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“ जरूरी नहीं कि शौचालय मौजूद हो तो इस्तेमाल भी हो रहा हो ! ”

प्राची सालवे और स्वगाता यदवार,

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नौ राज्यों और 34 जिलों में गैर-लाभकारी संस्था ‘वॉटरएड इंडिया’ ने एक सर्वेक्षण किया और घरों का जयजा लिया। पाया गया कि केवल एक तिहाई घरों तक शौचालय की पहुंच है और 64 परिवार ऐसे मिले, जहां कम से कम एक सदस्य अब भी खुले में शौच जाता है।

 

‘ वाटरएड इंडिया ’ की प्रबंधक नीति अरुंदती मुरलीधरन कहती हैं, “अकेले शौचालय की मौजूदगी, इसका इस्तेमाल होने की गारंटी नहीं देती है। शौचालयों का प्रयोग न करने वाली बाधाओं की पहचान करने और इसका उपयोग करने के प्रोत्साहन के लिए लगातार कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। ”

 

इंडिया स्पेंड के साथ एक ईमेल साक्षात्कार में  उन्होंने भारत भर में हाथ धोने, स्वच्छता और कुपोषण और जागरूकता के बीच के रिश्तों पर विस्तार से चर्चा की है।

 

37 वर्षीय मुरलीधरन के पास सार्वजनिक स्वास्थ्य-चिकित्सा, मासिक धर्म स्वास्थ्य, स्वच्छता प्रबंधन, लिंग और स्वच्छता और यौन प्रजनन स्वास्थ्य में विशेषज्ञता के साथ गुणात्मक शोधकर्ता के रूप में 15 वर्ष का अनुभव है।

 

मुरलीधरन ने‘पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया’के साथ मिलकर स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों, विशेष रूप से लिंग और डब्लूएएसएच पर शोध किया है। गैर सरकारी संगठन ‘सोसायटी फॉर न्यूट्रिशन एजुकेशन एंड हेल्थ एक्शन’जो मुंबई में शहरी झुग्गी बस्तियों में स्वास्थ्य और स्वच्छता पर काम करता है, के साथ भी उन्होंने शोध किया है और मासिक धर्म और मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन पर सार्थक हस्तक्षेप किया है।

 

उन्होंने अपना सार्वजनिक स्वास्थ्य कैरियर ‘मुंबई के पॉपुलेशन सर्विस इंटरनेश्नल’ ( मलेरिया, बाल अस्तित्व, एचआईवी और प्रजनन स्वास्थ्य को लक्षित करने वाले कार्यक्रमों के साथ गैर-लाभकारी वैश्विक स्वास्थ्य संगठन ) के साथ शुरु किया था।

 

मुरलीधरन ‘ बोस्टन विश्वविद्यालय’ से सार्वजनिक स्वास्थ्य में डॉक्टरेट हैं । मुंबई के ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ से उन्होंने सोशल साइंस में मास्टर की डिग्री ली है। उनसे हुई बातचीत के अंश-

 

पिछले 15 वर्षों में विभिन्न स्वच्छता कार्यक्रमों का विश्लेषण करते हुए इंडियास्पेंड ने पाया कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड सबसे बद्तर प्रदर्शन करने वाले राज्य हैं। चूंकि इन क्षेत्रों में ‘ वाटरएड इंडिया ’ काम करती हैं तो आपके अनुसार इस राज्यों के बद्तर प्रदर्शन के पीछे क्या कारण हैं?

 

-सफाई के मामले में इन राज्यों के बदतर प्रदर्शन के कारणों की पहचान की गई है-

* निम्न आधार: जब स्वच्छ भारत मिशन लागू किया गया था, तब ये क्षेत्र शौचालय कवरेज और उपयोग के संदर्भ में पीछे थे… और इसलिए ये कहानी जारी है।

* खराब सामाजिक अवसंरचना

* समग्र कमजोर प्रशासन और कार्यान्वयन तंत्र

* उपयुक्त प्रौद्योगिकियों की कमी। बिहार को एक बाढ़ प्रवण राज्य माना जाता है, लेकिन शौचालय बुनियादी ढ़ाचें और जल स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बाढ़-प्रतिरोधी प्रौद्योगिकियों का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए शायद ही कोई काम किया गया है। और

*कमजोर संस्थागत क्षमता

 

शौचालय के उपयोग से संबंधित सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक शौचालय उपयोग के प्रति मनोवृत्ति को बदलना है। केवल शौचालय की उपस्थिति इसके प्रयोग होने की गारंटी नहीं देता है। इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार कार्यक्रम होने चाहिए और रास्ते की रूकावटों को हटाने का सतत प्रयास भी होने चाहिए।

 

एक कारण और है। शौचालय का उपयोग और रखरखाव तब और मुश्किल है, जब पानी की उपलब्धता और विश्वसनीयता से संबंधित मुद्दों का सामना करना पड़ता है। इन राज्यों को बेहतर बनाने में मदद करने के लिए, शौचालयों का उपयोग न करने के कारणों को हल करने और सुलझाने के लिए हमें स्वच्छता कवरेज को देखने से अलग भी जाना होगा।

 

स्वच्छता कवरेज और शौचालय प्रयोग में सुधार पोषण-संबंधित संकेतकों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन राज्यों में कम कवरेज और शौचालय का उपयोग कम क्यों है, यह समझना और स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाने से इन क्षेत्रों में बच्चों के पोषण संबंधी स्थिति में सुधार हो सकता है।

 

पानी, स्वच्छता और स्वच्छता की स्थिति का आकलन करने के लिए जनवरी से अप्रैल 2016 तक 9 राज्यों में ‘वाटरएड इंडिया’ के मूल्यांकन नीति  में परिवर्तन का प्रस्ताव है।

 

अध्ययन से पता चलता है कि कई जिलों में खुले में शौच अभी भी प्रचलित है। इसके दो कारण साफ हैं- व्यवहार परिवर्तन की कमी और कार्यात्मक सुविधाओं के लिए खराब पहुंच।

 

अध्ययन में स्वच्छता जागरूकता और शिक्षा के मामले में एक बड़ा अंतर भी है। साबुन से हाथ धोने के मामले में हम स्वच्छता के सार्वभौमिक मानकों से पीछे हैं। यहां तक ​​कि ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन और बच्चों के मल के उचित निपटान में भी, हम स्वीकार्य स्तरों से पीछे हैं।

 

हालांकि एसबीएम अलग-अलग स्तर के लिए इनमें से अधिकांश पहलुओं को संबोधित करता है। अध्ययन से उभरते प्रमाण से पता चलता है कि सफल होने के लिए इसके महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण के लिए और उपाय की आवश्यकता है। एक नया सामाजिक आदर्श बनाने की आवश्यकता है, जिसमें खुले शौच एक अस्वीकार्य प्रथा हो और घर के अंदर पर्यावरणीय स्वच्छता महत्वपूर्ण हो।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की धारणाएं और पुरानी प्रथाओं के विश्वास के कारण शौचालय उपयोग पर जोर देने का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जैसा कि ‘रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर  कम्पैशनिट इकोनॉमिक्स’ (राइस) के सह-संस्थापक, डायने कोफी और उनके सहयोगियों ने पाया है। इंडियास्पेंड 13 अगस्त 2017 की रिपोर्ट में भी ऐसी ही बातें कही हैं।

 

कई परिवारों को अपने घरों में शौचालय रखना पसंद नहीं है, क्योंकि वे उन्हें प्रदूषण मानते हैं। इसके अलावा  शौचालयों के निर्माण की लागत को देखकर भी लोग शौचालय का निर्माण करने से कतराते हैं।

 

वॉटरएड की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में सबसे ज्यादा स्टंट बच्चों की संख्या भारत में है। यह संख्या लगभग 4.8 करोड़ है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खुले में मलबा और स्वच्छता की कमी स्टंटिंग के मुख्य कारणों में से हैं। आप इसे किस तरह से देखती हैं?

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, विश्व में 50 फीसदी कुपोषण के मामले  गंदे पानी की वजह से बार-बार होने वाले दस्त या आंत्र कीड़े के संक्रमण से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, दस्त के 88 फीसदी मामलों में हाथ की सही ढंग से साफ-सफाई भी कारण होता है। एक अनुमान के मुताबिक,स्टंटिंग के सभी मामलों में से एक चौथाई जीवन के पहले दो वर्षों में क्रोनिक डायरिया के कारण होती है।

 

जब लोग खुले में शौच करते हैं तो मल मिट्टी और पानी के स्रोतों में प्रवेश करता है, जिसका उपयोग पीने और घरेलू प्रयोजनों के लिए किया जाता है। जब बच्चे शौचालय जाने या खाने से पहले अपने हाथ नहीं धोते हैं और जब उनके भोजन को तैयार करने वाले बड़े या बच्चों को खिलाने वाले शौच के बाद सही ढंग से अपने हाथ नहीं धोते हैं, तो रोगजनक बैक्टिरिया बच्चों के शरीर में प्रवेश करते हैं। बीमारी के एक चक्र की शुरुआत होती है।

 

एक तत्काल और आम परिणाम दस्त है। अन्य हाथ धोने से संबंधित संक्रमणों में आंत्र कीड़ा संक्रमण, मिट्टी-प्रेषित पेट के कीड़े से संक्रमण, शिस्टोसोमासिस और पर्यावरणीय एंटोपाथी शामिल हैं।

 

बार-बार दस्त होने से शरीर के विकास के लिए जरूरी आवश्यक पोषक तत्व नाटकीय रूप से समाप्त हो जाता है। मिट्टी-प्रेषित पेट के कीड़े से संक्रमित बच्चों में एनीमिया, और संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है और ऐसे संक्रमण शरीर को महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूर करते हैं।

 

शिस्टोसोमासिस परजीवी कीड़े शिस्टोसोमस के माध्यम से संक्रमित होता है और इसका मुख्य कारण प्रदूषित जल में पनपे जलीय घोंघे हैं।

 

पर्यावरणीय एन्टोरोपैथी ( मल विषाणुओं के लिए पुराने संपर्क के कारण आंत्र संक्रमणों की स्थिति ) छोटी आंत की परत को बदलता है, जिससे बच्चों द्वारा खाए जाने वाले भोजन से पोषक तत्वों को अवशोषित करने की क्षमता खत्म होती है।

 

ये संक्रमण बच्चों के शरीर में पोषक तत्वों को विकसित करने से रोकते हैं । शारीरिक और संज्ञानात्मक दोनों तरह से। इस तरह के संक्रमण से लड़ने के लिए पोषक तत्वों का उपयोग करने से, बच्चे की प्रतिरक्षा क्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

 

क्रोनिक कुपोषण स्टंटिंग की ओर जाता है, जहां बच्चे शारीरिक रूप से, बौद्धिक और सामाजिक रूप से विकसित नहीं होते हैं।

 

दो वर्ष की उम्र के बाद, स्टंटिंग अपरिवर्तनीय है और इसके दीर्घकालिक कुपरिणाम देखने को मिलते हैं। स्टंट बच्चों का स्कूल में प्रदर्शन उनके गैर स्टंट समकक्षों की तुलना में बद्तर होती है और वयस्क होने पर अपने साथियों से 22 फीसदी कम कमाते हैं।  
 
स्टंटिंग देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है। एशिया और अफ्रीका में कुपोषण की लागत सालाना कुल घरेलू उत्पाद का 11 फीसदी है।

 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (2015-16) के मुताबिक, घरों तक स्वच्छता की पहुंच के संबंध में आंकड़े 2005-06 में 29 से बढ़ कर 2014-15 में 48 फीसदी हुआ है। क्या इससे घरों में स्वच्छता सुविधाओं का ज्यादा उपयोग हुआ है?

 

घर में शौचालय होने और उपयोग के बीच का संबंध जटिल है। यह कई सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों द्वारा संचालित होता है जो शौचालय प्रयोग के प्रति एक व्यक्ति की धारणाएं और व्यवहार को आकार देते हैं।

 

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं द्वारा अधिक शौचालय के उपयोग के साथ हम लिंग के आधार पर अंतर भी देखते हैं।

 

शौचालय का उपयोग महिलाओं के लिए फायदेमंद हो सकता है। उससे उनकी गरिमा की रक्षा भी होती है। ऐसा पुरुषों के साथ नहीं है।

 

शौचालय का इस्तेमाल, कुछ हद तक लोगों की शौचालय प्रौद्योगिकी की धारणा से भी जुड़ा है। उदाहरण के लिए, दो गड्ढे कितनी जल्दी भर सकते हैं, इसकी समझ उपयोग की आवृत्ति के बारे में परिवार के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं। शौचालय का उपयोग और साफ करने के लिए पानी की उपलब्धता भी लोगों की धारणा को बदल सकता है। इससे इस्तेमाल होने की संभावना जुड़ी है। संक्षेप में, शौचालय की मात्र उपस्थिति इसके उपयोग की गारंटी नहीं है।

 

‘वाटरएड’ ने ने हाथ की स्वच्छता और दस्त से होने मौतों पर इसके प्रभाव पर अध्ययन किया है। क्या आप अध्ययन के निष्कर्षों को विस्तार में बता सकती हैं? दस्त को रोकने के लिए हाथ की स्वच्छता पर ध्यान देने की आवश्यकता क्यों है?

 

बच्चे के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है कि समय-समय पर वे साबुन और पानी के साथ हाथ धोएं। हाथ की सफाई मल के माध्यम से रोगों के फैलने से रोकता है। यह एक जरूरी प्राथमिक कार्य है।

 

जब बच्चों की देखभाल करनेवालों के हाथ मल पदार्थ से दूषित होते हैं (शौच के बाद या बच्चे के शौच धोने के बाद हाथ न धोने की वजह से) तो बच्चों के लिए भोजन बनाते वक्त या उन्हें खाना खिलाते वक्त मल के विषाणु बच्चों के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इसका परिणाम दस्त हो सकता है।

 

लगातार दस्त होने से बच्चों का शरीर कमजोर पड़ सकता है । कई बार इसके परिणामस्वरूप मृत्यु तक हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक,  वर्ष 2015 में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का दूसरा प्रमुख कारण दस्त है। वर्ष 2015 में दस्त से हर दिन करीब 321 बच्चों की मौत हुई है।

 

इस प्रकार, दस्त को रोकने के लिए, शौचालय का उपयोग केवल एकमात्र उपाय नहीं है। शौचालय का प्रयोग, पीने के पानी का सुरक्षित संचालन और भंडारण और भोजन तैयार करने से पहले, बच्चों को खिलाने से पहले हाथ धोना भी जरूरी है।

 

‘वाटरएड ’ के अध्ययन में, उसमें मल त्याग के बाद हाथ धोना (99.3 फीसदी) खाना खाने से पहले (91.9 फीसदी) इसके अलावा खाना बनाने से पहले (50.1 फीसदी) और बच्चों की देखभाल के समय खासकर बच्चों को खाना खिलाते वक्त स्वास्थ्यपूरक प्रथाएं चार राज्यों में देखने को मिले थे।

 

ऐसे उत्तरदाता जिनके परिवार में पांच साल से कम उम्र के बच्चे थे, उनका डेटा को देखें तो लगभग 26.3 फीसदी ने बच्चों को खिलाने से पहले हाथ धोया, स्तनपान कराने से पहले 14.7 फीसदी ने, बच्चों के मल का निपटान करने के बाद 16.7 फीसदी ने  और बच्चों के निचले हिस्से को साफ करने के बाद 18.4 फीसदी ने अपने हाथ धोए थे।

 

मल पदार्थ के संपर्क के क्रियाकलापों के लिए पसंदीदा सफाई एजेंट साबुन था। वास्तव में, खुद शौच के बाद हाथ धोने के अनुपात की तुलना में बच्चों के मल के संपर्क में आने के बाद हाथों को साफ करने वाले उत्तरदाताओं का अनुपात ज्यादा था।

 
50 फीसदी उत्तरदाताओं ने भोजन पकाने से पहले हाथ धोया, 31 फीसदी से खाना खिलाने से पहले हाथ धोया

Source: WaterAid India

 

अगर स्वच्छता के व्यवहार पर ध्यान बढ़ाया जाता है तो कितने जीवन को बचाया जा सकता है और कैसे?

 

यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि व्यवहार में स्वच्छता लाने से कितने जीवन बचाए जा सकते है। हम जो जानते हैं वह यह है कि शौचालय प्रयोग से संबंधित प्रमुख स्वच्छता व्यवहार, महत्वपूर्ण समय पर हाथ धोने, पीने के पानी के सुरक्षित भंडारण और सुरक्षित भोजन की तैयारी बच्चों के बीच, विशेष रुप से पांच साल से कम आयु के बच्चों में परिहार्य मृत्यु और बीमारियों को रोकने के प्रयासों में योगदान दे सकती है।

 

स्थिति को सुधारने के लिए हमें व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों के लिए स्वच्छता को व्यवहार में अनिवार्य ढंग से लाना होगा। इस तरह, हम वास्तव में बाल मृत्यु दर और रोगों को रोकने की दिशा में योगदान कर सकते हैं।

 

सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए साल पर पीने के पानी और स्वच्छता मंत्रालय द्वारा दिए गए प्रतिक्रिया के अनुसार, 2016 में सरकार ने स्वच्छ भारत के विज्ञापन पर 1.4 करोड़ रुपये (प्रति दिन) का औसत खर्च किया है। क्या आपको लगता है कि सरकार स्वच्छता संदेश भेजने पर ध्यान दे रही है?

 

सरकार भी जान गई है कि भारत को खुले में शौच मुक्त बनाने के लिए स्वच्छता के व्यवहार में बदलाव महत्वपूर्ण है। इस प्रकार अब तक सबसे पहले यह सुनिश्चित किया गया है कि आवश्यक शौचालय का ढांचा तैयार हो, और इसके परिणामस्वरूप अधिकांश संदेश इस पर केंद्रित है।

 

सिविल सोसाइटी संगठनों,  अनुसंधान संस्थानों और संस्थाओं को न केवल शौचालय के उपयोग और हाथ की स्वच्छता पर स्वच्छता के संदेश में मार्गदर्शन प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है, बल्कि पेयजल के सुरक्षित संचालन, भंडारण और भोजन की स्वच्छता पर भी ध्यान देना है।

 

मजबूत स्वच्छता संदेश विकसित करने के लिए प्रमाण के आधार रेखांकित कर, प्रमुख दर्शकों की पहचान, और विभिन्न दर्शकों के लिए इन स्वच्छता संदेशों के सबसे प्रभावी वितरण तंत्र द्वारा सरकार के चलते प्रयासों में योगदान करने का एक अवसर है।

 

मैं यह भी सुझाव देना चाहती हूं कि संस्थागत सशक्तीकरण और अंतर-क्षेत्रीय कार्रवाई के माध्यम से जागरूकता फैलाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जाना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को स्वच्छता संदेश देने के लिए और वाश और स्वास्थ्य और पोषण के बीच के लिंक पर ज़ोर देना जरूरी है।

 

ज्यादातर प्रयास आज शौचालयों के निर्माण पर है। उदाहरण के लिए, स्वच्छ विद्यालय के अंतर्गत, लगभग 96 फीसदी स्कूलों में शौचालय हैं, लेकिन 28 फीसदी काम में नहीं आ रहे हैं। सरकार, एनजीओ और अंत उपयोगकर्ताओं के लिए शौचालयों का रख-रखाव प्राथमिकता क्यों नहीं है?

 

संचालन और रखरखाव अब तक सबसे आगे नहीं आया है, क्योंकि फोकस मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करने पर है कि बुनियादी ढांचा मौजूद हो। अब जब कि कई विद्यालयों में बुनियादी ढांचे मौजूद हैं, बुनियादी ढांचे को बनाए रखने और निरंतर उपयोग सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

 

वर्ष 2016 की शुरुआत में, ‘वॉटरएड इंडिया’ ने नौ राज्यों के 34 जिलों के 453 स्कूलों में वाश सेवाओं और बुनियादी ढांचे का प्रबंधन, कार्यप्रणाली और उपयोग को समझने और मासिक धर्म के स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) सहित स्वास्थ्य की स्थिति और जागरूकता का पता लगाया था।

 

यह पाया गया कि हाथ पंप 64 फीसदी स्कूलों में पानी का प्राथमिक स्रोत था और यह 61 फीसदी के लिए प्राथमिक पेय जल स्रोत था। इसके बाद सिर्फ 20 फीसदी स्कूलों में पाइप से पानी की आपूर्ति थी।  लगभग 10 फीसदी स्कूलों ने गर्मियों के महीनों के दौरान पानी की कमी की सूचना दी और 15 फीसदी स्कूलों में गंदा या अशुद्ध पानी की सूचना मिली।

 

स्वच्छता के संदर्भ में, शौचालय-छात्र अनुपात स्वच्छ विद्यालय द्वारा प्रस्तावित 40 छात्रों के लिए एक शौचालय इकाई के आदर्श के नीचे है – 76 लड़कों के लिए एक कार्यात्मक शौचालय और और 66 लड़कियों के लिए एक कार्यात्मक शौचालय। 39 फीसदी स्कूलों में, शौचालयों पर ताला लगाया गया था। साक्षात्कार किए गए करीब 15 फीसदी छात्रों ने बताया कि स्कूल के घंटों के दौरान उन्होंने स्कूल के शौचालयों का इस्तेमाल कभी नहीं किया। उन्होंने बताया कि वे खुले में शौच जाते हैं। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन स्कूलों में अपर्याप्त था। 45 फीसदी शिक्षकों ने बताया कि कचरा या तो खेतों में जलाया जाता है या फिर जमा किया जाता है, जबकि 32 फीसदी बताया कि स्कूल परिसर के बाहर कचरा फेंक दिया गया था।

 

(सालवे विश्लेषक और यदवार प्रमुख संवाददाता है। दोनों इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 07 सितंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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