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जहाँ एक ओर किसान आत्महत्या कर रहे, यू.पी. मौतें छुपा रहा

भास्कर त्रिपाठी और सौम्या तिवारी,

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कड़ोरे कुशवाहा की बैंक पासबुक। उत्तर प्रदेश के गेहूं के 56 वर्षीय गेहूं किसान कड़ोरे ने चार साल से बकाया 41,000 रुपये से ज्यादा के क़र्ज़ और लगातार बर्बाद होती फसल से परेशान होकर, आत्महत्या कर ली। स्थानीय प्रशासन जिसने कड़ोरे के घर उसकी मौत की जाँच के लिए एक अधिकारी तक नहीं भेजा, यह मानने से इनकार कर रहा है कि उसने फसल बर्बादी के चलते आत्महत्या की। प्रशासन आत्महत्या का कारण शराब और बीमारी को बता रहा है।
फोटो: भास्कर त्रिपाठी, गाँव कनेक्शन

 

रजवाड़ा (ललितपुर), उत्तर प्रदेश। पिछले महीने जब बारिश उनकी फसल को बर्बाद कर रही थी, कड़ोरे कुशवाहा की पूरी रात चिंता में कटी। अगले दिन जब बारिश रुकी तो वे खेत में अपनी गेहूं की फसल का मुआएना करने निकल गए।

 

परिवार वालों के अनुसार खेत से लौटकर कड़ोरे ने सीधे बाज़ार जाकर ‘‘सल्फास की टिकिया’’ खरीदी और घर लौटकर खा लिया।

 

कड़ोरे (56 वर्ष) को अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन एलुमिनियम फोस्फाइड के ज़हर के चलते 19 मार्च की शाम उनकी मौत हो गयी। सलफास का वैज्ञानिक नाम एलुमिनियम फोस्फाइड होता है- जो भारत के सबसे पिछड़े 250 ज़िलों में से एक ललितपुर में आत्महत्या के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

 

परिवार के अनुसार कड़ोरे मानसिक रूप से तनाव में थे। तीन दिन पहले ही लोक अदालत से बैंक द्वारा उन्हें नोटिस भिजवाई गयी थी। इस नोटिस में उन्हें क़र्ज़ के ‘41,415 रुपए + ब्याज’ तुरंत  भुगतने की चेतावनी दी गयी थी।

 

लगातार आपदाओं से फसल नुकसान के चलते वे पिछले लगभग चार वर्षों से इस कर्ज में फंसे थे।

 

ललितपुर जि़ला मुख्यालय के उत्तर में लगभग पांच किमी दूर राजवाड़ा गाँव के कड़ोरे कुशवाहा का दाह संस्कार 20 मार्च को किया गया। स्थानीय अखबारों ने कड़ोरे की आत्महत्या को प्रमुखता से छापा। लेकिन 27 मार्च को रिपोर्टर के पहुँचने तक भी कड़ोरे के घर कोई भी अधिकारी नहीं पहुंचा था- जिसका मतलब हुआ की कड़ोरे की मौत को दर्ज नहीं किया गया.

 

कड़ोरे अकेले ऐसे किसान नहीं जिनकी मृत्यु देश के सबसे बड़े राज्य के प्रशासन द्वारा नज़रअंदाज कर दी गई। किसान नेता और ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे गैर सरकारी संगठनों ने ललितपुर और हमीरपुर में दर्जनों किसानों की अकाल मौतों का दावा किया। ये दोनों ही जिले प्रदेश के दक्षिण-पूर्व भाग में बुन्देलखंड क्षेत्र में स्थिति हैं।

 

सरकार के मुताबिक बे-मौसम बारिश और ओलावृष्टि से 2014 और 2013 में बर्बाद हुए इन दोनों ज़िलों के साथ अन्य 10 ज़िलों में भी, क़र्ज़ और फसल नुकसान से किसी भी किसान की मौत नहीं हुई। यह खबर लिखे जाने के दौरान मौसम फिर करवट ले रहा है, जिससे नुकसान और भी बढ़ सकता है।

 

अधिकारी भेजे गए- पर मृतकों के घरों तक नहीं पहुंचे

 

मार्च 27 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिलाधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देशित किया कि किसी भी किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर मिलने पर तत्काल मौके पर जाकर आत्महत्या के वास्तविक कारणों की जानकारी वे हासिल करें।

 

”कहां है अधिकारी? ” सरकारी बेरुखी से नाराज़ मृतक कड़ोरे के बेटे पुरुषोत्तम कुशवाहा (29 वर्ष) ने पूछा। ”कोई नहीं आया अभी तक, लेखपाल तक भी नहीं।” पुरुषोत्तम और उनका छोटा भी विजय (25 वर्ष) खेती छोड़ अब मजदूरी करते हैं।

 

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कडोरे कुशवाहा के दो बेटे हैं, पुरुषोत्तम (29) और विजय (25)। उत्तर प्रदेश के गेहूं के किसान कड़ोरे ने चार साल से बकाया क़र्ज़ और लगातार बर्बाद होती फसल से परेशान होकर, ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली। दोनों ही बेटों ने किसानी छोड़ दी है और अब मजदूरी करते हैं।
फोटो :भास्कर त्रिपाठी, गाँव कनेक्शन

 

ललितपुर जिले में ग्रामीण स्तर पर कार्य करने वाली संस्था ‘सांई ज्योति संस्थान’ उन चार किसनों के घर पहुंची जिन्होंने फसल बर्बादी के चलते आत्महत्या कर ली। संस्थान के कार्यकर्ता निसार खान ने बताया, ”इससे ज्यादा ही मौते हुई हैं, हम अभी लगातार सर्वे कर रहे हैं।”

 

निसार ने बताया कि पिछली रबी की फसल में भी ओलावृष्टि से ललितपुर में काफी फसल बर्बाद हुई थी जिसके बाद 40 से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली थी। ”हमारे पास इन सभी किसानों का पूरा ब्यौरा है। लेकिन सरकारी आंकड़ों में कहीं भी इन मौतों का जि़क्र नहीं है।”

 

दरअसल किसानों की आत्महत्याओं के लिए देश में सबसे ज्यादा कुख्यात महाराष्ट्र के विदर्भ के बाद, सात ज़िलों- झांसी, चित्रकूट, बांदा, महोबा, ललितपुर, हमीरपुर और जालौन को मिलाकर बना बुंदेलखण्ड- किसानों की आत्महत्याओं के नए गढ़ के तौर पर सामने आया है। हालांकी उत्तर प्रदेश सरकार इन मौतों को आत्महत्या नहीं मानती।

 

मैगेसेसे सम्मान पा चुके देश के वरिष्ठ पत्रकार पी.साईंनाथ के अनुसार पिछले बीस वर्षों में- वर्ष 1991 से 2011 तक देशभर में करीब 1.5 करोड़ किसानों ने फसल के नुकसान और क़र्ज़ से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। साईंनाथ ने राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के दो दशकों के आंकड़ों का अध्ययन किया है।

 

सरकारी आंकड़ों और अख़बारों में छपी ख़बरों के आधार पर पिछले पांच सालों में बुंदेलखंड में लगभग 3,000 किसानों ने आत्महत्या कर ली। इन मौतों का प्रमुख रहीं बैंक से लिए कृषि ऋण की शर्तें। ऐसी शर्तें जो महानगरों में मध्यमवर्गीय परिवारों को दिए जाने वाले गृह ऋण से भी ज्यादा मुश्किल है। ‘इंडिया स्पेंड’ ने अक्टूबर 2014 की अपनी रिपोर्ट में इन शर्तों का ज़िक्र किया था।

 

यदि सिर्फ सरकारी आंकड़ों को ही आधार माने तो किसानों के लिए एक आपात स्थिति दिखती है।  वो भी एक ऐसे देश जहाँ 1.3 बिलियन जनसँख्या में से 118.9 मिलियन लोग कृषि पर निर्भर हों।यदि इसमें परिवारों को सम्मिलित करें तो यहां आंकड़ा ६०० मिलियन के पर हो जाता है|

 

भारत में किसानों की आत्महत्याओं के आधिकारिक आंकड़े (2013)

 

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Source: NCRB (National Crime Records Bureau)

 

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2013 की रिपोर्ट के अनुसार किसान आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र (3146 मामले), आन्ध्र प्रदेश (तेलंगाना के साथ, 2014 मामले) और उत्तर प्रदेश (750 मामले) जैसे राज्यों में हुईं। एनसीआरबी केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आधीन एक संस्था है जो राज्यों से अपराध के  आंकड़े जुटाती है।

 

क्यों भ्रामक लगते हैं किसान आत्महत्याओं के यूपी के आंकड़े

 

इंडिया स्पेंड ने जैसा की पिछले महीने ही रिपोर्ट किया था कि यूपी में अपराध के आंकड़ों को छुपाया जाता है। किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े भी इसी का शिकार हैं।

 

इसका कारण ये है।

 

एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 20 करोड़ जनसँख्या वाले उत्तर प्रदेश में वर्ष 2013 में 14.2 प्रतिशत की दर से 750 किसानों ने आत्महत्याएं की। लेकिन यूपी से ढाई गुना कम जनसँख्या वाले राज्य मध्य प्रदेश में, यूपी के मुकाबले 2.7 प्रतिशत इकाई की कम दर होने के बावजूद भी यूपी से 340 ज्यादा किसानों ने खुदखुशी की।

 

आंकड़ों के इस परस्पर विरोध, और ज़मीनी तथ्यों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में बहुत से किसानों की आत्महत्याएं दस्तावेजों में अपनी जगह नहीं बना पातीं।

 

हालांकि जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन को हर किसान की मृत्यु की जानकारी होती है, पर वे उसे जानबूझकर दर्ज नहीं करते।

 

पुरानी बीमारियाँ, शराब पीना – मौत का कारण : अधिकारी

 

‘बुंदेलखण्ड किसान पंचायत’ के प्रमुख गौरी शंकर बिधुआ ने भी बुंदलेखण्ड के सभी जि़लों के प्रशासन पर किसानों की मौतों को नज़रअंदाज़ करने की बात कही। उन्होंने बताया, ”हमारे सर्वे के अनुसार झांसी, बांदा, हमीरपुर, जालौन और ललितपुर में ही अब तक (27 मार्च तक) 62 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।”

 

अधिकारी इन मौतों का कारण फसल की बर्बादी और क़र्ज़ ना मानकर अन्य वजहें बता रहे हैं।  झांसी के जिलाधिकारी अनुराग यादव ने कहा कि किसानों की सभी मौतों की सूचना उनके पास है। लेकिन जाँच में मौत का कारण फसल ख़राब होना नहीं पाया गया।

 

“पुरानी बीमारी, शराब की लत जैसे कारण सामने आ रहे हैं”, अनुराग ने कहा।

 

“हम इन तथ्यों को लेकर सरकारों से लड़ते रहे लेकिन कभी नहीं माना गया की ये किसान कर्ज से मरे।” बिधुआ ने बताया। “रबी की फसल पर मौसम की जो मार पड़ी है उसने किसानों को मानसिक रूप से तोड़ दिया है।”

 

इस बार स्थिति इसलिए और भी बिगड़ी क्योंकि बुंदेलखंड के सभी जिलों में पिछली खरीफ की फसल के दौरान सूखा पड़ गया। साथ ही साथ पिछली 2013-14 की रबी की फसल के दौरान भी ओलावृष्टि से बुंदेलखंड में भारी मात्र में फसल चौपट हो गयी थी।

 

सरकार भी इस बात को अब मानने लगी है कि बुंदेलखंड के किसानों के सामने आपात स्थिति उत्पन्न हो गयी है।

 

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उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के रजवाड़ा गाँव के किसान देव जू (90) अपने चार एकड़ में बर्बाद हो चुकी गेंहू की फसल के अवशेषों के बीच बैठे हुए। पूरी फसल बे-मौसम बरसात और ओलावृष्टि से खराब हो गई।
फोटो :भास्कर त्रिपाठी, गाँव कनेक्शन

 

बुंदेलखंड की रबी की फसल की स्थिति

 

बोई गयी फसलों के रकबे के आधार पर स्थिति अच्छी दिखती है, पर मुख्य फसलों में गिरावट स्थानीय समस्याओं की ओर इशारा करती है। ये गिरावट किसानों की कुड़की और आत्महत्याओं का मुख कारण बन सकती है।

 

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Source: Directorate of Agriculture, Uttar Pradesh

 

कृषि निदेशालय से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखण्ड के सातों जि़लों में गेहूं 88.19 लाख हैक्टेयर और दलहन (चना, मटर और मसूर) की फसल 92.2 लाख हैक्टेयर रकबे में बोई गयी थी।

 

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उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में बे-मौसम बरसात और ओलावृष्टि से खराब हुए गेहूं की कटाई से सड़े हुए दाने निकल रहे हैं।फोटो:भास्कर त्रिपाठी, गाँव कनेक्शन

 

मार्च 26  को बजट सत्र के दौरान विधानसभा में एक प्रश्न का जवाब देते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्मंत्री अखिलेश यादव ने ये स्वीकारा है कि बे-मौसम बारिश और ओलावृष्टि से सबसे ज्यादा नुकसान बुंदेलखंड को हुआ है।

 

हालांकि, उनकी सरकार, ये नहीं मानेगी की इस नुकसान ने कड़ोरे जैसे किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया।

 

(त्रिपाठी, लखनऊ से प्रकाशित ग्रामीण अखबार गाँव कनेक्शन के वरिष्ठ संवाददाता हैं। तिवारी इंडिया स्पेंड की विश्लेषक हैं)

 

इस लेख में अतिरिक्त जानकारी संकलित की गयी है|

 
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