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जलवायु परिवर्तन से 115 भारतीय ज़िलों के कृषि पर अधिक जोखिम

मनुप्रिया,

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बारिश की कमी के कारण, आंशिक रुप से क्षतिग्रस्त फसल एकत्रित करता किसान। पहली बार भारत के 572 ग्रामीण जिलों के सभी 38 मौसम विज्ञान, कृषि और सामाजिक डेटा का विश्लेषण करने वाला एक नया अध्ययन कृषि के लिए एक जलवायु असुरक्षा सूचकांक बनाया गया है। अनुसंधान के बावजूद, देश भर के किसान जलवायु परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हैं।

 

जैसा कि पूर्वी और उत्तरी भारत में बाढ़ तबाही मचा रहा है, 15 राज्यों के 115 ज़िले में जलवायु परिवर्तन से कृषि “अत्यधिक संवेदनशील है”। यह जानकारी इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस जर्नल करंट साइंस में मई 2016 में प्रकाशित हुई एक अध्ययन में सामने आई है।

 

अध्ययन में पहली बार भारत के 572 ग्रामीण जिलों में 38  मौसम विज्ञान, कृषि और सामाजिक डेटा का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन कृषि के लिए एक जलवायु असुरक्षा सूचकांक बनाता है जिसे असुरक्षा की पांच श्रेणियों में विभाजित किया गया है: उच्चतम, उच्च, मध्यम, कम, और सबसे कम।

 

अध्ययन के सह-लेखक आलोक कुमार सिक्का , अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान, नई दिल्ली में भारत के प्रतिनिधि और प्रमुख शोधकर्ता, ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि असुरक्षा सूचकांक का पहले  ही भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा उनके अध्ययन द्वारा पहचान की गई “उच्चतम” या “उच्च” जोखिम जिलों में जलवायु लचीले कृषि पद्धतियों प्रदर्शित करने के लिए उपयोग किया गया है।

 

हालांकि, अध्ययन संभवतः अब तक सबसे अधिक व्यापक है, स्वतंत्र पर्यवेक्षकों कहते हैं कि यह अभी जलवायु परिवर्तन पर स्थानीय निर्णय लेने के लिए सूचित करने के लिए अपर्याप्त हो सकता है।

 

“अत्यधिक संवेदनशील” जिलों में अधिकांश भारत के पश्चिमी और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों से आते हैं। राजस्थान में 25 “अत्यधिक संवेदनशील” जिले हैं जो राष्ट्रस्तर पर इस श्रेणी में सबसे अधिक हैं। अध्ययन कहती है कि गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में ज़िले हैं जो “उच्चतम” और “उच्च” जोखिम श्रेणी में आते हैं।

 

टॉप 10 ज़िले जहां जलवायु परिवर्तन से कृषि को सबसे अधिक खतरा है

Note: Most vulnerable district is marked by the largest bubble, and so on.

 

भारत के पश्चिमी तट, उत्तरी आंध्र प्रदेश और उत्तर पूर्वी राज्य के ज़िलों में कृषि पर जलवायु परिवर्तन का सबसे कम प्रभाव पड़ेगा।  “बहुत कम असुरक्षा” की श्रेणी में आने वाले सबसे अधिक ज़िले – 13 – असम से हैं।

 

नए अध्ययन के 38 संकेतकों को, जिसका  राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल किया गया है, तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है – संवेदनशीलता, जोखिम और अनुकूली क्षमता। कुछ संकेतक जो संवेदनशीलता को परिभाषित करते हैं उनमें अपमानित भूमि, वार्षिक वर्षा, और असुरक्षा चक्रवात या सूखा शामिल है। जोखिम को कुछ संकेतक जैसे कि अधिकतम और न्यूनतम तापमान, गर्मी की लहर या ठंड में लहर आवृत्ति द्वारा परिभाषित किया गया है। अनुकूलन संकेतक में कृषि के क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या, साक्षरता, लैंगिक अंतर, ग्रामीण विद्युतीकरण और पक्की सड़कों आदि शामिल हैं।

 

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क्या है श्रेणी का अर्थ?
 

सूचकांक ज़िलों से संबंधित जोखिम का एक कार्यवाही माप है। शून्य का अर्थ सबसे कम संवेदनशील जबकि एक का अर्थ अति संवेदनशील है। जोखिम ज़िला विशिष्ट है। दो जिलों को अलग अलग कारणों के लिए “बहुत अधिक” असुरक्षित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के बाड़मेर जिले में, जहां जलवायु परिवर्तन के लिए कृषि “उच्च” असुरक्षित है, मुख्य प्रभावित करने वाले कारक जुलाई वर्षा में अनुमानित कमी, कम वर्षा और कम शुद्ध सिंचित क्षेत्र है। कर्नाटक में दावणगेरे के लिए, जो  ” बहुत अधिक” असुरक्षा वाला एक और जिला है, मुख्य कारण अधिकतम तापमान में वृद्धि का अनुमान, कम वर्षा और कम भूजल उपलब्धता है। असुरक्षा सूचकांक की गणना करने के लिए 38 संकेतकों का एक सेट इस्तेमाल किया गया है।

 

 

सूचकांक, एक जिले के संबंधित जोखिम को दर्शाता है। यह 0 से 1 के पैमाने पर दर्शाया जाता है जिसमें 0 का अर्थ सबसे कम जोखिम होता है।

 

सूचकांक में आगे भारत की जलवायु परिवर्तन असुरक्षा में अनुसंधान किया गया है, उस समय जब, जैसे कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2015 में बताया है, मध्य भारत में चरम वर्षा की घटनाएं, मानसून प्रणाली की कोर बढ़ रही हैं और मध्यम वर्षा कम हो रही है – स्थानीय और विश्व मौसम में जटिल परिवर्तन के भाग के रूप में।

 

जलवायु परिवर्तन एक जटिल विषय है, अनुकूलन जारी रखने के लिए है शोध की आवश्यकता

 

यह पहली बार नहीं है जब वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि पर होने वाले जोखिम की गणना करने की कोशिश नहीं की है (कुछ पिछले अध्ययन यहां, यहां और यहां हैं।) लेकिन इन्हें स्थानीय किया गया है।

 

इस तरह के सूचकांक रणनीति तैयार करने में और यहां तक कि जलवायु अनुकूल कृषि के लिए नीति तैयार करने में मदद करने की क्षमता रखता है। एक अच्छे जोखिम मूल्यांकन को “अनुकूलन के लिए विकल्पों की पहचान करने में मदद” करना चाहिए।

 

सी ए रामा राव , अध्ययन सह-लेखक और सेंट्रल रिसर्च इंस्ट्टयूट फॉर ड्राय लैंड एग्रिकल्चर, हैदराबाद के साथ कृषि अर्थशास्त्री, कहते हैं, “हमारे अध्ययन ने संकेतकों के संदर्भ में बदलते हुए मौसम को प्रतिबिंबित करने के लिए चुना है जैसे कि वर्षा में परिवर्तन, तापमान आदि, जो अनुकूलन अनुसंधान के क्षेत्र में वास्तविक उपयोग के हैं।”

 

Climate Change & Indian Agriculture

A May 2016 study, published in Indian Academy of Science’s journal Current Science, analysed 38 meteorological, agricultural and social data across all of India’s 572 rural districts, and created a climate vulnerability index for agriculture. The factors are subdivided into three categories–-sensitivity, exposure and adaptive capacity. The maps above show how the districts ranked on these three broad categories.

 

लेकिन जलवायु परिवर्तन असुरक्षा आकलन करने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि नए अध्ययन द्वारा इस्तेमाल किए गए व्यापक डेटासेट जलवायु परिवर्तन पर नीति को सूचित करने के लिए अपर्याप्त हो सकता है।

 

रवि खेत्रपाल, सेंटर फॉर एग्रिकल्चर एंड बायोसाइंसेज इंटरनेशनल (दक्षिण एशिया), कृषि पर केंद्रित एक गैर सरकारी संस्था , कहते हैं सूचकांक का “बड़ी सावधानी ‘के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि, “समान संदर्भ अवधि के लिए सभी चर / संकेतकों पर आंकड़ा नहीं प्राप्त किया गया है।” उन्होंने यह भी कहा डेटा “समय के एक उचित अवधि के लिए एकत्र नहीं किया गया है, एक दोष जो लेखक पत्र में स्वीकार करते हैं।

 

दिव्या मोहन, विज्ञान नीति अधिकारी, स्विस एजेंसी फॉर डेवल्पमेंट एंड कोपरेशन, कहते हैं, “हालांकि जोखिम का एक स्नैपशॉट प्रदान करने के लिए, जिला स्तर विश्लेषण अच्छा है, प्रवृत्तियों मान्य के लिए सूक्ष्म स्तर पर और अधिक डेटा की आवश्यकता है।”

 

भारत में जलवायु अनुरूप कृषि पर ध्यान देना शुरु

 

नवंबर 2015 की विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगले 15 वर्षों में 45 मिलियन भारतीयों को अत्यधिक गरीबी की ओर धकेलते हुए जलवायु परिवर्तन प्रभावी ढंग से भारत की आर्थिक प्रगति को निष्फल कर सकता है। रिपोर्ट अधिक जलवायु प्रतिरोधी फसलों और कृषि उत्पादकता में गिरावट की भविष्यवाणी का मुकाबला करने के लिए पशुधन का उपयोग करने की सिफारिश करता है।

 

करंट साइंस अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु अनुरूप कृषि पर अब शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं द्वारा ध्यान दिया जा रहा है।

 

असुरक्षा सूचकांक पेपर, 2011 की केंद्र सरकार एनआईसीआरए (जलवायु अनुरूप कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार) नामक कार्यक्रम का परिणाम है, जो विभिन्न कृषि उप-क्षेत्रों, जैसे कि फसलों, बागवानी फसलों, पशुधन और मत्स्य पालन, में 40 आईसीएआर संस्थानों के बीच साझेदारी के अनुसंधान को सक्षम बनाता है।

 

अनुसंधान के बावजूद, देश भर में किसान जलवायु परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हैं। खेत्रपाल कहते हैं, “हमें आईसीएआर को ध्यवाद देना चाहिए कि हम अनुसंधान के मामले में अच्छा कर रहे हैं लेकिन राज्य सरकारों द्वारा विस्तार और विकास कार्यक्रमों के मामले में पर्याप्त नहीं है।”

 

असुरक्षा सूचकांक में अपने दोष हो सकते है, लेकिन संभवतः वर्तमान में केवल यही उपकरण उपलब्ध है जो जलवायु बदलाव पर भारतीय कृषि की संवेदनशीलता का आकलन करता है। किसानों को प्रभावित करने के लिए इसका इस्तेमाल किस प्रकार होगा यह और बात है।

 

(मनुप्रिया बैंगलुरु स्थिति स्वतंत्र विज्ञान लेखिका हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 03 अगस्त 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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