Home » Cover Story » क्यों 1.1 मिलियन भारतीय एचआईवी के मरीज़ों को नहीं मिलती है दवा

क्यों 1.1 मिलियन भारतीय एचआईवी के मरीज़ों को नहीं मिलती है दवा

सिल्वियो ग्रोसचेट्टी,

art_620

चंडीगढ़ में एक जागरूकता अभियान के दौरान चेहरे पर चित्रित संदेशों के साथ प्रदर्शन करते छात्र। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, भारत में केवल 44 फीसदी एचआईवी संक्रमित रोगियों को एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी (दवाईयां जो संक्रमण कम करने के लिए इस्तेमाल होती है) मिलती है।

 

एक अनुमान के अनुसार, करीब 2.1 मिलियन मानव इम्यूनो वायरस(एचआईवी) से संक्रमित भारतीयों को जीवन को लम्बा और संक्रमण को कम करने के लिए कुछ ज़रुरी दवाईयां मिलनी चाहिए लेकिन 44 फीसदी से अधिक मरीज़ों को यह दवाईयां उपलब्ध नहीं होती हैं। यह जानकारी अप्रैल 2016 को स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोकसभा में बताया है।

 

भारत में दवाईयां उन मरीज़ों को दी जाती हैं जिनकी प्रति रक्त की mm3 पर सीडी4 की 350 काउंट से कम है – सीडी 4 कोशिकाएं सफेद रक्त कोशिकाएं हैं, जिनकी गिनकी से व्यक्ति के स्वास्थ्य की प्रतिरोधक क्षमता का आकलन किया जाता है।

 

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, सीडी 4 की गिनती 350 से कम होने के साथ 1.3 मिलियन एचआईवी संक्रमित रोगियों में से 940,000 (70 फीसदी) एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) पर हैं। बच्चों में स्थिति और बद्तर है। 36 फीसदी से अधिक बच्चों को एआरटी प्राप्त नहीं होता है।

 

एआरटी वे दवाएं हैं – जिन्हें जब संयोजन में लिया जाता है – जिन्हें लेने से एचआईवी वायरस को फैलने से रोका जा सकता है और रोग को धीमा किया जा सकता है। यह वायरस को मारते नहीं हैं और न ही इलाज करते हैं।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देश के मुताबिक रोगियों के नैदानिक ​​मंच और एक सफेद रक्त कोशिका संख्या की परवाह किए बिना (जिसके आधार पर भारत निर्धारित करता है कि किसका इलाज किया जाना चाहिए) हर एचआईवी मरीज़ को एंटी-रेट्रोवायरल (एआरटी) दवाएं मिलनी चाहिए।

 

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, एआरटी की जल्द शुरुआत कम मृत्यु दर, रुग्णता और एचआईवी संचरण परिणामों के साथ जुड़ा हुआ है।

 

एचआईवी मरीज़ों की संख्या की तुलना में भारत केवल दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया से पीछे है। यूएनएड्स , एचआईवी / एड्स पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम से 2016 के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका में 48 फीसदी एचआईवी रोगियों को एआरटी प्राप्त होता है जबकि नाइजीरिया में 24 फीसदी रोगियों को यह थेरेपी प्राप्त है।

 

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, साक्ष्यों से पता चलता है कि, “अनुपचारित एचआईवी संक्रमण कई गैर -एड्स परिभाषित स्थिति के विकास के साथ जुड़ा हो सकता है और एआरटी की पहल जल्दी करने से इस तरह की घटनाओं को कम कर देता है और उत्तरजीविता को बेहतर बनाता है।”

 

एचआईवी पॉजिटिव रोगियों के जल्द इलाज शुरु करने से करीब 57 फीसदी मरीज़ों में इन बीमारियों के होने की संभावना कम होती है। यह जानकारी एक अध्ययन, स्ट्रेजिक टाइमिंग ऑफ एंटीरेट्रोवाइरल ट्रीटमेंट, में सामने आई है। यह अध्ययन 2011 के  2016 के बीच 35 अलग-अलग देशों में 4,500 से अधिक लोगों के बीच किया गया है। यह अध्ययन अमेरिका – सरकार द्वारा वित्त पोषित शोध संगठन, इंटरनेश्नल नेटवर्क फॉर स्ट्रेटेजिक इनिशिएटिव इन ग्लोबल एचआईवी ट्रेल्स द्वारा किया गया है।

 

भारत में बच्चे और एचआईवी: दो तिहाई को नहीं मिलती एआरटी

 

5 वर्ष का अहमद और 6 वर्ष की सबा (बदला हुआ नाम) जन्म से ही एचआईवी पॉज़िटिव हैं। उनकी मां से उन्हें यह संक्रमण हुआ है ;सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 3 फीसदी एचआईवी संक्रमण माताओं द्वारा भ्रूण को या नवजात शिशुओं को जन्म के दौरान या बाद में मिलता है।

 

भारत में 138,000 से अधिक बच्चे (15 वर्ष से कम आयु) एचआईवी का शिकार हैं जो कि एड्स आबादी का 6.5 फीसदी है। इनमें से केवल 36 फीसदी (50,000) एआरटी दवाओं पर हैं जोकि एआरटी पर कुल भारतीय आबादी (44 फीसदी) की तुलना में एक छोटा अनुपात है।

 

डब्ल्यूएचओ कहती है कि, “एचआईवी के साथ जी रहे शिशु और युवाओं में खराब परिणाम का अधिक खतरा होता है। गौर हो कि 52 फीसदी जन्म के साथ एचआईवी से ग्रसित बच्चों की मौत, किसी प्रकार के हस्तक्षेप के अभाव में दो वर्ष से पहले हो जाती है। पांच साल की उम्र तक मृत्यु दर का जोखिम और और उपचार के अभाव में रोग प्रगति युवा वयस्क के समान दरों पर गिर जाता है।”

 

अहमद और सबा मुंबई के डेज़ायर सोसायटी में रहने वाले 33 बच्चों में से एक हैं। इस संस्था की स्थापना 11 वर्ष पहले बाबू रवि द्वारा एचआईवी से ग्रसित बच्चों के लिए की गई थी।

 

यह संगठन अब पांच भारतीय शहरों तक फैला है और करीब 300 से अधिक एचआईवी पॉजिटिव बच्चों की देखभाल करता है। अपने शरीर को मजबूत बनाने के लिए सभी बच्चों को सख्त प्रोटीन आहार दिया जाता है और उन सभी को एआरटी दवाएं दी जाती हैं।

 

भारत के किसी भी अन्य शहर की तुलना में चंडगढ़ में एआरटी पर रहने वाले मरीज़ अधिक हैं

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चंडीगढ़ में एआरटी पर 146 फीसदी एचआईवी – एड्स रोगी हैं, जिनमें से कई रोगियों के हरियाणा से होने की संभावना है। हरियाणा के एआरटी केन्द्रों में एचआईवी की आबादी का सबसे कम अनुपात है। इस संबंध मेघालय के लिए यही आंकड़े 82 फीसदी और मिज़ोरम के लिए 73 फीसदी हैं।

 

2 फीसदी के आंकड़ों के साथ त्रिपुरा और 14 फीसदी के साथ सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश सबसे नीचले स्थान पर है।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 455 एआरटी केन्द्र हैं। 68 केंद्रों के साथ महाराष्ट्र सबसे ऊपर है। 63 के साथ कर्नाटक दूसरे, 55 के साथ आंध्र प्रदेश तीसरे और 51 के साथ तमिलनाडु चौथे स्थान पर है।

 

अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में प्रत्येक एआरटी केंद्र कम से कम 1,000 एचआईवी पॉजिटिव रोगियों की देखभाल करता है; हरियाणा में हर 22,500 रोगियों के लिए केंद्र है। भारत में प्रत्येक 4552 एचआईवी पॉजिटिव रोगियों के लिए एक एआरटी केंद्र है।

 

अरुणाचल प्रदेश में प्रति एआरटी केंद्र पर सबसे कम एचआईवी पॉजिटिव रोगी हैं; हरियाणा में हैं सबसे अधिक

Source: Ministry of Health and Family Welfare

 

दुनिया भर में 37 मिलियन से अधिक लोग एड्स – एचआईवी वायरस के कारण सिंड्रोम- के साथ रहते हैं, जो 2010 से 10 फीसदी की वृद्धि है।

 

पिछले पांच वर्षों से 2015 तक, विश्व स्तर पर एआरटी तक पहुंच में 126 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2010 की तुलना में 17 मिलियन लोग एआरटी थेरापी पर हैं।

 

2015 यूएनएड्स के बयान के अनुसार दुनिया 2050 तक एचआईवी की महामारी को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। “ एड्स से ग्रसित लोगों तक एआरटी का विस्तार होने से 2030 तक 21 मिलियन एड्स से संबंधित मौतें और 28 मिलियन नए संक्रमण टल सकते हैं।”

 

(ग्रोसचेट्टीएक मल्टीमीडिया पत्रकार है और नेपियर विश्वविद्यालय, एडिनबर्ग से पत्रकारिता में बीए (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 12 सितम्बर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
__________________________________________________________________

 

“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

 

Views
3208

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *