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गुजरात में भाजपा सरकार के लिए 4 चुनौतियां

संयुक्ता नायर,

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अहमदाबाद में विधानसभा चुनाव से पहले रोड शो के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी। अब जब भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की है, हम राज्य में मुख्य विकास संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करेंगे, जिसे नई सरकार को सामना करना पड़ेगा।

 

हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 60.4 मिलियन जनसंख्या वाले भारत के पश्चिमी राज्य, गुजरात में लगातार पांचवी बार सरकार बना रही है, लेकिन राज्य भारतीय औसत से कम प्रतिरक्षण दर, स्कूल में लड़कियों का कम नामांकन, और भारतीय औसत के मुकाबले अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ अपराधों के लिए कम अभियोग दर जैसी चुनौतियों का सामना करता है।

 

वर्ष 2015-16 में देश के 30 राज्यों में से छठा सबसे समृद्ध राज्य, गुजरात की प्रति व्यक्ति आय 122,502 रुपए थी। यह आंकड़े 2015-16 में भारत के 77,803 रुपए के प्रति व्यक्ति आय से 57 फीसदी अधिक है। भाजपा सरकार के पिछले 19 वर्षों के कार्यकाल में गुजरात की प्रति व्यक्ति आय में नौ गुना बढ़ोतरी हुई है। कुल अपराध दर प्रति 100,000 लोगों पर 267.3 से घट कर 233.2 रह गई, है और शिशु मृत्यु दर ( प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर मृत्यु) में 50 फीसदी से भी ज्यादा की कमी आई है।

 

फिर भी, वर्ष 2015-16 तक भारत की तुलना में टीकाकरण दर लगभग 12 प्रतिशत कम थी, 2015-16 में प्रति 1,000 लड़कों के जन्म के समय 907 ​​लड़कियां का लिंग अनुपात, 943- 980 के प्राकृतिक स्तर से नीचे रहा है, स्टंटिंग (उम्र के लिए कम ऊंचाई) और वेस्टिंग (ऊंचाई के लिए कम वजन) केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे अन्य समृद्ध राज्यों की तुलना में ज्यादा रहा है और पिछले छह वर्षों में ग्रामीण विद्यालयों में ऊपरी प्राथमिक विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए सीखने के स्तर में 19 फीसदी की गिरावट आई है, जैसा कि सरकारी आंकड़ो और एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्टस के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आया है। वर्ष 1998 से नवीनतम आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर इंडियास्पेंड ने इन प्रत्येक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा किया है।

 

चुनौती 1: कम प्रतिरक्षण कवरेज, उच्च वेस्टिंग का प्रसार

 

2015-16 में, गुजरात में दो साल से कम के 50.4 फीसदी बच्चों को पूरी तरह से प्रतिरक्षित किया गया था। यह आंकड़े भारत के कुछ बीमारु राज्यों (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) से कम है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों के मुताबिक, न केवल गुजरात का टीकाकरण भारत की तुलना में 12 प्रतिशत कम है, बल्कि यह धीमी दर पर भी बढ़ी है। जबकि भारत का टीकाकरण 2005-06 से 2015-16 तक दस वर्षों में 18.5 प्रतिशत अंक में सुधार हुआ है, लेकिन गुजरात में केवल पांच प्रतिशत अंक में सुधार हुआ है।

 

युवावस्था में बच्चों का टीकाकरण शिशु मृत्यु दर को कम करने का एक तरीका है। टीकाकरण से रोकथाम होने वाले बीमरियों के कारण भारत हर वर्ष दो साल से कम उम्र के 0.5 मिलियन बच्चों को खो देता है।

 

गुजरात की टीकाकरण दर भारतीय औसत से धीमी गति से बढ़ी है

Source: National Family Health Survey-4.

 

भारतीय औसत दर (2015-16 में 21 फीसदी) में 1.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी की तुलना में गुजरात मेँ पांच साल से कम उम्र के बच्चों में वेस्टिंग का प्रसार लगभग आठ प्रतिशत अंक से बढ़ा है, 2005-06 में 18.7 फीसदी से 2015-16 में 26.4 फीसदी तक। अक्टूबर 2017 में, अहमदाबाद के मुख्य सिविल अस्पताल में 18 बच्चों, जिनमें से ज्यादातर कम वजन वाले थे, की मृत्यु हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने नवंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

गुजरात के स्वास्थ्य सूचक अन्य समृद्ध राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र से भी बदतर हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2017 में रिपोर्ट में बताया है।

 
भारतीय औसत की तुलना में गुजरात में बच्चों में वेस्टिंग का उच्च प्रतिशत ( कद के हिसाब से कम वजन )

Source: National Family Health Survey-4

 

हिमाचल प्रदेश का 2015-16 में प्रति व्यक्ति आय लगभग गुजरात के बराबर रहा है। 2015-16 में गुजरात की तुलना में हिमाचल प्रदेश का  वेस्टिंग प्रसार न केवल 13 प्रतिशत अंक कम रहा है बल्कि गुजरात के विपरीत यह दस वर्षों में वेस्टिंग कम करने में भी सफल रहा है। वहीं गुजरात में वेस्टिंग के आंकड़े में वृद्धि हुई है।

 

अपर्याप्त पोषण का परिणाम वेस्टिंग है। 2015-16 में, एनएफएचएस के आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में दो साल से नीचे के 5.2 फीसदी बच्चों को पर्याप्त आहार मिला। जबकि राष्ट्रीय औसत 9.6 फीसदी रहा है।

 

गुजरात में स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि के बावजूद ऐसा हुआ है। गुजरात में, यह वृद्धि 2000-01 में सकल व्यय का 3.4 फीसदी से बढ़कर  2016-17 में 5.4 फीसदी हुआ है। 2016-17 में स्वास्थ्य पर भारत का खर्च कुल व्यय का 4.9 फीसदी था।

 

उच्च निवेश और बेहतर बुनियादी ढांचा हमेशा स्वास्थ्य परिणामों में सुधार की ओर अग्रसर नहीं होता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

चुनौती 2: माध्यमिक विद्यालय में कम नामांकन,  शिक्षा गुणवत्ता बद्तर

 

गुजरात में सभी बच्चों में से करीब 95 फीसदी प्राथमिक स्कूल (ग्रेड I-V) में नामांकित हैं, लेकिन केवल 74 फीसदी माध्यमिक विद्यालय-आयु (ग्रेड IX-X) के बच्चे स्कूल में दाखिला लेते हैं। यह आंकड़े 80 फीसदी की भारतीय औसत की तुलना में छह प्रतिशत अंक कम है, जैसा कि डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन ( डीआईएसई ) के आंकड़ों से पता चलता है।

 

उच्च माध्यमिक स्तर पर (ग्रेड XI-XII), उच्च माध्यमिक विद्यालय आयु वर्ग के 43.4 फीसदी बच्चों को गुजरात में स्कूल में नामांकित किया गया था। यह आंकड़े भारत की तुलना में 13 प्रतिशत अंक कम थे और 30 राज्यों में छठा सबसे कम है।

 

भारत की तुलना में गुजरात के स्कूलों में बच्चों का कम नामांकन

Source: District Information System For Education

 

गुजरात में उच्च शिक्षा (18-23 वर्ष) में नामांकन, भारत औसत से भी कम है।

 

गुजरात उच्च शिक्षा नामांकन में पीछे

Source: All India Survey On Higher Education

 

पिछले छह वर्षों से 2016 तक,  ग्रामीण स्कूलों में उच्च प्राथमिक स्तर पर सीखने के स्तर में कमी आई है, जैसा कि एक शिक्षा गैर-लाभकारी, प्रथम द्वारा संचालित सीखने को मापने के लिए एक नागरिक नेतृत्व की पहल, एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2016 कहती है।

 

वर्ष 2010 में, सरकारी और निजी ग्रामीण विद्यालयों में ग्रेड VIII के 54.3 फीसदी छात्र गणित का भाग करने में सक्षम थे। यह आंकड़े 2016 में 35 फीसदी तक कम हुए हैं। 2010 में, हालांकि ग्रेड VIII के 79 फीसदी छात्र कम से कम ग्रेड II स्तर का पाठ पढ़ने में सक्षम थे, लेकिन यह 2016 में यह आंकड़ा 76.6 फीसदी तक कम हुआ है।

 

इनमें एक कारण कम व्यय होना है। 2016-17 में, गुजरात सरकार ने शिक्षा के लिए अपने कुल व्यय का 14 फीसदी खर्च किया है, जो कि भारतीय राज्यों में पांचवां सबसे कम है। इस संबंध में भारतीय औसत 15.6 फीसदी था।

 

चुनौती तीन: महिला सशक्तिकरण

 

जन्म के समय, गुजरात के लिंग अनुपात में दस वर्षों में कोई सुधार नहीं हुआ है। 2005-06 में प्रति 1,000 लड़कों पर 906 लड़कियां का आंकड़ा था और 2015-16 में यह 907 था। नई सरकार को राज्य के लिंग अनुपात में सुधार की चुनौती का सामना करना पड़ेगा, जैसा कि 2011 विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से गणना के अनुसार जन्म के समय, प्राकृतिक लिंग अनुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 943- 980 लड़कियों के बीच माना जाता है।

 

पिछले दस वर्षों में, गुजरात में महिलाओं की साक्षरता दर भारतीय औसत से ज्यादा रही है। हालांकि, भारत ने अपनी महिला साक्षरता दर में तेजी से वृद्धि देखी है।

 

भारत की तुलना में गुजरात महिला साक्षरता दर में धीमी वृद्धि

Source: National Family Health Survey-4

 

उच्च प्राथमिक स्तर पर, 2014-15 में गुजरात में लड़कियों के स्कूल छोड़ने का दर 8.5 फीसदी था, जो देश के तीसरा सबसे ज्यादा है,  जैसा कि डीआईएसई आंकड़े बताते हैं। इस संबंध में भारतीय औसत 4.6 फीसदी था।

 

डीआईएसई आंकड़ों के मुताबिक, माध्यमिक (ग्रेड IX-X) स्तर पर,  2015-16 में माध्यमिक विद्यालय आयु की लड़कियों में से कम से कम 67 फीसदी नामांकित थी, जो भारत के 81 फीसदी के आंकड़ों से 14 प्रतिशत अंक कम है।

2014-15 में ड्रॉप-आउट दर भी 23 फीसदी थी, जो भारत के 17 फीसदी के आंकड़ों से 6 प्रतिशत अंक ज्यादा है। उच्चतर माध्यमिक स्तर पर एक ही प्रवृत्ति जारी है। गुजरात का सकल नामांकन अनुपात 41.4 फीसदी था जबकि भारतीय औसत 56.4 फीसदी रहा है।

 

चुनौती चार: अनुसूचित जाति, जनजाति के खिलाफ अपराधों की कम सजा दर

 

गुजरात पांच राज्यों में से एक है (दूसरा गोवा, राजस्थान, मिजोरम और नागालैंड है) जहां भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत अपराधों की अपराध दर 1998 की तुलना में 2016 में गिरावट हुई है। 1998 में, गुजरात की अपराध दर, प्रति 100,000 लोगों पर 267.3 थी, जो 2016 में घटकर 233.2 हुई है – सभी भारतीय राज्यों में दसवां सबसे ज्यादा है।

 

वर्ष 2016 में, भारतीय औसत की तुलना में गुजरात की महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध दर कम थी, लेकिन अनुसूचित जातियों के खिलाफ इसकी अपराध दर उच्च थी।

 

भारत की तुलना में गुजरात में अनुसूचित जाति, जनजाति के खिलाफ उच्च अपराध दर

Source: National Crime Record Bureau

 

वर्ष 2004 से 2014 के बीच, गुजरात में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की सजा दर राष्ट्रीय दर के मुकाबले लगभग छह गुना कम था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 की रिपोर्ट में बताया है। इस अवधि में औसत सजा दर 5 फीसदी थी, जिसका अर्थ था कि हर 100 आरोपियों में से 95 को निर्दोष बताया गया था। भारत के लिए औसत अभिरक्षा दर 29 फीसदी थी।

 

2016 में, गुजरात में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराध की सजा दर 4.6 फीसदी थी, जबकि भारत के लिए यह 25.7 फीसदी था, जैसा कि हालिया एनसीआरबी आंकड़ें बताते हैं।

 

अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराधों के संदर्भ में,  2016 में, गुजरात की अपराध दर प्रति 100,000 आबादी पर 3.2 थी, जो भारत के 6.3 के आंकड़ों के मुकाबले कम थी। हालांकि, इस तरह के अपराधों की सजा दर 0.9 फीसदी के आंकड़ों के साथ गुजरात में कम थी। इस संबंध में राष्ट्रीय आंकड़ा 20.8 फीसदी का है।

 

(नायर इंटर्न हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 दिसंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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