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क्यों 2022 तक किसानों की आय दोगुना करना है मुश्किल

अभिषेक वाघमारे,

रायपुर, छत्तीसगढ़ में धान खरीद केंद्र।

 

“देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ होने के लिए, हम हमारे किसानों के लिए आभारी हैं। हमें खाद्य सुरक्षा से परे सोचने की आवश्यकता है, इसलिए, सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए खेत और गैर कृषि क्षेत्रों में अपने हस्तक्षेप को नई दिशा देगी।” 29 फरवरी 2016 को, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में यह कहा था|

 

अगले पांच वर्षों में किसानों की आय दोगुनी करने की जेटली की घोषणा की वास्तविकता जानने के लिए इंडियास्पेंड ने विभिन्न सरकारी आंकड़ों पर विश्लेषण किया है। हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि बढ़ती लागत के लिए समायोजन करने के बाद, पिछले दशक में (2003-2013), भारतीय किसानों की आय में प्रति वर्ष प्रभावी ढंग से 5 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

अशोक गुलाटी, कृषि लागत और मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेश्नल इकोनोमिक रिलेशन में प्रोफेसर, ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि वास्तविक आय को दोगुना करना एक चमत्कार होगा, जैसा कि यह प्रति वर्ष 12 फीसदी की चक्रवृद्धि विकास दर का संकेत देता है।

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा रिपोर्ट, कृषि परिवारों की स्थिति के आकलन के अनुसार, फसल उगाने और जानवरों के पालन से औसत मासिक आय 2003 में 1,060 रुपए से बढ़कर 2013 में 3,844 रुपए हुई है, 13.7 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक आय वृद्धि दर है।

 

2003 की रिपोर्ट केवल भूमि के मालिक किसानों को ही लिया गया है जबकि 2013 की रिपोर्ट में भूमिहीन मजदूरों सहित सभी कृषि परिवारों को लिया गया है।

 

हमारे अनुसान के अनुसार, 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए, नाममात्र (संख्यात्मक) संदर्भ में – जो खाते में मुद्रास्फीति नहीं लेते हैं – 15 फीसदी वार्षिक आय वृद्धि दर (चक्रवृद्धि) की आवश्यकता होगी।

 

इसलिए, किसान आय दोगुनी के वादे को पूरा करने के लिए सरकार को आय में वृद्धि दर में मामूली वृद्धि – सामान्य रूप से व्यापार में रखते हुए –  सुनिश्चित करनी होगी, प्रति वर्ष 13.7 फीसदी से 15 फीसदी तक।

 

हालांकि, यहां चार बाधाएं हैं:

 

* बीज, खाद और सिंचाई की लागत में वृद्धि।
*न्यूनतम समर्थन मूल्य की अप्रासंगिकता, जो किसानों से उनकी फसल खरदीते वक्त सरकार उन्हें भुगतान करती है।
* गोदामों और कोल्ड स्टोरेज जैसे बाजार के बुनियादी ढांचे का अभाव|
* तथ्य कि 85 फीसदी किसानों को बीमा से लाभ नहीं मिलता है।

 

जब तक इन मुद्दों को संबोधित नहीं किया जाता, किसान की आय केवल नाममात्र के लिए दोगुनी होगी। देविंदर शर्मा, प्रख्यात भोजन और व्यापार नीति विश्लेषक, की इस रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में वास्तविक आय, मुद्रास्फीति और बढ़े व्यय के लिए समायोजित, तब भी 2016 की आय के करीब होगा।

 

बढ़ती लागत, घटता मुनाफा

 

कृषि उत्पादकता में कमी एवं लागत में वृद्धि होने से किसानों का मुनाफा घट रहा है।

 

2003-2013 के दौरान खेतों की लागत में तीन गुना वृद्धि

 

 

हालांकि, 2003 के मुकाबले 2013 में, खेती से होने वाली आय में 3.6 गुना वृद्धि हुई है लेकिन इसी अवधि के दौरान लागत में तीन गुना वृद्धि हुई है, जिससे तिगुना आय का प्रभाव लगभग समाप्त हो जाता है।

 

सरकार के फसल खरीदने से क्या मिलती है कोई मदद?

 

1965 में शुरू किया गया  न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) कृत्रिम मूल्य निर्धारण की एक प्रणाली है जो किसानों को सिर्फ पारिश्रमिक सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी), भारत में उत्पादित 23 कृषि वस्तुओं के खरीद के न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करता है।

 

हालांकि, न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की घोषणा, बुआई करते हुए किसानों के लिए एक प्रोत्साहन है लेकिन तीन कारक हैं जो ऐसा होने नहीं देंगे:

 

  1. न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में बहुत कम जागरूकता है – औसतन 25 फीसदी से कम किसान, जबकि कुछ फसलों के लिए 5 फीसदी से कम – न्यूनतम समर्थन मूल्य के संबंध में जानकारी है।

 

  1. पिछले तीन वर्षों में, सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में प्रति वर्ष 12 फीसदी तक से वृद्धि हुई है, वर्ष 2012-13 की तुलना में 42 फीसदी की वृद्धि, वर्ष 2011-12 में 52 फीसदी तक और 2010-11 में 39 फीसदी तक।

 

  1. शहरी क्षेत्रों में, न्यूनतम समर्थन मूल्य की वृद्धि मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकते हैं और, इसलिए, उच्च मासिक खर्च भी।

 

चौथाई से भी कम किसानों को पता है समर्थन मूल्य के संबंध में, (खरीफ फसल)

 

 

चौथाई से भी कम किसानों को पता है समर्थन मूल्य के संबंध में, (रबी फसल)

 

 

2013 के बाद अधिकांश फसलों के लिए एमएसपी में मामूली वृद्धि

 

 

2008-09 में रागी के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में 52 फीसदी की वृद्धि हुई है, 2010-11 में तूर दाल के लिए 52 फीसदी, 2011-12 में सरसो के लिए 35 फीसदी और 2012-13 में ज्वार के लिए 53 फीसदी वृद्धि हुई थी।

 

किसान को अंतिम कीमत के रूप में केवल 10 फीसदी ही मिलता है

 

2012 में भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि कुशल कृषि बाजार, गरीबी कम करने के लिए भी शक्तिशाली उपकरण हो सकता है।

 

न्यूनतम समर्थन मूल्य की सीमित पहुंच के कारण किसानों को लाभकारी मूल्य नहीं मिलता है – 25 फीसदी से कम किसान एमएसपी के संबंध में जानते हैं – और नीति आयोग की यह रिपोर्ट कहती है कि कृषि विपणन प्रणाली जो किसानों को मूल्य का केवल एक छोटा सा अंश वितरण करता है (बिजनेस स्टैंडर्ड की इस रिपोर्ट के अनुसार खुदरा मुल्य का 10 से 30 फीसदी)।

 

नियामक बाधाओं ने कृषि बाजार में निवेश के लिए विवश कर दिया है और घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के लिए किसानों की क्षमता को कम कर दिया है।

 

नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि विभिन्न राज्यों में, कृषि उत्पादन और विपणन समिति कानून के तहत करों की बहुलता ने किसानों के हितों को कम आंका है और बिचौलियों को फायदा पहुंचाया है।

 

केवल 15 फीसदी किसान हुए हैं फसल बीमा से लाभान्वित

 

2014-15 में, केवल 19 मिलियन (या 190 लाख) – 15 फीसदी – किसान, सरकार द्वारा घोषणा की गई फसल बीमा योजनाओं से लाभान्वित हुए हैं।

 

कम से कम 37.2 मिलियन (या 372 लाख) किसान, तीन योजनाओं – राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और मौसम आधारित फसल बीमा योजना – के तहत कवर किए गए थे लेकिन उनमें से केवल आधे ही इन योजनाओं से लाभान्वित हुए हैं।

 

85 फीसदी किसान योजनाओं से लाभान्वित नहीं

 

Note: NAIS – National Agricultural Insurance Scheme; MNAIS: Modified NAIS; WBCIS – Weather Based Crop Insurance Scheme.

 

एनएसएस रिपोर्ट कहती है कि आधे किसान जो योजनाओं से लाभान्वित नहीं हुए वे इन योजनाओं के संबंध में जागरुक नहीं थे।

 

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, सरकार की ताज़ा पहल, मौजूदा बीमा योजनाओं को विलीन करती है, किसानों द्वारा भुगतान की जाने वाली प्रिमियम को कम करता है एवं बीमा के लिए सरकारी सब्सिडि पर सीमा समाप्त करती है।

 

अशोक गुलाटी एक रिसर्च पेपर में लिखते हैं, “चीन ने कृषि संबंधि सुधार 1978 में आरंभ किया था एवं 1978-84 के दौरान, कृषि जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में प्रति वर्ष 7 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई और कीमतों की ढील के कारण कृषि आय में प्रति वर्ष 14 फीसदी से अधिक वृद्धि हुई जिससे केवल छह वर्षों में गरीबी आधी हुई थी।”

 

2015-16 में, भारत में कृषि का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 1 फीसदी बढ़ रहा है (अग्रिम अनुमान), कृषि आय का प्रति वर्ष 14 फीसदी वृद्धि करना आसान नहीं होगा।

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 30 मार्च 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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