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जुलाई 2016 से, कश्मीर घाटी में शैक्षणिक संस्थान 197 कार्य दिवसों में से सिर्फ 80 दिन खुले

अथर परवेज,

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14 नवंबर, 2016 को कश्मीर के बारामूला शहर के एक माध्यमिक विद्यालय में सुरक्षाकर्मियों के साये में परीक्षा देने के लिए जाते छात्राएं।  अलग-अलग सर्वेक्षणों और रिपोर्टों के विश्लेषण से पता चलता है कि 8 जुलाई 2016 से कश्मीर घाटी में शैक्षणिक संस्थान 197 कार्य दिवसों में से सिर्फ 80 दिन खुले रहे हैं।

 

श्रीनगर: रेइसा अख्तर श्रीनगर के बमिना इलाके में रहती हैं। हर बार जब उसका सात साल का बेटा स्कूल से लौटता है तो वह अल्लाह का धन्यवाद करती हें और दुआ करती हैं कि स्कूल गर्मियों में भी खुला रहे। कश्मीर के हजारों माता-पिता की यही चिंता है कि स्कूल खुला रहे। बच्चों ने भी अपनी व्यथा बताई। कुछ इसी तरह की चिंता के साथ अख्तर भी जी रही हैं।

 

8 जुलाई, 2016 को आतंकवादी कमांडर बुहरन वानी की हत्या के बाद हंगामा, पुलिस द्वारा लगाए गए कर्फ्यू और कश्मीरी अलगाववादियों द्वारा बुलाए गए बंद के कारण उनका बेटा 130 दिनों तक घर पर ही रहा। स्कूल नहीं जा पाया।

 

27 मई 2017 को वानी के उत्तराधिकारी सबजार भट की हत्या के बाद राज्य में एक बार फिर हिंसा भड़कने की संभावना है। 27 मई, 2017 को अलगाववादियों ने भट्ट की मृत्यु के शोक के लिए तीन दिन की हड़ताल और विरोध प्रदर्शन की घोषणा की, उधर पुलिस ने लोगों के एक जगह पर जमा होने पर रोक लगा दी है। फिर भी, प्रदर्शनकारियों और राज्य पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कर्मियों के बीच हिंसक  संघर्ष हुआ, जिसमें एक युवा की मौत हो गई, 70 लोग जख्मी हुए हैं।राज्य में वर्ष 2016 में पथराव, हिंसक प्रदर्शन, फायरिंग और शॉटगन छर्रों के इस्तेमाल की कुल मिलाकर 2,690 घटनाएं दर्ज हुई हैं। ये आंकड़े 1989 में दर्ज विद्रोह से संबंधित 1,500 घटनाओं की तुलना में 79 फीसदी ज्यादा हैं। 1989 का यह वह समय था, जब कश्मीर में सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत हुई थी।

 

नाम न छापने की शर्त पर एक शीर्ष पुलिस अधिकारी ने बताया कि इस वर्ष साढ़े चार महीने (18 मई, 2017 तक) के लिए आंकड़े 1,031 हैं । स्थानीय प्रेस में उद्धृत शीर्ष पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, 27 मई 2017 को भट की हत्या के बाद से शनिवार और रविवार को पत्थरबाजी की 30 घटनाएं हुई हैं।

 

हिंसा का बदलता चेहरा

 

कर्फ्यू और बंद के साथ हिंसा कश्मीर क्षेत्र में बार-बार शिक्षा में बाधा डालती है। वर्ष1990 और वर्ष 2000 के बीच में हिंसक घटनाओं में मुख्य रूप से बम विस्फोट, ग्रेनेड विस्फोट और क्रॉस फायरिंग होती थी। लेकिन वर्ष 2010 के बाद से प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थरबाजी और प्रदर्शनकारियों को छित्तर-बित्तर करने के लिए सुरक्षा कर्मियों द्वारा गोलीबारी और छर्रा फायरिंग का इस्तेमाल देखा गया है।

 

जम्मू कश्मीर पुलिस की ओर से आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी, 2010 और 18 मई 2017 के बीच, कम से कम 6979 कानून और व्यवस्था से जुड़ी इस तरह की घटनाएं हुईं हैं, जबकि विद्रोह से संबंधित 1,970 घटनाएं दर्ज की गई हैं।

 

कश्मीर में कानून और व्यवस्था के मामले – पत्थरबाजी की घटनाओं सहित

Source: Data shared by an official of the Jammu & Kashmir police

 

स्कूल- कॉलेजों पर निशाना

 

अभी इस वर्ष आशंका है कि सुरक्षा स्थिति फिर से बिगड़ सकती है। 9 अप्रैल, 2017 से श्रीनगर-बड़गाम संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के उप-चुनावों के बाद से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा बार-बार बाधित हुई है। चुनाव के दौरान व्यापक हिंसा के परिणामस्वरूप आठ नागरिकों की मौत हुई और स्कूलों और कॉलेजों को चार दिन तक बंद रखा गया।

 

इसके बाद में कुछ यातना वीडियो वायरल हुए थे, जिससे कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्र आवेश में आ गए। अब, महिलाओं सहित छात्र विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं।

 

छात्रों का विरोध प्रदर्शन को देखते हुए एहतियात के तौर पर जम्मू-कश्मीर सरकार ने कई बार शैक्षिक संस्थानों, विशेषकर कॉलेजों को बंद रखने के लिए आदेश दिया है। उदाहरण के लिए, श्रीनगर की एसपी हायर सेकेंडरी स्कूल को कम से कम छह मौकों पर बंद कर दिया गया है, जिसमें हाल का 18 मई, 2017 भी शामिल हैं। अप्रैल 2017 के एक आदेश के बाद कश्मीर में शिक्षा संस्थान लगातार पांच दिनों तक बंद रहे थे।

 

एक शैक्षणिक वर्ष से भी ज्यादा रहे संस्थान बंद

 

शिक्षाविदों और सिविल सोसायटी के कार्यकर्ता फेसबुक पर अपील कर रहे हैं कि छात्र कक्षा में वापस जाएं। सरकार के द्वारा 27 अप्रैल, 2017 को फेसबुक और ट्विटर सहित 22 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने के निर्णय के बाद से सोशल मीडिया तक पहुंचने के लिए कश्मीर में रहने वाले लोग वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) का उपयोग कर रहे हैं। यह सार्वजनिक नेटवर्क में एक निजी नेटवर्क का विस्तार है।

 

जम्मू और कश्मीर के शिक्षा मंत्री सय्यद अल्ताफ बुखारी ने 18 मई 2017 को प्रदर्शन करने वाले छात्रों को चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि कक्षा में कम उपस्थित रहने वाले छात्रों को परीक्षा की अनुमति नहीं दी जाएगी।

 

शिक्षाविद चिंतित हैं। श्रीनगर कॉलेज ऑफ एजुकेशन में पढ़ाने वाले रोशन आरा ने 1990 के दशक और 2000 के दशक के अराजकता का जिक्र करते हुए कहा, “हमें अपने युवाओं को शिक्षित करने की आवश्यकता है। हम और अधिक अशिक्षित पीढ़ी बर्दाश्त नहीं कर सकते।”

 

हम बता दें कि इस अवधि के दौरान राजनीतिक उथल-पुथल बढ़ने से पूरे कश्मीर में हिंसा हुई थी, जिससे लगभग दो पीढ़ियां उचित शिक्षा से वंचित रह गई।

 

उस समय की अख़बार की खबरों पर एक विस्तृत नज़र डालने से उन वर्षों में हिंसा की तीव्रता स्पष्ट दिखाई देती है। अखबार के मुख्य पन्नों पर भारी संख्या में हिंसक घटनाओं का जिक्र आपको मिलेगा।

 

पुलिस आधिकारियों द्वारा बताए गए आंकड़े जम्मू और कश्मीर के हालात पर सोचने को विवश करते हैं। वर्ष 1989 के अंत में 1,500 हिंसक घटनाएं दर्ज की गई थीं। इनमें 351 बम विस्फोट की घटनाएं शामिल थीं। विस्फोटों, ग्रेनेड लॉन्च, क्रॉस-फायरिंग, अपहरण और प्रदर्शनों की आवृत्ति बाद के वर्षों में बड़ी तेजी से बढ़ी। अकेले वर्ष 1990 में कम से कम 4,211 हिंसक घटनाएं दर्ज हुई , जिनमें विस्फोटक और ग्रेनेड हमले शामिल हैं। साल दर साल इन हमलों की संख्या घटती- बढ़ती रही है। वर्ष 2016 में हिंसक घटनाओं की संख्या 2,690 दर्ज की गई थी। इस वर्ष के पहले साढ़े चार महीनों में 1,000 मामले दर्ज हुए हैं।

 

कश्मीर में हिंसक घटनाएं, 1989-2016

Source: Data shared by an official of the Jammu & Kashmir police (1989-2002), and from the annual reports (2003-2016) of the Ministry of Home Affairs.

 

कश्मीर में संघर्ष की शुरुआत के बाद से ही स्कूलों और सरकारी कार्यालयों के कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

 

इन हमले के कारण सभी सरकारी विभागों के कर्मचारियों के साथ समन्वय में सभी शैक्षिक संस्थानों के कर्मचारी 14 सितंबर से लेकर 28 नवंबर, 1990 तक विरोध जर्ज कराते हुए लगातार हड़ताल पर रहे। सरकारी कर्मचारी मानवाधिकार के हनन पर नाराज थे।

 

इससे स्कूलों का कामकाज बंद रहा। जम्मू-कश्मीर पुलिस के क्राइम ब्रांच द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक, 1990 में अकेले अलगाववादी संगठनों द्वारा 125 हड़ताल का आह्वान किया गया था। इस तरह के दौर चलते रहे।वर्ष 2016 में 130 दिन ऐसे हुए, जब कर्फ्यू लगाया गया या बंद बुलाया गया था। मीडिया रिपोर्टों के विश्लेषण से पता चलता है इस वर्ष 1 मार्च, 2017 को स्कूलों और कॉलेजों को फिर से खोले जाने के बाद से कर्फ्यू और बंद ने सामान्य जीवन को 15 दिनों से भी ज्यादा बाधित किया है। ये आंकड़े कार्य दिवसों का करीब पांचवा हिस्सा यानी 19 फीसदी है।

 

कश्मीर: हड़ताल कर्फ्यू, विरोध प्रदर्शन के कारण प्रभावित कार्य दिवस

Source: Data compiled by the crime branch of the Jammu & Kashmir police, analysis of media reportsNote: Data not available for 1997, 1998 and 2004.

 

श्रीनगर की  रेइसा अख्तर आज भी याद करके सिहर उठती हैं कि कैसे 2016 में उसके बेटे को चार महीने के लिए घर के भीतर रहना पड़ा था।

 

विभिन्न सर्वेक्षणों और रिपोर्टों के विश्लेषण से पता चलता है कि 8 जुलाई, 2016 से शैक्षणिक संस्थान 197 कार्य दिवसों में से 80 दिन खुले रहे हैं। यानी 59.39 फीसदी कार्य दिवसों पर बंद रहे हैं।

 
रेइसा कहती हैं, “शुक्र है, अभी तक स्कूल खुले हैं। लेकिन हर कोई कहता है कि यदि स्थिति खराब हो जाती है, तो ज्यादा दिनों पर स्कूल खुले नहीं रहेंगे।” यह एक दिन या एक साल की स्थिति नहीं है।पिछले 27 वर्षों से कश्मीरी राजनीतिक उथल-पुथल, सुरक्षा, अशांति और मानवाधिकारों के हनन के जाल में फंसे हुए हैं।
 

(परवेज पत्रकार हैं और श्रीनगर में रहते हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 30 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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