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क्यों टूटे हुए शौचालयों की गणना करना है जरुरी?

रणजीत भट्टाचार्य और आदर्श गंगवार,

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वर्ष 2016 में, भारत में 96.5 फीसदी ग्रामीण प्राथमिक स्कूलों में शौचालय जरूर थे, लेकिन चार में से एक से अधिक शौचालय (27.7 9 फीसदी) या तो बेकार थे या उन पर ताले लगे थे। यह जानकारी ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर नागरिक नेतृत्व के सर्वेक्षण, एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट ( एएसईआर ) के लिए एकत्र किए गए आंकड़ों में सामने आई है। करीब 68.7 फीसदी स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय की सुविधा थी।

 

वर्ष 2016 में, 619 ग्रामीण भारतीय जिलों में से 589 में एएसईआर सर्वेक्षण किया गया था । सर्वेक्षणकर्ताओं ने 17,473 स्कूलों का दौरा किया था। एएसईआर सर्वेक्षण के तहत वर्ष 2009 के बाद से स्कूलों में पानी, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे पर आंकड़े एकत्र किया जा रहा है।

 

वर्ष 2010 से 2016 के बीच शौचालय वाले स्कूलों के अनुपात में 7.43 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है। इसी अवधि के दौरान कार्यात्मक शौचालयों की संख्या में 21.45 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है। लेकिन प्रगति की दर अब धीमी हो रही है । सरकारी एजेंसियां उपयोग करने योग्य शौचालयों पर आंकड़े एकत्रित नहीं कर रही हैं। मतलब यह कि मौजूदा सुविधाएं काम कर रही हैं और उपयोग करने योग्य हैं या नहीं इस पर आंकड़े एकत्र नहीं किए जा रहे हैं।

 

भारत में नेशनल सेंपल सर्वे, शिक्षा के लिए डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन सिस्टम(डीआईएसई), और जनगणना, जो पानी और स्वच्छता से संबंधित संकेतकों पर डेटा के प्रमुख स्रोत हैं, स्वच्छता के बुनियादी ढांचे की उपयोगिता को नहीं मापते हैं। अक्सर इस आधारभूत संरचना की उपलब्धता पर अधिक जोर देने के कारण स्वच्छता सुविधाओं की कार्यत्मक और उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

 

उत्तर-पूर्वी और केंद्रीय राज्यों में उपलब्धता और कार्यक्षमता के बीच का अंतर भारी है। इन राज्यों में केवल शौचालयों की उपलब्धता पर ध्यान केंद्रित करने से नीति निर्माताओं और विश्लेषकों को भ्रम हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि केवल उपलब्धता पर विचार किया जाता है, तो वर्ष 2014 में ग्रामीण उत्तर प्रदेश में 95.82 फीसदी और वर्ष 2016 में 95.35 फीसदी प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों के लिए शौचालय पाया गया है। लेकिन अगर हम इन शौचालयों की स्थिति को देखते हैं, तो

 

हम पाते हैं कि वर्ष 2014 में सिर्फ 54.9 2 फीसदी और 2016 में 54.83 फीसदी स्कूलों के शौचालय काम करने योग्य थे।

 

भारत में एक-चौथाई से ज्यादा स्कूलों में शौचालय इस्तेमाल योग्य नहीं

Source: Annual Status of Education Report

 

वैसे उपलब्धता के मामले में ,शौचालय की सुविधा वाले स्कूलों का प्रतिशत पिछले कुछ वर्षों में नब्बे तक होने की सूचना मिली है, जो स्कूलों में सार्वभौमिक स्वच्छता को दर्शाता है।

 

इस आंकड़ों के मुताबिक, भारत अब ‘समस्या की अंतिम चरण’ में है। यानी भारत को स्कूलों में 100 फीसदी शौचालय की उपलब्धता के लिए थोड़ा और प्रयास करने की जरूरत है।

 

लेकिन जब हम काम कर रहे शौचालयों के आंकड़ों को देखते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि भारत स्कूलों में सार्वभौमिक स्वच्छता प्राप्त करने में अभी काफी दूर है।

 

उदाहरण के लिए, मिजोरम के स्कूलों में बने शौचालयों में से आधे थोड़े अधिक (54.88 फीसदी ) शौचालय निष्क्रिय या बंद पाए गए।  इसी तरह की स्थिति मणिपुर (47.1 9 फीसदी), मेघालय (45.74 फीसदी), और नागालैंड (45.24 फीसदी) में देखी गई है।

 

अगर हम केवल शौचालयों की उपलब्धता पर विचार करते हैं, तो छात्रों द्वारा शौचालयों के इस्तेमाल में पहुंच न हो पाने के तथ्य के बावजूद इन स्कूलों के बारे में कोई सवाल नहीं उठाए जाते हैं।

 

कार्यक्षमता और उपलब्धता के बीच का अंतर उन राज्यों में भी देखा जा सकता है, जिनके विकास संकेतक बेहतर हैं। केरल में, 100 फीसदी स्कूलों में शौचालय था, लेकिन वर्ष 2016 में 18 फीसदी अनुपयोगी पाए गए थे। समय के साथ, इस्तेमाल करने योग्य शौचालयों की संख्या कम हुई है। वर्ष 2014 में, केरल के स्कूलों में कुछ ही शौचालय (15.2 फीसदी) अनुपयोगी थे।

 

शौचालयों की उपलब्धता की रिपोर्ट का फायदा क्या, जब साक्ष्य बताते हैं कि इन शौचालयों में से बहुत से अनुपयोगी हैं? स्वच्छता नीतियों के कार्यान्वयन और छात्रों पर इन नीतियों का प्रभाव सबसे अच्छा तब मापा जाएगा, जब हम शौचालयों की उपयोगिता पर जोर देंगे। ‘स्वच्छ भारत अभियान-ग्रामीण’ और ‘स्वच्छ भारत-स्वच्छ विद्यालय’ के संदर्भ में स्वच्छता के लिए बुनियादी सुविधाओं की संरचना को मापना या गिनना महत्वपूर्ण है। क्योंकि टूटे शौचालय हमें स्वच्छ भारत की कल्पना को साकार करते दिखाई नहीं देते हैं।

 

स्वच्छता में सुधार की दर में गिरावट

 

हालांकि, गुजरते समय के साथ काम कर रहे स्वच्छता प्रावधान के साथ स्कूलों में वृद्धि हुई है लेकिन भारत के राजनीतिक वादों में स्वच्छता महत्वपूर्ण मुद्दा होने और पिछले कुछ सालों में स्वच्छता नीतियों के लिए धन में वृद्धि होने के बावजूद देश के अधिकांश राज्यों में इस सुधार की गति धीमी है।

 

उदाहरण के लिए, असम में ,शौचालयों के साथ स्कूलों के अनुपात में वर्ष 2010 और 2012 के बीच 20 फीसदी, वर्ष 2012 और 2014 के बीच 6 फीसदी और वर्ष 2014 से 2016 के बीच 3 फीसदी की वृद्धि हुई है। आदर्श रूप से, राशि में वृद्धि के साथ  समय के साथ सुधार की दर भी बढ़नी चाहिए।  उपयोग हो रहे शौचालयों की संख्या संमग्र रूप से कम है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2010 में 33 फीसदी, वर्ष 2012 में 53 फीसदी, वर्ष 2014 में 59 फीसदी, और वर्ष 2016 में 62 फीसदी रहा है। इन आंकड़ों के बाज यह समझना कठिन नहीं है कि स्कूलों में बच्चे क्यों नहीं करते शौचालोयों का इस्तेमाल।

 

तमिलनाडु में वर्ष 2016 में स्कूलों में उपयोग करने योग्य शौचालय का आंकड़ा 79.4 फीसदी था। राज्य में वर्ष 2010 से 2012 के बीच काम करने योग्य शौचालयों के प्रतिशत में 23 फीसदी, वर्ष 2012 से 2014 के बीच 12 फीसदी की वृद्धि हुई । वहीं वर्ष 2014 से 2016 के बीच 0.41 फीसदी की गिरावट हुई है। उत्तर प्रदेश में, काम करने योग्य शौचालयों के साथ स्कूलों के अनुपात में वर्ष 2010 और 2012 के बीच 6 फीसदी, वर्ष 2012 और 2014 के बीच 2 फीसदी तक की वृद्धि हुई है, जबकि 2014 और 2016 के बीच स्थिर रहा है।

 

स्कूलों में स्वच्छता तक पहुंच

Source: Annual Status of Education Report

 

कामकाजी सफाई व्यवस्था में लिंग असमानता

ग्रामीण भारत में लड़कियों के लिए स्कूल छोड़ने की उच्च दर और गैर-नामांकन के कारणों में से एक स्कूलों में शौचालयों की कमी हो सकती है । यह चिंताजनक है कि लड़कियों के लिए कामकाजी सफाई व्यवस्था में सुधार की दर भी बहुत कम है।

 

अपेक्षाकृत समृद्ध राज्य, महाराष्ट्र में, वर्ष 2010 से 2012 के बीच शौचालयों के साथ लड़कियों के स्कूलों के प्रतिशत में 10 फीसदी, वर्ष 2012 और 2014 के बीच 6 फीसदी  और 2014 से 2016 के बीच 4 फीसदी की वृद्धि हुई है। वर्ष 2016 में, महाराष्ट्र के 62.5 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए काम करने योग्य शौचालयों की सूचना दी गई है।

 

दूसरी बात यह कि आंकड़े बताते हैं कि स्कूलों में लड़कों के लिए काम करने योग्य शौचालयों की तुलना में लड़कियों के लिए शौचालयों का अनुपात कम है। इसका मतलब हुआ कि लड़कों की तरह लड़कियां स्वच्छ सुविधाओं का लाभ नहीं ऊठा पाती हैं।

 

स्कूलों में, लड़कों की तुलना में काम करने योग्य शौचालयों तक लड़कियों की कम पहुंच

Source: Annual Status of Education Report

 

महाराष्ट्र में, 68 फीसदी स्कूलों में शौचालय थे। जबकि लड़कियों के लिए काम करने योग्य शौचालयों के आंकड़े 62.5 फीसदी थे। इसी तरह, पश्चिम बंगाल में, शौचालयों के साथ स्कूलों के दर्ज प्रतिशत और लड़कियों के लिए काम करने योग्य शौचालयों के साथ स्कूलों के दर्ज प्रतिशत के बीच अंतर वर्ष 2012 में 14.8 फीसदी, वर्ष 2014 में 24 फीसदी और वर्ष 2016 में 14.7 फीसदी देखा गया है।

 

ऐसा इसलिए है कि हम शोचालयों की उपलभ्धता पर तो ध्यान देते हैं लेकिन इस पक्ष को भूल जाते हैं कि वे इस्तेमाल करने लायक हैं या नहीं। अगर इस्तेमाल होने योग्य शौचालयों पर बात करेंगे तो ही   हम स्वच्छता और लिंग समानता में सुधार के दर जैसे संकेतक पर ठोस काम कर पाएंगे  और इन चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहतर नीति बना पाएंगे।

 

(भट्टाचार्य एएसईआर केंद्र में जल और स्वच्छता गतिविधियों का नेतृत्व करते हैं। गंगवार हरियाणा के अशोक विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के स्नातक छात्र हैं और हाल ही में एएसईआर के साथ ट्रेनिंग ली है। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 जुलाई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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