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जम्मू-कश्मीर में बढ़ रही है मादक पदार्थों की समस्या

अथर परवेज,

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श्रीनगर: आज की तारीख में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की तुलना में मादक पदार्थों की लत एक बड़ी चुनौती है। यह जानकारी राज्य के पुलिस महानिदेशक, शेष पॉल वैद ने 16 नवंबर, 2017 को एक समाचार एजेंसी को दी है।

 

वैद ने बताया है कि नशीली दवाईयों की जब्ती में वृद्धि हुई है और प्रतिबंधित पदार्थों की तस्करी के लिए ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्जेन्ट्स’ (एनडीपीएस) एक्ट- 1985 के तहत पंजीकृत मामलों की संख्या बढ़ रही है।

 

Source: Data collected from Jammu & Kashmir policeNote: Data refer to cases registered under the Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (NDPS) Act, 1985. *as of August 2017

 

पिछले पांच से छह सालों में 968 क्विंटल, या 96.8 टन, जो कि 12 ट्रक लोड (8 टन प्रति ट्रक पर) के बराबर है, नशीले पदार्थों को जब्त किया गया है। 25 सितंबर, 2017 को जारी एक आदेश में राज्य के गृह विभाग ने खुलासा किया है। इस आदेश में एनडीपीएस अधिनियम के तहत पंजीकृत मामलों से निपटने के दौरान पुलिस अधिकारियों को मानक परिचालन प्रक्रिया का पालन करने के लिए कहा गया है।

 

आदेश में कहा गया है कि, जब्ती के बावजूद, इस समस्या पर जांचकर्ताओं और अभियोजन पक्ष की ओर से प्रयाप्त ध्यान नहीं दिया गया है। परिणाम स्वरुप, ऐसे मामलों में पकड़े गए बेगुनाहों की संख्या, गुनाहगारों की संख्या से अधिक है, क्योंकि प्रत्येक दोषी पर निर्दोष की संख्या नौ है। “

 

 वैद के मुताबिक, वर्ष 2014 से अगस्त 2017 के बीच, 118 किलो हेरोइन जब्त किया गया था। इसी अवधि में, श्रीनगर में सरकारी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) से संबंधित दो अस्पतालों और शहर में जम्मू और कश्मीर पुलिस द्वारा चलाए जा रहे एक ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर (डीडीसी) में इलाज के लिए 18,435 नशीली दवाओं की जांच की गई है, जैसा कि दो अस्पतालों और डीडीसी के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं।

 

Source: Data collected from Institute of Mental Health and Neuro Sciences; Community Centre, Shri Maharaja Hari Singh Hospital, Jammu & Kashmir Police’s Drug De-addiction Centre, Srinagar

 

7 मिलियन की आबादी वाले क्षेत्र के लिए यह संख्या खतरनाक नहीं लग सकती है, लेकिन नशे की लत के बहुत छोटा प्रतिशत इलाज के लिए आ रहे हैं, जैसा कि डीडीसी के निदेशक मुजफ्फर खान ने बताया है।

 

श्रीनगर के दो जीएमसी अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य के मरीजों का इलाज करने वाले एक प्रमुख मनोचिकित्सक अरशद हुसैन कहते हैं, “1980 के दशक के शुरुआती दिनों में, जब श्रीनगर अस्पताल के डॉक्टरों ने पाया कि मरीज हेरोइन की आदी थे, तो यह एक असामान्य अनुभव था। और इस मामले को तत्कालीन मुख्यमंत्री के ध्यान में लाया गया था।”

 

 

हुसैन कहते हैं, “1980 के दशक में उपमहाद्वीप ओपिओइड की समस्या का सामना कर रहा था लेकिन कश्मीर परेशानी से मुक्त रहा। लेकिन अब हम और मेरे सहकर्मी एक अलग ही स्थिति देख रहे हैं।” वैद के बयान पर किसी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज समूहों या नागरिकों से कोई जवाब नहीं आया है। इससे समस्या को व्यापक आधार मिल सकता था। वैसे आम तौर पर यहां नागरिक सुरक्षा एजेंसियों पर समस्या को अतिरंजित करने का आरोप लगाते हैं। लेकिन राज्य की न्यायपालिका और प्रशासन ने बढ़ते नशीली दवाओं पर चिंता व्यक्त की है।

 

 

20 अगस्त, 2017 को जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को “अन्य राज्यों से एकत्रित अनुभव और नशीली दवाओं के नियंत्रण से संबंधित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों के अनुसार दवाओं के नियंत्रण से संबंधित मुद्दे पर दोबारा गौर करने का निर्देश दिया है।

 

सितंबर 2017 में, मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को खेती और दवाओं की तस्करी में शामिल लोगों के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) सहित सबसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल करने के लिए निर्देशित किया है ( जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति को दो साल तक परीक्षण के बिना हिरासत में लिया जा सकता है। )।

 

 

ड्रग्स आसानी से उपलब्ध, पूरे कश्मीर में होती है अफीम की खेती

 

 

हुसैन कहते हैं, नशे की लत बढ़ने का सबसे महत्वपूर्ण कारण दवाओं की आसान उपलब्धता है।वह कहते हैं, “कुछ ग्रामीण इलाकों में बसें नहीं जाती हैं, लेकिन अफीम पहुंच जाती है। कैनबिस सिगरेट से ज्यादा आसानी से उपलब्ध है। अगर हमें ड्रग्स के प्रचार-प्रसार को रोकना है तो हमें सक्षम पुलिस की जरूरत है।  “

 

आधिकारिक एजेंसियों ने भी इलाके में अफीम और कैनबिस की खेती के फलने-फूलने की पुष्टि की है। राज्य के उत्पाद शुल्क विभाग के एक अधिकारी शमीम अहमद कहते हैं, “कुछ साल पहले, अफीम की खेती कश्मीर के दक्षिणी हिस्सों तक सीमित थी। लेकिन, अफीम की खेती अब क्षेत्र के उत्तरी और मध्य भागों में फैल गई है। ” अहमद उस टीम का नेतृत्व करते है, जो टीम अफीम और कैनबिस फसलों को नष्ट करने का काम करती है।

 

दक्षिणी कश्मीर के कई किसान 1980 के दशक के बाद से, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे आस-पास के राज्यों में तैयार बाजार देखते हुए अपनी आय को बढ़ाने के लिए अफीम का उत्पादन कर रहे हैं। कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने कार्रवाई की है। यहां तक ​​कि फसलों को नष्ट कर दिया गया है, लेकिन वे राज्य में अफीम की खेती को फैलाने से रोक नहीं सके हैं।

 

अहमद और उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने आबकारी विभाग के एक बड़े नेटवर्क का निर्माण किया है। उस नेटवर्क में कई स्वयंसेवक भी हैं। वर्ष 2008 के बाद से दल ने 2,080 एकड़ से अधिक अफीम की फसल और 5,365 एकड़ में कैनबिस फसल को नष्ट किया है।

 

Source: Data collected from Jammu & Kashmir Excise Department

 

लेकिन किसान अन्य फसलों और पेड़ों के बागानों में अफीम या कैनबिस को छिपाने का प्रबंधन करते हैं। वर्ष 2016 में, 180 किलो चरस (कैनबिस संयंत्र के राल से उत्पाद), 546 किगलो फूकी ( अफीम से बना हुआ पाउडर पदार्थ) और 4,161 किलो अफीम का भूरा (अफीम के बाद छोड़ा जाने वाला भूसा अफीम फली से निकाला जाता है) जब्त किया गया था, जैसा कि पुलिस ने दावा किया था। यह जब्त किए गए हेरोइन और ब्राउन शुगर जैसी सिंथेटिक दवाओं के अतिरिक्त है। वर्ष 2016 में, सिंथेटिक दवाओं से जुड़े 550 मामले पंजीकृत हुए थे।

 

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जम्मू और कश्मीर में नशीली दवाओं के जब्ती के दौरान ली गई तस्वीरें, जिसे पुलिस गजट ऑफ क्राइम- 2016 में देखा जा सकता है। यह रिपोर्ट राज्य के गृह विभाग द्वारा जारी की जाती है।

 

यहां नशीली दवाओं का एक रिवर्स व्यापार है – हेरोइन और ब्राउन शुगर, कहीं और प्रयोगशालाओं में तैयार हो रहे हैं और कश्मीर में अपना रास्ता बना रहे हैं।

 

 प्रमुख मनोचिकित्सक मुश्ताक मार्गोब और के एस दत्ता द्वारा 1993 के एक पत्र के मुताबिक, 1980 से 1988 के बीच कश्मीर में मादक पदार्थों की लत के सिर्फ 189 मामले दर्ज थे। लेकिन फिर भी, शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी थी कि ” इससे पहले कि बहुत देर हो जाए इस समस्या को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए । “

 

हुसैन भी उन बच्चों की संख्या से परेशान है, जो साल्वन्ट लत के इलाज की मांग कर रहे हैं। साल्वन्ट के आदी 200 से अधिक बच्चे थे, जिन में से ज्यादातर की उम्र 18 वर्ष से कम थी, जो पिछले दो वर्षों में दो जीएमसी केंद्रों में आए थे।

हुसैन बताते हैं, “सॉल्वैंट्स में सबसे सक्रिय घटक टोल्यूनि है, जो अत्यधिक नशीला है।” टोल्यूनि का उपयोग नियमित रूप से स्थिर सामग्री जैसे कि सुधार द्रव्यों में किया जाता है। छात्र जो सॉल्वेंट युक्त उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें शिक्षकों द्वारा मॉनिटर किया जाना चाहिए।”

 

राजनीतिक अशांति, बढ़ती बेरोजगारी और नशीली दवाओं का उपयोग

 

लगातार संघर्ष, तनाव और ढहते शासन में अक्सर लोग नशे की लत के बढ़ते स्तर तक पहुंच जा सकते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 12 नवंबर, 2016 को मणिपुर की महिलाओं पर एक लेख में बताया था। सिक्किम जैसे अन्य किसी समृद्ध और सुव्यवस्थित राज्य में भी, उच्च बेरोजगारी का स्तर बड़े पैमाने पर मादक पदार्थों की लत का कारण बन सकता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 18 मार्च, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

ये सभी समस्याएं, संघर्ष से बेरोजगारी तक, जम्मू और कश्मीर में प्रचलित हैं। जम्मू और कश्मीर के 2016 आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राजनीतिक और सशस्त्र संघर्ष का राज्य के आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि “संघर्ष ने पर्यटन, बागवानी, हस्तशिल्प और उद्योग जैसे स्थानीय लोगों की आजीविका के महत्वपूर्ण स्रोतों पर असर डाला है। ” कश्मीर में 2016 के अस्थिरता के कारण 8 जुलाई से 30 नवंबर तक होने वाले नुकसान की वजह से 16,000 करोड़ रुपए से अधिक का अनुमान है।

 

सर्वेक्षण कहता है कि, “संघर्ष से जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रति व्यक्ति जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) विकास में कमी आई है। इससे एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) में कमी, निर्यात, व्यापार प्रवाह घट गया है। इससे घरेलू निवेश और बचत कम हो गई है। इसने सुरक्षा व्यय को सार्वजनिक व्यय पुनर्निर्देशित किया है। इसने पर्यटन प्रवाह और पर्यटन प्राप्ति और परिवहन की मांग को कम कर दिया है।” सर्वेक्षण में कहा गया है कि जम्मू और कश्मीर में बेरोजगारी की दर 24.6 फीसदी है (18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में), जबकि इस आयु वर्ग में भारतीय औसत 13.2 फीसदी है।

 

औसतन, कश्मीर घाटी में रहने वाले एक वयस्क व्यक्ति ने अपने जीवनकाल के दौरान 7.7 दर्दनाक घटनाओं का अनुभव किया है, जैसा कि वर्ष 2015 में ‘मेडिसिंस सेन्स फ्रंटियर्स’ के सर्वेक्षण में पाया गया है।

 

सर्वेक्षण में पता चला है कि, संभावित अवसाद के 41 फीसदी प्रदर्शित संकेत, 26 फीसदी संभावित चिंता और 19 फीसदी संभावित पोस्ट-आघातक तनाव विकार ( पीटीएसडी ) के साथ कश्मीर में 1.8 मिलियन वयस्क (45 फीसदी वयस्क आबादी) मानसिक तनाव के लक्षणों का सामना कर रहे हैं।

 

शोधकर्ता और दक्षिण कश्मीर सिविल सोसायटी (एसकेसीएस) के प्रवक्ता, राव फरमान अली कहते हैं, “कश्मीर सतत राजनीतिक संघर्ष,  जिससे अक्सर हिंसा का जन्म होता है, नशीली दवाओं जैसे मुद्दों में फंस गया है। और, संघर्ष के कारण, हमारे सामाजिक और प्रशासनिक संरचना ऐसी समस्याओं को हल करने में असरदार नहीं हैं।  “

 

‘मैं मादक पदार्थों का इस्तेमाल बंद करना चाहता हूं, मैं पढ़ाई करना चाहता हूं!’

 

तीन साल पहले जम्मू और कश्मीर के एक विश्वविद्यालय के कानून छात्र वालिम (पहचान के लिए नाम बदल दिया गया) ने टूटे हुए रिश्ते से निपटने के लिए ड्रग्स लेना शुरु किया था। कभी वकील बनने का सपना देखने वाले वलिम ने आज अपनी डिग्री पूरी नहीं की है, और उसका परिवार संकट में है। उनकी हेरोइन और ब्राउन शुगर जैसी महंगी दवाओं की आदत से उनकी मां की बची-खुची बचत भी समाप्त हो गई है।वलिम का मनोवैज्ञानिकों द्वारा इलाज किया जा रहा है, और उसकी मां को उम्मीद है कि उनका बेटा जल्द ही ठीक हो जाएगा।

 

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श्रीनगर के डल झील में शिकारा पर लगा एक ड्रग्स विरोधी जागरूकता पोस्टर

 

श्रीनगर के डीडीसी में, हमने रुस्तम ( बदला हुआ नाम ) से मुलाकात की। रुस्तम  एक धूमिल और लाल आंखों वाला 15 वर्षीय दुबला-सा लड़का था। उसने बताया कि उसने पांचवी कक्षा से ही ड्रग्स लेना शुरु कर दिया था।

 

रुस्तम की यह कहानी तब शुरु हुई, जब उसका एक दोस्त एक दिन अपने परिवार की अनुपस्थिति में उसे घर ले गया। रुस्तम बताते हैं, “दोस्त ने कुछ चरस निकाला और सिगरेट में डाल दिया। उसने वह सिगरेट आधी पी और आधी मुझे पकड़ा दी। मैं पहले से भी धूम्रपान करना था और मुझे उसे पीने की काफी जिज्ञासा हुई। “

 

रुस्तुम कहता है, “तब से, मैंने नियमित रूप से चरस और कभी-कभी शराब और हेरोइन भी लिए हैं।” लेकिन अब वह ठीक होना चाहता है। वह कहता है, “मुझे पता है कि उसने मेरे माता-पिता को बहुत दर्द दिया है। अब मैं दवाओं को छोड़ना चाहता हूं और पढ़ाई करना चाहता हूं।”

 

रुस्तम के पिता, क्लास फोर सरकारी कर्मचारी हैं। वह कहते हैं , “उनकी पत्नी अपने बेटे की लत से अवसाद में चली गई है। वह अक्सर रात में सोती नहीं है और लगभग दूसरों से बात करना बंद कर दिया है।” बच्चे के डीडीसी में प्रवेश के बाद उन्होंने कुछ ठीक होने के लक्षण दिखाना शुरू किया है।

 

डॉक्टरों का कहना है कि, लेकिन नशीली दवाओं की आदत को दूर करना मुश्किल है। दो साल पहले, डीडीसी में खान और उनके सहयोगियों ने सफलतापूर्वक 35 दिनों के लिए 20 वर्ष के युवा का इलाज किया था। खान बताते हैं, “लेकिन यह देख कर मुझे धक्का पहुंचा कि  कुछ महीने बाद वह पैसे के लिए भीख मांग रहा है। फिर से नशीली दवाओं की लत लग गई थी।”

 

क्यों होती है पुलिस विफल

 

एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर इंडियास्पेंड के साथ बात की और ड्रग्स की समस्या का समाधान करने में पुलिस की विफलता स्वीकार किया । और कानून और व्यवस्था के साथ सेना के व्यस्तता को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा, “क्यों पुलिस नशीली दवाओं के प्रचार-प्रसार को रोकने में सफल नहीं है।”

 

एक गैर सरकारी संगठन, ‘सिविल सोसाइटी फोरम ऑफ कश्मीर’ के जनरल सेक्रेटरी (सीएसएफके), उमर ट्रंबो कहते हैं, “यह एक तथ्य है कि राजनीतिक और सुरक्षा की स्थिति अक्सर बदलती रहती है।

 

पुलिस अक्सर कानून और व्यवस्था के मुद्दों से निपटने में व्यस्त हो जाती है और इससे  नशीली दवाओं के उपयोग के मामले को छोड़ना पड़ता है। “

 

एनडीपीएस अधिनियम में नशीली दवाओं के दुरुपयोग और तस्करी से संबंधित अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है।लेकिन अनिवार्य प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुपालन के कारण एनडीपीएस मामलों में बड़ी संख्या में अपराधियों को बरी कर दिया जाता है।

 

हर जिले में सक्रिय एक विशेष नशीली दवा-विरोधी सेल की जरूरत

 

नाम न बताने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि पुलिस बल को हर जिले में सक्रिय एक विशेष नशीली दवा-विरोधी सेल की जरूरत है। उन्होंने कहा, “इस खतरे को रोकने में कोई प्रगति केवल तभी संभव होगी जब कुछ पुलिस अधिकारियों को नशीली दवाओं की लत और पीडलिंग से निपटने के लिए विशेष रूप से कहा जाता है”।

 

नशीली दवाओं के विक्रेताओं की शीघ्र रिहाई एक और मुद्दा है। अधिकारी ने कहा, “अन्य उत्तर भारतीय राज्यों में एनडीपीएस अधिनियम के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को महीनों तक जमानत नहीं मिलती है। लेकिन यहां कश्मीर में, ऐसे गिरफ्तारियों को 10 दिनों के भीतर रिहा किया जाता है।”

 

सीएसएफके के ट्रांबो ने विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय का सुझाव दिया। ट्रांबो कहते हैं, “हमें उचित शिक्षा, पुनर्वास और सुधारात्मक उपायों की आवश्यकता है। यह रॉकेट विज्ञान नहीं है।”

 

सीएसएफके नशे की लत के खिलाफ काम कर रहे समूह को एक छत के तहत लाने का इरादा रखता है और दवाओं के इस्तेमाल से निपटने के लिए एक निदेशालय के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल और उत्पाद शुल्क विभाग जैसे सभी संबंधित विभागों को एक साथ लाने के लिए सरकार को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया है।

 

 

इंडियास्पेंड द्वारा दिए गए सुझाव
 

  • नशीली दवाओं के संचलन की रोकथाम के लिए, हमें एक प्रभावी दवा नियंत्रण नीति की आवश्यकता है। दवा नियंत्रण विभाग को पर्याप्त स्टाफ की आवश्यकता है, वर्तमान में इसकी कमी है। सामुदायिक संसाधन भी जरूरी हैं: मुश्ताक मार्गोब, जम्मू और कश्मीर के अग्रणी मनोचिकित्सक।
  • लोक सुरक्षा कानून (पीएसए) ( एक कानून जिसके तहत किसी व्यक्ति को दो साल तक परीक्षण के बिना हिरासत में लिया जा सकता है ) सहित कानून के सबसे कड़े प्रावधान का उपयोग खेती और दवाओं की तस्करी में शामिल लोगों के लिए किया जाना चाहिए। कृषि विशेषज्ञों को उन क्षेत्रों में नगदी फसलों को शुरू करने का विचार करना चाहिए जहां किसान कैनबिस पैदा होते हैं: मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने सितंबर 2017 के बयान में कहा था।
  • अगर हमें ड्रग्स के प्रसार को रोकना है तो हमें सख्त पुलिस की जरूरत है और विद्यालय के छात्रों को केवल शिक्षकों की देखरेख में सॉल्वैंट्स वाले उत्पादों का उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए: अर्शद हुसैन, कश्मीर में मनोचिकित्सक।
  • राज्य के प्रत्येक जिले में नशीली दवाओं और मादक पदार्थों की लत के खिलाफ विशेष रूप से पुलिस को काम करना चाहिए। जम्मू एवं कश्मीर पुलिस के एक शीर्ष पुलिस अधिकारी।
  • विभिन्न विभागों के बीच उचित समन्वय होना चाहिए और नशीली दवाओं के नियंत्रण को नियंत्रित करने के लिए एक सुसंगत दृष्टिकोण होना चाहिए। सुधारात्मक और पुनर्वास के उपायों के लिए उचित शिक्षा के माध्यम से नशीली दवाओं के मुद्दे का अध्ययन करने की आवश्यकता है: कश्मीर के सिविल सोसाइटी फोरम के महासचिव उमर ट्रम्बो।

 

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(परवेज श्रीनगर स्थित पत्रकार है।)

 

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 28 नवंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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