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जेल की धमकी के बावजूद डॉक्टर और केमिस्ट नहीं दे रहे टीबी की रिपोर्ट

स्वागता यदवार और श्रेया खेतान,

ILO TB PROJECT

 

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में 13 से 15 मार्च, 2018 तक हुए टीबी शिखर सम्मेलन की मेजबानी के एक सप्ताह बाद भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी एक अधिसूचना में घोषणा की गई है कि अगर डॉक्टर और फार्मासिस्टों ने सरकार को तपेदिक यानी टीबी के मरीजों की सूचना नहीं दी, तो उन्हें जेल भी हो सकती है।

 

अब, डॉक्टर, लैब और जांच में शामिल तकनीकी सहायक ( इसमें सार्वजनिक क्षेत्र भी शामिल हैं ) भारतीय दंड संहिता की धारा 269 (लापरवाही की वजह से दूसरों के जीवन के लिए खतरनाक बीमारी फैलने की संभावना) और धारा 270 (घातक रोग का खतरनाक तरीके से फैलने की संभावना) के तहत छह महीने से दो साल के बीच जेल जा सकते हैं।

 

कई कार्यकर्ता और डॉक्टर, जिनसे इंडियास्पेंड ने बात की, वे नए नियम से नाखुश थे, और कुछ ने इसे आपत्तिजनक, कठोर और अनावश्यक कहा। वे कहते हैं, यह निजी डॉक्टरों और केमिस्टों के साथ काम करने के बजाय विरोध का कारण बनता है।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में अनुमानित 2.7 लाख नए टीबी मामलों के साथ ( दुनिया में सबसे ज्यादा ) हर चौथा नया टीबी रोगी भारत से था। इनमें से, कम से कम आधे रोगी निजी क्षेत्र में इलाज करा रहे थे और उनका निदान और उपचार सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है।

 

नतीजतन, भारत के राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम, संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) के पास निजी क्षेत्र में टीबी का पता लगाने, उपचार और इलाज दर पर सही संख्या नहीं है। इससे बीमारी को रोकने और इलाज करने के लिए सरकार के प्रयासों में बाधा आई है । यानी वर्ष 2025 तक इस रोग को समाप्त करने के कथित लक्ष्य को पूरा करने के प्रयासों में रुकावट आ रही है।

 

इसका गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभाव है। कुछ खास तरह के टीबी, यदि उपचार रहित छोड़ दिया जाता है, तो संक्रामक होते हैं। यदि  टीबी का गलत तरीके से या अपूर्ण तरीके से इलाज किया जाता है तो इसका परिणाम टीबी जीवाणु, मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस में होता है, जो मौजूदा औषधियों के लिए प्रतिरोधी विकास है। नियमित रूप से टीबी के मुकाबले दवा प्रतिरोधी टीबी अधिक कठिन और महंगा है।

 

हालांकि भारत ने नियमित टीबी के नए मामलों की संख्या (2015 से 2016 तक 3.5 फीसदी तक) और टीबी के कारण होने वाली मौतों को कम करने में कामयाब रहा है (इसी अवधि में 12फीसदी से 423,000 तक), दवा प्रतिरोधी टीबी के रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है (13 फीसदी से 147,000), जैसा कि इंडियास्पेंड ने नवंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

कई नए कार्यक्रम, लेकिन अधिक सहयोग की जरूरत

 

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘दिल्ली इंड टीबी समिट’, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक और 20 देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों ने भाग लिया था, के उद्घाटन के अवसर पर कहा, “भारत मिशन मोड टीबी की चुनौती को हल करने के लिए निर्धारित है। मुझे विश्वास है कि 2025 तक भारत टीबी से मुक्त हो सकता है। “

 

भारत सरकार ने शिखर सम्मेलन में कई उपायों की घोषणा की। रोगियों के लिए मासिक पोषण समर्थन के लिए एक योजना, उपचार और निदान के लिए व्यापक सार्वजनिक-निजी साझेदारी मॉडल, और कार्यक्रम और उपचार पालन की निगरानी के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग। पहली बार, सरकार ने भारत में टीबी को समाप्त करने के लिए एक सामुदायिक भागीदारी के बारे में बात की है।

 

इन योजनाओं में से अधिकांश 2017 में तैयार किए गए टीबी उन्मूलन के लिए पहले से ही राष्ट्रीय सामरिक योजना का हिस्सा हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने मार्च, 2017 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।

 

आमतौर पर, सभी नए प्रस्तावों को एक मिशन स्टीयरिंग समूह के सामने पेश किया जाना चाहिए, जिसमें स्वास्थ्य और अन्य संबंधित मंत्रालयों, राज्य स्वास्थ्य मंत्रियों और 10 स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हैं। पिछले समूह को 2017 में भंग कर दिया गया था, और एक नया समूह नहीं बनाया गया है।

 

नतीजतन, “दंडनीय डॉक्टरों के फैसलों पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए, लेकिन पूछताछ नहीं हुई”, जैसा कि छत्तीसगढ़ स्थित गैर-लाभकारी जन स्वास्थ्य सहयोग (जेएसएस) के संस्थापक सदस्य योगेश जैन ने कहा, जो पिछले स्टीयरिंग ग्रुप के सदस्य थे।

 

लापता 10 लाख टीबी के मामलों की खोज

 

रिफांसिन, टीबी की मुख्य दवा सहित दवाओं की बिक्री के आधार पर 2016 के एक अध्ययन का अनुमान है कि वर्ष 2014 में 1.19 से 5.24 मिलियन के बीच मरीजों का इलाज निजी क्षेत्र में हुआ है।

 

हालांकि, 2017 के दौरान निजी क्षेत्र से निक्षय के साथ केवल 395,691 मामले दर्ज किए गए थे – आरएनटीपी के साथ पंजीकृत 1.86 लाख टीबी के मामलों में पांचवीं, या 21.2 फीसदी की तुलना में अधिक लेकिन अनुमानित आंकड़ों के आसपास नहीं।

 

टीबी रोगियों को रिपोर्ट करने में विफलता को दंडित करके, अनियमित निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में देखभाल करने वाले अधिक रोगियों को सरकार के दायरे में लाया जा सकता है या निजी क्षेत्र में देखभाल जारी रखने के दौरान अधिक सरकारी सहायता प्रदान की जा सकती है।

 

हालांकि, कई विशेषज्ञ रोगियों की सूचना नहीं करने पर डॉक्टरों के लिए जेल की सजा सहित आपराधिक सजा का समर्थन नहीं करते हैं। मुंबई में शिवड़ी टीबी अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ललित अनंदे ने कहा, “निजी डॉक्टर टीबी के मरीजों को इलाज से इनकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन इस अधिसूचना के बाद वे कर सकते हैं।” उन्होंने कहा कि टीबी पर काम करने वाले बहुत कम अच्छे निजी छाती रोग विशेषज्ञ हैं, और यह नया फैसला उन्हें हतोत्साहित कर सकता है।

 

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय सचिव जयेश लेले ने कहते हैं, ” दंड थोड़ा ज्यादा और कठोर है, लेकिन इसके पीछे अच्छे कारण हैं।”वह कहते हैं, डॉक्टर टीबी रोगियों को रिपोर्ट करने में 2012 के जनादेश का पालन करने में नाकाम रहे हैं, जिससे दवा प्रतिरोधी टीबी के मामलों में वृद्धि हुई है और रोगियों के इलाज की लागत में वृद्धि हुई है।

 

महाराष्ट्र राज्य के एंटी टीबी एसोसिएशन के सचिव और तकनीकी सलाहकार यतीन ढोलकिया ने कहते हें कि कारावास के बजाय सरकार को अमेरिका द्वारा चलाए जाने वाले पेनल्टी के तीन स्तरों को लागू किया जाना चाहिए। संयुक्त राज्य अमेरिका की चिकित्सा परिषद पहले अपराध पर जुर्माना लगाती है, दूसरी बार में बड़ा जुर्माना और बार-बार उल्लंघन करने पर पंजीकरण का निलंबन। वे कहते हैं, “महाराष्ट्र सरकार अगले तीन सालों के दंड के साथ एक समान बिल बनाने की योजना बना रही है जिसे अगले शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है।”

 

कठोर दंड, टीबी दवाओं के लिए एक नया भूमिगत बाजार बना सकता है, जैसा कि ‘ग्लोबल कोएलिशन ऑफ टीबी एक्टिविस्ट’ के सीईओ और एक राष्ट्रीय गठबंधन टच्ड बाई टीबी के समन्वयक ब्लेसिना कुमार ने इंडियास्पेंड को बताया है। यह कदम रिपोर्टिंग को बढ़ाने के लिए काम कर सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार कसौटी पर नजर रखती है और यह देखें किसने टीबी के मामलों की रिपोर्ट नहीं की है।

 

रिपोर्ट में विफलता के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को भी दंडित किया जा सकता है। मरीज की सरकारी प्रणाली के साथ पंजीकृत होने के बाद, सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को उनके घर पर जाना चाहिए, उन्हें और उनके परिवारों से सलाह देना, उपचार प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करना और उपचार पूरा होने तक उनका पालन करना चाहिए। संभावित मामलों में टीबी रोगियों के संपर्कों को भी पता लगाना चाहिए और पात्र मामलों में निवारक उपचार प्रदान करना चाहिए। अगर किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी टीबी के रोगी के बारे में सूचित किए जाने के बाद उचित सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्रवाई नहीं करता है, तो उन्हें जुर्माना या कैद या दोनों किया जा सकता है।

 

सुरक्षा की सोच

 

दिल्ली इंड टीबी शिखर सम्मेलन में, सरकार ने टीबी के नए मामलों की रिपोर्ट करने के लिए निजी डॉक्टरों के लिए एक हजार रुपये प्रोत्साहन की घोषणा की। यह प्रोत्साहन स्वास्थ्य श्रमिकों, पड़ोसियों, केमिस्टों और रोगियों पर भी लागू होगा।

 

‘ग्लोबल कोएलिशन ऑफ टीबी एक्टिविस्ट’ के कुमार कहते हैं, “हम टीबी के मामलों को सूचित करने पर दिए जाने वाले प्रोत्साहन का विरोध करते हैं। ऐसी स्थिति की कल्पना करें जिसमें आपका पड़ोसी आपको दो सप्ताह तक खांसते हुए सुनता है और आपके मामले की रिपोर्ट करता है, और लोग आपके घर में दिखाई देते हैं? यह मरीजों को अपराधी बना देगा, उन्हें सशक्त नहीं करेगा “।

 

शिवड़ी टीबी अस्पताल के अनण्डे कहते हैं, “डॉक्टरों को रोगियों को सूचित करने या इलाज करने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि, मरीजों की गोपनीयता की रक्षा होनी चाहिए।

 

आधार एक अवरोध

 

1 अप्रैल, 2018 से, सरकार बैंक खाते में सीधे लाभ हस्तांतरण के माध्यम से प्रत्येक टीबी रोगी 500 रुपये का पोषण समर्थन देगी।

 

10 लाख से अधिक टीबी रोगियों को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता है,  जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई 2017 में रिपोर्ट किया गया था। मध्यम या उच्च स्तर के जीवन स्तर के लोगों की तुलना में निम्न जीवन स्तर वाले लोगों में टीबी का प्रसार 3.7 गुना अधिक था।

 

पोषण संबंधी सहायता प्राप्त करने के लिए, नवंबर 2017 की सरकार के परिपत्र के अनुसार, रोगियों को अपने आधार और आधार-लिंक किए गए बैंक खाते का विवरण देना होगा।

 

दिल्ली इंड टीबी शिखर सम्मेलन के दौरान विभिन्न राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों के साथ बैठक में अतिरिक्त सचिव और मिशन निदेशक मनोज झालानी ने कहा कि आधार-लिंक्ड बैंक खातों के बारे में आंकड़े कम हैं। मिसाल के तौर पर, राजस्थान में टीबी के केवल 20 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 40 फीसदी रोगियों में आधार कार्ड से जुड़े बैंक खाते का ब्योरा दिया गया है, जैसा कि दोनों राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों ने बताया है।

 

झालानी ने कहा कि यह राज्यों का फैसला होगा कि वे पोषण का समर्थन कैसे प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ ने नकद हस्तांतरण के बजाय भोजन राशन वितरित करने का निर्णय लिया है।

 

जन स्वास्थ्य सहयोग के जैन कहते हैं, “इस तथ्य के आधार पर किसी के सामाजिक अधिकार को नकार  जा सकता है कि अगर उनके पास आधार संख्या से जुड़ा खाता नहीं है या यदि उनके बायोमैट्रिक मैच गलत हैं।” उन्होंने कहा कि जेएसएस उन कुछ संगठनों में से एक था जिन्होंने टीबी रोगियों को पोषण सहायता प्रदान करने के लिए सरकार को समझाया था, लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि यह ‘रोगियों के सहयोग से इनकार करने का एक तंत्र’ बन जाएगा।

 

टीबी के खिलाफ भारतीय गैर लाभ वाले उत्तरजीवी के संयोजक चपल मेहरा ने कहा, “इस योजना को प्राप्तकर्ताओं तक पहुंचने के लिए प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता होगी। हमें यह भी सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि पैसा पौष्टिक उद्देश्यों के लिए उपयोग हो और इसमें मुद्रास्फीति की दर को देखा जाए।”

 

2017 के बाद से परिवर्तनों का दौर

 

2017 के बाद से, सरकार ने आरएनटीसीपी पर अपने खर्च को दोगुना कर दिया है, एक अधिक सफल उपचार के लिए आहार पर गई सरकार, दवाओं के प्रतिरोध के परीक्षण के लिए प्रत्येक जिले में मशीनें उपलब्ध कराई गई, और उपचार और परामर्श में पहुंच बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र से भागीदारी की है।

 

जब इंडियास्पेंड ने दिल्ली में कुछ डीओटीएस (डायरेक्ट ऑब्सेड थेरेपी (लघु कोर्स)) का दौरा किया, जहां आरएनटीसीपी के साथ पंजीकृत रोगी टीबी की दवाएं लेते हैं, तो कई डीओटीएस प्रदाताओं ने कहा है कि वे अपने सुपरवाइजर्स द्वारा निर्देशित मरीजों के आधार नंबर और आईएफएससी कोडों को ध्यान में रखते हैं। लेकिन सीधे हस्तांतरण के विचार पर सभी सहमत नहीं थे।

 

नाम न बताने की शर्त पर एक डॉट्स प्रदाता ने इंडियास्पेंड को बताया, “यह बेहतर होगा यदि सरकार मरीजों को प्रोटीन पाउडर प्रदान करने की योजना जारी रखे, जैसा कि पिछले कुछ वर्षों में किया था, जिससे कई मरीजों को वजन बढ़ाने में मदद की।

 

हाल ही में आरएएनटीसीपी ने पिछले वैकल्पिक पाठ्यक्रम से दैनिक फिक्स-डोस के लिए स्थानांतरित कर दिया है। डॉट्स प्रदाताओं ने कहा कि दवाओं की कमी है और रोगियों के पर्चे पहले की तरह  पूरा सेट बनाए हुए  पैक में नहीं होते हैं। एक अन्य डॉट्स प्रदाता ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करने के लिए पैकेट को तोड़ रहे हैं कि हर दिन आने वाले सभी रोगियों के लिए पर्याप्त दैनिक खुराक हो।”

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं । खेतान एक लेखक-संपादक हैं। दोनों इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 मार्च, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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