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जेंडर डेटा पर भारत दिखा सकता है विश्व को रास्ता !

अनिता राज,

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लैंगिक समानता को मापने के नए तरीके विकसित कर अधिक लिंग-संवेदनशील सर्वेक्षण के जरिए भारत लिंग आंकड़ों के विज्ञान में सुधार लाने में विश्व का नेतृत्व कर सकता है।

 

ये आंकड़े जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता दिखाते हैं । इसमें संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के पांचवें लक्ष्य को प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। इस लक्ष्य का उदेश्य 2030 तक सभी देशों को लिंग समानता प्राप्त करना है और सभी महिलाओं और लड़कियों को सशक्त बनाना है।

 

आंकड़ों के समृद्ध स्रोतों और सक्षम शोधकर्ताओं के साथ देश जेंडर डेटा को बेहतर बनाने और लैंगिक समानता तथा महिला सशक्तिकरण में उनका उपयोग बढ़ाने के वैश्विक प्रयास को आगे बढ़ा सकते हैं।

 

लैंगिक समानता पर आंकड़े क्यों हैं महत्वपूर्ण हैं?

 

लिंग समानता की ओर आगे बढ़ने में एक राष्ट्र को सबसे पहले यह जानना चाहिए कि इसे बेहतर कैसे करना है। इसके लिए हमें लैंगिक आधार पर आंकड़ों की जरूरत है, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में वृद्धि की गति को माप सकते हैं और महिलाओं के समर्थन में आवाज उठा सकते हैं, उनकी पसंद और उनके स्वयं के जीवन और सुरक्षा पर नियंत्रण का समर्थन कर सकते हैं।

 

महिलाओं के विशिष्ट कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए वर्ष 2005 में स्थापित देश के लिंग बजट ने भारत में लिंग समानता में प्रदर्शित सुधारों में योगदान दिया है। फिर भी यह पर्याप्त नहीं है।  बेहतर आंकड़े उन क्षेत्रों को ध्यान देने में मदद कर सकता है, जिनके लिए इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, जैसे कि श्रम बल की भागीदारी या फिर यौन हिंसा पर रोकथाम जैसे मसले।

 

उदाहरण के लिए, घर से बाहर यौन हिंसा के मामले के बेहतर आकलन की जरूरत है। भारत में यौन हिंसा का सबसे करीबी राष्ट्रीय आकलन यह दर्शाता है कि 3 फीसदी महिलाओं ने शादी से अलग यौन हिंसा का अनुभव किया है। यह कुल समस्या का कम से कम आकलन है, क्योंकि भारतीय महिलाएं इस तरह के मामले में नुकसान या बदनामी के डर से रिपोर्ट नहीं गर्ज कराती हैं।

 

इसके विपरीत, घरेलू हिंसा पर राष्ट्रीय आकलन एक ठोस मापदंड पर आधारित है,और वर्ष 2006 में इसका दस्तावेज तैयार किया गया है। देश की एक तिहाई महिलाओं ने अपने पतियों से ऐसी हिंसा का सामना किया है। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद फंडिंग, कार्यक्रम, नीतियां और घरेलू हिंसा के खिलाफ मुकदमा चलाने में सुधार हुआ है, और 2016 से सबसे ताजा आकलन के अनुसार,  पूरे देश में घरेलू हिंसा में कमी आई है।

 

लैंगिक समानता में सुधार पर भारत का मिला-जुला रिकार्ड

 

ऐसे समय में जहां अन्य देश घरेलू हिंसा और बाल विवाह पर संसाधन और सुरक्षा कम कर रहे हैं, भारत ने इन मुद्दों पर प्रगति की है।

 

हाल ही में जारी किए गए राष्ट्रीय आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में महिला सशक्तिकरण के मामले में वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए, पिछले एक दशक में बाल विवाह में 20 फीसदी की कमी आई है। यह आंकड़े 47 फीसदी से घट कर 27 फीसदी हुए हैं। जबकि घरेलू हिंसा में रिपोर्टिंग की संख्या 37 फीसदी से घटकर 29 फीसदी हुई है। ये आंकड़े राष्ट्रीय परिवार के स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2015-16 (एनएफएचएस -4) के हैं।

 

फिर भी सर्वेक्षण बताता है कि भारत में, प्रति 1,000 लड़कों पर 919 लड़कियों के आंकड़े के साथ एक विषम लिंग अनुपात होना जारी है। इसके अलावा श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी वर्ष 2006 में 29 फीसदी से घटकर वर्ष 2016 में 25 फीसदी हो गई है।

 

इसी तरह, 144 देशों की विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक लिंग अंतर सूची में भारत की समग्र रैंकिंग 2006 में 98 से बढ़कर 2016 में 87 हुई है।

 

यहां विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि राजनीतिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में इसकी रैंकिंग 9 है, जबकि वर्ष 2006 में 20 थी। हालांकि, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में भारत नीचे खिसककर 110 से 136 पर, शैक्षिक प्राप्ति में 102 से 113, और स्वास्थ्य और जीवन स्तर में 103 से 142 पर पहुंचा है।

 

लिंग संबंधी बेहतर और अधिक आंकड़ों का लिंग समानता में योगदान

 

विश्व स्तर पर  कई क्षेत्रों में महिलाओं की प्रगति का आकलन करने की उपाय में कमी है। यौन उत्पीड़न, घरेलू श्रम वितरण और समय-प्रबंधन सहित 80 फीसदी संकेतक  और स्थानीय राजनीतिक भागीदारी, जो एसडीजी में महिलाओं के सशक्तिकरण के लक्ष्य का हिस्सा हैं, उन संकेतकों के बारे में प्रगति मापने का कोई तरीका नहीं है। दूसरे शब्दों में, हम महिला सशक्तिकरण में सुधार के लिए अपने लक्ष्य का 80 फीसदी नहीं माप सकते, और अगर हम उन्हें माप नहीं सकते हैं, तो हम यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि हम इस मामले में प्रगति कर रहे हैं।

 

जेंडर डेटा पर कैसे भारत दिखा सकता है विश्व को रास्ता?

 

सशक्तिकरण की राह पर प्रगति को समझना मुश्किल लग सकता है, खासकर जब महिला सशक्तिकरण संकेतकों के महत्वपूर्ण अनुपात का आकलन करने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं हैं। लेकिन हमें उदाहरणों के लिए केवल बाल विवाह और घरेलू हिंसा के मुद्दों पर भारत की प्रगति पर ध्यान देना चाहिए जहां डेटा,  समर्थन, समर्पित संसाधन आवंटन और साक्ष्य आधारित योजना से कुछ सुधार हुआ है।

 

उदाहरण के लिए,  विशेषज्ञों के काम से पता चला कि, लिंग-तटस्थ आवंटन से महिलाओं और लड़कियों की तुलना में अधिक पुरुष लाभान्वित हुए, जिसके परिणामस्वरूप 2005 में लिंग बजट विकसित हुआ। 2018 में यह लिंग बजट 18 फीसदी बढ़ाया जाएगा। इस मामले पर इंडियास्पेंड में फरवरी 2017 की इस रिपोर्ट को देखा जा सकता है।

 

सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए आंकड़ों के उपयोग का एक हालिया उदाहरण पेंटापार्टम महिलाओं का एक सर्वेक्षण है, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों पर बच्चे के जन्म के दौरान उनकी देखभाल की की गुणवत्ता को समझने के लिए किया गया था। हैं। सर्वेक्षण में लगभग पांच में से एक महिला ने अपने स्वास्थ्य प्रदाता द्वारा प्रसव के दौरान स्वास्थ्य देखभाल सुविधा में दुर्व्यवहार की शिकायत की, जिसमें भेदभाव भी शामिल है।

 

सर्वेक्षण के डेटा को बड़ी तेजी से अधिकारियों तक पहुंचाया गया था, जिन्होंने इस मुद्दे पर सुधार के लिए नीतियों और कार्यव्यवहार में आवश्यक बदलाव किये।

 

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 80 से अधिक सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों में सर्वेक्षण में दर्शाए किए गए उपायों के माध्यम से स्वास्थ्य प्रदाता-दुर्व्यवहार पर नज़र रखा जा रहा है।

 

यह सर्वेक्षण (जिसमें यह लेखक शामिल था) उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्रालय और उत्तर प्रदेश स्थित अनुसंधान संगठन संबोधी के सहयोग से किया गया था और इसे बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से आर्थिक सहायता मिली थी।

 

भारत एक मजबूत जनसांख्यिकीय और स्वास्थ्य सर्वेक्षण, जनगणना डेटा, शिक्षा रिपोर्ट का वार्षिक सर्वेक्षण और अन्य बड़े पैमाने पर प्रतिनिधि डेटा पर अनुकूल स्थिति में है, जो पूरे देश के साथ प्रत्येक राज्य और जिले के लिए काफी मददगार हैं। इन आंकड़ों के निष्कर्षों के बारे में जानकारी देने और प्रदान करने के लिए देश में सामाजिक वैज्ञानिकों का एक समर्थ दल भी मौजूद है।

 

ये सर्वेक्षण विशेष रूप से महिलाओं की समानता और सशक्तिकरण के मुद्दों जैसे बाल विवाह, घरेलू हिंसा, और महिलाओं के श्रम बल और राजनीतिक भागीदारी पर आंकड़े प्रस्तुत करते हैं।

 

इसके अलावा, भारत में जनसंख्या, अर्थशास्त्र और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त शोधकर्ता शामिल हैं, जिन्होंने महिलाओं और लड़कियों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों और अनुभवों को समझने के लिए आंकड़ों का इस्तेमाल किया है।

 

सामान्य रुप में भारत में नीति परिवर्तन और प्रभाव की वकालत के लिए लैंगिक आंकड़ों पर पकड़ और उपयोग करने की वैज्ञानिक क्षमता पहले से ही मौजूद है, जिससे यह अधिक संभावना बनती है कि बेहतर आंकड़ों से जमीनी रुप से बदलाव होंगे।

 

लिंग संबंधी डेटा को बेहतर बनाने की  संभावनाएं

 

दुर्भाग्य से, भारत के आंकड़े (और वैश्विक आंकड़े) हमें जीवन के विकल्पों, संपत्ति और अवसरों पर महिलाओं और लड़कियों के अनुभवों को समझने में मदद करने के लिए कुछ नहीं करते हैं, जो उन विकल्पों को सुविधाजनक बना सकते हैं और सामूहिक प्रयासों से वे अपनी परिस्थितियों या विकल्पों को बदल सकते हैं।

 

उप-सहारा अफ्रीका में पायलट अनुसंधान नए उपायों को बनाने और अनुकूलित करने के लिए महत्वपूर्ण तरीकों का दस्तावेज करता है, जो कुछ संसाधनों और निम्न स्तर के शिक्षा के साथ समायोजन में सार्थक हैं। इसमें कृषि उत्पादन सहित विभिन्न मुद्दों पर महिला स्वायत्तता और एजेंसी का आकलन करने के लिए लघुचित्र या संक्षिप्त कहानियां शामिल हैं।  देशों ने कृषि उत्पादन से संबंधित फैसले पर महिलाओं के नियंत्रण पर सर्वेक्षण मूल्यांकन किया है।

 

इस तरह के दृष्टिकोण भारत में भी लागू किए जा सकते हैं, और स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम, सुरक्षा में विस्तार कर सकते हैं और लिंग आधारित हिंसा को रोक सकते हैं ।

 

इन मुद्दों पर हमारे लिंग आंकड़ों को बेहतर बनाने से सशक्तिकरण की दिशा में हमारी निगरानी और बेहतर हो सकती है और हम अन्य देशों को भी आगे का रास्ता दिखा सकते हैं।

 

लिंग आंकड़ों को सुधारने के प्रयास और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए इसका उपयोग सहयोगी रूप से आरंभ करने के लिए, भारत में लैंगिक असमानताओं के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने वाले अग्रणी शोधकर्ताओं (मातृ देखभाल के लिए महिला श्रम बाजार में भागीदारी, किशोर मानसिक स्वास्थ्य के लिए लड़की की शिक्षा ) ने 28 फरवरी, 2017 को दिल्ली में एक बैठक की। यह बैठक  एक नई पहल के तहत की गई थी, जिसे ‘एविडेंस बेसड मेजरस ऑफ एम्पावर्मेंट फॉर रिसर्च ऑन जेंडर इक्वालिटी’ ( ईएमआरजेईजी ) कहा गया है।

 

ईएमआरजेईजी का उद्देश्य भारत में स्वास्थ्य और विकास के लिए लैंगिक समानता और सशक्तिकरण के माप में नए विज्ञान का सहयोग निश्चित करना है। विशेषज्ञों की इस पहली बैठक में भारत में सबूतों और अनुभवों के संबंध में हमारी जानकारी, सीख और बदलाव पर चर्चा की गई है।

 

अगले चरण में, एसडीजी 5 की ओर बढ़ने के लिए राष्ट्रों का ट्रैक रखने के लक्ष्य के साथ यौन उत्पीड़न और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, प्रजनन और मातृ स्वास्थ्य में स्वायत्तता और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे मुद्दों के लिए जरूरी उपायों का विस्तार शामिल है।

 

अगर भारत अपने आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार लाने और महिलाओं के सशक्तिकरण के नए उपायों का सृजन करने के लिए मौजूदा आंकड़ों और लिंगों पर अधिक से अधिक समानता के लिए शोध जारी रख सकता है, तो यह न केवल भारत के लिए, बल्कि दुनिया के लिए एक अच्छी शुरुआत होगी।

 

(अनीता राज सैन डिएगो के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में सेंटर ऑन जेंडर ईक्विटी एंड हेल्थ की निदेशक और मेडिसन एंड ग्लोबल प्बलिक हेल्थ की प्रोफेसर हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 28 मार्च 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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