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जनसंख्या वृद्धि के साथ उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य प्रणाली हो रही है बद्तर

सुश्री पाणिग्रही एंव जीत सिंह,

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उत्तर प्रदेश में, पिछले 15 वर्षों से 2015 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्रों (पीएचसी) की संख्या (जो सरकारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है) में 8 फीसदी की गिरावट हुई है। गौर हो कि इस अवधि के दौरान राज्य की जनसंख्या में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है। पिछले 25 वर्षों से 2015 तक, छोटे उप केन्द्रों, (सार्वजनिक संपर्क का पहला बिंदु) की संख्या में 2 फीसदी से अधिक की वृद्धि नहीं हुई है। इस अवधि के दौरान जनसंख्या में 51 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है।

 

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी  ( आरएचएस) 2015 के इन आंकड़ों संकेत मिलता है कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश की सरकार ने लगातार 200 मिलियन – केवल पांच देशों की इससे बड़ी आबादी है – लोगों के लिए सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य की जरूरत की उपेक्षा की है। उत्तर प्रदेश भारत की सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है जहां देश की आबादी का पांचवा हिस्सा रहता है।

 

विभिन्न सरकारी आंकड़े जिसका हमने अध्ययन किया है उसके अनुसार,इस उपेक्षा का परिणाम उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य अभाव के प्रमुख संकेतक में दिखाई देता है:

 

  • उत्तर प्रदेश में जन्म लिए एक नवजात शिशु के जीवित रहने की संभावना बिहार में जन्में बच्चे की तुलना में चार वर्ष, हरियाणा से पांच वर्ष और हिमाचल प्रदेश में जन्म लेने वाले बच्चे की तुलना में सात वर्ष कम होती है।
  • उत्तर प्रदेश का, टाइफाइड से होने वाली कुल मौतों (2014) का 48 फीसदी; कैंसर से होने वाली मौतों का 17 फीसदी और तपेदिक से होने वाली मौतों का 18 फीसदी (2015) सहित लगभग सभी संचारी और गैर संचारी रोग से होने वाली मौतों में बड़े हिस्सा का योगदान है।
  • असम के बाद, भारत की दूसरी सबसे मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) उत्तर प्रदेश की है; प्रसव पूर्व देखभाल का उपयोग करने में असमर्थ 62 फीसदी गर्भवती महिलाओं के साथ प्रति 100.000 जीवित जन्मों पर 285 मातृ मृत्यु (2013) दर्ज की गई है।
  • संस्थागत देखभाल तक पहुंच का अभाव इस तथ्य से स्पष्ट से होता है कि 42 फीसदी गर्भवती महिलाएं यानि 1.5 मिलियन से अधिक महिलाएं घर पर ही बच्चे को जन्म देती हैं।
  • उत्तर प्रदेश में घर पर होने वाले एक-तिहाई (61 फीसदी) प्रसव असुरक्षित हैं, जिसका अर्थ है कि प्रसव किसी स्वास्थ्य पेशेवर की देखरेख में नहीं होती है जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर और रुग्णता बढ़ती है।
  • नवजात मृत्यु दर (NNMR) से लेकर पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की होने वाली मृत्यु तक, उत्तर प्रदेश में उच्चतम बाल मृत्यु दर संकेतक है। प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 64 बच्चे जिनकी मृत्यु पांच की आयु से पहले होती है, उनमें से 32 बच्चों की मौत जन्म के एक महीने के भीतर ही हो जाती है और 50 बच्चे एक वर्ष पूरा नहीं कर पाते हैं।
  • सार्वभौमिक टीकाकरण बाल मृत्यु दर को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है: उत्तर प्रदेश के लगभग आधे बच्चे को टीका लगाया नहीं लगाया जाता है (2013)।
  • पांच वर्ष का आयु तक जीवित रहने वाले बच्चों में से आधे से अधिक बच्चों (50.4 फीसदी) की स्टंटिंग विकास (राष्ट्रीय औसत: 38.7 फीसदी) दर्ज की गई है, जो कि भारत में सबसे अधिक स्टंटिंग दर है।
  • 2006 से 2014 के बीच, भारत में पांच वर्ष की आयु से कम स्टंटिंग बच्चों का अनुपात औसतन 48 फीसदी से गिरकर 38.7 फीसदी हआ है। उत्तर प्रदेश के लिए तुलनीय डेटा 56.8 फीसदी से 50.4 फीसदी है (प्रगति जो बिहार : 55.6 फीसदी से 48.4 फीसदी, झारखंड : 49.8 फीसदी से 47.4 फीसदी और जम्मू-कश्मीर : 35 फीसदी से 31.7 फीसदी के समान है)

 

पिछले दशक के दौरान, कई सर्वेक्षणों , रिपोर्टिंग और स्वतंत्र अध्ययन से भारत भर में व्यापक स्वास्थ्य असमानताओं का पता चलता है और उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्यों की सामाजिक – आर्थिक स्थिति अकेली नहीं है। उत्तर प्रदेश उन आठ राज्यों में से हैं जो पिछड़े राज्यों का एम्पावर्ड एक्शन ग्रूप (ईएजी) बनाते हैं जिसे पहले बिमारु राज्य कहा जाता था। इस समूह में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार , राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड शामिल हैं जिनकी पहचान विशेष ध्यान देने के लिए 2005 में की गई थी।

 

लेकिन पिछले एक दशक के दौरान,उत्तर प्रदेश में यह विशेष ध्यान किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के परिणाम के रुप में दिखाई नहीं दिया है जो कि आठ ईएजी राज्यों में, बिहार, झारखंड और जम्मू-कश्मीर की तरह ही सबसे बद्तर प्रदर्शन वाला राज्य है।

 

क्यों एक दशक के दौरान भारत भर में होने वाली प्रगति से उत्तर प्रदेश बचा रहा?

 

उत्तर प्रदेश की सरकारों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं लगातार प्राथमिकताओं में नीचे रहा है। 2012 की इस नेश्नल इंसटट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एवं पॉलिसी रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च में, पिछले चार वर्षों से 2010 तक 260 रुपए से बढ़ कर 372 रुपए हुए है। जबकि यह आंकड़ा इसी अवधि के दौरान, केरल में 356 रुपए से बढ़ कर 580 रुपए और तमिलनाडु में 299 रुपए से बढ़ कर 579 हुआ है।

 

भारत के प्रमुख राज्यों में, दक्षिणी, पश्चिमी और पूर्वी राज्यों में दशक लंबी प्रगति के विपरीत उत्तर प्रदेश, असम, मध्य प्रदेश और ओडिशा की जन्म के समय कम जीवन प्रत्याशा की हिस्सेदारी है।

 

उत्तर प्रदेश के खराब स्वास्थ्य रिकार्ड के लिए कारण क्या हैं? इसके लिए कई कारकों के संयोजन हो सकते हैं जैसे कि स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी , स्वास्थ्य की बढ़ती लागत , निजी स्वास्थ्य केंद्रों में वृद्धि और नियोजन की कमी।

 

भारतीय लोक स्वास्थ्य मानकों (IPHS) जो भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के लिए ढांचागत और मानव संसाधन मानकों को तय करती है, के मानदंडों के अनुसार उत्तर प्रदेश में ग्रामीण आबादी का एक तिहाई , प्राथमिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे से वंचित है।

 

उत्तर प्रदेश में जनसंख्या की स्वास्थ्य मांगों को पूरा करने के लिए 31,037 उप केन्द्रों, 5172 पीएचसी और 1,293 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों (सीएचसी) की आवश्यकता है । लेकिन उत्तर प्रदेश में  33 फीसदी उप केन्द्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और 44 फीसदी सीएचसी की कमी है। यह जानकारी आरएचएस 2015 के आंकड़ों में सामने आई है।

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों की यह कमी आगे केन्द्र प्रायोजित स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को प्रभावित करती है जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के लिए एक प्रभावी नेटवर्क की आवश्यकता होती है।

 

पिछले 15 वर्षों में सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों का विस्तार नहीं

 

जैसा कि हमने कहा, राज्य सरकारें लगातार योजना बनाने, प्राथमिकता देने और स्वास्थ्य देखभाल की जरूरत को समझने में नाकाम रहे हैं।

 

पिछले 25 वर्षों से 2015 तक, उत्तर प्रदेश में उप केन्द्रों की संख्या में 1.8 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसी अवधि के दौरान जनसंख्या में 51 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है।

 

उत्तर प्रदेश में जन स्वास्थ्य अवसंरचना की विकास

 

Source:Rural Health Statistics (RHS), 2015

 

1985 से 2002 के बीच पीएचसी में 225 फीसदी की वृद्धि हुई है लेकिन उसके बाद से इसमें लगातार गिरावट ही हुई है। 15 वर्षों में पीएचसी में 8 फीसदी की गिरावट हुई है। यह आंकड़े 2002 में 3808 थे जबकि 2015 में 3,497 हुआ है। इसी अवधि के दौरान राज्य की आबादी में 25 फीसदी से 30 फीसदी गिरावट हुई है।

 

चूंकि सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों का नसंख्या विकास के साथ मेल बनाने में नाकाम रही हैं, लाखों लोग बुनियादी स्वास्थ्य सेवा से वंचित हैं और मौजूदा सुविधाओं में ज़रुरत से अधिक भीड़ है जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बद्तर हो रही है।

 

स्वास्थ्य उप केंद्र में गुणवत्ता और स्टाफ की कमी

 

आरएचएस -2015 के अनुसार, भारत में केवल 21 फीसदी उप केन्द्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और 26 फीसदी सीएचसी IPHS -2012 की गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं। उत्तर प्रदेश में कोई भी उप केंद्र IPHS मानदंडों के अनुरूप नहीं है और केवल 5 फीसदी पीएचसी और 17 फीसदी सीएचसी मानदंडों को पूरा करती हैं।

 

2015-15 के इस राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में, बुनियादी स्वास्थ्य सेवा पेशकश करने वाले संस्थानों में कोई उन्नयन नहीं किया गया है। 773 सीएचसी में से चार में से अधिक में पर्याप्त स्टाफ और दवाओं और आपूर्ति के साथ सेवित नहीं करती हैं। 467 सीएचसी में न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं और स्टाफ नहीं हैं।

 

उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ की (संक्षेप में भारत भर में आपूर्ति, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2016 में बताया है) कमी है।

 

उत्तर प्रदेश के लोक स्वास्थ्य संस्थानों में मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ

Source: Compiled from Rural Health Statistics-2015

 

जैसा कि राज्य और देश, दोनों में प्रशिक्षित चिकित्सा और पैरामेडिकल पेशेवरों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है स्वास्थ्य कर्मियों की कमी के मुद्दे को दूर किया जा सकता है।

 

यूपी में कम गुणवत्ता वाले निजी स्वास्थ्य सेवाएं कामयाब

 

उत्तर प्रदेश की अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे निजी स्वास्थ्य प्रणालियों को कामयाब करने के लिए जगह प्रदान की है। अप्रैल 2016 की इस सांख्यिकी मंत्रालय से भारत में स्वास्थ्य पर रिपोर्ट के अनुसार, भारत में, निजी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली अब, चिकित्सा उपचार का दो तिहाई प्रदान करता है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं – गैर मान्यता प्राप्त डॉक्टरों और नीम हकीमों सहित – में से 85 फीसदी चिकित्सा जरूरत को पूरी करते हैं।

 

वर्ष 2014-15 की राज्य वार्षिक योजना रिपोर्ट कहती है, “उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य देखभाल उपयोग, गुणवत्ता और मांग की समग्र चुनौती के रूप में संक्षेप किया जा सकता है। बड़े सार्वजनिक क्षेत्र की पर्याप्त पहुँच नहीं है। निजी क्षेत्र के लिए पहुंच है लेकिन गुणवत्ता की गंभीर कमी के कारण चुनौती बन गया है।”

 

ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश के पास दो विकल्प हैं: पर्याप्त, अक्षम सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली और निजी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली जो कम गुणवत्ता और महंगी सेवाओं की पेशकश करता है।

 

गरीब राज्यों में, उत्तर प्रदेश के मरीज़ सबसे अधिक चिकित्सा खर्च उठाते हैं जो राष्ट्रीय औसत का दोगुना है

 

कुछ ही उपलब्ध विकल्पों के साथ , उत्तर प्रदेश के लोग निजी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली तक नियमित होते हैं बीमारी के इलाज की औसत प्रति व्यक्ति लागत, गरीब राज्यों (ईएजी)  के बीच अधिक (नीचे ग्राफ देखें) है।

 

उप केन्द्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में इलाज की औसत लागत प्रति व्यक्ति 660 रुपए है जोकि 312 रुपए प्रति व्यक्ति के राष्ट्रीय औसत से दोगुना है।

 

बीमारी के इलाज के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में औसत चिकित्सा व्यय

Source: Compiled from Health in India, NSS 71st round (January to June 2014)

 

मंत्रालय के आंकड़े यह भी बताते हैं कि आम तौर पर, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में उपचार की लागत निजी संस्थानों में इसी प्रकार के उपचार की तुलना में कम है। हालांकि, उत्तर प्रदेश और बिहार में, सार्वजनिक और निजी संस्थानों में उपचार की लागत लगभग एक ही है।

 

स्वास्थ्य सेवाओं की उच्च लागत, लोगों के लिए उन्हें का उपयोग करने की क्षमता को प्रभावित करता है। उत्तर प्रदेश की आबादी का लगभग एक-तिहाई (29.43 फीसदी) गरीबी रेखा के नीचे रहता है।

 

वर्तमान में, उत्तर प्रदेश सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी सुविधाओं पर निर्भर है जो दो दशक पुराना है। स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित जनसंख्या का पंचवा हिस्सा देश के सामाजिक या आर्थिक विकास में योगदान नहीं कर सकते हैं।

 

(पाणिग्रही  राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑर कन्टेम्परेरी स्टडीज में फेलो हैं।  सिंह एसोसिएट फेलो हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 22 सितम्बर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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