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क्यों हो रही है आम आदमी की थाली से दाल गायब?

अभिषेक वाघमारे,

Pulses 620

 

बेटा – मां आज दाल खाने का मन हो रहा है..
 

मां – इतने पैसे नहीं हैं…चुपचाप बटर चिकन खा ले

 

आज-कल सोशल नेटवर्क पर इस तरह के चुटकुले खूब चल रहे हैं। बात भले ही मज़ाक में की जा रही है लेकिन यह सच है कि दाल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं और आम आदमी की थाली से दाल गायब हो गई है। आंकड़ों पर नज़र डाले तो दाल की कीमत 210 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है यानि पिछले साल के मुकाबले कीमतों में दोगुना से भी अधिक वृद्धि हुई है।

 

एनडीटीवी की इस रिपोर्ट के अनुसार दाल की बढ़ती कीमतों से बढ़ती राजनीतिक दबाव को कम करने के लिए सरकार की ओर से कदम उठाए जा रहे हैं। दाल की कालाबाजारी रोकने के लिए देश के कई राज्यों में  दालों की जमाखोरी के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। हाल ही में 13 राज्यों में छापे मार कर जमाखोरों से करीब 75,000 मीट्रिक टन दाल ज़ब्त की गई है।

 

परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली में एक सप्ताह में दो बार अंतर-मंत्रालयी बैठक बुलाई एवं राज्यों को इस संबंध में पर्याप्त कदम उठाने के लिए कहा है।

 

लेकिन यह सब अल्पकालिक प्रतिक्रिया थी जबकि दीर्घकालिक समस्या वैसी ही बनी हुई है। करीब 80 फीसदी दालों का उत्पादन भारत में होता है जो देश के अधिकतर गरीब किसानों की आजीविका है और – हाल ही तक – वनस्पति प्रोटीन का एक विश्वसनीय,  समृद्ध स्रोत था ।

 

इस समय दाल की कीमतों में वृद्धि होने का मुख्य कारण गर्मियों की फसल या खरीफ ( जून से अक्टूबर ) फसलों का बाज़ार में अब तक नहीं पहुंच पाना है।

 

अनाज काटने का समय अभी-अभी समाप्त हुआ है। मौजूदा स्टॉक जो बेची जा रही है वह 2014-15 की सर्दियों की फसल या रबी ( नवंबर-अप्रैल ) फसल जो बाज़ार में 2015 के अप्रैल और मई महीने में उतारी गई वह जमा की हुई फसले हैं।

 
तुअर दाल, भारत में होने वाली पांच मुख्य दालों में से एक है। तुअर दाल का उत्पादन केवल खरीफ मौसम में ही होता है और यह एक मुख्य कारण है कि क्यों अन्य दालों के मुकाबले तुअर दाल की ही कीमत में सबसे अधिक उछाल आया है। दालों की कुल उत्पादन में से करीब 70 फीसदी रबी दालें होती है।
 
जन्माष्टमी से लेकर दिवाली तक, त्योहार के मौसम के दौरान दाल की मांग भी अधिक होती है जिससे बढ़ती कीमतों को उपभोक्ताओं में आसानी से स्वीकृति मिल जाती है। यह समय व्यापारियों के लिए कीमत बढ़ाने के लिए सबसे अनुरुप होता है।
 
लेकिन दालों की कीमत में वृद्धि होने का वास्तविक स्पष्टीकरण (क्यों अगले साल भी दाल की कीमतें ऐसे ही बढ़ सकती हैं ) बहुत जटिल है।
 
दाल पर उठा बवंडर

 

दो साल से लगातार मानसून में कमी  ( 10 फीसदी से कम वर्षा की कमी) हो रही है। दालों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एमएसपी) में नगण्य वृद्धि हुई है। भारतीय किसान की प्रति हेक्टेयर अधिक दाल उत्पादन करने असमर्थ है। इंडियास्पेंड ने पहले ही अपनी खास रिपोर्ट में बताया है कि किस प्रकार भारतीय प्रोटीन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए अंडा, चिकन और दूध का सेवन कर रहे हैं।

 

यह कुछ कारक हैं जिनके कारण दाल किसानों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए बवंडर खड़ा हो गया है।

 

विश्व से सबसे बड़े दाल उत्पादक एवं उपभोक्ता, भारत है जो प्रति हेक्टेयर 600 किलो से 800 किलो की उत्पादकता के साथ 16 से 20 मिलियन टन (या वैश्विक उत्पादन का एक चौथाई ) दाल उत्पादन करता है और यह उभरते और विकसित देशों के मुकाबले सबसे कम है । यहां तक कि गरीब देश म्यांमार भी प्रति हेक्टर दोगुना उत्पादन करता है वही ईजिप्ट चार गुना अधिक उत्पादन करता है।

 
वैश्विक दलहन उत्पादकता में भारत सबसे नीचे
 

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही बताया है कि किस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप में जून से सितंबर का वर्षा चक्र अनियमित है और यह जलवायु परिवर्तन संभवत: इसी का परिणाम है। बढ़ती स्थानिक और लौकिक भिन्नता भारत में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।

 

भारत में केवल 16 फीसदी दालों के लिए खेत सिंचित है (1)। इसलिए 84 फीसदी खेती अनिश्चित वर्षा पर निर्भर करती है।
 
सामान्य से मानसून का प्रस्थान एवं और दलहन उत्पादन ( खरीफ सीजन)
 

 

वर्ष 2004-05 के दौरान वर्षा में 14 फीसदी कमी के कारण दालों की उत्पादन 6.16 मिलियन टन से गिरकर 4.72 मिलियन टन हुई थी। इसी प्रकार, करीब पिछले फसलों की तरह ही 2015 की खरीफ मौसम में भी 14 फीसदी वर्षा की कमी की उम्मीद है जिसके परिणामस्वरुप 5.56 मिलियन टन दाल उत्पादन का अनुमान किया जा रहा है (पहले उन्नत अनुमान)।

 

वर्ष 2010-11 में 18.24 मिलियन टन दालों का उत्पादन हुआ था और उसके बाद ही धीरे-धीरे दालों के कुल उत्पादन में गिरावट शुरु हुई थी।

 

दालों का उत्पादन, अगले 50 वर्षों की मांग से पिछड़ गया है। और यही कारण है कि भारतीय व्यपारी आयात पर भरोसा करने के लिए मजबूर हुए हैं जोकि अब मांग का 15 फीसदी तक पहुंच गया है।

 

हर वर्ष भारत 3 मिलियन टन से अधिक दाल आयात करता है, हाल ही में ज़ब्त की गई दालें कुल आयात का 5 फीसदी बनाती हैं।

 
दालें – बढ़ती मांग, गिरता उत्पादन
 

 

वर्ष 2014-15 के दौरान चार मिलियन टन से अधिक दालों के लिए आयात बिल करीब 15,990 करोड़ रुपए था। इसी अवधि के दौरान कृषि के लिए कुल केन्द्रीय योजना परिव्यय 11,530 करोड़ रुपए है।

 

सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रभाव

 

वर्ष 2011-12 में उत्पादन में गिरावट आने के बाद (औसत से नीचे बारिश एवं दालों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में 6 से 10 फीसदी वृद्धि होने के कारण ) उसके बाद से वर्षों में उत्पादन में वृद्धि हुई है (2012-13 , 2013-14) और इसका कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में 15 से 25 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 
दालें – समर्थन मूल्य वृद्धि बढ़ने से उत्पादन में वृद्धि
 

 

वर्ष 2014 में मानसून में 12 फीसदी की कमी हुई थी एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य में प्रति क्विंटल 50 से 100 रुपए की वृद्धि हुई थी।

 

वर्ष 2015 में मानसून में 14 फीसदी की कमी हुई है और अभी तक न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि प्रति क्विंटल 100 रुपए से कम है।

हालांकि तुअर, मूंह एवं उड़द के लिए प्रति क्विंटल 200 रुपए का बोनस दिया गया है लेकिन कुल उत्पादन में 17 मिलियन टन तक गिरवट हुई है।
 
भारतीय कृषि के बदलते चेहरे

 

कृषि जनगणना 2010-11 के अनुसार जहां पिछले 20 वर्षों में छोटे एवं मध्यम किसानों की संख्या में वृद्धि हुई है वहीं लगभग हर फसल के लिए बड़े किसानों की संख्या में गिरावट हुई है।

 

बुनियादी खाद्य पदार्थों के उत्पादन में अधिक एवं छोटे भूमि-धारकों के शामिल होने से दाल उगाने वाले गरीब किसानों की सौदा-शक्ति स्वभाविक रुप से कम हो रही है।

 

जबकि पिछले 20 वर्षों में खाद्यान्न के तहत क्षेत्र (अनाज और दालों) और तिलहन में 5.5 फीसदी एवं 14.6 फीसदी की वृद्धि हुई है, कुछ नकदी फसलों ( गन्ना, कपास और मसालों) के तहत क्षेत्रों में 22.9 फीसदी से 32.3 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

प्रमुख फसलें : खेती के तहत क्षेत्र में प्रतिशत वृद्धि (1995-2010)

 

 

भारतीयों का अंडे, चिकन एवं दूध की ओर बढ़ता झुकाव

 

एक और तथ्य जिसका प्रभाव दाल के किसानों एवं उत्पादन पर पड़ा है वह है प्रोटीन ग्रहण के स्रोतों में विविधीकरण ।

 

अंडो की खपत में खासी वृद्धि पाई गई है। वर्ष 1993 में, शहरी इलाकों में जहां प्रति व्यक्ति अंडों की खपत 17.76 अंडे थी वहीं 2012 में यह बढ़ कर 38.16 हो गई है। वहीं यदि ग्रामीण इलाकों के आंकड़े पर नड़र डाली जाए तो यह 7.68 अंडे से बढ़ कर 23.28 हो गई है। ( 2 )

 

इसी अवधि के दौरान शहरी इलाकों में प्रति व्यक्ति दाल की खपत प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति 9 किलो से 12 किलो के बीच रही है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़े 8 किलो से 10 किलो के बीच रहे हैं। यह निश्चित रुप से उल्लेखनीय वृद्धि नहीं है।

 
भारतीय प्रोटीन खपत ( प्रति व्यक्ति ), 1993-2012
 

 

सरकार को करना चाहिए हस्तक्षेप?

 

जैसा कि हमने पहले बताया है चार मुख्य फैक्टर – मानसून की विफलता,न्यूनतम समर्थन मूल्य के संबंध में सरकार की निष्क्रियता , आकर्षक नकदी फसलों के लिए बदलाव एवं वैकल्पिक प्रोटीन स्रोतों की उपलब्धता – के कारण ही दाल के बाज़ार पर बुरा प्रभाव पड़ा है।

 

यदि बाज़ार की बाध्यता इन्हें अनिवार्य करते हैं तो ऐसी स्थिति में सरकार को क्या करना चाहिए?

 

हाल ही में अंग्रेज़ी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में अशोक गुलाटी , कृषि के लिए इंफोसिस के अध्यक्ष प्रोफेसर एवं श्वेता सैनी , अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर भारतीय अनुसंधान परिषद में सलाहकार ( आईसीआरआईईआर ) के छपे एक कॉलम के अनुसार, “सरकार को किसानों के लिए एक फसल के तटस्थ प्रोत्साहन संरचना बनाने की जरूरत है जो वर्तमान में चावल, गेहूं और गन्ने के पक्ष में विषम है।”

 

सरकार के हस्तक्षेप और एक दीर्घकालिक योजना के बिना दालों की कीमतों में बदलाव लाना संभवत: मुश्किल है।

 

References:

(1) Agriculture Ministry data, Lok Sabha Questions (Sixteenth Lok Sabha)

(2) Data on household consumption of various goods and services, NSSO Rounds 61, 66, 68

 

(वाघमारे इंडिस्पेंड के साथ  विश्लेषक है।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 31 अक्टूबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 
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