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क्यों दुनिया में सबसे अधिक मृत जन्म होता है भारत में?

दीपा पद्मानाबन,

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उत्तरी भारतीय शहर, लखनऊ के अस्पताल में नवजात शिशु

 

नागापुरा,  हुन्सुर जिला (कर्नाटक): दक्षिण कर्नाटक के नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान के पास रहने वाली युवा महिला, शांता  की पीली आंखों से इसका दर्द चेहरे पर झलकता है। शांता पारंपरिक रुप से शहद निकालने वाली जनजाति की हैं।

 

शांता बताती हैं कि किस प्रकार उनका बच्चा,उनका बेटा, मृत पैदा हुआ था। जब उन्हें प्रसव पीड़ा हुई तोउन्होंने हुन्सुर में नजदीकी जिला अस्पताल तक  ऑटोरिक्शा से 20 किलोमीटर की यात्रा की। अस्पताल पहुंचने पर उन्हें बताया गया कि उनके बच्चे की मृत्यु गर्भ में ही दो दिन पहले हो चुकी थी।

 

मध्य 20 की आयु की शांता में गर्भावधि मधुमेह की पहचान की गई थी, ऐसी स्थिति यदि मां का ठीक प्रकार से इलाज न किया गया तो गर्भ में बच्चे को खतरा हो सकता है।

 

इस तरह की मौत नागापुरा में आम है, जहां एक दशक में 50 मौतों की रिपोर्ट दर्ज की गई है, हालांकि इस संबंध में कोई नई रिपोर्ट सामने नहीं आई है। एक दुबली-पतली महिला, अंबिका, जिनकी आयु भी मध्य 20 के बीच है, को भी मृत बच्चा पैदा हुआ है। अंबिका का प्रसव स्थानीय दाई और सास ने कराया है।

 

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अंबिका को भी मृत बच्चा पैदा हुआ है जिसका प्रसव दाई और सास ने कराया है।

 

जब भावना निरंजनकुमार, मैसूर के सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (PHRII), एक गैर सरकारी संगठन की एक डॉक्टर, ने अंबिका से पूछा कि वो प्रसव के लिए अस्पताल क्यों नहीं आई तो अंबिका ने कहा कि,”यह सब हुत जल्दी में हुआ।”

 

अंबिका और शांता जेनु कोरुबस (शहद संग्रह करने वाले) हैं। अंबिका की तरह ही अधिकतर महिलाएं घर में हीं बच्चे को जन्म देती हैं। लैंसेट (एक वैश्विक मेडिकल जर्नल) द्वारा पिछले महीने प्रकाशित शोध के अनुसार, इनके जन्म के समय मृत पैदा होने वाले बच्चे, भारत के 592,000 मृत जन्म होने वाले बच्चों का हिस्सा हैं।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मृत जन्म “किसी जीवन संकेत के बिना जन्म लेने वाले बच्चे या गर्भस्था के 28 सप्ताह के बाद जीवन संकेत समाप्त ” होने पर कहा जाता है।

 

मृत प्रसव: दुनिया में सबसे आगे भारत

 

 

दुनिया भर में मृत जन्म का दर वर्ष 2000 में 24.7 से गिरकर 2015 में प्रति 1,000 जन्मों पर 18.4 हुआ है। इसी अवधि के दौरान, भारत में मृत जन्म दर 33.3 से गिरकर 23 हुआ है। यह आंकड़े युगांडा, घाना और मोजाम्बिक, सभी गरीब देशों के सामन है।

 

2 फीसदी के साथ मृत जन्म का वार्षिक वैश्विक औसत दर, मातृ (3 फीसदी) या पांच साल से कम आयु के बच्चों के बाद नवजात मृत्यु दर (4.5 फीसदी) से कम है। भारत में भी मातृ मृत्यु दर (5.7 फीसदी) और नवजात मृत्यु दर (4.6 फीसदी) का वार्षिक औसत मृत जन्म (2.4 फीसदी) से बेहतर है।

 

जोखिम वाले कारकों में:  प्रसव पूर्व देखभाल और निगरानी का अभाव; गैर संचारी रोग जैसे कि उच्च रक्तचाप और मधुमेह; पोषण संबंधी कारक जैसे कि मातृ एनीमिया; जैव चिकित्सा कारक जैसे कि जन्मजात असामान्यताएं, संक्रमण, और जीवन शैली ; पर्यावरणीय कारक जैसे कि शराब पीना और धूम्रपान करना ; और गरीबी , परिवहन और सामान्य रहने की स्थिति सहित सामाजिक निर्धारक शामिल हैं।

 

लैंसेट अध्ययन कहती है कि वंचित महिलाओं में मृत जन्म देने का जोखिम दोगुना बढ़ जाता है

 

आदिवासी महिलाओं को डॉक्टर छूते नहीं – एवं बुरे स्वास्थ्य के लिए अन्य कारण

 

जेनु कोरुबा जनजाती की महिलाओं की शिकायत है कि उनके संगठित स्वास्थ्य से दूर रहने के कारणों में स्वास्थ्य क्लीनिकों (सरकारी और गैर सरकारी संगठन दोनों) में उनके साथ भेद-भाव होना शामिल हैं। उनका कहना है कि क्लीनिक पर उन्हें घंटों इंतज़ार कराया जाता है और अक्सर डॉक्टर उन्हें छूने से भी मना कर देते हैं।

 

इंडियास्पेंड से बात करते हुए शांता ने बताया कि “जब मैं 20 सप्ताह स्कैन के लिए जिला अस्पताल में गई तो मुझे किसी ने देखा नहीं। मैंने दो घंटे इंतज़ार किया लेकिन मुझे चेकअप के लिए किसी ने नहीं बुलाया। इसलिए मैं बिना स्कैन के वापस आ गयी”।

 

Shanta

शांता को जब प्रसव पीड़ा शुरु हुआ तो वो 20 किलोमीटर ऑटोरिक्शा से चल कर अस्पताल पहुंची जहां उसे बताया गया कि उसके बच्चे की मौत गर्भ में ही दो दिन पहले हो चुकी है। यहां शांता डॉ निरंजन कुमार (दाएं) के साथ देखी जा सकती हैं।

 

लोग जिनके पास सार्वजनिक परिवहन की सुविधा  नहीं है, उनके लिए 20 किलोमीटर की यात्रा करना आसान नहीं है और यात्रा करने के लिए उन्हें पति पर निर्भर रहना पड़ता है जो कि अक्सर काम के सिलसिले में कोडागू कॉफी बगान में रहते हैं जहां वो मजदूरी करते हैं।

 

नागापुरा ज़िले में अधिकांश लोग अशिक्षित एवं स्वास्थ्य लाभ के संबंध में जागरुक नहीं हैं – फिर भी शांता 20 किमी की यात्रा कर अस्पताल पहुंची – और अधिकतर लोग जो पहले जंगल में रहते थे अभी पारंपरिक दवाईयों पर निर्भर हैं।

 

पिछले कुछ वर्षों में, पीएचआरआईआई जैसे कुछ गैर सरकारी संगठन जैसे कि एवं सरकारी कर्मचारियों ने गर्भवती और प्रसवोत्तर महिलाओं और शिशुओं के लिए स्वास्थ्य शिविर चलाया है, जहां उन्हें मातृ और शिशि के स्वास्थ्य के संबंध में जानकारी दी जाती है। साथ ही आदिवासी महिलाओं को नियमित रुप से स्वास्थ्य केन्द्रों पर जांच कराने के लिए प्रोत्साहित भी किया है। लेकिन फिर भी वो नहीं आते हैं और यदि वो आते हैं तो भेदभाव के कारण उन्हें कम ही देखा जाता है।

 

निरंजनकुमार कहती हैं कि महिलाओं में खून की कमी भी है लेकिन वे कोई आयरन की अतिरिक्त खुराक नहीं लेती हैं। इसका कारण पूछने पर महिलाएं संकोचपूर्वक मुस्कुराती हैं। डॉक्टरों का अनुमान है कि वो गोलियां लेने की आदि नहीं हैं।

 

भारत में मृत जन्म कम हो रहे हैं लेकिन अब भी इसकी संख्या कम नहीं है।

 

जिन राज्यों में मातृ स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाता है वहां मृत प्रसव होने की संभावना कम

 

लैंसेट अध्ययन में बताया गया, “हर नवजात एक्शन प्लान” का उदेश्य 2030 तक वैश्विक मृत जन्म दर प्रति 1,000 जन्म पर 12 या इससे कम तक करना है (2014 में भारत ने “हर नवजात एक्शन प्लान”, मातृ प्रसव को एकल संख्या तक लाने के उदेश्य से अपनाया है।)। इसके लिए सशक्त महिलाओं, बेहतर स्वास्थ्य सेवा एवं प्रगति नियंत्रण की आवश्यकता है।

 

लाभांश स्पष्ट है:

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही बताया है कि जिन राज्यों में मातृ स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा रहा है उन राज्यों में बच्चों के स्वास्थ्य बेहतर हैं। 2005 में, सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित करने के उदेश्य से जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) जैसे शुरु हुए कार्यक्रम, सफलतापूर्वक संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करने के लिए नकद प्रोत्साहन प्रदान करते हैं एवं सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इनका दर – सभी प्रसव का – 2006-07 में 56.7 फीसदी से बढ़ कर 2010-11 में 78.5 फीसदी हुआ है।

 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण द्वारा हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, कार्नाटक में 94 फीसदी संस्थागत प्रसव हुए हैं। 61 फीसदी और 58.4 फीसदी के साथ उत्तराखंड एवं मेघालय का प्रदर्शन सबसे बुरा रहा है। बाकि में प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता पर्यवेक्षण के बिना और संभवतः अस्वास्थ्यकर की स्थिति में घर में ही प्रसव हुए हैं। घर में प्रसव के कारण हैं सुविधा, टांके का डर, परिवहन और अस्पतालों या वहन पर खर्च करने में असमर्थता।

 

जेएसवाई लाभार्थियों की संख्या, जो एक दशक पहले शुरु हुई थी, 2014-15 में 0.74 मिलियन से बढ़ कर 10.4 मिलियन हुई है। लेकिन सरकार की इस समीक्षा से पता चलता है कि जेएसवाई के केवल 15 फीसदी संस्थान संस्थागत प्रसव के साथ निपटने के लिए सुसज्जित हैं।

 

(पद्मानबन बेंगलुरु स्थित पत्रकार है एवं इनकी विशेषज्ञता  सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग है)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 05 फरवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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