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खेल में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद भारतीय महिलाओं का उन्नति के लिए संघर्ष जारी

सौम्या तिवारी,

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2016 रियो ओलंपिक में, बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी सिंधु रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला रही हैं; साक्षी मलिक एक पदक (कांस्य) जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान रही हैं, जिमनास्ट दीपा करमाकर , चौथे स्थान पाते हुए जिमनास्टिक फाइनल में जाने वाली पहली महिला बनी हैं और ललिता बाबर 3,000 मीटर स्टीपलचेज़ फाइनल में प्रवेश पाने वाली पहली भारतीय महिला बनी हैं, बाबर दसवें स्थान पर रही। अठारह वर्षीय अदिति अशोक – भारत की सबसे कम उम्र की गोल्फर – भी महिलाओं की गोल्फ प्रतियोगिता के अंतिम दौर तक पहुंची थी।

 

रियो ओलंपिक में भारत का मान रखनेवाली महिलाएं ही रही हैं और 31 ओलंपियाड में, उनकी बढ़ती उपस्थिति 54 महिला भारतीय एथलीटों – अब तक की सबसे अधिक संख्या – में परिलक्षित हुई हैं।

 

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हालांकि, इनकी बढ़ती संख्या, विशेष रुप से छोटे शहरों और गरीब परिवारों से कई महिला खिलाड़ियों की प्रगति और सामान्य रुप से भारतीय महिलाओं की प्रगति की ओर इशारा करती है, लेकिन पांच प्रमुख मापदंडों – कामकाजी महिलाएं, शिक्षा, मातृ स्वास्थ्य , विवाह और गर्भपात दरों की उम्र – पर एक एक नज़र डालने से पता चलता है कि भारतीय महिलाएं नियमित रूप से शिक्षा, काम पर अवसरों और यहां तक ​​कि जन्म दिए जाने से भी वंचित रहती हैं।

 

1. कामकाजी महिलाएं : ब्रिक्स में सबसे नीचे, एक दशक में 25 मिलियन महिलाओं ने छोड़ा श्रमबल

 

ब्रिक्स देशं में, भारत में, कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी सबसे कम है। इस संबंध में अन्य देश जैसे कि बहरीन (39 फीसदी), मलेशिया (45 फीसदी) और सोमालिया (37 फीसदी) का प्रदर्शन बेहतर है, जैसा कि 2014 के विश्व बैंक के आंकड़ों का उपयोग कर इंडियास्पेंड ने मार्च 2015 में विस्तार से बताया है।

 

2013 श्रम ब्यूरो की इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 26 फीसदी से अधिक महिलाओं श्रमबल का हिस्सा नहीं हैं। हालांकि, 2015 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की एक अध्ययन कहती है कि 2014 में यह दर सुधरी – 27 फीसदी – है। इस संबंध में भी इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है। 14 वर्षों के दौरान, यह 8 फीसदी प्रतिशत अंक की गिरावट है; 1999 में 34 फीसदी तक महिलाएं श्रमबल का हिस्सा थीं।

 

हालांकि, पाकिस्तान की तुलना में भारत में काम करने वाली महिलाओं की संख्या मामूली रुप से अधिक है (25 फीसदी और 27 फीसदी) पाकिस्तान की महिला श्रम शक्ति की भागीदारी दर में वृद्धि हो रही है जबकि भारत में घट रही है। भारत के मुकाबले बांग्लादेश में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत दोगुना है, इंडियास्पेंड ने मार्च 2016 में बताया है।

 

माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती संख्या के बावजूद भारत की महिलाओं का श्रमबल से बाहर होना जारी है। 2005 के बाद से, 25 मिलियन भारतीय महिलाएं श्रमबल से बाहर हुई हैं।

 
2. उच्चतर शिक्षा : अधिक महिलाओं का नामांकन, पुरुषों से बेहतर प्रदर्शन लेकि बाद में ड्रॉप आउट
 

हालांकि उच्च शिक्षा में नामांकन कराने वाली युवा महिलाओं की संख्या अब तक सबसे अधिक है – और युवा पुरुषों की तुलना में 10 वीं बोर्ड की परीक्षा जाहिर तौर पर और अधिक सफल रही हैं – लेकिन या तो उनकी शादी जल्द हो रही है या उन्हें नौकरी नहीं मिल रही या वे रोज़गार नहीं तलाश रही हैं। यह जानकारी विभिन्न आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है।

 

उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन 2007 में 39 फीसदी से बढ़ कर 2014 में 46 फीसदी हुआ है लेकिन उपर दिए गए आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी 1999 में 34 फीसदी से गिरकर 2014 में 27 फीसदी हुआ है।

 

करीब 12 मिलियन लड़कियों ने स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया है, लेकिन इनमें से कुछ ही व्यावसायिक पाठ्यक्रमों तक पढ़ाई जारी रखती हैं; नवीनतम उपलब्ध 2013 के आंकड़ों से पता चलता है कि 600,000 महिलाओं ने डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए दाखिला लिया है। यहां तक कि कुछ ही महिला छात्र पीएचडी चुनती हैं और केवल 40 फीसदी पीएचडी छात्र महिलाएं हैं।

 

2016 में, दसवीं परीक्षा पास करने में महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले अधिक सफल रही हैं और यह प्रवृति पिछले सात वर्षों से चली आ रही है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है।

 

3. मातृ स्वास्थ्य: अब तक का सबसे बढ़िया प्रदर्शन लेकिन गरीब देशों से बद्तर

 

सरकार के ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत की मातृ मृत्यु अनुपात – प्रति 100.000 जीवित जन्मों के दौरान मरने वाली महिलाओं की संख्या – 2010-12 में 167 थी।

 

मातृ मृत्यु दर में गिरावट

Source: Press Information Bureau

 

भारत की मातृ मृत्यु अनुपात – विश्व बैंक के अनुसार 174 – अपने पड़ोसी देशों जैसे कि श्रीलंका (30), भूटान (148) और कंबोडिया (161) की तुलना में बद्तर है।

 

ब्रिक्स देशों के बीच भारत का प्रदर्शन बद्तर है: रूस (25) , चीन (27), ब्राजील (44) और दक्षिण अफ्रीका (138); विश्व बैंक के ताजा अनुमान है, जो भारतीय स्रोतों के ‘ 167  से कुछ अलग है लेकिन प्रवृत्तियों पुष्टि करता है।

 

मातृत्व मृत्यु दर : ब्रिक्स और गरीब राष्ट्र

Source: World Bank

 

4. शादी की औसत उम्र : बढ़ी है लेकिन 61 फीसदी की शादी 16 वर्ष से पहले

 

2011 की जनगणना के अनुसार,औसत भारतीय महिला की शादी की उम्र 21.2 वर्ष है, सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1990 में 19.3 वर्ष की तुलना में यह सुधार है।

 

2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के विवाह की औसत उम्र 20.7 है; शहरी क्षेत्रों में उम्र 22.7 है।

 

हालांकि शिक्षा एक कुशल गर्भनिरोधक है – एक कॉलेज की डिग्री प्राप्त भारतीय महिला को अपने जीवनकाल के दौरान 1.9 बच्चे होते हैं जबकि  अशिक्षित महिला को 3.8 बच्चे होते हैं – लेकिन यह केवल जल्दी शादी की अनिवार्यता को धीमा करने के लिए मामूली प्रतीत होता है।

 

2011 तक दो दशकों में महिला साक्षरता में 26 प्रतिशत अंक की वृद्धि के बावजूद, 20 वर्ष की आयु के बाद महिला के लिए अकेले रहना मुश्किल होता है, जैसा कि हमने पहले भी बताया है।

 

कम से कम 80 फीसदी अशिक्षित जिनकी शादी 10 वर्ष से पहले हुई है वे लड़कियां हैं – 10 वर्ष के बीतर होने वाले 5.4 मिलियन (44 फीसदी) बच्चे अशिक्षित हैं – जो यह संकेत देता है कि कैसे शिक्षा का निचला स्तर और जल्दी शादी एक-दूसरे से सह-संबंधित है। शिक्षा का संबंध कम और स्वस्थ बच्चे स्वस्थ माताओं के साथ भी है।

 

करीब 12 मिलियन भारतीय बच्चों की शादी 10 वर्ष की उम्र से पहले हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जून 2016 में बताया है ; 7.84 मिलियन (65 फीसदी) विवाहित बच्चे लड़कियां हैं, जो इस तथ्य को मजबूत करता है कि हमारे समाज में लड़कियां अब भी वंचित है। दस विवाहित अशिक्षित बच्चों में से भी आठ लड़कियां हैं।

 

इसके अलावा, प्रति 1000 पुरुषों पर कम से कम 1,403 ऐसी महिलाएं हैं जो किसी शिक्षण संस्थान नहीं गई हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने नवंबर 2015 में बताया है।

 

5. भारत की लापता लड़कियां : 60 वर्षों में बाल लिंग अनुपात सबसे कम

 

भारत का बाल लिंग अनुपात – 0 से 6 वर्ष की आयु के बीच प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या – पिछले 60 वर्षों में सबसे बद्तर है, जो यह दर्शाता है कि लड़कियों का निरंतर रुप से गर्भपात कराना या भ्रूण हत्या होना जारी है।

 

बाल लिंग अनुपात: 60 वर्षों में सबसे नीचे

Source: Census of India

 

यदि भारत के बाल लिंग अनुपात में सुधार नहीं होता है, तो यहां 2030 तक 23 मिलियन कम महिलाएं (29-40 वर्ष) होंगी। यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष प्रक्षेपण में सामने आई है।

 

जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के भारत में लिंग चयन पेश किया गया था, इस तथ्य पर आधारित कि लड़कियां साहसी होती हैं, बाकी सब बराबर, लड़कों की तुलना में अधिक बच्चियों के जन्म जीवित रहती हैं। 1975 में, भारतीय बाल चिकित्सा जर्नल में एक पेपर ने तर्क दिया कि लड़कियों की अधिक संख्या “अनावश्यक उपजाऊपन और लड़कियों की कि उन्मूलन जनसंख्या नियंत्रण के लिए नेतृत्व करेंगे” – फरवरी 2016 में इंडियन एक्सप्रेस कॉलम में साबू एम जार्ज ने लिखा है। जार्ज वर्ष 1994 के कानून जिसमें लिंग चयन प्रतिबंधित कर दिया उसकी निगरानी के लिए कमेटी के सदस्य हैं।

 

लेकिन कानून और शिक्षा स्तर में वृद्धि के बावजूद – और अधिक महिला मॉडल जैसे कि भारत की नवीनतम ओलंपियन पदक विजेता – बाल लिंग अनुपात में गिरावट जारी है।

 

(तिवारी इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 23 अगस्त 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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