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ट्रैक का अत्यधिक इस्तेमाल भारतीय रेल यात्रा को बनाता है असुरक्षित

चारु बाहरी,

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21 जनवरी 2017 को आंध्र प्रदेश के विजयांग्राम जिले में कुनरु के पास 18448 हिरखंद (जगदलपुर-भुवनेश्वर) एक्सप्रेस के नौ कोच और इंजन पटरी से उतर गए। इस हादसे में 39 यात्रियों की मौत हो गई और 60 घायल हो गए। हादसे की विस्तृत खबर इस रिपोर्ट में दर्ज है।

 

28 दिसंबर 2016 को  कानपुर-टूंडला रेल मार्ग पर कानपुर से 70 किलोमीटर दूर रुरा के पास 12989 सियालदह-अजमेर एक्सप्रेस के 15 डिब्बे पटरी से उतर गए थे। इस रिपोर्ट के अनुसार, इस हादसे में दो यात्रियों की मौत हो गई और 65 घायल हो गए।

 

20 नवंबर 2016 को 19321 इंदौर-पटना एक्सप्रेस के 14 डिब्बे पटरी से उतर गए। यह घटना झांसी रेल डिवीजन में कानपुर से 60 किलोमीटर की दूरी पर पुखरायन के नजदीक घटी। इस रिपोर्ट के अनुसार, इस हादसे में 149 यात्रियों की मौत हुई थी और 182 घायल हुए थे।

 

पिछले चार महीनों के दौरान पटरी से ट्रेन के पलटने की प्रत्येक घटना में वजह बनी रेलवे ट्रैक का अत्यधिक इस्तेमाल। नीचे दिए गए मैप के अनुसार, इन लाइनों को अपनी क्षमता से ज्यादा चलाने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

 

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Source: Indian Railways, Lifeline of the nation; Click here for the high-resolution image.

 

फरवरी 2015 में जारी इंडियन रेलवे, लाइफलाइन ऑफ द नेशन श्वेत पत्र के अनुसार भारतीय रेल के 1,219 लाइन सेक्शन में से कम से कम 40 फीसदी का इस्तेमाल 100 फीसदी से ज्यादा हुआ है। तकनीकी रुप से किसी वर्ग का इस्तेमाल अगर अपनी क्षमता से 90 फीसदी ज्यादा होता है तो उसे संतृप्त माना जाता है।

 

भारतीय रेलवे ट्रैक की क्षमता का उपयोग

Source: Indian Railways, Lifeline of the nation

 

भीड़ की दर काफी है। यह भारतीय रेल नेटवर्क के 247 उच्च घनत्व वाले ट्रैक पर 65 फीसदी है। रेलवे की स्थायी समिति के सदस्य और राज्य सभा के सदस्य मुकुट मिथी कहते हैं, “आदर्श इस्तेमाल की दर लगभग 80 फीसदी होना चाहिए। ”

 

भारतीय रेलवे पर उच्च घनत्व नेटवर्क की लाइन क्षमता स्थिति

Source: Indian Railways, Lifeline of the nation

 

उपलब्ध आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि ट्रैक में अवरोध और ट्रेनों के पटरी से उतरने के दो मुख्य कारण हैं,  अत्यधिक यातायात और रेल बुनियादी ढांचे में कम निवेश।

 

अब जरा गौर करें: 15 वर्षों के दौरान पैसेंजर ट्रेनं की दैनिक संख्या में 56 फीसदी की वृद्धि हुई है। वर्ष 2000-01 में 8,520 से बढ़ कर वर्ष 2015-16 में 13,313 हुआ है।

 

इसी अवधि के दौरान माल गाड़ियों की संख्या में 59 फीसदी की वृद्धि हुई है। लेकिन 15 वर्षों में इन सभी ट्रेनों के लिए चल रहे ट्रैक की लंबाई में केवल 12 फीसदी का विस्तार हुआ है। ट्रैक की लंबाई 81,865 किमी से बढ़ कर 92,081 किमी हुआ है।

 

यदि आप वर्ष 1950 से वर्ष 2016 तक की अवधि को देखें तो रेलवे के बुनियादी ढांचे में कम निवेश साफ दिखाई देता है। रेलवे मार्ग की लंबाई में मात्र 23 फीसदी (किलोमीटर में ) का विस्तार हुआ है, लेकिन यात्रियों और माल ढुलाई में क्रमश:1,344 फीसदी और 1,642 फीसदी की वृद्धि हुई है। ये आंकड़े रेलवे की स्थायी समिति द्वारा रेलवे में सुरक्षा पर दिसंबर 2016 में जारी एक रिपोर्ट के हैं।

 

कानपुर के पास इंदौर-पटना एक्सप्रेस के 14 डिब्बों के पटरी से उतरने के कारणों की समीक्षा करते हुए उत्तर प्रदेश रेलवे पुलिस के महानिदेशक  गोपाल गुप्ता ने कहा कि इसका कारण विस्फोटक नहीं ‘रेलवे पटरियों की थकान’ है। यह बयान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के तोड़फोड़ के दावे से एकदम विपरित था।
 

गंगा रेल नेटवर्क पर सबसे ज्यादा जोखिम

 

फिजिएका ए जर्नल जर्नल पेपर भारत के एक्सप्रेस ट्रेन मार्गों पर यातायात प्रवाह पर और भारतीय रेलवे में हाल ही में हुए दुर्घटनाओं पर नजर डालती है। फिजिएका ए जर्नल पेपर-2012 के अनुसार, भारत के उच्च यातायात वाले ज्यादातर रेल मार्ग गंगा के मैदानी इलाकों में है। पेपर के अनुसार  वर्ष 2010 में पटरी से उतारने या टकराव की वजह से हुई 11 प्रमुख दुर्घटनाओं में से आठ  इसी क्षेत्र में हुई हैं।

 

दिल्ली-टुंडला-कानपुर अनुभाग भारत के सबसे जोखिम वाले एक्सप्रेस ट्रेन ट्रंक मार्ग के रूप में चिह्नित हैं। उपर बताए गए तीन हाल के दुर्घटनाओं में से एक इसी खंड में हुई है।

 

पेपर के अनुसार, विशेषकर गंगा के मैदानी इलाकों में रेल यातायात इतना अधिक है कि “अगर सभी ट्रेनें समय तालिका के अनुसार चलने लगेंगी  तो भारतीय रेलवे का वर्तमान बुनियादी ढांचा परिणामी ट्रैफिक-प्रवाह को संभालने में सक्षम नहीं होगा।”

 

पेपर के अनुसार, “भारतीय रेलवे अधिकारी इस स्थिति का प्रबंधन ‘सिगनल पर रेलगाड़ियों को इंतजार कराते हुए’ करते हैं। इस वजह से ही ट्रेन लगतार देरी से चलती है और मानवीय चूक की स्थिति में दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है।”

 

बजट के बाद हर साल बढ़ती है भीड़

 

नई रेलगाड़ियों की घोषणा और ट्रैक विस्तार के बिना कोई वादे के साथ हर साल भारत की पटरियों पर भीड़ बढ़ती है।  मिथि कहते हैं कि आम लोगों की मांगों के जवाब में रेल बजट के दौरान घोषित हर नई रेलगाड़ी से भारतीय रेल नेटवर्क पर भीड़ बढ़ जाती है।

 

उदाहरण के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस साल, तीर्थयात्रा और पर्यटन केन्द्रों के लिए नई समर्पित रेलगाड़ियों की घोषणा की है।

 

भारतीय रेलवे द्वारा नियुक्त उच्च स्तरीय सुरक्षा समीक्षा समिति की फरवरी 2012 की रिपोर्ट कहती है कि बुनियादी सुविधाओं के अनुरूप इनपुट के बिना नई ट्रेनें चलाने का अभ्यास बंद करना चाहिए। यह समिति भारतीय रेल की सुरक्षा की समीक्षा के लिए अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में बनाई गई थी। समिति ने सुधार की सिफारिशें भी की हैं।

 

लेकिन किसी ने भी इस सलाह की ओर ध्यान नहीं दिया है। नतीजा यह है कि पिछले 15 वर्षों में यात्रियों की संख्या और उनके द्वारा तय की जाने वाली यात्रा की दूरी दोनों में 150 फीसदी की वृद्धि हुई है। माल ढुलाई भी दोगुनी हुई है।

 

भीड़ से ट्रैक के रख-रखाव में लगता है समय

 

ट्रैक पर भीड़ गति को कम कर देती है और इस कारण बेहद व्यस्त रास्तों पर टकराव की संभावना बढ़ जाती है। इससे रख-रखाव के लिए भी ज्यादा समय लगता है।

 

खड़गपुर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और फिजिका ए पेपर के सह-लेखक नीला गांगुली कहती हैं,” हमने दिन के सबसे व्यस्त समय में धीमी गति और दुर्घटना की संभावना के बीच संबंध पाया है। ”

 

दिल्ली-कानपुर सेगमेंट के अतिव्यस्त ट्रैक के उदाहरण को देखते हैं। फिजिकिका ए पेपर के मुताबिक मध्यरात्रि और 7 बजे के बीच, सबसे व्यस्त रेल यातायात घंटे में रेलवे कर्मचारियों को सिर्फ 13 मिनट पटरियों की जांच के लिए मिले । दिन के बाकी समय यह बढ़कर 19 मिनट हुआ।

 

ऐसा नहीं है कि रखरखाव के क्षेत्र में कोई तकनीकी उन्न्ति नहीं हुई है। रेलवे बोर्ड के अतिरिक्त महानिदेशक(जनसंपर्क) अनिल कुमार सक्सेना कहते हैं, “भारतीय रेलगाड़ी ट्रैक रिकॉर्डिंग कारें रखती है और ट्रैक ज्यामिति में दोषों का पता लगाने के लिए पोर्टेबल दोलन निगरानी प्रणालियों का उपयोग करता है। इसमें ट्रैक गेज, संरेखण, ऊंचाई, वक्रता और सतह जैसे पैरामीटर शामिल हैं। रेल और वेल्ड्स यानी जोड़ने का परीक्षण करने के लिए भारतीय रेलवे अल्ट्रासोनिक दोष जांच परीक्षण पद्धति का उपयोग करता है। वर्ष 2016 से, यह अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्शन सिस्टम का परीक्षण कर रहा है जो उत्तर रेलवे और उत्तर मध्य रेलवे द्वारा बनाए गए ट्रैक पर दक्षिण अफ्रीकी रेलवे द्वारा उपयोग किया जा रहा है।

 

वेल्ड विफलताओं को कम करने के लिए भारतीय रेलवे ने नई वेल्डिंग विधियों को अपनाया है। हम बता दें कि 4 मई 2014 को कोंकण रेलवे की दिवा-सावंतवाड़ी रेलगाड़ी निदई गांव के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। इस हादसे का मुख्य कारण यही था। इस हादसे में 22 लोग मारे गए और 150 से अधिक घायल हुए थे। वेल्डिंग की आवश्यकता को कम करने के लिए 83 फीसदी ट्रैक पर अधिक लंबाई वाले रेल पैनल  लगाए जा रहे हैं।

 

40 साल से अधिक अनुभव वाले रेलवे के निर्माण और रखरखाव में जुटी कंपनी आईएससी प्रोजेक्ट्स के निदेशक  कुलमीत सिंह छाबड़ा भी मानते हैं कि भारतीय रेलवे ने देर से ही सही, लेकिन बेहतर तकनीक पेश की है, जो काम को गति देता है। लेकिन वे इससे खुश नहीं हैं-“लेकिन अच्छी तकनीक का उपयोग क्या है जब इसे प्रयोग करने के लिए आपके पास समय ही नहीं है?”

 

बेंगलुरु रेलवे सुरक्षा  के पूर्व आयुक्त और दक्षिण पश्चिमी रेलवे के पूर्व मुख्य अभियंता (समन्वय) श्रीनाथ नायडू बताते हैं, “ रखरखाव के लिए जब माल गाड़ियों को पास करने के लिए समय निर्धारित होता है, हम यातायात के लिए लाइनें बंद करते हैं।”

 

ट्रैक विस्तार की धीमी गति, नवीनीकरण और कोच उन्नयन

 

ट्रैफिक बाधाओं को कम करने के लिए नए ट्रैक महत्वपूर्ण हैं। भारतीय रेल के माल ढुलाई परिचालनों में आमूल-चूल बदलाव के लिए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को लाया गया है। ये दो तरह से लागू किया जा रहा है पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डब्‍ल्‍यूडीएफसी) और पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर(ईडीएफसी)।

 

वर्ष 2005 में शुरू की गई इन दो प्रमुख परियोजनाएं में एक पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर 1504 किमी लंबी है और और पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर 1318 किलोमीटर लंबी हैं। ये परियोजनाएं मुंबई-दिल्ली और हावड़ा-दिल्ली लाइनों पर हैं, जिसका इस्तेमाल 115 फीसदी और 150 फीसदी के बीच होता है।

 

नए माल कॉरिडोर उन रूटों पर मौजूद 70 फीसदी माल ढुलाई के ट्रैफिक को नियंत्रित करेगा। इससे मालगाड़ी गाड़ियों की गति भी बढ़ेगी।

 

स्थायी समिति की दिसंबर 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक “ट्रैक या रोलिंग स्टॉक में दोष” को ठीक करने में भी रेलवे पीछे है, जो गाड़ी के पटरी से उतरने के पीछे का एक मुख्य कारण है।

 

फरवरी 2015 में जारी श्वेतपत्र इंडियन रेलवे,लाइफलाइन ऑफ द नेशन  के अनुसार जुलाई 2014 में जब प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने कार्यभार संभाला तो  5,300 किमी लंबी ट्रैक का नवीनीकरण किया जाना बाकी था। इसके अतिरिक्त, हर साल 4,500 किलोमीटर ट्रैक का नवीनीकरण होता है।

 

लेकिन पिछले तीन वर्षों के लिए नवीनीकरण के लक्ष्य का 2014 और 2015 में 2016 में क्रम क्रमशः 2,200 किमी, 2,500 किमी और 2,668 किलोमीटर की जरूरत के करीब आधे रहे हैं। पहले दो हासिल किए गए थे। 2015 श्वेत पत्र के अनुसार, इस कमी का परिणाम “अपर्याप्त उच्च रखरखाव के रुप” में होगा और संभावित रूप से गति में कमी होगी।

 

ट्रैक नवीकरण: लक्ष्य और उपलब्धियां

Source: Indian Railways, Lifeline of the nation

 

रेलवे बोर्ड के सक्सेना कहते हैं, “ट्रैक की नवीनीकरण एक सतत प्रक्रिया है, जब उनकी उम्र और परिस्थितियों की मांग होती है, तब नवीकरण किया जाता है। जब फंड या सामग्री की कमी के कारण ऐसा नहीं हो पाता है, तो सुरक्षित चलने के लिए गति पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं।”

 

देश का सबसे पुराने कोच निर्माता कंपनी इंटीग्रल कोच फैक्ट्री द्वारा बनाए गए पुराने कोच के लिए तीव्र गति करीब 100 किमी प्रति घंटे निर्धारित है। दूसरी तरफ, अल्स्टॉम-लिंकी हॉफमैन बुश (एलएचबी) के कोच में दुर्घटना की स्थिति में मौत को कम करने के लिए कई तरह की तकनीक और सुविधा को जोड़कर तैयार किया गया है और यह 130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार में भी सुरक्षित है।

 

अब तक एलएचबी कोच केवल राजधानी, शताब्दी और दुरंतो जैसे प्रमुख सेवाओं में शामिल किया गया है। वर्ष 2018-19 से केवल एलएचबी डिब्बों का उपयोग करने के लिए एक नीति के तहत फैसला लिया जाएगा कि अन्य ट्रेनों में भी इन्हें शामिल किया जाए या नहीं। लेकिन मौजूदा बेड़े का पूर्ण प्रतिस्थापन सम्भवत: लगभग 2040 तक हो पाएगा, जैसा कि नवंबर 2016 की इंडिया टुडे की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

वर्ष 2016-17 रेलवे बजट निर्णय के अनुसार, लेवल क्रासिंग दुर्घटनाएं, दुर्घटनाओं का दूसरा सबसे बड़ा कारण है और कम से कम ब्रॉड गेज पर, जब तक वे पूरी तरह से चरणबद्ध नहीं हो जाते, तब तक खतरा बना हुआ रखेगा। इस साल, 9,340 लेवल क्रॉसिंगों में से 15 फीसदी को उन्मूलन के लिए लक्षित किया गया है।

 

जर्मनी की तुलना में भारत में प्रति मिलियन ट्रेन किमी कम दुर्घटनाएं?

 

इस साल के बजट में, तीन विनाशकारी रेल दुर्घटनाओं के बाद, सुरक्षा पर एक बड़ी राशि आवंटित की गई है। 100,000 करोड़ रुपये के पांच साल के संगोपन के साथ यह राष्ट्रीय रेल सुरक्षा कोष (राष्ट्रीय रेल सुरक्षा निधि) की स्थापना के लिए चला गया है।

 

सरकार ने यह स्वीकार किया है कि सुरक्षा में निवेश अपर्याप्त रहा है, लेकिन उसने यह भी दावा किया है कि भारत के लाखों किलोमीटर की दूरी पर एक सुरक्षा सूचकांक दुर्घटनाओं की तुलना यूरोप के साथ अनुकूल है।

 

भारत में, इस सूचकांक में पिछले दशक के दौरान, गिरावट आई है – 2006-07 में 0.23 से 2015-16 में 0.10 में कमी। यह आंकड़ा फ्रांस या जर्मनी (दोनों 0.17) से कम है।

 

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय रेलवे यूरोपीय रेलवे नेटवर्क की तरह सुरक्षित हैं, क्योंकि विशेषज्ञों का कहना है कि उनकी ट्रेनें प्रति घंटे 250 किलोमीटर की रफ्तार से चलती है

 

भारतीय रेलवे के साथ हैदराबाद स्थित एक परियोजना प्रबंधन के पूर्व विशेषज्ञ सुकेश कुमार शर्मा कहते हैं, “प्रति मिलियन ट्रेन किलोमीटर दुर्घटनाएं ट्रेन की संख्या पर निर्भर करती हैं जो भारत में बहुत ज्यादा है। यह गति पर भी निर्भर करता है। ”

 

शर्मा कहते हैं, “भारत और विकसित देशों के रेलवे प्रणालियों के बीच एक सीधा तुलना संभव नहीं है। हमारी औसत गति प्रति घंटे 60-70 किमी है – केवल कुछ भारतीय ट्रेनें 130 किमी प्रति घंटे की गति के ऊपर पहुंचती हैं, जो विकसित देशों में 300 किमी प्रति घंटा की गति से आधे से भी कम गति है। भारत में दुर्घटनाओं पर कम सूचकांक एक भ्रामक तस्वीर दिखाता है।”

 

(बाहरी एक स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं और राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।.)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 3 अप्रैल 2017 को indiaspend.com पर प्रकशित हुआ है।

 

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