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गिरता भूजल स्तर, बढ़ता संदूषण, जल संकट में वृद्धि

संदीप पई एवं प्रथमेश मुल्ये,

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बोरवेल रिसाव अक्सर भारत के ग्रामीण इलाकों में देखा जाता है, भूजल स्तर के गिरने से पुनर्भरण की काफी कम या न के बराबर संभावना है।

 

कोल्हापुर (महाराष्ट्र), दिल्ली: पांच वर्ष पहले जब 55 वर्षीय रमाकांत देसाई ने अपने खेतों में मक्के की सिंचाई के लिए, बोरवेल सिंक के लिए खुदाई का काम कराया तो रमाकांत को 200 फीट की गहराई पर पानी मिला। मौजूदा स्थिति में यदि आज वह पानी के लिए खुदाई कराता है तो पहले के मुकाबले चार गुना अधिक खुदाई करानी होगी, यानि पानी 900 फीट पर मिलेगा।

 

कोल्हापुर, महाराष्ट्र के दक्षिणी ज़िले में स्थित रमाकांत देसाई के गारगोती गांव की कहानी आम है। जलगांव ज़िले के भुसावल से 682 किलोमीटर उत्तर में रहने वाले 52 वर्षीय राजेंद्र नाद भी कुछ ऐसी ही कहानी सुनाते हैं, जहां की स्थिति उर्वरक के अति प्रयोग से और जटिल हो गई है। नाद, जो बाजरा , ज्वार और मूंगफली की खेती करते हैं, बताते हैं कि, “उर्वरकों के अति प्रयोग से हमारा भूजल प्रदूषित हो गया है।”

 

एक ऐसे देश में जहां 74 फीसदी खेत सिंचित नहीं है और पानी की कमी बढ़ रही है – ईए, एक पानी परामर्श, द्वारा इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2025 तक भारत में पानी की कमी होगी – वहां भूजल स्तर गिर रहा है, जिससे खेती के संकट में भी वृद्धि हो रही है। भूजल गिरावट को स्वीकारते हुए, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि उनकी सरकार “भूजल प्रबंधन” पर 6,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी लेकिन इसका पूरा विवरण अभी तक स्पष्ट नहीं है।

 

अन्य देशों की तुलना में भारत में सालाना मीठे पानी की खपत अधिक होती है – विश्व बैंक के चार साल के आंकड़ों के अनुसार, घरेलू , कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए प्रति वर्ष 761 बिलियन (76100 करोड़) घन मीटर जल का इस्तेमाल होता है। पानी की कमी और बढ़ गई है क्योंकि आधे से अधिक पानी अब दूषित है, मुख्य रूप से यह उद्योग और सीवेज द्वारा दूषित होता है जिससे डायरिया, टाइफाइड और वायरल हेपेटाइटिस जैसी बिमारियां फैलती हैं।

 

मीठे पानी की वार्षिक निकासी, टॉप पांच देश

 

अधिक आबादी के साथ, भारत के मुकाबले चीन 28 फीसदी कम करना का मीठे पानी का उपयोग

 

एक आम तर्क यह है कि भारत में पानी की बढ़ती खपत अपरिहार्य है। 1.4 बिलियन (140 करोड़) की आबादी के साथ, चीन प्रति वर्ष 554.1 बिलियन ( 55410 करोड़) क्यूबिक मीटर मीठे पानी का इस्तेमाल करता है – यह भारत की तुलना में 28 फीसदी कम है।

 

परिणाम: पिछले 69 वर्षों में भारत की सालाना प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 74 फीसदी गिरी है, 1947 में 6042 घन मीटर से 2011 में 1,545 घन मीटर तक पहुंचा है। यह आंकड़े दिल्ली सरकार के इस जल नीति रिपोर्ट में सामने आई है।

 

अयान बिस्वास, एक जल प्रबंधन विशेषज्ञ कहते हैं, “सब्सिडी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का परिणाम अस्थिर निष्कर्षण और भूजल का उपयोग एवं अंत में इसमें कमी होना हुआ हैं।” बिस्वास आगे कहते हैं कि किसानों द्वारा सस्ते, सब्सिडी वाले बिजली के उपयोग से, बिना किसी प्रतिबंध के अधिक भूजल का इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

ग्रामीण भारत में पानी की कमी, अरक्षणीय कृषि प्रथाओं का परिणाम है जैसे कि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में अधिक पानी लगने वाले फसलों – धान, कपास और गन्ना – की खेती करना।

 

जल गहन फसल

 

नौ राज्यों में भूजल की स्थिति “गंभीर”

 

जल संसाधनों पर इस 2,016 संसद समिति की रिपोर्ट के अनुसार, नौ राज्यों में – दक्षिण, पश्चिम और मध्य भारत – भूजल स्तर को ‘गंभीर’ में वर्णित किया गया है। “गंभीर” एक ऐसी स्थिति है जहां फिर से भरने की क्षमता में उल्लेखनीय गिरावट के साथ 90 फीसदी भूजल निकाल लिया गया है

 

दिसंबर 2015 तक, 6607 इकाइयों की (ब्लॉक, मंडलों, तालुकों) का आकलन किया गया जिसमें से 16 राज्यों के 1,071 16 संघ शासित प्रदेशों से दो इकाइयों को “अति शोषित” के रुप में वर्गीकृत किया गया है, जिसका अर्थ हुआ कि फिर से भरने की काफी कम क्षमता के साथ, 100 फीसदी पानी निकाला जा चुका है।

 

विश्व भर में, भारत में भूजल का स्तर सबसे अधिक गंभीर है। इस संबंध में पहले भी इंडियास्पेंड ने विस्तार से बताया. है। भारत के आधे से अधिक इलाके में पानी की गंभीर समस्या है, विशेष रुप से उपजाऊ गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन भर में, जैसा कि इस ग्राफ में दिखाया गया है।

 

तमिलनाडु और राजस्थान सबसे अधिक शोषित ब्लॉक है।

 

9 गंभीर राज्यों में भूजल परिदृश्य

 

भारत का आधे से अधिक भूजल दूषित है

 

जल संकट का दूसरा पहलू संदूषण है। सतही और भूजल फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और लोहे के साथ मिला हुआ है।

 

राज्य/ जिले, जहां भूजल में रासायनिक घटक बीआईएस मानदंड से ऊपर हैं

 

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 650 शहर और कस्बे, प्रदूषित नदियों के पास बसे हैं, जो भूजल प्रदूषित करते हैं।

 

रिपोर्ट कहती है कि, उद्योगों में “बुरी पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली” के कारण पानी के जहरीले और जैविक अपशिष्ट निर्वहन होता है। इसी का परिणाम है कि “सतह और भूमिगत जल स्रोत दूषित हुए हैं जो पानी सिंचाई और घरेलू कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है।”

 

प्रदूषित नदियों के पास बसे शहर/कस्बे

 

केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का आधे से अधिक भूजल दूषित है। रिपोर्ट कहती है कि, कम से कम 276 जिलों में फ्लोराइड का उच्च स्तर है, 387 जिलों में नाइट्रेट सुरक्षित स्तर से ऊपर है एवं और 86 जिलों में आर्सेनिक का उच्च स्तर है।

 

भूजल बोर्ड के अनुसार, 2007 से 2011 के बीच औसतन, दूषित पानी से 10 मिलियन (100 लाख) डायरिया के मामले, टाइफाइड के 740,000 मामले एवं 150,000 वायरल हेपेटाइटिस के मामले सामने आए हैं।

 

यदि जलगांव की बात करें तो, पानी के संकट से निपटने के लिए नाद का गांव अब फिर पारंपरिक तरीकों को अपना रहा है। नाद कहते हैं, “पानी के संयोजन के लिए हम जलधारा को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि सूखे के दौरान हमें इससे पीने एवं फसलों के लिए पानी मिलेगा।”

 

(पई पई एक स्वतंत्र पत्रकार एवं 101reporters.com के सदस्य हैं। करीब पांच सालों तक यह हिंदुस्तान टाइम्स और डीएनए के साथ जुड़े रहे हैं। वर्तमान में सेंट्रल यूरोपीयन विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट में पर्यावरण विज्ञान, नीति और प्रबंधन में मास्टर्स कर रहे हैं। मुल्ये नई दिल्ली स्थित पत्रकार एवं 101reporters.com का एक सदस्य है। मुल्ये सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 10 मार्ट 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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