Home » Cover Story » डॉली कुमारी की कहानी में भारत के परिधान उद्योग की सुखद तस्वीर

डॉली कुमारी की कहानी में भारत के परिधान उद्योग की सुखद तस्वीर

लावण्या गर्ग,

pace_620

वर्ष 2014 में 19 वर्ष की डॉली कुमारी झारखंड में अपना घर छोड़कर  बेंगलुरु आई थी। उसे नौकरी की तलाश थी। बेंगलुरु में डॉली एक ड्रेस प्रोडक्शन कंपनी में दर्जी की नौकरी करने लगी। आज डॉली कंपनी के प्रोडक्शन यूनिट में दो असिस्टेंट लाइन सुपरवाइजर्स में से एक है। डॉली 119 दर्जियों के काम की देखरेख करती हैं। उसकी सफलता का श्रेय जीवन-कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘पर्सनल एडवांसमेंट एंड करियर एंहांसमेंट’ को जाता है।

 

वर्ष 2014 में 12 वीं पास 19 वर्षीय डॉली झारखंड में अपना घर छोड़कर बेंगलुरु आई थी। बेंगलुरु में डॉली एक कपड़े के कारखाने में दर्जी की नौकरी करती थी। जब वे पहले यहां आई तो अन्य कारिगरों की तरह की उसका इरादा यहां कुछ महीने ही ठिकने का था। आज दो साल बाद 21 साल की उम्र में डॉली  शाही एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रोडक्शन यूनिट में दो असिस्टेंट लाइन सुपरवाइजर्स में से एक है। डॉली 119 दर्जियों की देखरेख देखती हैं। डॉली के वेतन में 66 फीसदी की वृद्धि हुई है। उसका वेतन 5,000 रुपए प्रति माह से बढ़ कर 8,300 रुपए प्रति माह हुआ है। वह समय प्रबंधन पर आसानी से बातचीत कर सकती है और उसे एक दिन ‘फ्लोर इन-चार्ज’ बनने की उम्मीद है।

 

डॉली अपनी सफलता का श्रेय जीवन-कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम को देती है। यह कार्यक्रम ‘पर्सनल एडवांसमेंट एंड करियर एंहांसमेंट’ या पीएसीई कहा जाता है। इसे बहुराष्ट्रीय यूनिट ‘गैप इंक’ द्वारा तैयार किया गया है। योग्य पीएसीसी प्रशिक्षकों द्वारा आयोजित 11 महीनों के लिए हर हफ्ते दो घंटे की सत्र में डॉली को सिखाया गया कि कैसे वह अन्य बातों के अलावा अपने समय का प्रबंधन कर सकती है। उसे प्रभावी रूप से संवाद कर सकने की कला भी सिखाई गई।

 

वर्ष 2011 में अमेरिका स्थित तीन अर्थशास्त्रियों(अच्युता अधोवारु, नम्रता काला, और अनंत न्याशादाम) ने पीएसीई के प्रभाव का पता लगाने के लिए बेंगलुरु के कुछ शाही कारखानों में एक औचक नियंत्रित परीक्षण (आरसीटी) आयोजित किया था। शोध में पाया गया कि प्रोग्राम पूरा होने के नौ महीने बाद कर्मचारियों की नौकरी और जीवन कौशल में जो लाभ हुआ,उससे कंपनी के निवेश में 250 फीसदी से अधिक का लाभ हुआ।

 

वर्ष 2012 टाइम्स पत्रिका के इस लेख में दुनिया के बदलने के विचार के रुप में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन द्वारा उद्धृत किए गए इस कार्यक्रम ने दुनिया भर में 58, 9 38 वस्त्र श्रमिकों को प्रशिक्षित किया है। (भारत में 26,600 सहित, जहां यह पहली बार 2007 में शुरू हुआ था)

 

यह भारत सरकार की स्किल इंडिया पहल के लिए विशेष रूप से योगदान देता है और यह दर्शाता है कि कैसे कार्यकर्ता नए कौशल प्राप्त कर सकते हैं और कंपनियां ऐसे क्षेत्र में लाभ बढ़ा सकती हैं। यह भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। जैसा कि 30 जुलाई, 2016 को इंडियास्पेंड ने रिपोर्ट किया है कि हाल के समय में इस क्षेत्र में नौकरियों के अवसर स्थिर हो गए हैं और निर्यात कम हुआ है।

 

ब्लूमबर्ग के नवंबर 2014 की रिपोर्ट के अनुसार चीन में बढ़ते श्रम लागत ( वर्ष 2014 में उत्पादन में भारत में 0.92 डॉलर प्रति घंटे की तुलना में 3.52 डॉलर प्रति घंटे) से भारत को मुनाफा हासिल कर सकता है। इस संदर्भ में पीएसीई कार्यक्रम वस्त्र उद्योग से जुड़ी महिला श्रमिकों के कौशल और उनके काम करने के माहौल को सकारात्म रूप से बदल सकता है।

 

आईटी सेक्टर की तुलना में परिधान उद्योग में 13 गुना अधिक नौकरियां

 

कृषि के बाद भारत का वस्त्र और परिधान क्षेत्र देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। वर्ष 2015-16 में कपड़ा और परिधान उद्योग ने प्रत्यक्ष रूप से 105 मिलियन लोगों को रोजगार दिया। यह आंकड़े सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से 13 गुना अधिक या दक्षिण कोरिया की जनसंख्या के बराबर है। साथ ही भारत की निर्यात आय में 15 फीसदी की भागेदारी वस्त्र और परिधान उद्योग की है।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सभी औद्योगिक क्षेत्रों में छह नौकरियों की औसत से तुलना करते हुए, परिधान क्षेत्र में  0.15 मिलियन डॉलर के हर निवेश से 56 से 84 नौकरियां पैदा होती हैं।

 

महिलाओं को कौशल और रोजगार प्रदान करने में वस्त्र और परिधान कारखाने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि वर्ष  2015 में समाप्त हुए दशक में भारत में महिला श्रम-बल की भागीदारी में गिरावट हुई है लेकिन किसी भी अन्य क्षेत्र की तुलना में इस क्षेत्र ने लगातार महिलाओं के लिए और अधिक नौकरियों का निर्माण किया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 8 मार्च, 2016 को विस्तार से बताया है।

 

श्रम बल वितरण,  2011-12

desktop (2)

Source: NITI Aayog

 

एक सरकारी ट्रस्ट द्वारा चलाई जाने वाली इंडिया ब्रैंड इक्विटी फाउंडेशन की 2016 की इस रिपोर्ट के अनुसार अगले 10 वर्षों में संगठित परिधान सेगमेंट की 13 फीसदी से अधिक की वार्षिक वृद्धि की उम्मीद है।

 

भारत का कपड़ा क्षेत्र

Source: India Brand Equity Foundation, NITI Aayog

 

इन आंकड़ों और वस्त्र क्षेत्र के लिए भी बड़ी संख्या में महिला श्रमिकों को रोजगार देने की क्षमता के मद्देनजर शोधकर्ताओं ने यह भी जानने की कोशिश की कि अपने श्रमिकों को प्रोत्साहित करने, उनका कौशल बढ़ाने और कार्य स्थल पर अच्छे माहौल के लिए परिधान कंपनियों को प्रोत्साहित कैसे किया जा सकता है?

 

शाही एक्सपोर्ट के कर्मचारियों को जीवन-कौशल प्रशिक्षण से कैसे मिला लाभ?

 

वर्ष 2007 में पीएसीई शाही कारखानों में संचालित किया गया था, जो अब कम से कम 110,000 लोगों को रोजगार देता है। वर्ष 2012 में, अध्वार्यू, काला और न्यशादम ने बेंगलूर क्षेत्र के पांच शाही कारखानों में कार्यक्रम के प्रभाव का मूल्यांकन किया।

 

आरसीटी में 2,703 उन कार्यकर्ताओं को शामिल किया गया, जिन्होंने कार्यक्रम में रुचि व्यक्त की थी। इनमें से 1,000 लोगों को औचक रूप से भाग लेने के लिए चुना गया और शेष एक नियंत्रण समूह को आवंटित किया गया, जिन्हें प्रशिक्षण नहीं मिला था।

 

line_620

बेंगलुरु में शाही एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की एक उत्पादन यूनिट। वर्ष 2007 में अब कम से कम 110,000 लोगों को रोजगार देने वाले शाही कारखानों में जीवन-कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘पीएसीई’   संचालित किया गया था।

 

साप्ताहिक दो घंटे के सत्रों के माध्यम से ‘पीएसीई’ में संचार, समय प्रबंधन, वित्तीय साक्षरता, समस्या सुलझाने और निर्णय लेने जैसे आवश्यक जीवन कौशल को समझाया गया।

 

शुरू होने के बाद 11 महीनों के अंत में कंपनी के लिए कार्यक्रम की संचयी लागत 90,285 डॉलर (61.45 लाख रुपए) रहा।   इस अवधि के बाद लाभ बढ़ना जारी रहा और 20 महीने के अंत में  321,145 डॉलर पर (2.18 करोड़ रुपए) पर आ गया।

 

कार्यक्रम की लागत को श्रमबल की लागत और उत्पादकता के साथ जोड़कर देखने के बाद इस कार्यक्रम की महत्ता स्पष्ट हो जाती है।

 

( कुल निवेश पर वापसी की गणना के लिए यहां क्लिक करें) कौशल-विकास प्रशिक्षण में शामिल हुए श्रमिक अपने बच्चों की शिक्षा खुद के लिए राज्य प्रायोजित पेंशन और स्वास्थ्य देखभाल में ज्यादा संवेदनशील दिखे। उनका आत्मसम्मान भी बढ़ा और काम के दौरान उनमें विनम्रता भी थी।

 

महिला श्रमिकों के लिए जीवन में स्थायी परिवर्तन और मजदूरी में वृद्धि

 

यह प्रयोग अनूठा है। इसने साबित किया है कि  कंपनियों के माध्यम से दिए गए कौशल-विकास कार्यक्रमों से उत्पादन पर प्रभाव तो पड़ता ही है, कामगारों की जिंदगी में भी सुखद बदलाव होता है।

 

महिलाओं को जीवन कौशल में प्रशिक्षण प्रदान करना उन्हें केवल अधिक उत्पादक नहीं बनाता है। यह महिलाओं के घरेलू जीवन में स्थायी परिवर्तन भी पैदा करता है और उनकी आय को प्रभावी रुप से बढ़ाता है।

 

session_620

बेंगलुरु में शाही एक्सपोर्ट में जीवन-कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘पीएएसीई’ के तहत एक प्रशिक्षण सत्र। यह कार्यक्रम योग्य प्रशिक्षकों द्वारा 11 महीनों के लिए हर हफ्ते दो घंटे के सत्र में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में अन्य बातों के अलावा समय प्रबंधन और प्रभावी ढंग से संवाद करना सिखाया जाता है।

 

पिछले पांच वर्षों में इससे और अन्य इसी तरह के अध्ययनों के सकारात्मक परिणामों से प्रेरित दो शोधकर्ताओं- अधिव्यूरू और न्याशाधाम- ने शाही में संगठनात्मक विकास के प्रमुख अनंत आहुजा के साथ मार्च 2017 में द गुड बिजनेस लैब की स्थापना की है। कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी और शोध फंडों के माध्यम से वित्त पोषित इस लैब का उदेश्य पीएसीई और अन्य शोध निष्कर्ष जिससे श्रमिकों को लाभ मिलता है और मुनाफा कमाते हैं, उनको देखना, उनका मूल्यांकन और उनका प्रसार करना है।

 

पीएसीई का व्यापक प्रभाव !

 

इस अध्ययन के परिणाम ने ‘गैप इंक’ के पीएसीई कार्यक्रम की लोकप्रियता वैश्विक स्तर पर बढ़ा दी है।शाह की  तरह चुनिंदा फर्मों ने ‘गैप इंक’ के लाइसेंस के लिए प्रस्ताव दिया है, ताकि गैप इंक उनके कारखानों या बाहरी कारखानों में पीएसीई का विस्तार कर सके।

 

आज की तारीख तक ‘गैप इंक’ ने 12 देशों में अपने इस कार्यक्रम का प्रसार किया है और लगभग 60,000 महिला परिधान श्रमिकों ने पीएसीई से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है।

 

पीएसीसी के प्रभाव को देखने के लिए वापस बेंगलुरु चलें। शाही सहायक पर्यवेक्षक डॉली 21 साल की उम्र में अपनी फैक्ट्री में वरिष्ठ स्तर पर पहुंच चुकी है। डॉली कहती है, “पीएसीई से मेरे समय प्रबंधन कौशल में सुधार हुआ है, मुझे जाति के आधार पर भेदभाव न करने के लिए सिखाया गया और कारखाने में समग्र काम के माहौल को बेहतर बनाने की कला सिखाई गई। ”

 

अब डॉली किसी ऐसे फर्म से जुड़ना नहीं चाहती है,जहां कार्यकुशलता का आभाव है या जहां जीवन-कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं है। भले ही फिर वह उसके घर के करीब ही क्यों न हो। वह शाही में रहना चाहती है। पेशेवर ढंग से से आगे जाना चाहती है । यही नहीं,  वह अन्य महिलाओं को भी कठिन परिस्थिति में काम करने और अपने सपनों को जीवित रखने के लिए प्रेरित करती रहती है।

 

(गर्ग अनुसंधान और संचार प्रबंधक है । वह ‘गुड बिजनेस लैब’ से जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 अप्रैल 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
__________________________________________________________________

 

“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

 

Views
2974

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *