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“खेत संकट को हल करने के लिए औपचारिक रुप से काश्तकारी ही एकमात्र विकल्प”

भास्कर त्रिपाठी,

Dr Tajamul Haque_620

 

नई दिल्ली: पिछले 10 महीनों में पूरे देश के किसानों ने करीब आधा दर्जन बड़े प्रदर्शन किए हैं। 12 मार्च, 2018 को, पूरे महाराष्ट्र के 35,000 किसान सात दिन में 180 किलोमीटर की यात्रा कर मुंबई पहुंचे और भूमि खिताब, कृषि उत्पाद और कृषि ऋण के लिए बेहतर मूल्य की मांग की। जुलाई 2017 में, तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया। सूखे की मार झेल रहे राज्य के किसान ऋण माफी की मांग कर रहे थे। जून 2017 में, मध्य प्रदेश के किसानों ने सड़कों पर दूध, फलों और सब्जियों को फेंक दिया था।

 

इस तरह के विरोध कृषि संकट के संकेत हैं। तेजी से बढ़ते अनिश्चत मौसम की वजह से किसान कम रिटर्न, कर्ज और अक्सर मौत के चक्र के चक्र में फंस रहे हैं। जून 2013 में एक वर्ष में, 70 फीसदी भारतीय खेतिहर परिवारों ने अपनी कमाई की तुलना में अधिक व्यय करने की सूचना दी है। 52 फीसदी से अधिक ने कहा कि वे कर्ज में डूबे हुए हैं और स्वास्थ्य लागत उनके कर्ज को और बढ़ा रहे हैं, जैसा कि  इंडियास्पेंड ने 27 जून, 2017 की रिपोर्ट में बताया है। पांच साल से 2015-16 तक, प्रति किसान प्रति असली खेत आय केवल 0.44 फीसदी प्रति वर्ष बढ़ी है, जैसा कि 18 जुलाई, 2017 की हमारी रिपोर्ट में बताया गया है।

 

देश के कृषि क्षेत्र में, काश्तकारी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों से एक है। भारत में यह एक पुरानी परंपरा है, भूमिहीन किसान खेती के लिए भूमि किराये पर लेते है। हालांकि, चूंकि भूमि मालिक आमतौर पर अमीर और अधिक शक्तिशाली होते हैं, इसलिए इसमें अक्सर शोषण होता है। आजादी के बाद से ही इसमें सुधार का लक्ष्य रहा है। हालांकि 1950 और 1960 के दौरान अधिकांश राज्यों में काश्तकारी समाप्त कर दी गई थी या प्रतिबंधित की गई, लेकिन राज्य सरकार भूमिहीन के बीच भूमि पुनर्वितरित करने में विफल रही है। काश्तकारी छिपकर और अनौपचारिक रूप से बढ़ती ही रही और इसमें छोटे किसान और कमजोर होते रहे।

 

वर्ष 2016 में, नीति आयोग ने एक मॉडल एग्रीकल्चरल लैंड लीजिंग एक्ट का प्रस्ताव दिया था, जिसका उद्देश्य देश के किरायेदारी प्रणाली का “उदारीकरण” करना है, और यह तर्क देता है कि इससे वास्तव में छोटे किसानों को लाभ होगा और देश की कृषि उत्पादकता में सुधार होगा। कई राज्यों ने इस मॉडल की तर्ज पर कानून तैयार किए हैं, जो कि कमिशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइस के पूर्व अध्यक्ष, नेशनल सेंटर फॉर एग्रीकल्चर एंड पॉलिसी रिसर्च के पूर्व प्रोफेसर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रूलर डेवलपमेंट के पूर्व निदेशक ताजमुल हक की अगुवाई में नीति आयोग के विशेष सेल द्वारा तैयार किया गया था।  इंडिया स्पेंड के साथ एक साक्षात्कार में, हक ने मॉडल कानून पर चर्चा की और समझाया कि इसके कार्यान्वयन के सभी हितधारकों को कैसे फायदा हो सकता है।

 

मॉडल कृषि भूमि पट्टा कानून क्या है? यह किसान किरायेदारों की मदद कैसे करेगा?

 

मॉडल कानून का उदेश्य देश में भूमि पट्टे पर देने की प्रणाली को उदारीकरण और वैध बनाना है। अधिकांश राज्यों ने 60 और 70 के दशक में किरायेदारी कानून पारित किए, जो बेहद प्रतिबंधात्मक थे। कुछ राज्यों ने पट्टे पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। उदाहरण के लिए, केरल और जम्मू और कश्मीर भूमि पट्टे पर देने की अनुमति नहीं देते। बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे अन्य राज्यों को केवल कुछ श्रेणियों के लोगों को पट्टा पर जमीन देने की इजाजत होती है, उदाहरण के लिए विकलांग, विधवा, नाबालिग आदि। कर्नाटक ने इन श्रेणियों के लोगों को भी अपनी जमीन पट्टे देने की इजाजत नहीं दी है। राज्य में केवल सैनिकों को अपनी जमीन पट्टे पर देने की इजाजत है।

 

आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और गुजरात में, सरकार ने पट्टे पर प्रतिबंध नहीं किया है, लेकिन साथ ही इन राज्यों में कुछ प्रावधान हैं, जो पट्टे पर देने के विकल्प को निषिद्ध मानते हैं। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश में, अगर कोई मालिक पट्टा समाप्त करना चाहता है और निजी खेती के लिए किरायेदार से जमीन लेना चाहता है  तो मालिक को किरायेदार के साथ कम से कम 50 फीसदी जमीन छोड़नी होगी। अब, कोई मालिक भूमि पर इन प्रतिबंधों के साथ पट्टा नहीं करना चाहता है। इसी प्रकार, कुछ राज्यों का कहना है कि यदि कोई किरायेदार भूमि की निर्धारित अवधि से अधिक समय तक खेती कर रहा है, तो किरायेदार को जमीन पर कब्जा करने का अधिकार है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के जमींदारी उन्मूलन अधिनियम  का भी एक अधिग्रहण खंड था, जिसमें कहा गया था कि अगर किसी किरायेदार ने 12 से अधिक वर्षों के लिए भूमि का एक टुकड़ा खेती करना जारी रखा तो उस पर कब्जा करने का उसे अधिकार है। भूमि के पट्टे पर देने के खिलाफ इन नियमों के मालिक के मन में डर पैदा हो गया है।

 

नतीजन, लोग अपनी जमीन को अजोत छोड़ देते हैं, जो देश की कृषि उत्पादकता को प्रभावित करता है। वर्तमान में, देश में 25 मिलियन हेक्टेयर भूमि अजोत है, जिसका मुख्य कारण प्रतिबंध के कारण  मालिकों का बाहर पट्टे पर न देना है।  यदि आप मानते हैं कि एक हेक्टेयर में 2 टन अनाज का उत्पादन होता है, तो 25 मिलियन हेक्टेयर भूमि अजोत होने के साथ देश 50 मिलियन टन अनाज खो रहा है।

 

इसलिए मॉडल भूमि पट्टा अधिनियम के साथ, हमने इन सभी प्रतिबंधों को दूर करने का प्रयास किया। यदि कोई मालिक, ब्याज की कमी, निवेश करने के लिए पैसे की कमी या अन्य कारणों से, भूमि को खेती नहीं करना चाहता है, तो वह किसी भूमिहीन को खेत पट्टे पर देने के लिए चुन सकता है और जमीन को अजोत रखने और खोने के डर की बजाय किराए से लाभ ले सकता है।

 

किरायेदार और मालिक पारस्परिक रूप से किराया और पट्टे की अवधि पर सहमत हो सकते हैं और एक लिखित अनुबंध के साथ आ सकते हैं, जिसे किसी जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा सत्यापित किया जाना चाहिए, जैसे कि ग्राम प्रधान (गांव के प्रमुख), एक वकील या राजस्व अधिकारी। उन्हें किसी भी राजस्व कार्यालय या प्रशासनिक विभाग जाने की जरुरत नहीं है।

 

यह औपचारिक हस्ताक्षरित दस्तावेज दो चीजें करेगा; सबसे पहले, यह मालिक को आश्वस्त करेगा कि जमीन सुरक्षित है दूसरा, यह एक किरायेदार-किसान को सरकारी सब्सिडी, बीमा, आपदा राहत और क्रेडिट योजनाओं के लिए पात्र बनाएगी, क्योंकि पहली बार किरायेदार के पास यह साबित करने के लिए एक दस्तावेज होगा कि वह जमीन की खेती कर रहा है।

 

किरायेदार किसानों को लंबे समय से सरकारी कृषि उत्पाद बाजारों में अपने खेत का उपज बेचने का अधिकार नही है, जहां वे बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं; उन्हें बिचौलियों के माध्यम से जाना होता है और मुनाफे का बहुत नुकसान होता है। अब, यदि किरायेदारी एक अनुबंध के जरिए वैध है, तो किरायेदार किसान इन बाजारों में अपना सामान बेच सकते हैं।

 

मॉडल भूमि पट्टा कानून, यदि लागू किया जाता है, तो यह न केवल किरायेदार किसानों की भूमि की आय और उत्पादकता में वृद्धि करने में मदद करेगा, बल्कि सरकार द्वारा किसानों की आय में मदद से समग्र कृषि विकास में भी मदद मिलेगी।

 

मॉडल कानून की तर्ज पर कितने राज्यों ने अपने भूमि कानूनों में संशोधन किया है?

 

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ने अपने भूमि कानूनों में संशोधन किया है। उत्तराखंड ने इसे काफी व्यापक रूप से किया है, जबकि उत्तर प्रदेश ने इस खंड को हटा दिया है, जिसमें किरायेदार को 12 साल से अधिक समय से परिचालित करने के बाद जमीन पर कब्ज़ा करने की अनुमति थी। इसमें कई लोगों ( व्यापारिक लोगों, व्यापारियों, सेवाओं के लोगों, विधानसभा के सदस्यों या संसद के सदस्यों ) को भी शामिल किया गया है, जो अब विकलांगों के साथ अपनी जमीन पट्टे पर देने के लिए पात्र होंगे। यह एक बड़ी राहत है, लेकिन एक ऐसा काम है जो उन्हें नहीं करना चाहिए था, जो अधिकतम तीन साल की पट्टा अवधि निर्धारित कर रहा है। इसका निर्णय मालिक पर छोड़ देना चाहिए था।

 

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र ने हमारे मॉडल कानून की तर्ज पर एक नया कानून पारित किया है। उन्होंने एक दंड खंड भी जोड़ लिया है कि यदि किरायेदार पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद भूमि वापस नहीं करता है, तो उसे जेल हो सकती है।

 

क्या इन औपचारिक पट्टों को एक सरकारी एजेंसी / विभाग के साथ दर्ज करना होगा?

 

हमारे मॉडल कानून में, हमने कहा है कि किरायेदार और मालिक के बीच के समझौते को राजस्व विभाग के साथ दर्ज या पंजीकृत नहीं किया जाना चाहिए; इससे प्रक्रिया जटिल हो जाएगी । यह मालिक के डर का कारण भी हो सकता है कि उनकी जमीन पट्टे के तहत राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज की गई है और कल एक नया कानून आ सकता है और यह निर्धारित कर सकता है कि किरायेदार का जमीन पर अधिकार होगा।

 

इसलिए, हमने सुझाव दिया कि यह सहमति किसी जिम्मेदार व्यक्ति   प्रमाणित एक साधारण लिखित दस्तावेज हो, उदाहरण के लिए ग्राम प्रधान (गांव के प्रमुख), एक वकील या राजस्व अधिकारी। सरकार को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। अकेले यह दस्तावेज़ औपचारिक और कानूनी पट्टे बनाने के लिए पर्याप्त होगा। पट्टे की अवधि समाप्त हो जाने के बाद, जमीन अपने आप मालिक के कब्जे में वापस जाएगी। कब्जे लेने के लिए किसी को भी किसी भी कार्यालय में जाने की जरूरत नहीं है।

 

अब, कुछ राज्यों ने पट्टों की समयरेखा तीन से छह साल के बीच निर्धारित कर दी है, लेकिन यह सही तरीका नहीं है। आप देखते हैं, अगर किसी किरायेदार किसान बागवानी फसलों जैसे कि फलों की खेती कर रहा है, तो फसल पूरी तरह से तैयार होने में एक दशक से ज्यादा समय लग सकता है। अब, यदि मालिक किरायेदार किसान को लंबे समय तक खेती करने के अनुमति देता है तो राज्य क्यों कह रहा हैं कि यह तीन साल या छह साल का होना चाहिए? मालिक और किरायेदार को यह तय करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए कि पट्टा 10 साल के लिए है या 20 साल के लिए है।

 

अच्छे उदाहरण भी हैं। उत्तराखंड अपने नए कानून के साथ पट्टों को अधिकतम 30 साल तक रहने की इजाजत देता है, जो बहुत ही उचित है।

 

अगर सरकार शामिल नहीं है, तो क्या आपको नहीं लगता कि यह किरायेदार के वित्तीय शोषण का मौका देता है ?

 

एक किरायेदार की आर्थिक रूप से शोषण की संभावना बहुत कम है। वैसे भी, मुझे नहीं लगता कि सरकार किरायेदारों की रक्षा करती है। इसमें काफी संभावनाएं हैं कि यदि कोई किरायेदार मदद पाने के लिए एक राजस्व अधिकारी के पास जा रहा है, तो वह रिश्वत में और अधिक पैसे गवां दें। इस तरह के अनुबंध के लिए सरकारी निकायों पर कम निर्भरता, किरायेदारों और मालिक द्वारा अनुबंध की रक्षा करने की संभावना को बढ़ाता है।

 

वास्तव में, यदि कोई ऐसा मुद्दा उठता है, तो हमने सुझाव दिया था कि ग्राम पंचायत को इन सौहार्दपूर्ण तरीके से हल करना चाहिए, क्योंकि पंचायत भूमि, फसल और शामिल लोगों के बारे में वास्तविकता को जानता है।

 

आपको क्यों लगता है कि भूमि पुनर्वितरण विफल हो गया है?

 

पुनर्वितरित 5.1 मिलियन एकड़ जमीन में से लगभग 21 फीसदी पश्चिम बंगाल में ही है। इसके अलावा, पुनर्वितरण में भूमि प्राप्त करने वाले लाभार्थियों की कुल संख्या का 60 फीसदी पश्चिम बंगाल राज्य में है। इसलिए, पश्चिम बंगाल वास्तव में एकमात्र राज्य है, जिसने कुछ हद तक सफलतापूर्वक, भूमि पुनर्वितरण कानूनों को लागू किया है। बिहार ने कुछ कदम उठाए लेकिन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे अन्य बड़े राज्य भूमि के पुनर्वितरण में विफल हुए हैं।

 

जब समय सही था, राज्य सरकारों के पास ऐसा करने की इच्छा नहीं थी और प्रतिबद्ध नौकरशाही वहां नहीं थी। एक अन्य कारण यह था कि जम्मू और कश्मीर और बिहार ने 1950 के दशक के शुरूआती वर्षों में बिचौलियों को खत्म करने वाले कानूनों के साथ भूमि सीमा कानून लागू किए, लेकिन अन्य सभी राज्यों ने इन कानूनों को बहुत देर से, 1960 और 1970 के दशक में  लागू किया है। उस समय तक सभी जमींदार सतर्क हो गए और अपनी जमीन को अलग-अलग नामों के तहत स्थानांतरित कर दिया, जो कई राज्यों में भूमि सुधारों की विफलता का कारण बन गया।

 

अगर हम देश के भूमि सुधारों के वर्तमान परिदृश्य के बारे में बात करते हैं, तो हालात वास्तव में अच्छा नहीं है:

 
लगभग दो लाख हेक्टेयर भूमि ( दिल्ली से बड़े क्षेत्रफल के साथ ) लंबे समय तक मुकदमेबाजी के अधीन हैं। जब तक कि यह भूमि स्वतंत्र नहीं होती, तब तक कोई आशा नही है। वर्तमान में केवल एक राज्य पश्चिम बंगाल है, जो अभी भी जमीन के छोटे हिस्से भूमिहीन को पुनर्वितरित करता है, लेकिन किसी भी अन्य भारतीय राज्य में कुछ भी नहीं हो रहा है।
 
एक तरफ, 101.4 मिलियन या 56.4 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास कोई कृषि भूमि नहीं है और दूसरी ओर, भूमि का पुनर्वितरण असफल हो रहा है। इसका उपाय क्या है?

 

मॉडल पट्टा कानून से भूमिहीन गरीब लोगों की भूमि पर पहुंच में सुधार होगा। इससे छोटे और सीमांत किसानों की उनकी भूमिधारण के आकार में वृद्धि करने में मदद मिलेगी।

 

वर्तमान में, भूमिहीनों को अधिकांश राज्य सरकारों के भूमि सुधारों के तहत कोई भूमि नहीं मिल रही है, इसलिए यदि वे कम से कम पट्टे पर औपचारिक और कानूनी रूप दे रहे हैं, तो भूमिहीन एक सुरक्षित अनुबंध के साथ भूमि तक पहुंचने में सक्षम होगा।

 

आज की तारीख में ये ही एकमात्र आशा है, और निश्चित रूप से भूमिहीन लोगों को उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार करने में मदद करेगी।
 
भारत के 50 फीसदी से अधिक श्रमशक्ति कम स्तर के जीवन और कम स्तर की आय के साथ, अभी भी कृषि में शामिल है। वे गरीबी के जाल में फंस गए हैं। एक बार पट्टे के इस कानूनी ढांचे के सभी राज्यों द्वारा लागू किया जाता है, हम कृषि क्षेत्र में एक बड़ा परिवर्तनकारी परिवर्तन देखेंगे।
 

थिंक टैंक ‘ग्लोबल लैंड एलायंस’ के एक 2017 के अध्ययन में पाया गया कि कृषि भूमि के एक अलग भूखंड वाले पांच ग्रामीण व्यक्तियों में से लगभग एक भूमि को खोने के बारे में चिंतित हैं, और किराएदार भी भूमि हाथ से निकल जाने के कारण दोगुने चिंतित हैं। अपने संपत्ति के अधिकार के बारे में लोगों को सुरक्षित महसूस करने के लिए देश क्या कदम उठाने चाहिए? क्या भूमि दस्तावेजों का डिजिटलीकरण मदद करेगा?

 

यदि राज्य में किरायेदारी वैध है, तो वास्तव में मालिकों और किरायेदारों के बीच उनकी जमीन को खोने के डर को खत्म करने में मदद मिलेगी। मॉडल भूमि पट्टा कानून स्वामी के स्वामित्व की सुरक्षा करता है, लेकिन साथ ही किरायेदार को कार्यकाल से संबंधित सुरक्षा प्रदान करता है।

 

वर्तमान में, भारत में सभी भूमि पंजीकरण, कार्यों के पंजीकरण हैं, ये सबूत नहीं हैं कि आप उस भूमि के वास्तविक मालिक हैं जो आपके नाम पर पंजीकृत हैं; यह लड़ा जा सकता है, जिससे विवाद पैदा हो सकता है। लेकिन निर्णायक भूमि खिताब के तहत, एक बार पंजीकरण होने पर परदा गिर जाता है, भूमि तुम्हारी है, और यह किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा नहीं दावा नहीं की जा सकती है।[भारतीय प्रणाली में, भूमि स्वामित्व प्रत्याशित है। वर्तमान में, संपत्ति के हस्तांतरण अधिनियम, 1882 के तहत, भूमि के लिए सही या शीर्षक को केवल एक पंजीकृत दस्तावेज़ (पंजीकरण अधिनियम, 1908 के तहत पंजीकृत) के जरिए हस्तांतरित या बेचा जा सकता है।भूमि या संपत्ति का पंजीकरण इसलिए लेनदेन के पंजीकरण (बिक्री के लिए) को संदर्भित करता है । इसलिए, एक पंजीकृत बिक्री विलेख भूमि स्वामित्व की सरकारी गारंटी नहीं है। यहां तक ​​कि वास्तविक संपत्ति लेनदेन हमेशा स्वामित्व की गारंटी नहीं दे सकता है क्योंकि संपत्ति के पिछले हस्तांतरण को चुनौती दी जा सकती है।पिछले स्वामित्व के रिकॉर्ड की जांच करने की जिम्मेदारी खरीदार पर है, न कि रजिस्ट्रार पर।

 

लेकिन भारत के लिए निर्णायक भूमि खिताब को आश्वस्त करने के लिए इसे कुछ कानूनों में संशोधन करना होगा। पंजीकरण अधिनियम और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (जिसमें न्यायालय में सबूत प्रदान करने के लिए नियम शामिल हैं) को प्राथमिकता के आधार पर संशोधित करना होगा। लेकिन जब तक दो या अधिक राज्य केंद्र सरकार से अनुरोध नहीं करते हैं, ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि जमीन राज्य का विषय है।

 

लगातार भूमि अभिलेख, उनका डिजिटलीकरण और साथ ही जिनकी भूमि है,उनके भय का ख्याल रखना चाहिए, जो आज भारतीय जमींदार महसूस करते हैं।

 

2013 के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के अध्ययन के मुताबिक, भारतीय खेती के कुछ परिवारों में से 13.65 फीसदी ( सात में से एक ) किराएदर थे। इसका मतलब है कि 2012-13 में 21.29 मिलियन किरायेदार-किसानों की खेती 10.66 मिलियन हेक्टेयर थी, जैसा कि भुवनेश्वर स्थित सेंटर फॉर लैंड गवर्नेंस द्वारा फरवरी 2018 के अध्ययन में बताया गया है। इसके विपरीत, कृषि 2010 की जनगणना कहती है, 2.39 फीसदी किसान खेती के लिए भूमि पट्टे पर लेते हैं। कौन सा डेटा सेट सही तस्वीर दिखाता है और क्यों इतना अंतर है?

 

डेटा में अंतर दो प्राथमिक कारणों से हैं। कृषि डेटा किरायेदारी पर सही आंकड़े प्रस्तुत नहीं करता है, क्योंकि यह भूमि के रिकॉर्ड पर आधारित है। चूंकि किरायेदारी दर्ज नहीं की गई है, यह कृषि जनगणना के आंकड़ों में काफी प्रतिनिधित्व नहीं है। एनएसएसओ डेटा घरेलू सर्वेक्षणों पर आधारित है। जानकारी एकत्र करने के लिए कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रुप से घर-घर जाता है,  इसलिए यहां किरायेदारी का अपेक्षाकृत बेहतर प्रतिनिधित्व है। लेकिन यह पूरी तस्वीर भी नहीं हो सकती है, क्योंकि कई राज्यों में किराएदारी गैरकानूनी गतिविधि है और लोग यह नहीं बताएंगे कि उन्होंने खेती के लिए अनौपचारिक रूप से भूमि किराए पर ली है।

 

(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 25 मार्च, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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