014 के लोक सभा चुनाव में यह अंतर केवल 5 फीसदी का था।

 

क्या होगा 2015 के बिहार चुनाव में? 100 में से 5 और मतदाता अन्य समान विचारधारा वाली पार्टी छोड़ बीजेपी की तरफ जाएंगे या फिर वोट शेयर के बीच हो रहे अंतर में रिवर्स गियर लगेगी… लालू यादव के लिए यह सवाल वाकई विषाक्त है।

 

(चक्रवर्ती आईडीएफसी के साथ जुड़े हैं साथ ही IndiaSpend के ट्रस्टी संस्थापक है । अतिरिक्त सहायता- ऋतिका कुमार और स्पवनिल भंडारी)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 16 जून 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 
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