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जिद से जीत तक, तमिलनाडु में महिला पंचायत प्रमुखों की कहानी

भानुप्रिया राव,

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तमिलनाडु के शिवगंगाई जिले में थिरुमंवायाल पंचायत की दलित अध्यक्ष शर्मिला देवी ने पीने के पानी के संकट को हल कर दिया है। यहां 50 वर्षों से पानी की समस्या थी। तमिलनाडु में महिलाएं पंचायत प्रमुख शासन के साथ सेवाओं को जोड़कर एक नई व्यवस्था बना रही हैं और ऐसी समस्याओं का समाधान कर रही हैं, जिस पर पहले के पुरुष प्रमुखों ने ध्यान नहीं दिया था।

 

तिरुमंवल पंचायत, शिवगंगाई जिला (तमिलनाडु): दक्षिणी तमिलनाडु के शिवगंगाई जिले में थिरममानवाल पंचायत के सबसे कम उम्र ( 39 वर्षीय ) की दलित सरपंच शर्मिला देवी ने ऐसा काम कर दिखाया है जो ऊपरी जाति और पुरुष प्रमुखों ने 50 वर्षों में नहीं किया है। यह नेक और अद्भुत काम है, गांव में पीने का पानी उपलब्ध कराना।

 

शर्मिला देवी कहती हैं, “थिरुमंवायाल में अप्पू थान्नी (नमक पानी) था। ग्रामीणों को पानी की दैनिक आपूर्ति के लिए आसपास के गांवों में जाना पड़ता था। मैं ऐसा बचपन से देखती आ रही थी। और मुझे हमेशा आश्चर्य होता था कि इस समस्या का हम कोई समाधान क्यों नहीं निकालते? “

 

दसवीं कक्षा तक पढ़ी शर्मिला ने 2011 में पंचायत अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने का फैसला लिया तो इसके पीछे वर्षों से चली आ रही पानी की समस्या भी थी। 2011 में यह अनुसूचित जाति से महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया था। इससे पहले तक पंचायत अध्यक्ष पद पर कल्लर समुदाय का एकाधिकार था।

 

थिरुमंवायल की गंदी मिट्टी भूजल के प्रतिधारण की अनुमति नहीं देती है। एकमात्र समाधान पड़ोसी पंचायत, सरुकनी को पानी के लिए अनुरोध करना था। सरुकनी के पंचायत सदस्य पहले से ही ऐसे अनुरोधों से परेशान हो चुके थे। एक उज्ज्वल मुस्कुराहट के साथ शर्मिला याद करती हैं, “वे पहले से ही कुछ अन्य पंचायतों के साथ पानी साझा कर रहे थे, इसलिए स्वाभाविक रूप से वे परेशान थे। लेकिन मेरे लिए केवल यह मायने रखता था कि किसी तरह से उन्हें पानी बांटने के लिए राजी कराया जाए। ”

 

लेकिन इस काम में बीच में हस्तक्षेप करने के लिए आ गए विधान सभा (शिवगंगाई) के सदस्य एस गुणेसकरन । जिला में हर प्रभावशाली कार्यालय में शामिल होने के लिए और सरुकनी पंचायत की सहमति के लिए बातचीत में एक महीने से ज्यादा समय लगा।  गांव के प्रमुख ने घोषणा की, “यह अंतिम बार हम किसी को पानी दे रहे हैं।”

 

इसके तुरंत बाद, सरकुनी में एक नया बोरवेल खोदा गया और पानी को थिरुमन्वायल पहुंचाने के लिए एक पाइपलाइन लगाया गया। शर्मिला को मुख्य गांव में स्थापित 2,000 लीटर पानी का टैंक मिला और पंचायत के 18 गांवों में मिनी पावर पंपों और टैंकों का एक नेटवर्क बनाया गया। वह कहती हैं, “मुझे नहीं पता कि एक साधारण समस्या को हल करने के लिए इतने साल क्यों लगे?”

 

शर्मिला देवी, 2011-2016 के बीच पिछले और वर्तमान 40 पंचायत प्रमुखों में से एक हैं। महिला नेतृत्व ने स्थानीय शासन के कैसे बदला है, यह समझने के लिए इंडियास्पेंड ने तमिलनाडु के छह जिलों में बातचीत की। इनमें दक्षिण में शिवगंगा और तिरुनेलवेली, मध्य में डिंडीगुल, पूर्व में नागापट्टिनम और राज्य के उत्तर-पश्चिम में कृष्णागिरी और धर्मपुरी शामिल थे।

 

मार्च, 2017 में प्रकाशित चार-लेखों की श्रृंखला में इंडियास्पेंड ने महिला पंचायत प्रमुखों के बारे में बताया था जिन्होंने स्थानीय नेताओं के रूप में मजबूती से अपनी मौजूदगी दर्शाते हुए जाति और लिंग के अवरोधों को तोड़ा है। इस लोकप्रिय धारणा के विपरीत कि महिलाएं केवल सत्ता के भूखे उनके पुरुष रिश्तेदारों के प्रॉक्सी के रुप में काम करती हैं। हमने पाया कि उनमें से 60 फीसदी स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। उन्होंने पंचायत खातों, केंद्रीय और राज्य निधि योजनाओं और स्थानीय नौकरशाही संरचना को गहराई से जा भी लिया है।

 

पांच लेखों के इस श्रृंखला में, हम देखेंगे कि तमिलनाडु के गांवों में महिलाओं का नेतृत्व दो दशकों से कैसे विकसित हुआ है?  कैसे सीमित वित्तीय संसाधन, जाति उत्पीड़न और हिंसा के बावजूद वे सफल हो रही हैं और उनके लिए राजनीतिक सीढ़ी पर आगे बढ़ना क्यों मुश्किल है?

 

पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण, 1996 में शुरू किया गया। इसने तमिलनाडु में ग्रामीण प्रशासन का चेहरा बदल दिया है।

 

पिछली श्रृंखला में, हमने देखा था कि महिलाएं नेताओं ने अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में सड़कों के निर्माण और पहुंच में सुधार के लिए 48 फीसदी अधिक पैसे का निवेश किया है और  न केवल सूखे जिले में पानी की आपूर्ति में सुधार किया, बल्कि इसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान केंद्रित किया है।

 

जमीनी नेतृत्व महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण क्यों है? हमने पाया कि यह कई मायनों में यह महिलाओं को सशक्त बनाता है। इससे उन्हें अपनी आवाज उठाने में मदद मिली है, और समुदाय के भीतर प्रतिष्ठा मिली है। इससे उन्हें जिला कलेक्टर, ग्रामीण विकास के आयुक्त और उच्च निर्वाचित प्रतिनिधियों जैसे विधायकों और संसद सदस्यों (सांसद) जैसे उच्चतम स्तर के नौकरशाही तक पहुंच मिली है।

 

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि नेताओं के रूप में उन्होंने अपनी स्वयं की धारणा बदल दी है और अन्य युवा लड़कियों और महिलाओं के लिए आदर्श मॉडल तैयार किए हैं।

 

कृष्णागिरि जिले के जकरेरी पंचायत की अध्यक्ष लक्ष्मी, स्वास्थ्य मंत्री के पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबुमानि रामदास के साथ अपनी एक बैठक याद करती हैं। लक्ष्मी बताती हैं, “मैं उनसे अन्य पंचायत अध्यक्षों के साथ उनसे मिलने गई। अचानक, उन्होंने मुझे मंच पर आने और अपने अनुभव साझा करने के लिए कहा। मैं शर्मीली थीं, लेकिन उनके बुलाने पर मैं चली गई। मैं डरी हुई थी लेकिन फिर मैंने एक पूरे घंटे तक बात की। मुझे नहीं पता था कि मैं बोल सकती हूं। “

 
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तमिलनाडु के कृष्णागिरि जिले में जाकरकेरी के दलित पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी काफी शर्मीली थी,लेकिन पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास के सामने उन्होंने एक सभा को संबोधित किया, तो वह जान पाई कि वो बोल भी सकती है । महिलाओं के आरक्षण ने महिलाओं को जीवट राजनीतिक नेताओं में बदलने का अवसर दिया है। अब वे महिलाओं युवा लड़कियों की एक नई पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं।

 

पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी की 15 वर्षीय भतीजी मुस्कुराते हुए कहती हैं कि, “ मैं बड़ी हो कर उनकी तरह बनना चाहती हूं।” महिला नेतृत्व ने अन्य महिलाओं और हाशिए पर रहने वाली महिलाओ की पंचायत प्रमुखों तक पहुंच को बढ़ाया है। महिलाएं अब बिना किसी हिचकिचाहट के उन तक जा सकती हैं और सेवाओं की मांग कर सकती हैं। यह एक ऐसी स्वतंत्रता है, जो ज्यादातर पुरुष नेताओं के कार्यकाल में नहीं देखी गई।

 

तमिलनाडु में जमीनी स्तर पर महिला नेतृत्व के बीस साल

 

भारतीय संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के बाद अधिनियमित, नई तमिलनाडु पंचायत अधिनियम के तहत एक तिहाई सीट (33.3 फीसदी) महिलाओं के लिए आरक्षित होने के बाद, तमिलनाडु में पहली बार 1996 में महिलाएं ग्राम पंचायत ( ग्रामीण प्रशासन का सबसे निम्न स्तर ) के लिए चुनी गई ।

 

1996 में पहली बार, तमिल में महिलाओं को ‘नेता’ के लिए थैलिवी कहा जाता था। तब तक, पंचायत नेतृत्व प्रमुख जातियों से पुरुषों द्वारा किया जाता था। इस परिवर्तन ने सामान्य और अन्य बहिष्कृत समूहों, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में महिलाओं के लिए अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया। बिहार, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे कई राज्यों ने तब तक महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण 50 फीसदी तक बढ़ा दिया है।

 

2016 में, तमिलनाडु ने घोषणा की कि स्थानीय निकायों में 50 फीसदी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होगी।

 

राज्य अनुसार महिला प्रमुख पंचायतों की संख्या

Source: Unstarred question in Lok Sabha (December 2017)

 

जैसा कि पहले बताया गया है, हमारे साक्षात्कार में पता चला है कि अधिकांश महिला नेताओं ने पुरुषों के थोड़े हस्तक्षेप के साथ अपना रास्ता खुद तैयार किया है। पुरुष रिश्तेदारों से स्वायत्तता का स्तर विविध रहा है। उदाहरण के लिए हमने देखा, कि महिला नेताओं के नियंत्रण में प्रमुख जातियां अधिक थीं। उदाहरण के लिए, शिवगंगाई जिले के देवकोट्टाई ब्लॉक में, हमने पाया कि सात में से चार महिलाएं ( एससी और सामान्य श्रेणियों में से प्रत्येक ) प्रमुख पंचायतों का स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही हैं।

 

कलैर्यकोविल ब्लॉक में, साक्षात्कार किए गए सभी नौ महिलाओं ( छह दलित और तीन प्रमुख तेवर समुदाय से ) ने सड़कों, पानी, शौचालयों पर बड़े पैमाने पर निवेश किया और उनके काम में पुरुषों की कोई भूमिका नहीं दिखी। कृष्णागिरि जिले के पहाड़ी और आरक्षित वनों वाले क्षेत्रों, थेंली और केलमंगलम ब्लॉक में, जिन नौ महिलाओं का हमने साक्षात्कार किया उनमें से पांच स्वतंत्र नेता थीं। इनमें से तीन सामान्य श्रेणी की थी। अनुसूचित जाति और जनजाति से भी एक-एक थीं। लेकिन, कृष्णगिरी के उथंगराई ब्लॉक में वर्णीर जाति की चार महिला पंचायत प्रमुखों में से किसी को भी उनके पुरुष रिश्तेदारों ने स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अनुमति नहीं दी थी।

 

एक और पंचायत, जहां हम गए ( महिला नेता की सुरक्षा के लिए नाम गुप्त रखा) यह सुनते ही कि कोई मिलने आया है, वहां फौरन ही महिला प्रमुख के जेठ आ गए। वह खिड़की के बाहर खड़ा रहा। उनकी पूरी नजर महिला अध्यक्ष पर टिकी रही जो घबराई हुई थी और धीमी आवाज में बात कर रही थी। लेकिन ज्यादातर मामलों में, महिला पंचायत नेताओं ने एक बढ़ती राजनीतिक चेतना का प्रदर्शन किया। भले ही पंचायत अध्यक्ष एक गैर-पार्टी की स्थिति है, लेकिन इस अध्ययन में 43 फीसदी महिला राजनीतिक दल से थीं, मुख्यतः अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कजगम से।

 

जिन महिलाओं से हमने बात की, उनमें से कम से कम 30 फीसदी आगामी पंचायत चुनावों में फिर से चुनाव के लिए खड़ी होंगी, भले ही वे महिलाओं के लिए आरक्षित एक सीट का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। इसके अलावा, तमिलनाडु में महिला नेताओं ने भी राज्य स्तर पर नीतिगत निर्णयों को प्रभावित किया है। 1997 के प्रारंभ में, उन्होंने महत्वपूर्ण नीतियों में भागीदारी के लिए देश में पहली बार तमिलनाडु महिला पंचायत अध्यक्ष फेडरेशन के रूप में खुद को संगठित किया।

 

10 वर्ष तक पंचायत अध्यक्ष के पद को आरक्षित करने के लिए, 2001 में, उन्होंने जयललिता के साथ लॉबी किया, जो तब विपक्ष में थी। ऐसा करने वाला तमिलनाडु देश का पहला राज्य था। कल्पना सतीश, जो कि संघ के गठन के साथ निकटता से जुड़ी थीं और जिन्होंने महिला पंचायत नेताओं को प्रशिक्षित किया है,  उनके पास जयललिता के साथ उस बैठक के बारे में साझा करने के लिए एक दिलचस्प कहानी है-“जब उन्होंने 10 साल तक सीटें आरक्षित करने की मांग की तो जयललिता ने उनको देखा और कहा, ‘तो आप फिर से चुनी जाना चाहती हैं।’

 

महिलाओं ने जवाब दिया: ‘सिस्टम को समझने में हमें पांच साल और लगेंगे। हमें परिवर्तन करने के लिए एक और पांच की जरूरत है। “

 

राज्य के पंचायत और अन्य ग्रामीण निकायों की आखिरी अवधि 2011 और 2016 के बीच हुई थी। लेकिन मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु पंचायत (चुनाव) नियम, 1995 के नियम 24 के अनुपालन के कारण 2016 के लिए निर्वाचन अधिसूचना अमान्य घोषित की। विपक्षी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कजगम ने एक हलफनामा दायर किया कि अनुसूचित जनजाति जनसंख्या का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं है।

 

महिला नेताओं ने सौंपे गए कामों से अलग भी कुछ कर दिखाया

 

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है पंचायत की महिला प्रमुख बड़ी पूंजी में अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में अधिक खर्च करती हैं, खासकर सड़क संरचना में। अगर हम प्रति परिवार पूंजी व्यय पर विचार करते हैं, महिलाएं पहुंच में सुधार के लिए 15,515 रुपये खर्च कर रही थीं और पुरुषों क लिए आंकड़े 13,488 रुपये रहे । महिलाओं की तुलना (343.42 रुपये) में पुरुष ग्रामीण विद्युतीकरण (3,22 9 .65) पर अधिक खर्च करते हैं। पानी की आपूर्ति पर, पुरुषों ने महिलाओं (11,537 रुपये) की तुलना में थोड़ा अधिक खर्च किया (12,86 9 रुपये)।

 

ये महत्वपूर्ण निवेश हैं क्योंकि ये महिलाओं को ग्राम पंचायत अध्यक्षों को सौंपी गई शक्तियों और कर्तव्यों से परे दिखाते हैं। तमिलनाडु पंचायत अधिनियम के अनुसार, ग्राम पंचायतों की ओर से बुनियादी सुविधाओं जैसे कि पानी, स्वच्छता, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट्स, दफन मैदान और सड़क मरम्मत प्रदान करने के लिए हस्तक्षेप अनिवार्य है।वे जो निधि प्राप्त करती हैं, वह अक्सर बुनियादी सेवाएं प्रदान करने के लिए अपर्याप्त हैं। इसका अर्थ है कि महिला नेताओं ने अतिरिक्त पूंजी निवेश के लिए कड़ी मेहनत की है।

 

इंडिया स्पेंड की ओर से पिछली श्रृंखला में देखा गया कि तमिलनाडु में महिला पंचायत अध्यक्ष बुनियादी सेवाओं में निवेश के अलावा स्कूलों और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों का निर्माण कर रही हैं, हालांकि उनके पास शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सीमित शक्तियां हैं। इसके अलावा, वे सामाजिक समस्याओं जैसे बाल विवाह के खिलाफ सक्रिय रूप से प्रचार कर रही हैं।

 

महिलाओं ने राज्य में भी शक्तिशाली लॉबी की है, उदाहरण के लिए रेत खनन, और भूमि माफिया के खिलाफ। इस श्रृंखला में शामिल महिला अध्यक्ष भी अवैध अतिक्रमण और औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ लड़ रही हैं, जैसा कि उनसे बातचीत के बाद उनकी कहानी से पता चलता है।

 

महिला ग्रामीण नेतृत्व ने उन मुद्दों को भी उठाया है, जो तत्काल चिंता के विषय हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने शराब पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने के लिए राजनीतिक अभियान चलाया। यह एक ऐसा अभियान भी था जो राज्य सीमा से परे चला गया। आएं, तमिलनाडु के पंचायतों में महिला नेताओं के कुछ ठोस पहलुओं पर चर्चा करें:-

 

सिर्फ पीने के पानी पर खर्च नहीं, स्वच्छता पर भी जोर

 

जब वह देवकोट्टीई ब्लॉक में नचंगुलम पंचायत के प्रमुख बनीं, तो दलित नेता राजनिकंधम यह देख पर काफी हताश हुई कि उनके पूर्ववर्तियों ने पानी की कमी पर कितना कम काम किया है। वह कहती हैं, “मैंने मुख्य रूप से अपने पंचायत में हर किसी को पानी दिलाने के वादे पर चुनाव लड़ा था। मेरे समय में, मैंने तीन बड़े बोरवेल, 15 मिनी बोरवेल और तीन ओवरहेड टैंक बनाए हैं। अब नचंगुलम के सात गांवों में हर किसी को पानी मिलता है। “

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तमिलनाडु के शिवगंगाई जिले के नचंगुलम पंचायत की दलित अध्यक्ष राजनिकंधम ने तीन बड़े बोरवेलों, 15 मिनी बोरवेलों और तीन ओवरहेड टैंकों को स्थापित करके अपनी पंचायत की पेयजल समस्या का हल निकाला।

 

देवकोट्टई ब्लॉक में अपने पुरुष समकक्षों की तरह महिला अध्यक्षों को पानी पर अपने राजस्व का लगभग 10 से 20 फीसदी खर्च करना पड़ रहा था।

 

लेकिन महिलाओं की अगुवाई वाली 12 में से तीन पंचायतों में वे अपने कुल राजस्व में से 30 से 40 फीसदी पूंजी व्यय-खुदाई बोरवेल्स, पाइपलाइन बिछाने, सभी गांवों में बड़े और छोटे पानी के टैंकों के लिए उपलब्ध कराने में खर्च कर रहे थे। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि पाइपलाइन पूरी तरह से प्रमुख दलित बस्तियों को दरकिनार करते हुए प्रमुख जाति क्षेत्रों के लिए तैयार की जाती थी।

 

जैसा कि पहले बताया गया है, शुद्ध पेय जल सुनिश्चित करने के लिए महिलाएं भी परिष्कृत जल प्रणालियों में निवेश कर रही थीं। ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, कलैर्यकोविल में, जहां पानी खारा है, रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) शुद्धि प्रणाली चलाने वाले सात पंचायतों में से पांच का नेतृत्व महिलाओं के पास था।

 

मेलामारुंगोर का मझारकोड़ी धनसेकर, मारुवामंगलम के कलाश्वरी, और कुरुथंगुड़ी पंचायतों की राजेश्वरी ने आरओ सिस्टम के लिए अपने स्थानीय विधायक के साथ अतिरिक्त धन पाने के लिए प्रयास किया,  जो कि दूर-दराज के क्षेत्रों में 2,000 की आबादी के लिए 600,000 रुपये या वार्षिक पंचायत बजट का 60 फीसदी के बराबर का खर्च है।

 

पहले  इन सभी पंचायतों में निवासी पड़ोसी गांवों के निजी ऑपरेटर से 30 रुपये में पानी का एक बर्तन खरीदते थे। अब उन्हें पंचायत को केवल 5 रुपए देने की आवश्यकता है, जो कि आरओ प्रणाली संचालित करती है।

मझरकोड़ी धनसेकर कहती हैं,” इन इलाकों में पानी एक अनमोल चीज है और लोगों को इसका मूल्य पता होना चाहिए। यही कारण है कि हम एक छोटी सी राशि उनसे लेते हैं। “

 

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तमिलनाडु के शिवगंगाई जिले में मारुवामंगलम पंचायत की कालेश्वरी ने अपने पंचायत में रिवर्स ऑसमॉसिस (आरओ) सिस्टम स्थापित करने के लिए 10 लाख रुपये के आवंटन के लिए कोशिश की। ग्रामीण तमिलनाडु में महिला नेताओं ने उन क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति में भारी निवेश किया है, जहां का पानी खारा है।

 

अतिरिक्त संसाधनों के लिए कड़ी मशक्कत

 

कल्पना रवींद्रन धर्मपुरी जिले के हरूर ब्लॉक में वडागापट्टी पंचायत की दलित अध्यक्ष हैं। जब वो वोटों के लिए प्रचार करती थीं, तब उनके भावी मतदाताओं में केवल एक ही मांग थी, वह थी गांव में सड़कें बनाना।

 

वह याद करते हुए कहती हैं, “मैं एक युवा लड़की से मिली  जिसने मुझे बताया कि कच्चे सड़क पर सायकल से चलने पर उनके टायर खराब हो जाते हैं। जब आप अध्यक्ष बनें तो सड़कें पक्की बनाएं। मैं लड़की की मांग को कभी नहीं भूल सकती थी। इसलिए जब मैं अध्यक्ष बनी तो तमिलनाडु गांव आवास सुधार योजना के अंतर्गत 30 लाख रुपये का इस्तेमाल करते हुए मैंने सबसे पहला काम सड़क बनाने का किया। “

 

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धर्मपुरी जिले के वडागापट्टी पंचायत की अध्यक्ष कल्पना रवींद्रन जब निर्वाचन अभियान में थीं तो लोग उनसे सड़कों के बारे में बात करते थे। अब उन्होंने 30 लाख रुपये का इस्तेमाल कर सड़कें बनाने का काम किया। इनकी जैसी कई महिला नेता अपने मतदाताओं की आवश्यकताओं के लिए ज़्यादा जवाबदेह हैं।

 

देवकोट्टई ब्लॉक में महिलाएं, सड़कों पर पूंजीगत व्यय पर 15 फीसदी से 25 फीसदी के बीच खर्च कर रही थीं, जो पुरुषों (1 फीसदी -10 फीसदी) की तुलना में अधिक है। सड़कों के निर्माण के लिए नचंगुलम के राजनीकंधम ने अपने पंचायत के राजस्व का 47 फीसदी खर्च किया।

 

यह याद रखने योग्य है कि नियमित पंचायत का राजस्व सड़क निर्माण पर बड़े पूंजी व्यय के लिए अनुमति नहीं देता है। इसका मतलब यह है कि महिला नेता अतिरिक्त धन के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं। राज्य वित्त आयोग (एसएफसी) प्रत्येक पंचायत को 5 लाख रुपये (14 वें वित्त आयोग की वृद्धि की अनुदान के बाद 3 लाख रुपये की कमी) और गांव आबादी के आधार पर एक अतिरिक्त राशि का अनुदान देता है। उदाहरण के लिए, नाचंगुलम, एसएफसी अनुदान 530,000 रुपये से लेकर 700,000 रुपये तक ले जाता है।

 

सीमित शक्तियों के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य पर काम करने की ललक

 

सिदाहल्लम्मा इरला जनजाति की है, जो पारंपरिक रुप से सांप पकड़ने का काम करते हैं। 2011 में जब वे थैली ब्लॉक में पद्गिलामम की पंचायत अध्यक्ष चुनी गई तो उन्होंने इस दूरस्थ क्षेत्र की महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी। ग्रेनाइट खानों के क्रेटर के बीच स्थित, यहां महिलाओं को अक्सर प्रारंभिक विवाह,  जल्द गर्भधारण, एनीमिया और कुपोषण का सामना करना पड़ता है।

 

कृष्णागिरि जिले में, 15 से 49 की उम्र के बीच 47.4 फीसदी ग्रामीण महिलाओं में खून की कमी है, जिसमें 2.2 फीसदी में गंभीर रूप से खून की कमी थी, जैसा कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16 के आंकड़ों से पता चलता है।

 

अपने पंचायत में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं लाने के लिए, सिद्माल्लाम्मा ने खुद को 2014 में एक स्वास्थ्य कर्मचारी के रूप में प्रशिक्षित किया। वह बताती हैं “मेरे दो साल के कार्यकाल में, समुदाय के स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित करने के लिए उप-कलेक्टर का एक विशेष कार्यक्रम था। क्योंकि मुझे महिलाओं के स्वास्थ्य में दिलचस्पी थी, मैंने शामिल होने का फैसला किया। हालांकि मैं अशिक्षित थी, लेकिन मैंने बहुत कुछ सीखा। “

 

केरल या राजस्थान के विपरीत, जहां पंचायतों का स्थानीय शिक्षा पर नियंत्रण है, तमिलनाडु में स्कूलों को राज्य शिक्षा विभाग द्वारा नियंत्रित किया जाता है। तमिलनाडु में स्कूलों को राज्य शिक्षा विभाग द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जैसे कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्वास्थ्य संस्थानों को नियंत्रित किया जाता है। लेकिन सीमित शक्तियों के बावजूद, पंचायत की महिला नेताओं ने राज्य में काफी कुछ हासिल किया है।

 

नाचंगुलम में, राजनिकधम को अपने कार्यकाल में एक प्राथमिक विद्यालय को माध्यमिक विद्यालय तक उन्नयन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने कड़ी मेहनत की। जिला कलेक्टरेट और शिक्षा विभाग के कई चक्कर लगाए।

 

लेकिन उसे श्रेय मिलने में दिक्कत हुई।  देवकोट्टई ब्लॉक ऑफिस एक अधिकारी बताते हैं, “हां, वह इसे कर सकती थी लेकिन यह मुख्य रूप से ब्राह्मण पंचायत सचिव के कारण था। आप देख रहे हैं, ब्राह्मण बहुत बुद्धिमान हैं।”

 

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नचंगुलम की दलित पंचायत अध्यक्ष राजनिकंधम ने स्थानीय प्राथमिक विद्यालय को मिडिल स्कूल में अपग्रेड करने के लिए पैरवी की। केरल या राजस्थान के विपरीत, जहां पंचायतों का स्थानीय शिक्षा पर नियंत्रण है, तमिलनाडु में स्कूलों को राज्य शिक्षा विभाग द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सीमित शक्तियों के बावजूद, राजनिकंधम जैसी महिलाओं नेताओं ने राज्य में काफी कुछ हासिल किया है।

 

कम उम्र में लड़कियों के विवाह के खिलाफ अभियान

 

थैली ब्लॉक में एन्चेटी पंचायत के प्रमुख शांती (40) कम उम्र में लड़कियों के विवाह पर रोक लगाने के लिए प्रयासरत हैं। 2016 में, अध्यक्ष के रूप में अपने अंतिम वर्ष, उन्होंने चार ऐसे अवैध विवाह बंद कराए। उनमें से एक में वह शादी रोकने तब पहुंची, जब विवाह शुरु होने वाला था। वह बताती हैं, “लड़कियों को शादी करने के लिए चुपचाप रात को तैयार किया गया था। लेकिन मुझे पता चला और मैं उसे रोकने पहुंच गई। ”

 

कृष्णागिरि और धर्मपुरी जिले के दूरदराज के क्षेत्रों में बाल विवाह काफी आम है। कृषि कृष्णगिरी में, 20-24 आयु वर्ग में 25.3 फीसदी महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की कानूनी आयु के पहले हुआ है।

 

धर्मपुरी ने जनवरी और नवंबर 2017 के बीच बाल विवाहों की सबसे अधिक संख्या की सूचना दी है, जैसा कि तमिलनाडु के सामाजिक कल्याण विभाग द्वारा जारी आंकड़ों में दिखाया गया है।कृष्णगिरी और धर्मपुरी जिले के वन, पहाड़ी पंचायत में, हमारे द्वारा सर्वेक्षण में किए गए सात पंचायतों में से छह में बाल विवाह के खिलाफ महिला पंचायत नेताओं ने अभियान चलाया है, जैसा हमने पिछली श्रृंखला में बताया था। उनमें से चार, लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर को रोकने के लिए उच्च माध्यमिक स्कूलों में उन्नयन करने के लिए पैसे खर्च कर रही थीं। शांति याद करते हुए बताती हैं कि 15 वर्ष की आयु में शादी के लिए पढ़ाई छोड़ना पड़ा। वह कहती हैं, “मैंने पिछले पांच सालों में कई जागरूकता कार्यक्रम किए हैं। मैं परिवारों को बताती हूं कि चीजें बदल गई हैं। कई स्वास्थ्य समस्याएं होगी। पहले अपनी लड़कियों को पढ़ाओ। “

 

जान की धमकियों के बावजूद रेत / भूमि माफिया से लड़ाई

 

नानापट्टिनम जिले के वेदर्न्यम ब्लॉक में वड़ुवाचेरी पंचायत की पूर्व अध्यक्ष रानी मुनियाकानु ने समुद्र तट पर रेत माफिया से तक्कर लेने की हिम्मत की। तट का करीबी इलाका वुदुचेरी, मोनोजिट जैसे खनिजों से भरपूर है, जो परमाणु ईंधन के लिए मूल्यवान और सिंगापुर जैसे देशों को निर्यात किया जाता है। अवैध खनन भी होता है। अब तक उन माफियाओं के खिलाफ किसी भी पुरुष अध्यक्ष ने कदम नहीं उठाया था।

 

रानी लंबे समय से रेत ट्रक की आवाजाही देख रही हैं, और उन्हें पता था कि खनन ने गांव भूजल को गड़बड़ कर दिया था। रानी ने कहा, “रेत खनिक 15 फीट तक खुदाई कर रहे थे, जिससे पानी का स्तर कम हो गया। इन क्षेत्रों में, आप 18 फीट से नीचे कुछ खोदते हैं और नमक पानी मिलता है।”

 

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नागापट्टिनम जिले के वड़ुवांछी पंचायत के पूर्व अध्यक्ष रानी मुनियाकानु ने अपने क्षेत्र में समुद्र तट पर रेत खनन माफिया के खिलाफ एक लंबी और महंगी लड़ाई लड़ी है। ऐसी अवैध गतिविधियों का विरोध करने वाले तमिलनाडु में महिला नेताओं को अक्सर हिंसा से धमकी दी जाती है

 

अध्यक्ष के रूप में, उसने अपने पंचायत में रेत खनन के लिए दिए गए परमिटों के बारे में जानकारी का पता लगाया। वह बताती हैं, “श्रीराम इंडस्ट्रीज और एजिल इंडस्ट्रीज मुख्य रेत खनिक थे। हमें पता चला कि वे अपने लाइसेंस परमिट से परे काम कर रहे थे, उन क्षेत्रों में खनन कर रहे थे जिन पर उन्हें कोई परमिट नहीं था। “

 

उन्होंने अपने ही पंचायत के और पड़ोसी लोगों को इकट्ठा किया और इन उद्योगों के कार्यालयों में भारी विरोध प्रदर्शन किया। हालांकि प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन वे मीडिया और सांसदों और विधायकों का ध्यान आकर्षित करने में कामयाब रहे। उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्य के साथ मामला दायर किया।

 

उच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके बाद एजिल इंडस्ट्रीज पूरी तरह से बंद हो गईं। रानी मुनियाकानु बताती हैं कि श्रीराम इंडस्ट्रीज, जिस पर उन्होंने आरोप लगाया था, उसने मामले से बाहर निकलने के लिए 100,000 रुपये देने की पेशकश की। डर से उन्होंने अपनी गतिविधियों को उस पंचायत में कम कर दिया ।

 

इंडियास्पेंड ने अपनी 2017 की श्रृंखला में बताया था कि पी कृष्णवेनी एक चिंतनशील दलित पंचायत नेता हैं, । भूमि के अतिक्रमणकर्ताओं और कॉर्पोरेट समूह जैसे कि भारत सीमेंट्स का विरोध करने के कारण तिरोनेलवेली जिले के थिलैयुथु पंचायत में उनपर उनके घर के करीब ही हमला किया गया था।

 

गौदुलूर के पश्चिम पंचायत के पूर्व पार्षद जोथिमानी सेनामलाई ने इसी तरह करूर जिले में अमरावती नदी में अवैध रेत खनन के खिलाफ पूरे समुदाय को जुटाया था। इसके लिए, उसने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै की पीठ पर पांच साल की कानूनी लड़ाई लड़ी। अंत में फैसला उनके पक्ष में हुआ।

 

तमिलनाडु के पंचायतों में महिला नेताओं की स्थिति और उनके द्वारा किए गए कामों पर पांच लेखों की श्रृंखला का यह पहला लेख है।

 

इस श्रृंखला का अगला लेख-सीमित संसाधन और कोई वेतन नहीं, फिर भी तमिलनाडु  में महिला पंचायत प्रमुख कैसे हो रही हैं सफल?

 

(राव GenderandPolitics की को-क्रिएटर हैं। यह एक ऐसी परियोजना है, जो भारत में सभी स्तरों पर महिला प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी को ट्रैक करती है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 8 मार्च, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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