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चीन के भरोसे पाकिस्तान की ताकत

अभीत सिंह सेठी,

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वर्ष 2006 में इस्लामाबाद से लगभग 85 किमी की दूरी पर बसे एबटाबाद में एक संयुक्त सैन्य अभ्यास के दौरान ध्वजारोहण समारोह में भाग लेते चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिक (दाएं) और साथ में पाकिस्तानी सैनिक । विश्व में चीन अगर तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है तो इसमें बड़ा हाथ पाकिस्तान का ही है । चीन हथियारों का जितना निर्यात करता है, उसमें 35 फीसदी अकेले पाकिस्तान  खरीदता है और बीजिंग का सबसे बड़ा खरीददार है।

 

पांच साल पहले तक, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन, लगभग बराबरी पर पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करते थे। यदि आंकड़ों पर नज़र डालें तो पाकिस्तान जितना हथियार खरीदता था, उसमें अमरीका 39 फीसदी और चीन 38  फीसदी उसे मुहैया कराता था। आज की तारीख में ऐसा नहीं है।

 

इंडियास्पेंड के विश्लेषण के पता चलता है कि आज पाकिस्तान में हथियारों की जितनी जरूरत है, उसमें 63 फीसदी की आपूर्ति सिर्फ चीन करता है। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि अमेरिका अब दूसरे स्थान पर है । पांच वर्ष पहले की तुलना में 19 फीसदी कम हथियार पाकिस्तान को उपलब्ध कराता है।

 

आज चीन विश्व में तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश है। हथियार बेचने वाले देशों के बीच चीन की इस उपलब्धि के पीछे काफी हद तक पाकिस्तान का हाथ है। चीन सभी देशों को जितना हथियार बेचता है उसमें से 35 फीसदी अकेले पाकिस्तान खरीद लेता है और बीजिंग का सबसे बड़ा खरीददार है। अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने की होड़ में बांग्लादेश भी पीछे नहीं है। वह 20 फीसदी खरीद के साथ दूसरे नंबर पर है।
 
यह जानकारी स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ओर से फरवरी 2016 की रिपोर्ट में सामने आई है।

 

चीन से पाकिस्तान को सैन्य उपकरणों के आपूर्ति को उस समय बल मिला, जब भारत से उसके संबंध तनावपूर्ण हुए, साथ ही  अमेरिका के साथ भी संबंध लड़खड़ाए।  अगस्त 2016 में आई वायर की एक रिपोर्ट कहती है कि पिछले चार वर्षों से 2015 तक पाकिस्तान को अमेरिकी सुरक्षा सहायता में 73 फीसदी की कटौती हुई। अमेरिका ने आठ ‘एफ -16’ लड़ाकू जेट विमानों की रियायती दर पर बिक्री को भी रद्द कर दिया )।

 

पाकिस्तान के शस्त्र आयात की हिस्सेदरी

Source: Stockholm International Peace Research Institute Link 1 & Link 2

 

पिछले महीने, पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्रालय ने  सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले आठ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की खरीद के लिए चीन के साथ एक अनुबंध की पुष्टि की है। इसमें 4 बिलियन डॉलर से 5 बिलियन डॉलर ( 25,00 करोड़ रुपए से 33,200 करोड़ रुपए) की लागत आएगी। इसे चीन का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात सौदा माना जा रहा है।

 

इन पनडुब्बियों का इस्तेमाल पाकिस्तान अपने परमाणु सामरिक झमता को बढ़ाने में कर सकता है। इसका इस्तेमाल परमाणु क्षमता वाली क्रूज मिसाइल हमले के लिए भी किया जा सकता है। माना जा रहा है कि भारत के पनडुब्बी चालित बैलिस्टिक मिसाइलों से होड़ लेने की दिशा में पाकिस्तान ने ये हथियार जुटाए हैं।

 

पाकिस्तान के हथियारों के जखीरे में पनडुब्बियों का सौदा सबसे नया है। अन्य सौदे हैं-

 

  • संयुक्त रूप से चीन और पाकिस्तान द्वारा विकसित लगभग 250 से 300 जेएफ -17 लड़ाकू विमान। ये पाकिस्तानी वायु सेना के लिए रीढ़ की तरह होंगे।
  • आईएचएस जेन (रक्षा / एयरोस्पेस प्रकाशन) की रिपोर्ट के अनुसार नाइजीरिया ने जेएफ -17 विमानों की खरीद के लिए पाकिस्तान से संपर्क किया है। हालांकि नाइजीरिया कितने विमान खरीद रहा है, संख्या का पता नहीं चला है, लेकिन इसी के साथ पाकिस्तान सैन्य हथियार निर्यातकों की कतार में आ गया है।
  • आठ सी-802 एंटी शिप तटीय रक्षा के लिए बने मिसाइलों से लैस चार 560 टन अज़मत स्तरीय तेज़ हमले वाले जहाज। इसमें , मिसाइल नौकाएं भी जुड़ी हुई हैं। चार में से तीन पाकिस्तान में निर्मित किया जा रहा है।
  • पाकिस्तान में बने 600 अल खालिद टैंक पाकिस्तान सेना के बख्तरबंद कोर की रीढ़ हैं। वे चीनी टाइप 90-II के प्रकार हैं।
  • जमीन से हवा में मार करने वाली  नौ एचक्यू-16 मिसाइल प्रणालियां।लागत 600 मिलियन डॉलर और अदिकतम मारक क्षमता 40 किलोमीटर।
  • 278 मिलियन डॉलर की लागत से चार काराकोरम ईगल एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट (अवाक्स)।


 

वर्ष 2011 से 2015 के बीच चीन ने लंबे समय से स्थापित हथियार निर्यातक देशों जैसे फ्रांस ( 8 बिलियन डॉलर) और जर्मनी (6.7 बिलियन डॉलर) को पीछे छोड़ते हुए 8.4 बिलियन डॉलर के हथियार बेचे । हालांकि, यह अब भी अमेरिका  47 बिलियन डॉलर) और रूस (36.2 बिलियन डॉलर) से पीछे है।

 

दुनिया के टॉप पांच हथियार निर्यातक (2011 से 2015)

Source: Stockholm International Peace Research Institute, Figures in million US$ at constant 1990 prices

 

हथियारों के अंतरराष्ट्रीय  बाजार में चीन की हिस्सेदारी वर्ष 2006-10 में 3.6 फीसदी थी। यह बढ़कर वर्ष 2011-15 में 5.9 फीसदी हो गई। इसी अवधि के दौरान, फ्रांस की बाजार हिस्सेदारी 7.1 फीसदी से गिर कर 5.6 फीसदी और जर्मनी की 11 फीसदी से गिर कर 4.7 फीसदी हुई है।

 

अंतरराष्ट्रीय हथियार निर्यात की हिस्सेदारी

Source: Stockholm International Peace Research Institute

 

जाहिर है, ये समय बताता है कि चीन एक प्रमुख विश्व शक्ति के रूप में उभरते हुए  अलग-अलग क्षेत्रों में अमेरिका को चुनौति भी दे रहा है।वह भारत को लड़खड़ाते हुए देखना चाहता है, चाहे वह प्रत्यक्ष रूप में ऐसा कुछ करे या फिर पाकिस्तान के कंधे का इस्तेमाल करे।

 

(सेठी मुंबई स्थित एक स्वतंत्र लेखक और रक्षा विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 30 सितम्बर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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