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घर के लोगों की देखभाल चिंता न हो तो महिलाएं आसानी से कर सकती हैं वैतनिक कार्य

अनुष्का चंद्रशेखर और पारूल अग्रवाल,

India, Rajasthan, Tonk district, Nagar village

 

छोटे बच्चों के साथ भी माताएं वैतनिक कार्य करने का विकल्प चुन सकती हैं, यदि उन्हें परिवार से संबंधित जिम्मेदारियों का ख्याल रखने वाले विश्वसनीय लोगों का साथ मिले। यह जानकारी राजस्थान के उदयपुर जिले में आयोजित एक सर्वेक्षण में सामने आई है।

 

इस सर्वेक्षण में 1-6 साल की आयु वर्ग के बच्चों के साथ 3,177 माताओं को शामिल किया गया है। सर्वेक्षण में पाया गया है कि औसतन उत्तरदाता माताएं प्रतिदिन 9.4 घंटे अवैतनिक कार्य करती हैं, जबकि प्रति दिन मात्र 17 मिनट का वैतनिक कार्य वे कर पाती हैं।

 

24 घंटों में वैतनिक / अवैतनिक गतिविधियां पर औसत समय खर्च

Source: Baseline Report

 

अवैतनिक कार्यों पर खर्च किए गए समय में से माताओं ने ज्यादा वक्त बच्चों,बुजुर्गों या विकलांग व्यक्तियों की देखभाल पर बिताया है। इस देखभाल में प्रतिदिन का औसत समय करीब 2.5 घंटे रहा है। यहां हम आपको बताते चलें कि अवैतनिक कार्यों में घर में खाना बनाने, साफ-सफाई, जानवरों की देखभाल, बच्चों की परवरिश और परिवार के स्वामित्व वाले क्षेत्रों पर काम करना शामिल है।

 

इससे पता चलता है कि महिलाओं की देखभाल की जिम्मेदारी उनके श्रम बाजार में कम भागीदारी का एक संभावित कारण है, जैसा कि अनुसंधान उन्मुख गैर-लाभकारी ‘आईएफएमआर लीड’ द्वारा किए गए अध्ययन से पता चलता है। यह अध्ययन कनाडा के मैकगिल विश्वविद्यालय और भारतीय विकास-उन्मुख गैर लाभकारी संस्था ‘सेवा मंदिर’ के सहयोग के साथ किया गया था और कनाडा आधारित अंतर्राष्ट्रीय विकास अनुसंधान केंद्र द्वारा वित्त पोषित था।

 

अध्ययन में ‘बालवाडी’ नामक एक सामुदायिक दिवस-देखभाल मॉडल का मूल्यांकन किया गया है, जो राजस्थान में उदयपुर जिले के गांवों में ‘सेवा मंदिर’ द्वारा संचालित किया जाता है। यह 160 गांवों के साथ एक औचक परीक्षण है, जिनमें से 80 गांवों में बालवाडी हैं। वर्तमान में,  पहले दौर में हस्तक्षेप के बाद मिले डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है । सर्वेक्षण के अंतिम दौर पर काम जल्द शुरु किया जाएगा।

 

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसरों के संदर्भ में, ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ (2016) द्वारा ‘ग्लोबल जेन्डर गैप रिपोर्ट’ ने 144 देशों में से भारत को 136 वें स्थान पर रखा है। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक,  वर्ष 2004 और 2010 के बीच वैश्विक महिला श्रम शक्ति की भागीदारी दर में मामूली गिरावट आई है। ये आंकड़े 52 फीसदी से 50 फीसदी हुए हैं।

 

दूसरी तरफ, एनएसएसओ की रिपोर्ट कहती है, इसी अवधि के दौरान, भारत के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में क्रमश: 7 और 3 फीसदी की गिरावट आई है। ब्रिक्स देशों में, भारत में सबसे कम महिला श्रम शक्ति भागीदारी थी। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक,  वर्ष 2016 में, बांग्लादेश और चीन की दर 43 फीसदी और 63 फीसदी रही है, जबकि भारत की दर 27 फीसदी दर्ज की गई है।

 

शोधकर्ताओं ने कमजोर श्रमिक बल के लिए कई कारणों की पहचान की है और महिलाओं के लिए लगातार बद्तर आर्थिक अवसर की उपलब्धता पर गौर किया है। भारतीय संदर्भ में, महिलाओं के कार्य के आसपास के सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंड और हाल ही में घरेलू आय में हुई वृद्धि से जुड़े ऐसे दो प्रासंगिक कारक हैं।

 

इस पत्र से पता चलता है कि, पितृसत्तावादी-उन्मुख परिवारों से आने वाली महिलाओं की श्रम बल में भाग लेने की संभावना कम है। घरेलू आय में वृद्धि होने से महिलाओं पर बाहर काम करने का दवाब कम होता है और ऐसी परिस्थिति में महिलाओं का काम के लिए बाहर जाना परिवार की प्रतिष्ठा के खिलाफ माना जाता है, जैसा कि कुछ अध्ययन से पता चला है। इसके अलावा, आर्थिक विकास और वैतनिक श्रम में महिलाओं की भागीदारी के बीच संबंध पर किए गए कुछ शोध से पता चला है कि ज्यादातर महिलाओं में कौशल-गहन सेवा क्षेत्र के लिए आवश्यक हुनर की कमी है।

 

दिन भर महिलओं द्वारा खर्च समय पर आंकड़े यह भी बताते हैं कि कि क्यों कुछ महिलाएं ही घर से बाहर काम करती हैं।  वे अवैतनिक कार्य में व्यस्त रहती हैं, जिसमें घर के काम, बच्चों और बुजुर्गों का ख्याल रखना, और परिवार की देखभाल से संबंधित गतिविधियां शामिल हैं।

 

‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ द्वारा वर्ष 2016 ‘ग्लोबल जेन्डर गैप रिपोर्ट’ में पाया गया  है कि भारत में महिलाओं ने अवैतनिक कार्यों पर प्रति दिन औसतन 350 मिनट खर्च किए थे, जबकि पुरुषों ने 50 मिनट खर्च किए हैं।

 

पुरुषों और महिलाओं द्वारा अवैतनिक कामों पर खर्च किए गए समय

Source: Global Gender Gap Report, 2016 by World Economic Forum

 

क्योंकि, महिलाओं ने अपने समय का एक बड़ा हिस्सा अवैतनिक काम, विशेष रूप से अवैतनिक देखभाल  के लिए खर्च किया है, तो क्या वे आर्थिक गतिविधियों में अधिक भाग ले सकती हैं यदि उनके पास परिवार में वैकल्पिक देखभाल करने वाले ‘ऑल्टर्नटिव केयर गिवर्स’ (एसीजी) हैं? सर्वेक्षण में इस सवाल का जवाब सकारात्मक पाया गया है। एक घर में एसीजी की उपस्थिति का प्रत्यक्ष संबंध वैतनिक कार्य के लिए उत्तरदाताओं का घर से बाहर जाने के बीच पाया गया है। एक अतिरिक्त एसीजी की उपस्थिति ने एक महिला के लिए वैतनिक कार्य के लिए बाहर जाने की संभावना को 3.8 फीसदी बढ़ाया है।

 

उत्तरदाता महिला और उसके पति को छोड़कर घर में छह साल की उम्र से ऊपर का कोई भी व्यक्ति एसीजी हो सकता है।

 

पिछले 12 महीनों में महिलाओं द्वारा किए गए वैतनिक/अवैतनिक कार्य

Source: Baseline Report

NOTE: Out of the women who have done some work outside home.

 

क्योंकि इस सर्वेक्षण में शरीक ज्यादातर महिलाएं, पारिवारिक खेतों पर अवैतनिक काम में लगे हुए थे, रिपोर्ट में एसीजी और वैतनिक या अवैतनिक काम के लिए किसी भी प्रकार के लिए घर से बाहर जा रही महिलाओं की उपस्थिति के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया है।

 

एक अतिरिक्त एसीजी की उपस्थिति ने महिलाओं की वैतनिक या अवैतनिक कार्य करने की संभावना को1.1 प्रतिशत बढ़ाया है।

 

आगे के विश्लेषण से पता चला है कि सभी महिलाएं, जो वैतनिक कार्य के लिए घर से बाहर गई थीं (सर्वेक्षण में शरीक महिलाओं का 17 फीसदी), उनमें से 87 फीसदी के घरों में कम से कम एक एसीजी था। उन महिलाओं में से जो वैतनिक रोजगार के लिए बाहर गई और जिनके पास पास एसीजी नहीं थे, उनमें से 69 फीसदी ने कहा कि वे अपने बच्चों को अपने साथ काम पर ले गईं । इससे पता चलता है कि उनके पास बच्चों को छोड़ने के लिए कोई सुरक्षित या विश्वसनीय जगह नहीं है।

 

अध्ययन सर्वेक्षम में शामिल ज्यादातर महिलाएं, जो वैतनिक कार्य के लिए घर से बाहर गईं, उन्होंने निर्माण और सड़क मरम्मत स्थलों पर काम किया है।

 

ऐसे मामलों में, जब बच्चे अपनी माताओं के साथ काम की जगह तक जाते हैं, वे अक्सर बिना किसी निगरानी के छोड़ दिए जाते हैं और उन पर हमेशा कामकाजी खतरों और खतरनाक सामग्री के संपर्क में आने का जोखिम रहता है। असुरक्षा के अलावा, यह उनके स्वास्थ्य और विकास के लिए भी हानिकारक है।

 

हालांकि एसीजी महिलाओं की रोजगार क्षमता में सुधार कर सकते हैं, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि एसीजी कौन है?

 

कई उदाहरणों में यह देखा जाता है कि बड़े बच्चे, जो अपने छोटे भाई-बहनों से केवल कुछ साल बड़े हैं, वे ही उनकी देखभाल करते हैं। ये बड़े बच्चे, यदि वे एसीजी बनते हैं तो स्कूल छोड़ सकते हैं या पूरी तरह से बाहर निकल सकते हैं, जो उनकी शिक्षा, कौशल विकास और भविष्य के रोजगार के लिए असामायिक है। एक औपचारिक वैकल्पिक देखभाल व्यवस्था हो तो इस चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।

 

(चंद्रशेखर ‘आईएफएमआर लीड’ में फाइनैन्शल इन्क्लूश़न टीम के साथ वरिष्ठ अनुसंधान सहयोगी के रूप में काम करती हैं। अग्रवाल ‘आईएफएमआर ली’ड की फाइनैन्शल इन्क्लूश़न टीम के एसोसिएट डायरेक्टर हैं।.)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 07 अगस्त 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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