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खाद्य सब्सिडी के सुस्त डिजिटलीकरण से सुधार धीमा

सुमित चतुर्वेदी,

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अप्रैल 2015 के अंत तक 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल 16 राज्यों में डिजिटल राशन – कार्ड प्रणाली मौजूद थी।  यह सरकार द्वारा जारी किए गए ताज़ा आंकड़ों में सामने आए हैं। गरीबों तक रियायती भोजन वितरित करने के दुनिया के सबसे बड़े कार्यक्रम, लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीडीपीएस) के तहत डिजिटल राशन कार्ड जारी करने का लक्ष्य रखा गया है।

 

जो दुनिया के सबसे बड़े रियायती भोजन वितरित करने के लिए कार्यक्रम, लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीडीपीएस) के तहत शुरु किया गया।

 

भारत के तेजी से बढ़ते सब्सिडी बिल में कटौती के लिए टीपीडीएस का डिजिटलकरण महत्वपूर्ण है, जिसमें पिछले 10 वर्षों में 298 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2015-16 के बजट के अनुसार 2.27 लाख करोड़ रुपए सब्सिडी में से  124,000 करोड़ रुपए या 54.6 फीसदी, खाद्य सब्सिडी पर खर्च किया जाएगा।

 

खाद्य सब्सिडी में रिसाव की कटौती, सरकारी खर्च को सीमित करने के लिए महत्वपूर्ण है जो राजकोषीय घाटा बढ़ता है और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए उपलब्ध राशि को कम करता है।

 

डिजिटलीकरण कार्यक्रम में खाद्यान्न का कंप्यूटरिकरण द्वारा नज़र, गोदाम प्रेषण से ग्राहक पहुंचने तक, एक पारदर्शिता पोर्टल जो खाद्यान्न और सब्सिडी विवरण दिखाती है, ऑनलाइन शिकायत निवारण तंत्र और एक टोल फ्री हेल्पलाइन शामिल है।

 

टीडीपीएस से  आधिकारिक तौर पर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले (शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति 1,000 रुपये प्रति माह खर्च करने की क्षमता और ग्रामीण क्षेत्रों में 816 रुपये प्रति माह) 65.2 मिलियन परिवारों को लाभ मिलने की संभावना है एवं अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) के तहत 24.2 मिलियन परिवारों को ” गरीबों में गरीब ” लाभार्थियों के रुप में वर्णित किया गया है।

 

टीपीडीएस की शुरुआत 1997 में शुरुआती पीडीएस प्रणाली के बाद “गरीबों को लाभ एवं खाद्य सब्सिडी बजटीय को नियंत्रण में रकने के लिए किया गया था” । पीडीएस प्रणाली सभी उपभोक्ताओं के लिए एक सामान्य पात्रता योजना थी, चाहे वह अरबपति हो या भिखारी, जिसे विफल समझा गया था।

 

सैयद एस काजी , ई-गवर्नेंस पर किए गए इस केस स्टडी में कहते हैं कि “डिजिटलीकरण की प्रक्रिया गरीब लोगों को वितरण के लिए खाद्य वस्तुओं की चोरी नियंत्रण की दिशा की ओर काम कर रही है। अनाज की आवाजाही की निगरानी के अलावा स्वचालित कम्प्यूटरीकृत प्रणाली डुप्लीकेट राशन -कार्ड तैयार करने की संभावना को समाप्त करने में मदद करता है और यह भी कि यह सुनिश्चित करता है कि वहां अभिलेखों के रखरखाव में कोई मानव हस्तक्षेप नहीं कर रहा है।”

 

खेत संकट वृद्धि से खाद्य सब्सिडी में वृद्धि। रिसाव में रोक से होगी कटौती

 

2013 में, पूर्ववर्ती कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013, अभिनीत किया गया जिसमें 99.4 मिलियन परिवारों को प्रति माह प्रति व्यक्ति को सब्सिडी वाले 5 किलो खाद्यान्न देने की बात कही गई है। अन्त्योदय अन्न योजना के तहत लाभार्थियों को प्रति परिवार प्रति माह 35 किलो खाद्यान्न प्रदान किया जाता है।

 

हालांकि भारतीय जनता पार्टी , जो अब सरकार का नेतृत्व करती है, सब्सिडी वाले खाद्य कानून का विरोध करना चाहती थी, लेकिन फिर राजनीतिक प्रतिक्रिया के डर से नहीं किया, जैसा की इकोनोमिक टाइम्स की यह रिपोर्ट बताती है। अब, जब खेत संकट पूरे भारत में बिगड़ता जा रहा है, वहां कटौती की उम्मीद कम है।

 

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू करने के लिए बजट में वृद्धि हुई है, वर्ष 2013-14 में 10,000 करोड़ रुपए से बढ़ कर 2014-15 में 59,000 करोड़ रुपए हुई है। तीन वर्षों में, खाद्य सब्सिडी कानून को लागू करने के लिए अलग रखे गए पैसे साढ़े छह गुना, 65,000 करोड़ रुपए बढ़े है।

 

कुल खाद्य सब्सिडी बिल 2013-14 में 90,000 करोड़ रुपए से बढ़कर 2014-15 में 1,15,000 करोड़ रुपए हुई है, वर्ष 2015-16 के बजट में 1,24,000 करोड़ रुपए तक बढ़ा है।

 

टॉप और पिछड़े राज्य – तमिलनाडु में 100% डिजीटल राशन कार्ड, ओडिशा में 3%

 

16 राज्यों में से, जहां राशन – कार्ड डिजिटलीकरण पूरा कर लिया गया है, 12 राज्य एवं दिल्ली में  खाद्यान्न का ऑनलाइन आवंटन लागू किया गया है।

 

केवल पांच राज्यों (बिहार, छत्तीसगढ़ , तमिलनाडु, गोवा और कर्नाटक) और दिल्ली में टीपीडीएस आपूर्ति श्रृंखला का कम्प्यूटरीकरण पूरा किया गया है।

 

राशन कार्ड का डिजिटाइजेशन

 

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राज्यों में, ओडिसा में सबसे कम काम किया गया है। आंकड़ों पर नज़र डालें तो केवल 3 फीसदी ही राशन कार्ड का डिजिटलकरण किया गया है।

 

तमिलनाडु में 100 फीसदी राशन कार्ड डेटा डिजिटलीकरण पूरा किया गया है एवं इस कार्यक्रम के अन्य घटकों को लागू किया गया है लेकिन अब तक एक पारदर्शिता पोर्टल, एक ऑनलाइन शिकायत निवारण तंत्र और एक टोल फ्री हेल्पलाइन, स्थापित करना बाकी है।

 

टीपीडीएस कम्प्यूटरीकरण (2012 में शुरु किया गया) के लिए 2012-13 से 2015-16 के बीच (31 मई, 2015 तक) 27 राज्य, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र, और अन्य एजेंसियों के लिए केंद्र ने 269.17 करोड़ रुपए जारी किया है।

 

प्रणाली में सुधार की आवश्यकता: सार्वजनिक वितरण में नियंत्रण की कमियां

 

टीपीडीएस की यह 2005 निष्पादन मूल्यांकन में 16 राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मूल में तीन त्रुटियों की पहचान की गई है: अपवर्जन त्रुटियां (गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को बाहर रखते हुए), समावेशन त्रुटियां (गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों सहित) एवं नकली उपभोक्ता।

 

टीपीडीएस के क्रियान्वयन में राज्यों का निष्पादन मूल्यांकन (2005)

 

 

राज्य अनुसार कुल रिसाव

 

 

गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों का अपवर्जन असम और गुजरात में सबसे अधिक एवं आंध्र प्रदेश और पंजाब में सबसे कम था। गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों को सबसे अधिक तमिलनाडु और कर्नाटक में शामिल किया गया जबकि सबसे कम शामिल करने वाले राज्य राजस्थान और गुजरात रहे हैं।

 

नकली उपभेक्ताओं की सबसे बड़ी प्रतिशत, 20.58 फीसदी, कर्नाटक में दर्ज की गई जबकि आंध्र प्रदेश, पंजाब और राजस्थान में एक भी नकली उपभोक्ता का नाम दर्ज नहीं किया गया है।

 

पूरे प्रणाली में सबसे बड़ा रिसाव बिहार और पंजाब में दर्ज किया गया है जहां कुल खाद्यान्न का 75 फीसदी कभी लाभार्थियों तक नहीं पहुंचा है।

 

राज्य भर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में रिसाव (2011-12)

 

 

राज्य भर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में रिसाव (2011-12)

 

 

मणिपुर में, गोदामों में सबसे अधिक रिसाव – 97.8 फीसदी – दर्ज किया गया है जबकि छत्तीसगढ़ में 12 वर्ष पहले शुरु किए गए कंप्यूटरीकरण के कारण कोई भी रिसाव सूचित नहीं किया गया है।

 

केंद्र सरकार के स्टॉक से सबसे अधिक खाद्यान्न में रिसाव उत्तर प्रदेश, 15.3 फीसदी, दर्ज किया गया है। भारत के सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक , बुंदेलखंड , दिखाता है कि क्यों एक मजबूत टीपीडीएस महत्वपूर्ण है – न सिर्फ सरकारी पैसे बचाने के लिए बल्कि लोगों का जीवन बचाने के लिए भी।

 

क्यों रिसाव पर नियंत्रण बुंदेलखंड में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है

 

लगातार पड़ने वाला सूखा, खेत विफलताएं, किसानों की आत्महत्या और स्थानिक गरीबी की मार (जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है) के कारण सब्सिडी वाले अनाज कार्यक्रम, दक्षिण – पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तर-मध्य मध्य प्रदेश भर में फैले 13 जिलों मकी एक बंजर भूमि, बुंदेलखंड के लिए महत्वपूर्ण है।

 

सूखे की चपेट में होने के बावजूद, आमतौर पर बुंदेलखंड ने प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता में राज्य के औसत की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। 1997-98 से 2005-06 के आंकड़ों पर आधारित, गिरि इंस्ट्टियूट ऑफ डिवलेपमेंट स्टडीज़ के ए. के सिंह, ए. जोशी एवं नोमिता पी कुमार के इस रिपोर्ट से यह और स्पष्ट होती है।

 

खाद्यान्न की प्रति व्यक्ति उपलब्धता

 

 

रिपोर्ट कहती है कि “वास्तविक समस्या गरीबों तक भोजन की पहुंच प्रतीत होती है।”

 

स्वराज अभियान, एक कार्यकर्ता समूह द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार सर्वेक्षण किए गए सबसे गरीब परिवारों में से 42 फीसदी से अधिक के पास कार्ड नहीं थे, जिससे उन्हें भोजन – सब्सिडी का लाभ मिलता है।

 

सर्वोक्षण में लिए गए 60 फीसदी गरीब परिवारों को टीपीडीएस के तहत वितरित होने वाले चावल एवं गेहूं तक पहुंच नहीं है। कम से कम 38 फीसदी गावों में भूख और कुपोषण के कारण एक मौत दर्ज की गई है।

 

पूरी तरह कम्प्यूटरीकरण करने से भ्रष्टाचार और सरकारी धन की बर्बादी पर नियंत्रण और पार्दर्शिता के साथ साथ लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में मदद मिल पाएगी।

 

(चतुर्वेदी एक स्वतंत्र पत्रकार और opiniontandoor.in पर एक ब्लॉगर है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 28 जनवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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