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खाड़ी देशों से आने वाली रकम घटने के साथ केरल कर रहा चुनाव का सामना

अभिषेक वाघमारे,

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दुबई में निर्माण उद्योग में भारतीय श्रमिक।

 

तटीय राज्य केरल में 16 मई 2016 को चुनाव होने जा रहा है। ये राज्य भारत को भेजे जाने वाली कुल रकम का 40% प्राप्त करता है, लेकिन 2015-16 की चौथी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में ये रकम गिरकर चार साल के निम्नतम 14.9 अरब डॉलर (एक लाख करोड़) पर पहुँच गई है।

 

विदेश से भेजी गई रकम केरल के लगभग 20% घरों या 24 लाख परिवारों का खर्च चलाती है। एक परिवार का आकार तीन सदस्यों का मानते हुए, विदेश से भेजी गई ये रकम प्रत्यक्ष तौर पर 3.5 करोड़ की आबादी वाले केरल के 72 लाख लोगों पर असर डालती है। ये तथ्य एक आर्थिक राजनीतिक साप्ताहिक में हाल ही में केसी जकारिया और एस इरुदिया राजन की केरल प्रवासन सर्वे 2014 पर आधारित पेपर में सामने आए हैं।

 

पेपर कहता है:
 

  • 2014 में विदेश से भेजे गई रकम 70,000 करोड़ रुपये थी जो कि राज्य की शुद्ध घरेलू उत्पाद (एनएसडीपी) का 36.3% थी।
  • 2014 में विदेश से भेजी गई रकम का केरल की प्रति व्यक्ति आय में एक चौथाई 86,180 रुपये में से 22,689 रुपये का योगदान रहा।
  • 2014 में विदेश से भेजी गई रकम केरल सरकार द्वारा जुटाए गए राजस्व का 1.2 गुना थी।


 
भारत को भेजी गई रकम चार साल के न्यूनतम पर

 

विश्व बैंक की प्रवास पर नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देशों को भेजी गई रकम की वृद्धि दर 2014 में 3.2 प्रतिशत के मुकाबले गिरकर 2015 में 0.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

 

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत के लिए निजी धन हस्तांतरण 2011 के स्तर पर पहुँ गया है और ये 2015 में अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में गिरकर 15 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

 

भारत को 2014-15 में विदेशों से कुल 64 अरब डॉलर (3.8 लाख करोड़ रुपये) प्राप्त हुए

 

Source: Developments in India’s Balance of Payments, Reserve Bank Of India 2014-15, 2015-16. These include all private transfers including workers’ transfer to homes, institutional transfers by banks, etc.

 

Source: Developments in India’s Balance of Payments, Reserve Bank Of India 2014-15, 2015-16. These include transfers only by workers working abroad to their families in India.

 

तिरुवनंतपुरम के सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के मानद् फेलो के सी जकारिया ने इंडियास्पेंड को बताया, “दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, खाड़ी देशों की कंपनियों के मुनाफे में कमी आई है। इसका लोगों द्वारा खाड़ी से भारत और खासकर केरल धन भेजने पर तत्काल असर पड़ा है।”

 

Source: Research paper on Remittances in India, Facts and issues, IIM Ahmedabad.

 

विदेश से धन भेजने के मामले में पंजाब, तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश का स्थान केरल के बाद आता है। 2009 में विदेशों से भेजी गई कुल रकम में से इनका हिस्सा क्रमश 12.7%, 12.4%, 7.7% और 5.4% था। (नवीनतम उपलब्ध आंकड़ा, हालाँकि विशेषज्ञों के अनुसार इस अनुपात में कोई बदलाव होने की संभावना नहीं है)।

 

विदेश से भारत भेजे गए धन में केरल की हिस्सेदारी सबसे अधिक थी, जिसमें पिछले पाँच साल में 2014 तक श्रमिकों के साथ-साथ भेजे गए धन में भी बढ़ोतरी हुई।

 

Source: Kerala Migration Study 2014, Centre for Development Studies, Thiruvananthapuram.

 

केरल को 1998 में 13.6 लाख गैर-निवासियों से भेजी रकम मिली। 2014 तक विदेश में काम करने वाले केरलवासियों की तादाद बढ़कर 24 लाख हो गई।

 

जकारिया कहते हैं, “तेल कीमतों में गिरावट से 2015-16 में छोटी अवधि में विदेश से भेजी गई रकम में कमी आई है। क्योंकि ये आर्थिक धीमापन निरंतर बना हुआ है, तो केरल से बाहर जाने वाले कामगारों की संख्या भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पेशेवरों जैसे इंजीनियरों और डॉक्टरों द्वारा भेजे गई रकम में बढ़ेगी, जबकि श्रमिकों द्वारा भेजे गए धन- जिसका विदेशों से भेजी गई रकम में दबदबा है- गिरावट आएगी।”

 

विदेश से भेजी गई रकम हासिल करने वालों की दौड़ में केरल के अग्रणी बने रहने की उम्मीद है, जिसका मतलब है कि ये अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक लोग विदेश भेजता रहेगा।

 

क्यों केरल के प्रवासी बहुमत का झुकाव कांग्रेस की ओर है

 

क्योंकि 20% परिवार विदेशों से मिलने वाले धन पर निर्भर हैं, राज्य के 20% मतदाता आर्थिक सुस्ती से प्रभावित होंगे। इन मतदाताओं की हिस्सेदारी राज्य की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में एक शक्तिशाली ताकत है।

 

सभी तीन प्रमुख धार्मिक समुदायों के लोग- मुस्लिम, हिंदू और ईसाई- दूसरे देशों में जाते हैं, कुल श्रमिकों में से अधिकांश 86% खाड़ी देशों में काम करते हैं।

 

Source: Kerala Migration Study 2014, Centre for Development Studies, Thiruvananthapuram.

 

डॉक्टर जकारिया की ईपीडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार आप्रवासियों में बहुमत मुस्लिमों का है क्योंकि खाड़ी देश इस्लामिक हैं।

 

विकासशील समाजों के लिए दिल्ली स्थित केंद्र द्वारा कराए गए अध्ययन में राष्ट्रीय चुनाव अध्ययन के केरल के प्रतिनिधि सजाद इब्राहिम ने इंडिया स्पेंड को बताया, “क्योंकि केरल के आप्रवासियों में बहुमत धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से हैं, इसलिए विदेशों से धन पाने वाले विशेष इलाकों के परिवार कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को पसंद करते हैं और इसकी वजह है राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि।”

 

उन्होंने कहा, “हालाँकि मौजूदा सरकार में कुछ मंत्रियों के भ्रष्टाचार घोटालों में शामिल होने के आरोप केरल में सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा होगा। इसके अलावा, सत्ता विरोधी लहर से भी वामपंथी पार्टी के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को सहायता मिलेगी।”

 

डॉक्टर जकारिया ने कहा, “विदेशों से आने वाले धन में कमी से लोगों के जीवन पर पड़ने वाले असर को मापना मुश्किल है। ये हाल का अवलोकन है और हम गहरा अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं।”

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ एक विश्लेषक हैं)

 

लेख मूलतः अंग्रेजी में 20 अप्रैल, 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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