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छह से 23 महीने की उम्र के 10 भारतीय शिशुओं में से एक को मिलता है पर्याप्त आहार

देवानिक साहा,

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राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, 6 से 23 महीने की आयु के 10 भारतीय शिशुओं में से केवल 1 को पर्याप्त आहार मिलता है। नतीजा यह है कि पांच साल से कम उम्र के 35.7 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम है।

 

जन्म के बाद, 0-6 महीने के बीच सिर्फ स्तनपान ही शिशु के भोजन और पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त होता है। एनएफएचएस -4 के अनुसार, केवल 55 फीसदी बच्चों को विशेष रूप से 0-6 महीने तक स्तनपान कराया जाता है। ये आंकड़े वर्ष 2005-06 (एनएफएचएस -3) से 9 फीसदी ज्यादा हैं।

 

स्तनपान से खाद्य पदार्थों में बदलाव की अवधि को  पूरक आहार के रूप में संदर्भित किया जाता है। इसमें 6 से 23 महीने की आयु के बच्चे शामिल होते हैं । यह एक संवेदनशीन अवधि होती है। इसी अवधि में कई शिशु कुपोषण के शिकार होते हैं और इसी वजह से दो साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण का आंकड़ा बढ़ता है।

 

यूनिसेफ के अनुसार, पहले वर्ष में स्तनपान और पूरक आहार प्रथाएं एक साथ मिलकर, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में करीब करीब पांचवे हिस्से (1/5) की मौतों को रोक सकती हैं।

 

इष्टतम पूरक आहार सबसे प्रभावी हस्तक्षेप है । यह जीवन के पहले दो वर्षों के दौरान स्टंटिंग को काफी कम कर सकता है। सामान्य बच्चों की तुलना में स्टंड बच्चे बीमार ज्यादा पड़ते हैं, स्कूल में उनका खराब प्रदर्शन रहता है, मोटापे से जल्दी ग्रस्त हो जाते हैं और अपने पैरों पर खड़ा होने में पीछे रह जाते हैं।

 
इसके अलावा, अपर्याप्त आयरन के सेवन एनीमिया (आईडीए) का कारण बन सकता है, जिससे स्थायी रूप से संज्ञानात्मक क्षमता बिगड़ सकती है, जो कि 2015 के अध्ययन के अनुसार, वयस्क मजदूरी कम करती है।
 
दो साल या उससे भी अधिक उम्र तक स्तनपान जारी रखने के साथ छह महीने में पोषण-पर्याप्त और सुरक्षित पूरक (ठोस) खाद्य पदार्थों को एक “पर्याप्त आहार” के रूप में परिभाषित किया गया है।
 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, पर्याप्त आहार के लिए दिशानिर्देश में शामिल हैं:

 

  • लगातार दो साल तक या उससे अधिक तक स्तनपान जारी रखना
  •  

  • कम मात्रा में खाने के साथ छह महीने में भोजन देना शुरु करना और धीरे-धीरे बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ-साथ मात्रा बढ़ाना
  •  

  • बच्चे को खिलाने की आवृति में वृद्धि: आवश्यक रूप से 1-2 अतिरिक्त नाश्ते के साथ, शिशुओं के लिए 6-8 महीने की आयु के लिए प्रति दिन 2-3 बार भोजन और 9-23 महीने की उम्र के लिए प्रति दिन 3-4 बार भोजन रोज़ाना जरूरी
  •  

  • जरुरत के अनुसार, पूरक आहार या विटामिन-खनिज पूरक का उपयोग; और
  •  

  • बीमारी के दौरान, अधिक स्तनपान सहित तरल पदार्थ सेवन में वृद्धि करें, साथ ही नरम, पसंदीदा भोजन की आवृति में वृद्धि

 

उप-सहारा अफ्रीका के मुकाबले भारत में अधिक कुपोषित बच्चे हैं और दुनिया में हर पांच कुपोषित बच्चों में से एक भारत से है।

 

सबसे खराब प्रदर्शन वाले राज्यों में सबसे पहला स्थान राजस्थान का रहा है। राज्य में 6-23 महीने के आयु वर्ग के बच्चों में केवल 3.4 फीसदी बच्चों को पर्याप्त आहार मिला है।

 

इसके बाद 5.2 फीसदी के के साथ गुजरात दूसरे और 5.3 फीसदी के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर है। सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य / केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी (31 फीसदी), तमिलनाडु (30.7 फीसदी) और मेघालय (23.6 फीसदी ) हैं।

 

बड़े राज्यों में, 2015 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 19 की मृत्यु के साथ शिशु मृत्यु दर में 67 फीसदी की कमी के साथ, केवल तमिलनाडु ने अपने सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (एमडीजी) को हासिल करने में सफल रहा है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 9 जनवरी, 2017 को अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों अनुसार 6-23 महीने के पर्याप्त आहार प्राप्त करने वाले बच्चे

Source: National Family Health Survey, 2015-16

 

वर्ष 1975 से केंद्र सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम और बच्चे की देखभाल और विकास के लिए दुनिया का सबसे बड़ी योजनाओं में से एक एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) जारी है। वर्ष 2014-15 से एक दशक तक बाल स्वास्थ्य के लिए बजट में तीन गुना से अधिक वृद्धि हुई है। फिर भी,भारत अपना एमडीजी लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 4 जनवरी 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

बुनियादी सुविधाओं का आभाव और सभी पात्र बच्चों को वास्तव में शामिल नहीं करने से, आईसीडीएस में कई कमियां उजागर हुई हैं। इस संबंध में भी इंडियास्पेंड ने 3 मई, 2017 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।

 

बच्चों के लिए काम कर रही संस्था ‘चाइल्ड राइट्स एंड यू’ ( क्राई ) की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मोइत्रा ने एबीपी में एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि, “एनएफएचएस का आंकड़ा सिर्फ बच्चों की स्वास्थ्य और पोषण कल्याण की स्थिति और माताओं की अपेक्षा का प्रतिबिंब नहीं है। यह बाल स्वास्थ्य और कुपोषण पर राज्य की नीतियों और कार्यक्रमों में सुधार की सिफारिश भी करता है।”

 

मोइत्रा कहती हैं, “बाल कुपोषण को हल करने के संदर्भ में, आंगनवाड़ी केंद्रों का सार्वभौमिकरण और विकास की समुचित निगरानी से हम इस लड़ाई को जीत सकते हैं। ”

 

सरकार का विचार मंच नीति आयोग ने अपने तीन साल (2017-20) के एजेंडे मसौदे में, पोषण संबंधी मुद्दों से निपटने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं:

 

  • एक वेब-सक्षम पोषण सूचना प्रणाली की आवश्यकता है, जिसे स्वास्थ्य सूचना प्रबंधन प्रणाली और माता-पिता और बच्चे की ट्रैकिंग प्रणाली के साथ जोड़ना चाहिए।
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  • सुखद पोषण परिणामों के लिए, विभिन्न सीमावर्ती श्रमिकों के बीच समन्वय आवश्यक है। उन्हें प्रेरित करने के लिए एक संयुक्त तंत्र विकसित करने की जरूरत है।
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  • पोषण का अभिसरण महत्वपूर्ण है। बाल पोषण के उच्च स्तर के साथ 194 जिलों में से केवल 11 जिलों में ही तीन प्रमुख पोषण कार्यक्रम एक साथ चल रहे हैं।
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  • आईसीडीएस के तहत राज्यों की भागीदारी को और अधिक लचीलापन बनाने की जरूरत है, जिससे राज्य अपनी स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हस्तक्षेप कर सके।
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  • गेहूं, आटा, चावल, खाद्य तेलों और दूध के लिए निजी क्षेत्र को शामिल करना। फॉर्टफाइड भोजन को मध्य दिन के भोजन में शामिल करना और इसे सार्वजनिक वितरण की दुकानों और आंगनवाड़ी केंद्रों से जोड़ा जा सकता है, जिससे पकाया हुआ भोजन गर्म मिल सके।

 

(साहा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह ससेक्स विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज़ संकाय से वर्ष 2016-17 के लिए जेंडर एवं डिवलपमेंट के लिए एमए के अभ्यर्थी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में  09 मई 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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