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गर्भावस्था के दौरान 16 फीसदी महिलाओं की नहीं होती है देखभाल

गायत्री बालगोपाल,

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चेन्नई: सात भारतीय महिलाओं में से एक से ज्यादा को उनकी पिछली गर्भावस्था के दौरान जन्म से पहले की देखभाल प्राप्त नहीं हुई है। इनमें से आधी महिलाओं के पति या परिवार को यह देखभाल महत्वपूर्ण नहीं लगती है। यह जानकारी नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों से मिली है और यह जानकारी स्वास्थ्य देखभाल के लिए महिलाओं के अधिकारों के बारे में पुरुषों को संवेदित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।

 

जन्म के समय की देखभाल (एएनसी) में गर्भवती महिलाओं के लिए जटिलताओं के लक्षणों की निगरानी, उच्च रक्तचाप और मधुमेह का पता लगाना और उपचार, लोहे और फोलिक एसिड की गोलियां प्रदान करना और निवारक देखभाल पर सलाह, गर्भावस्था के दौरान आहार, प्रसव देखभाल, जन्म के समय की देखभाल आदि शामिल है। एएनसी एक कुशल स्वास्थ्य प्रदाता जैसे कि डॉक्टर, सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) या अन्य स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा प्रदान किया जाता है।

 

ग्रामीण भारत में केवल 16.7 फीसदी महिलाओं ने पूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल प्राप्त किया है ( कम से कम चार एएनसी का दौरा, कम से कम एक टेटनस टॉक्सॉयड इंजेक्शन, और लोहा और फोलिक एसिड गोलियां या 100 या अधिक दिनों के लिए लिया गया सिरप )। यह आंकड़ा शहरी आंकड़ों ( 31.1 फीसदी ) की तुलना में लगभग आधी है, जैसा कि एनएफएचएस -4 के आंकड़ों से पता चलता है।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश है कि सभी गर्भवती महिलाओं को कम से कम चार एएनसी का दौरा प्राप्त होना चाहिए और पहला दौरा गर्भावस्था के पहले तिमाही में होना चाहिए।

 

भारतीय परिवारों में निर्णय लेने की लिंगीय प्रकृति भी महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल की व्यवहार को प्रभावित करती है।

 

26 फीसदी पुरुषों कि सोच गर्भावस्था की देखभाल आवश्यक नहीं

 

चार पुरुषों में से एक, जिनकी पत्नियों को एएनसी नहीं मिला, उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता था कि यह आवश्यक था। पांच पुरुषों में से एक ने कहा कि उनके परिवार के सदस्यों को यह नहीं लगता था कि यह आवश्यक था, जबकि दस में से एक ने कहा कि महिलाओं ने स्वयं ही एएनसी को अनावश्यक माना। लगभग चार लोगों में से एक ने कहा कि यह ‘बहुत महंगा’ था।

 

महिलाओं को क्यों प्रसवोत्तर देखभाल नहीं मिली

Note: This data is from men’s report

 

शहरी पुरुषों और उनके परिवारों में से एक बड़े हिस्से की यह सोच थी कि एएनसी आवश्यक नहीं था या एएनसी की अनुमति नहीं थी, जैसा कि आंकड़ों से पता चलता है।

 

हालांकि यह दिलचस्प है और आगे अध्ययन की आवश्यकता दर्शाता है। ग्रामीण क्षेत्रों (54.4 फीसदी) की तुलना में, शहरी क्षेत्रों में प्रसव की संख्या सार्वजनिक सुविधाओं में मात्र 46.2 फीसदी था, और इस जानकारी से इस बात की संभावना सामने आती है कि कि निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में जाने वाले दंपत्ति को गर्भावस्था से संबंधित सही सलाह नहीं मिल रही हो।

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के रोजगार बेरोजगारी सर्वेक्षण, 2011-12 के अनुसार, शहरी भारत में केवल  14.7 फीसदी महिलाएं श्रमबल में थीं, जबकि ग्रामीण भारत में वे 24.8 फीसदी श्रमबल का हिस्सा थीं। इससे उनकी आय और निर्णय लेने की स्वतंत्रता कम होती है।

 

अधिक ग्रामीण पुरुषों ने अपनी पत्नियों को एएनसी नहीं प्राप्त करने के पीछे वित्तीय कारणों का हवाला दिया। घरेलू फैसले की लिंगीय प्रकृति, जैसे हमने कहा, महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल की व्यवहार को प्रभावित करती है। केवल 12 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्होंने अपने स्वास्थ्य से संबंधित फैसले स्वंय लिए हैं, जबकि 22.6 फीसदी ने कहा कि उनके पति ने फैसला किया और 62.5 फीसदी ने कहा कि उन्होंने अपने पतियों के साथ मिलकर निर्णय लिया है।

 

2005-06 के मुकाबले, 2015-16 के बीच खुद के स्वास्थ्य से संबंधित निर्णय लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत 15.1 प्रतिशत गिर गया है।

 

स्वंय के स्वास्थ्य संबंधित निर्णय लेने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी

Source: National Family Health Survey, 2015-16

 

शिक्षा के बेहतर स्तर, आय सृजन रोजगार में भागीदारी और आर्थिक संपन्नता वाले घरों से संबंध से महिलाओं के बीच अपने स्वास्थ्य के बारे में निर्णय लेने का प्रतिशत बढ़ता है, जैसा कि आंकड़े बताते हैं।

 

यहां तक ​​कि भारत की महिला श्रम शक्ति की भागीदारी में गिरावट आई है ( जैसा कि इंडियास्पेंड एक निरंतर श्रृंखला में इसकी जांच कर रहा है ) काम करने वाली महिलाओं में से 20 फीसदी यह  तय कर पाती हैं कि उनकी आय का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए। यह घरेलू निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी को बेहतर बनाने की आवश्यकता को दर्शाता है।

 

गर्भावस्था की जटिलताओं के मामले में ज्यादातर पुरुष अनभिज्ञ

 

2015-16 में, जिन महिलाओं को एएनसी का दौरा प्राप्त हुआ है, कम से कम एक एएनसी यात्रा के दौरान 10 में से सात के पति मौजूद थे। यह आंकड़ा 2005-06 में 49.5 फीसदी से 18.7 प्रतिशत अंक ज्यादा है। शहरी क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन देखा गया। ग्रामीण इलाकों में 63.9 फीसदी की तुलना में शहरी क्षेत्रों में 76.9 फीसदी पुरुष उपस्थित थे।

 

निवास स्थान के अनुसार प्रसवोत्तर देखभाल के दौरान पुरुषों की उपस्थिति

आंकड़ों के मुताबिक, पत्नी की एएनसी यात्रा के दौरान अधिक शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न पुरुषों के उपस्थित होने की संभावना अधिक थी।

 

एएनसी के दौरान उपस्थित पुरुषों में से केवल 38.6 फीसदी को जटिलताओं के संबंध में बताया गया, जैसे कि  एंठन, 37.1 फीसदी को योनि से खून बहने के संबंध में बताया गया, 45.2 फीसदी को लंबे प्रसव-काल, 44.8 फीसदी को उच्च रक्तचाप और 51.1 फीसदी को गंभीर पेट दर्द के बारे में बताया गया था। इसके अलावा, केवल 47.1 फीसदी पुरुषों को उनकी पत्नी के गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य प्रदाताओं द्वारा किसी जटिलता के इलाज के लिए बातचीत की गई। इसलिए, पुरुष अपनी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में पर्याप्त ज्ञान के बिना निर्णय लेने में भाग लेते हैं, जिससे कठिनाई बढ़ती है।

 

भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के 2013 के इस दस्तावेज के मुताबिक, बड़ी संख्या में मातृ एवं बाल मृत्यु देखभाल की मांग में निर्णय लेने में देरी के कारण होते हैं।

 

प्रसवपूर्व देखभाल क्यों है महत्वपूर्ण?

 

केवल 30.3 फीसदी भारतीय महिलाओं ने 100 दिनों या उससे अधिक के अनुशंसित कोर्स के लिए लोहा और फोलिक एसिड गोलियों का सेवन किया है। नतीजतन, 50.3 फीसदी गर्भवती महिलाएं और 6 से 59 वर्ष की आयु के 58.4 फीसदी बच्चों में लोहे की कमी वाला एनीमिया है, जो मातृ मृत्यु,  समय से पहले जन्म और शिशुओं की मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण है।

 

भारत की शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 34 मौतें हैं, जो ब्रिक्स देशों के बीच सबसे ज्यादा है। 2015 में भारत में नवजात शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 25 और पांच वर्ष की आयु के भीतर के लिए प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 43 का है, जैसा कि नमूना पंजीकरण प्रणाली सांख्यिकी रिपोर्ट 2015 में बताया गया है।

 

इसके अलावा, 2011-13 में प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 167 मौतों की भारत की मृत्यु दर अनुपात भी ब्रिक्स राष्ट्रों में सबसे बद्तर था।

 

प्रसव के बाद, केवल 41.5 फीसदी शिशुओं को एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया गया था । इसके अलावा, 6-23 महीने की आयु के 10 फीसदी से कम शिशुओं को न्यूनतम स्वीकार्य आहार दिया गया, जैसा कि एनएफएचएस -4 के आंकड़ों से पता चलता है।

 

इसके अलावा पांच साल से कम उम्र के बच्चों में से 38.4 फीसदी में स्टंटिंग ( आयु के अनुसार कम ऊंचाई ) और 35.7 फीसदी बच्चों में कम वजन (ऊंचाई के लिए कम वजन) का प्रसार है।

 

स्वास्थ्यसेवा में बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन में सुधार के अलावा, शिक्षा और वेतनभोगी रोजगार के माध्यम से महिलाओं के आत्मबल को बढ़ावा देने के साथ-साथ महिलाओं को स्वास्थ्य देखभाल के अधिकार के बारे में संवेदनशील बनाने तथा मातृ एवं बाल स्वास्थ्य देखभाल के बारे में जानकारी देने के लिए संबंधित सहज और ठोस विकास लक्ष्य हासिल करना महत्वपूर्ण है।

 

(गायत्री बालागोपाल स्वतंत्र शोधकर्ता हैं और चेन्नई में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 मार्च, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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