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जेटली की चार चुनौतियां – अर्थव्यवस्था, खेती, नौकरियां और नोटबंदी

इंडियास्पेंड टीम,

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अहमदाबाद के एक फर्नीचर वर्कशॉप के अंदर काम करता एक कारीगर। अपने चौथे बजट प्रस्तुत करने के दौरान, वित्त मंत्री अरुण जेटली के सामने कृषि क्षेत्र में दो साल के सूखे से उबरने का संकट, सात सालों से निर्माण कंपनियों की बिक्री में गिरावट और नोटबंदी के बाद निर्माण और कपड़ा क्षेत्र में मंदी जैसी चुनौतियां प्रमुख होंगी।

 

1 फरवरी, 2017 को वित्त मंत्री अरुण जेटली, अपना चौथा बजट पेश  करेंगे। इस बजट में जेटली वेतनभोगी वर्ग के लिए कर में अतिरिक्त छूट, मंदी की मांग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खर्च में वृद्धि और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले भारतीयों ( पिछली गणना में 17.2 करोड़ ) के लिए बुनियादी सुविधाएं और नियमित आमदनी के लिए जमीन तैयार करने की पेशकश कर सकते हैं।

 

जेटली की मुख्य चुनौतियों में से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र कृषि है, जिस पर 58 फीसदी ग्रामीण परिवार निर्भर करता है। कृषि क्षेत्र अब भी पिछले दो साल के सूखे की मार से उबर रहा है। हमने पहले भी बताया है कि किस प्रकार 140 वर्षों में पूर्वोत्तर मानसून बद्तर होता चला गया है। साथ ही सात सालों में विनिर्माण कंपनियों की बिक्री में गिरावट और 8 नवंबर 2016 को सरकार द्वारा 500 और 1,000 रुपए के नोटों को अमान्य घोषित करने के बाद निर्माण और कपड़ा क्षेत्र में आई मंदी भी वित्त मंत्री के लिए गंभीर चुनौतियां होंगी। हम बता दें कि कृषि के बाद निर्माण क्षेत्र और कपड़ा उद्योग संयुक्त रुप से देश में काफी मात्रा में लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करते हैं।

 

कुल मिलाकर, ये आर्थिक संकेतक युवा भारतीयों को रोजगार प्रदान करने के प्रयास को ख़तरे में डालते हैं – देश भर में आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल होने पर विभिन्न जाति समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन और आंदोलन की कई घटनाएं भी देखी जा रही हैं।

 

इस बजट में, अप्रैल-मार्च को वित्तीय वर्ष मानने की 150 साल के औपनिवेशिक परंपरा को समाप्त कर देश की मानसून और फसल के साथ जनवरी से दिसंबर को वित्तीय वर्ष बनाने की भी संभावना है। इस संबंध में इंडयास्पेंड ने दिसंबर 2016 में विस्तार से बताया है।

 

जेटली के द्वारा परंपरा को तोड़ने के साथ ही बजटीय वर्गीकरण में योजनागत व्यय और गैर-योजना व्यय के विलय की भी संभावना है। योजना आयोग भारत की इकोनॉमी का 5 साल के लिए खाका तैयार करता था, जिसे योजना अवधि के नाम से जाना जाता था. इसी के लिए प्‍लान और नॉन प्‍लान एक्सपेंडिर का क्‍लासिफिकेशन किया गया था, जो अब शायद समाप्त हो जाएगा।  यह परंपरा 1952 में शुरू हुई थी।

 

तेल की कीमत कम होने से सरकार खुश, लेकिन अर्थव्यवस्था का संघर्ष जारी

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार वर्ष 2013-14 के बाद से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली गिरावट से लाभान्वित हुई है। वर्ष 2015-16 में इससे सरकार को 2.7 लाख करोड़ रुपए ( 39 बिलियन डॉलर ) की बचत हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2016 में विस्तार से बताया है। यह बचत उपभोक्ताओं तक पारित नहीं किया गया है जिन्होंने पेट्रोलियम उत्पादों पर अधिक करों का भुगतान किया है; पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क की अब तक आबकारी राजस्व में 50 फीसदी की हिस्सेदारी है, जैसा कि 20 जनवरी, 2017 को ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ में टी एन नैनन ने लिखा है।

 

हालांकि, मोदी सरकार ने केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी 32 फीसदी से 42 फीसदी बढ़ाने के लिए 14 वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है, लेकिन वास्तव में राज्यों को दिया जाने वाला पैसा 26 फीसदी से 39 फीसदी के बीच हो सकता है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 4 मार्च 2015 को विस्तार से बताया है।

 

जेटली ने वर्ष 2016 में, कृषि के लिए आवंटन में 84 फीसदी की वृद्धि की है, लेकिन लागत के लिए समायोजित करने के बाद, एक दशक (2003-2013) में एक भारतीय किसान की आय में प्रति वर्ष प्रभावी ढंग से 5 फीसदी की वृद्धि हुई है, जैसा कि पांच वर्षों में किसानों की आय को दोगुना करने की जेटली की घोषणा पर सवाल उठाते हुए इंडियास्पेंड ने मार्च 2016 में अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

20 जनवरी, 2017 के बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, 6.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर रबी फसल बोया गया है। ये आंकड़े पिछले साल ( वर्ष 2014 और 2015 सूखे का साल रहा है)  की तुलना में 6 फीसदी और पांच वर्षों के औसत की तुलना में 34 फीसदी ज्यादा है।

 

हालांकि, चिंता का विषय पीछे हटता पूर्वोत्तर मानसून है। आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून को महत्व देते हुए इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले 140 वर्षों में वर्ष 2016 का पूर्वोत्तर मानसून सबसे बद्तर रहा है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 17 जनवरी, 2017 को विस्तार से बताया है।

 

जल संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु सरकार ने राज्य में पहले ही सूखे की घोषणा कर दी है। दक्षिण भारत में संयुक्त जलाशय का स्तर अपनी क्षमता के 30 फीसदी पर है।

 

उद्योगों का परिदृश्य भी सरकार के लिए चिंता का विषय है। हालांकि, पिछले साल की तुलना में नवंबर 2016 में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में 5.7 फीसदी की वृद्धि हुई है, लेकिन बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां और सुस्त आर्थिक विकास से पिछले छह सालों में कॉर्पोरेट उधार में 60 फीसदी की गिरावट हुई है।  इंडियास्पेंड ने 13 जनवरी, 2017 को इस संबंध में विस्तार से बताया है।

 

पिछले दो वर्षों में कुछ औद्योगिक वसूली स्पष्ट हुए हैं, लेकिन नोटबंदी के बाद स्थिति पहले जैसी हो गई है।

 

नोटबंदी और बजट पर इसका प्रभाव

 

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दिसंबर 2016 को दिए गए मौद्रिक नीति वक्तव्य के अनुसार पूरी अर्थव्यवस्था में से 17 लाख करोड़ रुपए का विमुद्रीकरण हुआ है। (विस्तृत जानकारी के लिए यहां क्लिक करें)इससे पहले के अनुमान वाला वृद्धि दर 7.6 फीसदी कम होकर 7.1 फीसदी पर आ गया है। सांख्यिकी मंत्रालय के नवंबर 2016 के आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के (जुलाई-सितंबर) के दूसरी तिमाही का विकास 7.1 फीसदी हुआ है। जबकि पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में यह दर 7.3 फीसदी था।

 

पिछले वर्ष की तुलना में, नौ महीने की अवधि (अप्रैल-दिसंबर, 2016) में प्रत्यक्ष कर संग्रह (आयकर, कॉरपोरेट टैक्स) में 12 फीसदी वृद्धि होकर 5.5 लाख करोड़ रुपए तक हुआ है। जबकि अप्रत्यक्ष कर संग्रह (उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क) 25 फीसदी बढ़ कर 6.3 लाख करोड़ रुपए हुआ है। यह जानकारी वित्त मंत्रालय के आंकड़ों में सामने आई है। कुछ आंकड़े  मंदी के डर को धता बताते है, हालांकि कई क्षेत्र अब भी मंदी की सूचना दे रहे हैं।

 

जेटली ने वर्ष 2016-17 के लिए 19.8 लाख करोड़ रुपए का बजट पेश किया था, जो कि 2015-16 के 17.8 लाख करोड़ के बजट अनुमान से 11 फीसदी ज्यादा था। (8 नवंबर, 2016 को 500 रुपए और 1000 रुपए के नोटों को अमान्य घोषित करने से पहले संचलन में नकदी के बराबर)

 

वर्ष 2019 में आम चुनावों के लिए केवल दो वर्ष बाकी हैं। मोदी सरकार के लिए शिक्षा के स्तर और स्वास्थ्य संकेतकों की चिंताजनक स्थिति के साथ-साथ हर महीने लाखों नौकरियों के अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती होगी। वर्ष 2020 तक भारत कामकाजी लोगों में वृद्धि के लिहाज से अग्रणी देश बन जाएगा। एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय तक एक अरब लोग रोजगार बाजार में प्रवेश के लिए तैयार होंगे।  इसके लिए अभी से लिए शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों ही महत्वपूर्ण मुद्दे माने जा रहे हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज में 31 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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