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जाति नेटवर्क से भारत के ग्रामीण सड़क कार्यक्रम में फैला भ्रष्टाचार

चारु बाहरी,

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एक नए अध्ययन से पता चला है कि ग्रामीण सड़क निर्माण कार्यक्रम में 3,592 करोड़ रुपये के मूल्य के निर्माण कार्य में विधायकों के अनुचित सांठ-गांठ का पता चला है।जब विधायकों और जिला कलेक्टरों ने एक ही उपनाम साझा किया, तब उसी उपनाम के ठेकेदार को कांट्रैक्ट मिलने संभावना अधिक थी। इन सड़कों का निर्माण 7 से 12 फीसदी अधिक महंगा था और 497 उदाहरणों में, संभवतः  निर्माण नहीं किया गया था।

 

2001 से 2013 के बीच, राज्यों के कानून निर्माताओं ने अपनी जाति के ठेकेदारों को अनुचित तरीके से 3,592 करोड़ रुपए ( 540 मिलियन डॉलर ) के मूल्य के ग्रामीण सड़क निर्माण का ठेका दिया है। यह जानकारी अमरीका के प्रिंसटन यूनिवर्सिटी द्वारा जर्नल ऑफ डिवेलपमेंट इकोनॉमिक्स में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में सामने आई है।

 

कांट्रैक्ट का मूल्य प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) पर कुल खर्च का 4 फीसदी था। अध्ययन में पाया गया कि अनुचित रुप से दिए गए कांट्रैक्ट का परिणाम अक्सर सड़क निर्माण अधिक महंगा होने के रुप में आया है। 2011 के जनगणना रिकॉर्ड के आधार पर इनमें से सैंकड़ों सड़कों का निर्माण नहीं किया गया है, जिससे कई लोगों की सड़क तक पहुंच नहीं बन पाई है।

 

प्रिंसटन के शोधकर्ताओं ने करीब 88,020 ग्रामीण सड़कों की परियोजनाओं का मूल्यांकन किया, जो राज्य चुनावों के ठीक पहले और बाद में उन ठेकेदारों को दिए गए, जिनके उपनाम विधानसभा के वर्तमान सदस्यों के उपनाम से मेल खाते थे।

 

प्रिंसटन विश्वविद्यालय के वुडरो विल्सन स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स के अध्ययन और प्रोफेसर के सह-लेखक जैकब एन. शापिरो ने इंडियास्पेंड से बातचीत में कहा, “विधायकों और ठेकेदारों के बीच उपनाम या आकिरी नाम को लेकर निकटता इस भरोसे पर था कि आगे इसका फायदा होगा, क्योंकि वे दोनों “एक ही क्षेत्र (राज्य, जिला या निर्वाचन क्षेत्र) या भाषाई क्षेत्र होते हैं। “

 

इस रिश्ते के पीछे पारिवारिक निकटता मायने नहीं रखती। एक क्षेत्र या एक भाषा या एक जाति का होने के कारण ठेकेदारों को विधायकों से संपर्क करने में आसानी होती है और विधायक भी इसे इसी रूप में देखते हैं।

 

अगर सचमुच विधायकों ने आबंटन को प्रभावित नहीं किया था तो एक मॉडल के रूप में शोधकर्ताओं ने एमएलए के उपनाम से मिलते-जुलते उपनाम वाले ठेकेदारों को आवंटित लगभग 2,200 सड़कें ही देखने को मिलती। लेकिन वास्तव में, वहां 4,127 थे-लगभग 1,900 ज्यादा। अनिवार्य रूप से, ठेकेदारों का हिस्सा जिनके नाम निकट चुनाव में विजयी राजनेता से मेल खाते थे, चुनाव से पहले यह 4 फीसदी था, जो बढ़कर बाद में 7 फीसदी तक हुआ है, जो अपने निर्वाचन क्षेत्र में सड़कों के आवंटन में हस्तक्षेप करने के लिए विधायक की शक्ति को अपनी ताकत मानता है। जबकि पीएमजीएसवाई में विधायकों की कोई आधिकारिक भूमिका नहीं है।

 

शोधकर्ताओं ने उन चुनावों को छोड़ दिया जहां जीतने और हारने वाले विधायक के नाम समान हैं, और तमिलनाडु के चुनाव भी शामिल नहीं किए गए, जहां उपनाम आमतौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

 

पीएमजीएसवाई परियोजनाओं के आवंटन में यह पक्षपात के संबंध में पहले बताया गया है। 2013 में, उत्तराखंड में विजय बहुगुणा सरकार द्वारा प्रदान किए गए 113 मेगा रोड निर्माण परियोजनाओं में, 75 कॉन्ट्रैक्ट्स को एकल-बोली के आधार पर अच्छी तरह से जुड़े लोगों को प्रदान किया गया था। कॉन्ट्रैक्स पाने वाले में से एक के बारे में कहा गया कि वह राज्य ग्रामीण विकास मंत्री प्रीतम सिंह का साला है।

 

शापिरो के अध्ययन के अनुसार, कुमार, लाल, पटेल, राम, रेड्डी, सिंह और यादव के उपनामों के साथ विधायकों की भ्रष्ट व्यवहार में शामिल होने की संभावना है।

 

इंडियास्पेंड ने पीएमजीएसवाई के एक ऐसे उपनाम वाले ठेकेदार से बात की जो पहचान बताने की इच्छा नहीं रखते थे। जब पूछा गया कि क्या पीएमजीएसवाई परियोजना पाने के लिए स्थानीय विधायक को रिश्वत देनी पड़ती है, तो उन्होंने कहा,  “हम विधायक को रिश्वत देते हैं, लेकिन सिस्टम में हर कोई, जिसमें स्थानीय पत्रकार भी शामिल है, जो यह देखता है कि वह क्या चल रहा है, उसे एक शेयर की उम्मीद है और उसे प्राप्त होता है।”

 

जब इंडियास्पेंड ने शापिरो के निष्कर्षों के बारे में ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक प्रतिनिधि से पूछा तो उन्होंने मिलीभगत के आरोपों का खंडन करते हुए कहा, ” राष्ट्रीय और राज्य स्तर की गुणवत्ता की जांच के लिए पीएमजीएसवाई के तहत बनाए गए सड़कों के लिए एक प्रणाली है ।”

 

भ्रष्टाचार जरूरी सेवाओं की गति को रोकता है, असमानता को बढ़ाता है

 

2000 में पीएमजीएसवाई शुरू करने से पहले, भारत के 825,000 गांवों में से 40 फीसदी गांवों में सभी मौसमों में बाजारों, नौकरियों और सार्वजनिक सेवाओं जैसे कि स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच के लिए सड़कों की कमी थी।

 

इस कार्यक्रम का उद्देश्य 2003 तक 1,000 से अधिक लोगों के साथ गांवों के लिए इस अंतर को भरना है, और 2007 तक 500 से अधिक लोगों की बस्तियों के लिए, आखिरकार सभी 178,184 बस्तियों तक पहुंचना है।

 

दिसंबर 2017 तक, पीएमजीएसवाई के तहत 130, 974 बस्तियों को जोड़ा गया था और अन्य 14,620 राज्य सरकार के कार्यक्रमों के माध्यम से जुड़ा हुआ था, ताकि कुल योग्य बस्तियों का 82 फीसदी जुड़ा हो।

 

शापिरो ने कहा कि यह बड़ी वृद्धि के लाभ के साथ एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन इस कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से कुछ अनुचित प्रभाव हैं। इसका मतलब है कि लाभ जितना बड़ा हो सकता था उतना नहीं हुआ।

 

राजनीतिक रूप से जुड़े ठेकेदारों द्वारा बनाई गई सड़कों का निर्माण लगभग 10 फीसदी अधिक महंगा था या फिर गुणवत्ता बद्तर थी। संभवत: निर्माण ठीक तरह से नहीं किया गया था। इससे बड़ी संख्या में लोगों को सड़क तक पहुंचने में बाधा रही, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

 

नमूना भर में, उन्होंने पाया कि पीएमजीएसवाई मॉनिटरिंग डेटा में भुगतान किए गए और पूर्ण रुप से समाप्त हुए सड़कों के रुप में सूचिबद्ध 2011 की जनगणना के सभी मौसमी सड़कों के आंकड़ों में गायब थे। यह संकेत देते हैं कि इन सड़कों का निर्माण कभी नहीं किया गया था। इन लापता सड़कों ने 857,000 लोगों को व्यापक भारतीय अर्थव्यवस्था से कम से कम आंशिक रूप से दूर रखा है।

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अध्ययन के निष्कर्षों के बारे में इंडियास्पेंड के सवाल के जवाब में ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा, “लापता सड़क का कोई सवाल ही नहीं है।” हालांकि, मंत्रालय ने लापता सड़कों के कुछ उदाहरणों का अनुरोध किया। सह-शोधकर्ता जैकब शापिरो ने इंडियास्पेंड को तीन उदाहरण प्रदान किए, जो मंत्रालय के साथ साझा किए गए थे। जवाब में, मंत्रालय ने इस तस्वीर को एक लापता सड़कों के निर्माण के प्रमाण के रूप में साझा किया है। यह परियोजना पूर्णता अंकन पत्थर 18 जनवरी 2004 को सड़क के पूरा होने की तारीख बताता है। जबकि अध्ययन डेटा में इस सड़क के प्रवेश को पूरा करने की तिथि के रूप में 22 दिसंबर 2005 को निर्धारित किया गया है। इंडियास्पेंड के अनुरोध के बावजूद मंत्रालय ने अन्य दो उदाहरणों के निर्माण के समर्थन में कोई तस्वीर नहीं दी।

 

अप्रैल, 2010 से मार्च, 2015 की अवधि के लिए भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने 2016 के एक निष्पादन लेखापरीक्षा में एक समान निष्कर्ष निकाला था। 7, 735 करोड़ रुपये की लागत के 4,417 कार्यों के कैग के नमूने में ( इस अवधि के दौरान खर्च किए 63,878 करोड़ रुपये का 12 फीसदी ) 19 राज्यों ने असंबद्ध बस्तियों जुड़ा हुआ दिखाया है, जबकि सड़क परियोजनाओं से योग्य बस्तियों को छोड़ा गया है। नौ राज्यों ने पहले से ही जुड़े हुए बस्तियों को जोड़ने के लिए सड़कों का निर्माण किया था और सात राज्यों ने 73 सड़कों का काम पूरा दिखाया है, हालांकि उन्होंने लक्षित क्षेत्रों को पूरी तरह कनेक्टिविटी प्रदान नहीं की थी।

 

अधिमान्य आवंटन छोटी कंपनियों या पहली बार ठेकेदारों के पक्ष में नहीं था, जैसा कि शापिरो के अध्ययन में पाया गया, जो अप्रत्याशित नहीं है।

 

भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर नजर रखने वाली ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया’ के कार्यकारी निदेशक राम नाथ झा ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “जब कोई अच्छा नेटवर्क सड़क निर्माण अनुबंध प्राप्त करने के लिए क्वालीफाय हो जाता है, तो इस व्यापार के अवसरों को कम करने वाले एक कम विशेषाधिकार प्राप्त परिवार से एक असंबद्ध ठेकेदार की संभावना कम होती है। यह एक और उदाहरण है कि कैसे भ्रष्टाचार गरीबी और असमानता बनाए रखता है।”

 

भारत में भ्रष्टाचार मोटे तौर पर अवसरवादिता और लालच से प्रेरित

 

शापिरो और उनके सह-शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि पीएमजीएसवाई में भ्रष्टाचार करने वाले वे अवसरवादी थे। आम धारणा के विपरीत, चुनाव में जीतने वाले राजनेताओं ने जिन कारोबारियों की मदद की,, उन कारोबारियों ने उन्हीं को वोट दिया हो, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता।

 

इसके बजाय, उन्हें पता चला कि रिश्तेदारी नेटवर्क में भ्रष्टाचार उत्पन्न हुआ क्योंकि इन्हें जोखिम भरा संकीर्ण व्यवहार में संलग्न होने के लिए विश्वास प्रदान किया गया था। शापिरो ने समझाया “एक परिवार या जाति के नेटवर्क के सदस्यों को भरोसेमंद, कम से कम जोखिम भरा सहयोगियों के रूप में देखा जाता है।”

 

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के झा ने सहमति व्यक्त की, “हमने देखा है कि जो लोग भ्रष्टाचार में शामिल हो गए हैं, वे मिलकर काम करते हैं, वे खुद के बीच एक अच्छा नेटवर्क बनाते हैं।”

 

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा दिसंबर 2017 के सर्वेक्षण में, 11 राज्यों के 34,696 उत्तरदाताओं में से 45 फीसदी ने कहा कि उन्होंने पिछले एक साल में कम से कम एक बार रिश्वत का भुगतान किया था। झा ने बताया कि,  “लोगों ने भुगतान किया क्योंकि उनका मानना ​​है कि ऐसा न करने से या तो उनके काम में देरी होगी या कभी नहीं किया जाएगा।”

 

झा ने बताया कि, “दूसरी तरफ, भ्रष्ट सार्वजनिक कर्मचारी लालच से प्रेरित होते हैं, वे लेने के लिए तैयार होते हैं और जो आधिकारिक रुप से उनका नहीं है, उसका आनंद लेते हैं।”

 

झा बताते हैं, “भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों से भ्रस्टाचार करने वाले डरते नहीं, और इसका कारण भ्रष्टाचार-संबंधित अपराधों के लिए सजा में 25 वर्ष तक विलंब होना या कम सजा मिलना है।

 

नौकरशाह-राजनीतिज्ञों के गठजोड़ को तोड़ना, बारीकी से निगरानी और नेताओं को जवाबदेह बनाना जरुरी

 

भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए पहला कदम यह है कि स्वीकार करना है कि भ्रष्टाचार मौजूद है।

 

ग्रामीण विकास स्रोतों के मंत्रालय ने कहा, “किसी लापता सड़क का कोई सवाल ही नहीं है। कभी-कभी, भूमि अधिग्रहण के मुद्दों या वन विभाग के मुद्दों के कारण सड़क का एक छोटा सा हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है”। उन्होंने कहा कि मंत्रालय का संचालन सभी सड़कों के भू-स्थानिक मानचित्रण, जो उनके सटीक संरेखण दिखाएंगे और अपने अस्तित्व को सत्यापित करेंगे।

 

2017 में, एक संसदीय पैनल ने ग्रामीण सड़क परियोजनाओं के कार्यान्वयन में अनियमितताओं की सूचना दी थी और बोली लगाने से ब्लैकलिस्ट में डाले जाने वाले भ्रष्ट ठेकेदारों के एक राष्ट्रीय डेटाबेस के निर्माण के लिए कहा है।

 

जैसा कि एक बड़ा मुद्दा यह है कि ऐसे भ्रष्ट प्रथाओं से राजनेताओं को कैसे रोकें। इसके लिए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि विधायकों का जब कार्यक्रम में कोई आधिकारिक भूमिका नहीं मिली, तो अच्छे आवंटन को हटा दिया गया।

 

अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों के मुकाबले, पीएमजीएसवाई भ्रष्टाचार के दायरे को सीमित करने के लिए डिजाइन किया गया है।केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित, यह स्थानीय कार्यान्वयन इकाइयों द्वारा प्रबंधित किया जाता है, जिसे राज्य ग्रामीण सड़क विकास एजेंसियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। हालांकि, केंद्र सरकार कार्यक्रम की निगरानी करती है।

 

यह दिलचस्प है कि अध्ययन में जिन जिलों में कम भ्रष्टाचार पाया गया, वहां जिला कलेक्टर अपने 13वें और 16वें वर्ष के सेवा में थे। ये मील का पत्थर हैं जब पदोन्नति के लिए आईएएस अधिकारी के प्रदर्शन की जांच की जाती है।

 

इसके अलावा, हालांकि, जब उचित रुप से दिए गए सड़क कॉन्ट्रैक्ट की तुलना में प्राथमिकता से आवंटित सड़कों का निर्माण 7 फीसदी से 12 फीसदी अधिक महंगा है।

 

इसलिए, अधिक सख्त निगरानी से भ्रष्ट प्रथाओं को रोकने में मदद मिलेगी। असल में, शापिरो ने कहा कि केन्द्र सरकार की लगातार बढ़ती भागीदारी है कि उनके अध्ययन में कार्यक्रम के सीमित पहलुओं में भ्रष्टाचार के प्रमाण पाए गए हैं।

 

एक अन्य उपाय पीएमजीएसवाई और अन्य स्थानीय परियोजनाओं में औपचारिक रूप से विधायकों को शामिल करना हो सकता है। इंडियास्पेंड ने पीएमजीएसआई ठेकेदार से पूछा कि उसने विधायक से संपर्क क्यों किया, जब निविदा प्रक्रिया में विधायकों की कोई आधिकारिक भूमिका नहीं है। उन्होंने बताया “विधायक स्थानीय स्थितियों को समझते हैं, वे यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि हम सड़क परियोजनाएं प्राप्त करें और इन सड़कों का डिजाइन इस तरह से तैयार करें कि जिस पर वहां की गाड़ियां चल सकें। “

 

शापिरो कहते हैं, “अगर पीएमजीएसवाई के तहत दिए गए सेवाओं के लिए मतदाताओं ने अपने विधायकों को जिम्मेदार ठहराया, तो बाद में भ्रष्टाचार को सीमित करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। इसके विपरीत, एक ऐसी योजना जिसमें स्थानीय राजनीतिज्ञों की कोई औपचारिक भूमिका नहीं है, लेकिन जिस पर वे अभी भी अनौपचारिक चैनलों के माध्यम से प्रभाव बनाए रखते हैं, भ्रष्ट चार के लिए एक आदर्श अवसर है।”

 

(बाहरी एक स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं । माउंट आबू, राजस्थान में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 फरवरी, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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