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घर से दूर नौकरियां नहीं करना चाहती हैं शहरी भारतीय महिलाएं

एंजल मोहन,

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मुंबई: शहरी भारत में महिलाएं घर से दूर बेहतर रोजगार के अवसरों के मुकाबले कम वेतन वाले पास के अवसरों को चुनना पसंद करती हैं, क्योंकि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था अक्सर अविश्वसनीय होती है। यह जानकारी उच्च गुणवत्ता वाले परिवहन प्रणालियों को डिजाइन और लागू करने और नीति समाधान प्रदान करने वाले वैश्विक गैर लाभकारी संस्था  ‘परिवहन और विकास नीति संस्थान’ (आईटीडीएस), द्वारा 2017 के अध्ययन में सामने आई है।

 

अध्ययन में कहा गया है कि सुरक्षित, आरामदायक, सुविधाजनक और सस्ता परिवहन, न केवल महिलाओं की व्यावहारिक जरूरतों जैसे कि स्कूलों और बाजारों तक पहुंच में मददगार होती है, बल्कि इससे सामाजिक और आर्थिक अवसरों तक पहुंच की सुविधा मिलती है और यह उनके सशक्तिकरण में भी सहायक होता है।

 

आईटीडीएस के अध्ययन में कहा गया है, “आने वाले दशक में, शहरों में सभी यात्राओं के 40 फीसदी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परिवहन के स्थायी तरीके में महिलाओं और लड़कियों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए एक ठोस प्रयास करने की आवश्यकता होगी।”

 

कम महिलाएं काम कर पा रही हैं, परिवहन एक बड़ा मुद्दा

 

पिछले दो दशकों से 2013 तक, भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी 34.8 फीसदी से घटकर 27 फीसदी हुआ है,  जैसा कि इंडियास्पेंड ने 5 अगस्त, 2017 की रिपोर्ट किया है।

 

राज्य स्तर पर महिला श्रम शक्ति की भागीदारी दर हिमाचल प्रदेश में 63 फीसदी से लेकर बिहार में 9 फीसदी तक है, जैसा कि व्यापार और आर्थिक अनुसंधान संस्थान, मककिन्सी ग्लोबल इंस्टीट्यूट द्वारा 2015 के इस रिपोर्ट में बताया गया है।

 

विश्व बैंक द्वारा 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक 2004-5 और 2011-12 के बीच भारत में महिला श्रम बल 19.2 मिलियन तक गिरा था।

 

घर से दूर रोजगार, शिक्षा या बुनियादी सेवाओं तक पहुंच बनाने में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक प्रभावित होती हैं, जैसा कि एफआईए फाउंडेशन द्वारा 2016 के इस अध्ययन में पाया गया है।

 

आईटीडीएस रिपोर्ट के मुताबिक महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर करती हैं, खासकर जब वे कम-आय वाले समूह से हैं।

 

शहर भर में, औसतन, 25 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 37 फीसदी महिलाएं काम पर पैदल जाती हैं और 25 फीसदी पुरुषों की तुलना में 30 फीसदी महिलाएं सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करती हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 8 जनवरी, 2016 की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

चूंकि महिलाओं को अनौपचारिक श्रमिकों के रूप में अधिक से अधिक प्रस्तुत किया जाता है, इसलिए उनके गंतव्यों को केंद्रीय व्यापारिक जिले में या एक या दो मुख्य क्षेत्रों में केंद्रित नहीं किया जा सकता है, जैसा कि जर्मन परिवहन नीति सलाहकार जीआईजेड द्वारा लिंग और शहरी परिवहन पर 2007 के इस पत्र में बताया गया है।

 

महिलाएं एक ही यात्रा के भीतर कई जगहों को संयोजित करती हैं

 

आईटीडीएस के अध्ययन में कहा गया है कि, ” महिलाओं के आवागमन में अक्सर कई ठहराव होते हैं, यानी एक यात्रा के भीतर अनेक स्थलों का संयोजन होता है।”

 

महिलाएं छोटी और अधिक यात्राएं करती हैं, जिन्हें अक्सर उन्हें अपनी यात्राएं बदलने, दूसरे मार्ग पर चलने और ब्रेक की जरूरत होती है- बच्चों को लेने, काम करने,खरीदारी करने या अन्य परिवार के दायित्व।

 

एफआईए फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह अक्सर महिलाओं के लिए महंगा हो जाता है, क्योंकि इन्हें इस तरह की श्रृंखलित यात्रा के दौरान कई एकल टिकट का भुगतान करना पड़ सकता है।

 

अधिकतर महिलाओं के लिए, परिवहन घर और काम प्रतिबद्धताओं को प्रबंधित करना एक दैनिक संघर्ष का हिस्सा है, जो उनकी जीवन की जीवन की गुणवत्ता पर काफी प्रभाव डालती है, जैसा कि आईटीडीएस की रिपोर्ट में कहा गया है।

 

“भारत जैसे विकासशील देश में, महिलाएं अक्सर किसी भी तरह के सार्वजनिक परिवहन पर आश्रित होते हैं, क्योंकि मोटर चालित परिवहन ही उनके लिए एकमात्र विकल्प है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि वे सार्वजनिक परिवहन सुरक्षित हों। “

 

सार्वजनिक स्थानों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की ज्यादा रिपोर्ट

 

आईटीडीएस रिपोर्ट के मुताबिक हिंसा और हिंसा के डर के कारण महिला और लड़कियां सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने से डरती हैं।

 

न्यूज एजेंसी थॉमसन रायटर्स के जनहित विभाग, थॉमस रायटर्स फाउंडेशन द्वारा इस 2014 की प्रस्तुति के अनुसार, महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक परिवहन व्यवस्था के लिए दिल्ली चौथे स्थान पर है।

 

90 फीसदी से अधिक महिलाओं ने किसी न किसी प्रकार के यौन उत्पीड़न का सामना किया है, 51 फीसदी महिलाओं ने सार्वजनिक परिवहन के भीतर उत्पीड़न का सामना किया है और अन्य 42 फीसदी ने साल में परिवहन की प्रतिक्षा करते हुए उत्पीड़न का सामना किया है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र महिला और महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ साझेदारी में एक महिला संसाधन केंद्र, जागोरी दिल्ली में 2010 में किए गए इस अध्ययन में बताया गया है।

 

सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यात्रा के दौरान सार्वजनिक परिवहन में यौन उत्पीड़न की सूचना ज्यादा नहीं की जाती है और इससे अपराध की रिपोर्टिंग मुश्किल हो जाती है।

 

सार्वजनिक परिवहन प्राधिकरण निरंतर तरीके से अन्य शिकायतों से अलग-अलग उत्पीड़न की घटनाओं को रिकॉर्ड नहीं करते हैं। रिपोर्टिंग की घटनाओं की प्रगति पर नजर रखने के लिए उत्पीड़न और उसके निराकरण की रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को एक तंत्र के साथ स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए, जैसा कि आईटीडीएस के अध्ययन में कहा गया है।

 

कई हेल्पलाइन नंबरों और खराब विज्ञापन अभियानों के साथ, महिलाओं इन सेवाओं से अनजान हैं और यह एक सार्वभौमिक हेल्पलाइन नंबर की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

 

शहरी परिवहन निवेश में महिला पक्ष पर ध्यान नहीं

 

सार्वजनिक स्थान में महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा ने महिला सशक्तिकरण बाधित किया है और इसे ‘महिला और बाल विकास मंत्रालय’ द्वारा महिलाओं के अधिकार उल्लंघन के रूप में माना गया है।

 

केंद्र सरकार ने इस तरह के मुद्दों से निपटने और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये के शुरुआती निधि के साथ निर्भया कोष की स्थापना की है। हालांकि, निधि का 30 फीसदी से कम उपयोग किया गया है, जैसा कि बिजनेस स्टैंडर्ड ने 11 फरवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

जबकि सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को संबोधित करने में सरकार के विभिन्न स्तरों पर गति विद्यमान है, आईटीडीएस के अध्ययन के मुताबिक, परिवहन पर निवेश के मामले में परिवहन और लिंग के बीच अंतर-संबंधों की सीमित समझ है।

 

अध्ययन में कहा गया है कि शहरी परिवहन में महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, आराम, सुविधा और सामर्थ्य को समेकित किए बिना सतत शहरी विकास संभव नहीं है।

 

(मोहन ने  मुंबई विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री ली है और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 9 अप्रैल, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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