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ग्रामीण भारत में अधिक लोग हो रहे हैं मोटापे का शिकार

राजन शंकर और जेम्स लेविनसन,

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पिछले 14 वर्षों के दौरान भारत के ग्रामीण इलाकों में मोटापे एवं अधिक वज़नदार लोगों में 8.6 गुना वृद्धि हुई है, जबकि पिछले 20 वर्षों के दौरान 1.7 गुना की वृद्धि देखी गई है।

 

आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले के ग्रामीण इलाकों में, जहां हम काम कर रहे थे,हमने पाया है कि प्रजनन उम्र की 40 फीसदी महिलाएं मोटापे या अधिक वज़न से ग्रसित हैं (25 या अधिक का बॉडी मास इंडेक्स, या बीएमआई; 18 से 22.9 के बीच की महिलाओं को स्वस्थ माना जाता है)। कम वजन व्यापकता की तुलना में मोटापा दर करीब तीन गुना अधिक है, यह पंजाब की औसत व्यापकता से भी उच्च है जो कि भारतीय राज्यों में सबसे अधिक है।

 

बीएमआई ऊंचाई और वजन का अनुपात है, जो लोगों को स्वस्थ या अस्वस्थ रूप वर्गीकृत करने के लिए प्रतिशतक का उपयोग करते हैं। प्रतिशतक अधिक वजन, स्वस्थ या कम वजन के जोखिम को रिकॉर्ड करता है।

 

अधिक वज़न एवं कम वज़न वाली महिलाएं – 2015-16

Source: National Family Health Survey – 4 (NFHS-4)Underweight refers to below-normal Body Mass Index (BMI); less than 18.5 kg/m2.Overweight refers to above-normal BMI; more than 25kg/m2.

 

यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि अधिक वजन और मोटापे की समस्या समृद्ध शहरी भारत तक ही सीमित नहीं रह गया है। मोटापा अब धीरे-धीरे महामारी का रुप ले रहा है एवं अमेरिका और चीन के साथ भारत विश्व को मोटापा देने के संबंध में तीन प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक है।

 

हम दोनों पिछले 30 वर्षों से भारत एवं अन्य देशों में अल्प-पोषण पर काम कर रहे हैं। हमने कई अधिक वज़न एवं मोटापे से ग्रस्त लोगों को देखा है, लेकिन आमतौर पर हम इस मुद्दे को शहरी और अधिक आय का परिणाम मानते हुए और भारत के समग्र विकास में कम महत्व समझते हुए खारिज करते आए हैं।

 

इस तरह की संख्या और हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कुछ तरह के कैंसर के साथ अधिक वजन का गहरे संबंध होने के साथ, भारत इस समस्या से बचा हुआ नहीं है।

 

मोटापा, भारत की समृद्धि को नुकसान पहुंचा रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2015 में बताया है। यह तब हो रहा है जब भारत एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है जोकि दुनिया में तीसरा सबसे अधिक मोटापे से ग्रस्त लोगों वाला देश है। आंकड़ों पर नज़र डालें तो देश में मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या 61 मिलियन (610 लाख) है और संख्या हर रोज़ बढ़ ही रही है।

 

कम आय वाली आबादी अब नहीं है इससे मुक्त

 

गरीबों में अधिक वज़न बढ़ने का कुछ कारण निश्चित रुप से वह है जिसे हम “मितव्ययी समलक्षणी” या “बार्कर” परिकल्पना कहते हैं, जोकि अब सिद्ध अभिधारणा है कि जो लोग भ्रूण की अवधि के दौरान या जीवन के पहले दो साल में कुपोषित रहते हैं, वयस्कों की तरह, वसा को ऑक्सीकरण की असमर्थता सहित, जैविक रोग ग्रस्त होते हैं।

 

आमतौर पर देखी जाने वाली तस्वीरें जिसमें अधिक वज़न वाली मां, कुपोषित बच्चे को दूध पिला रही है, बताती है कि मां खुद अपने प्रारंभिक वर्षों में कुपोषण का शिकार रही होगी।

 

लेकिन, इसके अतिरिक्त, समृद्ध लोगों एवं कम आय वाले परिवारों में अधिक वज़न एवं मोटापे के लिए कुछ कारक समान हैं: रोते हुए बच्चे को शांत कराने के लिए चाकलेट या मीठा देने की आदत, हर जगह दिखने वाले संसाधित खाने, जो चीनी और ट्रांस वसा से भरे हैं, उनका प्रभाव, उनका आक्रामक विज्ञापन, शराब, तंबाकू और पहले के मुकाबले उनकी अधिक गतिहीन जीवन शैली कुछ मुख्य कारण हैं।

 

हालांकि कोई विश्वसनीय राष्ट्रीय आंकड़े नहीं हैं, लेकिन स्थानीय अध्ययनों से पता चलता है कि भारत के बच्चों में मोटापे की समस्या बढ़ रही है, गरीब बच्चों के साथ-साथ अमीर बच्चे भी समान रुप से प्रभावित हो रहे हैं।

 

जिन देशों ने इस समस्या को गंभीरता से संबोधित किया है, उन देशों में भी इन प्रवृत्तियों को उलटना मुश्किल साबित हो रहा है। हालांकि, इन देशों में कुछ आशाजनक के घटनाक्रम भारत के लिए प्रासंगिक हो सकता है।

 

मोटापा-विरोधी चैंपियन की अहमियत

 

परिवर्तन के लिए एक चैंपियन की आवश्यकता होती है। ऐसी एक चैंपियन अमरीका की प्रथम महिला मिशेल ओबामा हैं, जिन्होंने, लेट्स मूव अभियान को डिजाइन कर, उनके कुछ सकारात्मक परिणाम के साथ, व्हाइट हाउस में अपने प्ररंभिक लक्ष्यों के रुप में बच्चों में अधिक वजन और मोटापे को कम करने के लिए काम किया है।

 

एक पूर्व चैंपियन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और अमरीका के अरकंसास के पूर्व गवर्नर, माइक हकाबी थे। हालांकि, हकाबी टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित थे, बाद में पौष्टिक आहार की मदद से बाहर निकले थे।

 

हकाबी ने बाद में सख्त नियम अपनाया, जंक फूड से भरे वेंडिंग मशीनों को स्कूलों से हटा दिया और अपेक्षा कि स्कूल कैफेटेरिया में केवल स्वस्थ भोजन उपलब्ध कराई जाए (जब उनसे यह डर जताया गया कि शायद बच्चे ऐसा खाना न खाएं तो उन्होंने जवाब दिया – “उन्हें भूख लगेगी”)

 

थीम्ड अभियान: दक्षिण कोरिया ने वसा के खिलाफ देशभक्ति का इस्तेमाल किया

 

इसके अलावा थीम पर आधारित अभियान भी महत्वपूर्ण है। एक अपेक्षाकृत सफल अभियान, जिसने कई देशों में बच्चों के माता पिता के लिए तैयार किया, उसका आदर्श-वाक्य “5-2-1″। इसका अर्थ हुआ : अपने बच्चे को एक दिन में कम से कम फलों और सब्जियों की पांच सर्विंग का उपभोग करना चाहिए, प्रतिदिन कम से कम दो घंटे का स्क्रीन समय होना चाहिए और कम से कम एक घंटा व्यायाम करना चाहिए।

 

दक्षिण कोरिया ने अपना थीम “देशभक्ति” बनाया है। थीम संदेश देती है कि, यदि आप देशभक्ति कोरियाई हैं तो आप वो खाद्य पदार्थ खाएं जो कोरिया के हैं, विदेशी फास्ट फूड नहीं।

 

फिनलैंड, जहां यूरोप भर में सबसे अधिक हृदय रोग के मरीज़ हैं, एक ऊर्जावान अभियान की शुरूआत की, जिसका उदेश्य बढ़ती ऊर्जा व्यय है :

 

  • एक निश्चित आयु के बाद के व्यस्कों को बर्फीले सड़कों पर चलने की सुविधा के लिए जूते के नीचे के लिए मुफ्त क्लीट उपलब्ध कराया गया।
  • मुफ्त व्यायाम की सुविधाएं एवं पूल स्थापित की गई।
  • इन सुविधाओं तक नि: शुल्क बस सेवाएं चलाई गई।
  • इंटर-सिटी प्रतियोगिताएं, जो पहले केवल खेल तक ही सीमित थे, उनमें वजन और कोलेस्ट्रॉल कम करने की प्रतियोगिताएं शामिल की गई।

अभियान सफल रहा था।

 

मेक्सिको सहित कुछ देशों ने मीठे शीतल पेय पर भारी करें (टैक्स) लगाई (सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को कम करने के लिए वैसे की कर को न्यायसंगत ठहराया गया जिस प्रकार सिगरेट के लिए की गई थी) । कुछ का कहना है कि इन कर राजस्व कम आय वाले क्षेत्रों में ताजा सब्जियों और फलों की कीमत पर छूट प्राप्त करने के लिए किया गया है।

 

अन्य देशों की मीडिया में और स्कूलों में अस्वस्थ खाद्य उत्पादों के विज्ञापन पर सख्त नियंत्रण रखा है।

 

वसा चुनौती : भारत अधिक से अधिक प्रतिकूल परिस्थितियों से उबरा है

 

यह अभियान , हालांकि चुनौतीपूर्ण है, लेकिन पूरा होने लायक हैं (भारत अपने हाल के इतिहास में अधिक से अधिक चुनौतियों को दूर किया है)। ये अभियान भारत के मध्यम वर्ग के बीच बढ़ती अस्वस्थ प्रसंस्कृत खाद्य पर पैसे खर्चनें एवं फिर नवीनतम समाधान के लिए विकल्प चुनने की प्रवृति के लिए स्पृहणीय है : बैरिएट्रिक वजन घटाने सर्जरी ।

 

शायद भारत के लिए अधिक वजन और मोटापे की समस्या के समाधान के लिए गंभीरता से विचार करने के लिए एक राष्ट्रीय प्रयास का वक्त आ गया है। यह समस्या देश के आर्थिक और सामाजिक वर्गों को जोखिम में डाल रही है – और राष्ट्रीय स्वास्थ्य लागत पर खतरनाक तरीके से योगदान दे रही है।

 

देश में अल्प-पोषण पर इस तरह के प्रयास जोड़ने से देश और इसके लोगों के लिए बहुमूल्य लाभांश का भुगतान करने की संभावना है।

 

(शंकर  टाटा ट्रस्ट के वरिष्ठ सलाहकार है। लेविनसन टफ्ट्स विश्वविद्यालय, बोस्टन, अमेरिका में अनुसंधान प्रोफेसर है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 23 जून 2016 को indiaspend.com  पर प्रकाशित हुआ है।

 

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