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तंबाकू से होने वाले स्वास्थ्य संकट क्यों हो रहे हैं नज़रअंदाज़

चारु बाहरी,

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इस साल जनवरी में सरकार ने धूम्रपान रोकने से संबंधित नए एवं कठोर कानून बनाए जाने पर जनता की राय मांगी थी : धूम्रपान की उम्र 18 वर्ष से 21 वर्ष करना एवं एकल सिगरेट की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना। गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर एकल सिगरेट बिक्री की हिस्सेदारी 70 फीसदी है।

 

रायटर की रिपोर्ट के मुताबिक इस गंभीर मुद्दे पर जनता की प्रतिक्रिया उत्साहपूर्वक रही। करीब 45,000 लोगों ने ई-मेल के ज़रिए एवं 100,000 लोगों ने पत्र के ज़रिए अपनी राय स्वास्थय मंत्रालय तक पहुंचाई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक प्रतिनिधि के अनुसार उन ई-मेल एवं पत्रों में क्या राय दी गई है यह अब तक नहीं पता चल पाया है क्योंकि अब तक उन्हें पढ़ा नहीं गया है।

 

जनता द्वारा भेजे गए संदेशों की तरह ही विश्व स्वास्थय संगठन की ग्लोबल टोबैको एपीडेमीक 2015 की रिपोर्ट को भी नज़रअंदाज़ किया गया है। इसका एकल संदेश है – तंबाकू पर कर की वृद्धि होने से धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाने में सहायता मिल सकती है।

 

भारत में धूम्रपान पर प्रतिबंध दो मुख्य कारणों से महत्वपूर्ण है –

 

  • भारत में धूम्रपान संबंधी बीमारियों से हर साल करीब एक मिलियन लोगों की मौत होती है, जोकि देश में मृत्यु के मुख्य तीन कारणों में से एक है।
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  • धूम्रपान काफी हद तक भारतीयों के जेब में छेद करता है। सिगरेट से सरकार जितना पैसा कमा रही है उससे ज़्यादा इससे होने वाली बीमारियों पर भारतीय खर्च कर रहे हैं।


 

वर्ष 2011 में भारत में 35 से 69 वर्ष की आयु के बीच लोगों ने तंबाकू संबंधित रोगों जैसे कि कैंसर,सांस की बीमारियों, तपेदिक और हृदय रोग पर करीब 104,500 करोड़ रुपए खर्च किया है। भारतीयसरकार, विश्वस्वास्थ्यसंगठनएवंभारतीयसार्वजनिकस्वास्थ्यफाउंडेशनकेअनुसार यह आंकड़े उस वर्ष केंद्रीय उत्पाद कर संग्रह द्वारा तंबाकू उत्पादकों पर एकत्रित करों के मुकाबले कम से कम छह गुना अधिक है।

 

यदि तंबाकू से होने वाले स्वास्थ्य लागत को देखा जाए तो वर्ष 2011 में यहवर्षिक राज्य एवं स्वास्थ्य देखभाल पर केंद्र सरकार के व्यय को मिला कर संयुक्त रुप से 12 फीसदी पार हो जाता है।

 

सिगरेट पर कर लगाना

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक यदि तंबाकू उत्पादकों के मूल्यों पर 10 फीसदी वृद्धि की  जाए तो विकासशील देशों में तंबाकू उत्पादकों की खपत पर 2 से 8 फीसदी की कटौती हो सकती है। करों में वृद्धि से कीमतों में बढ़ोतरी होगी जिससे मांग कम होगी और ऐसे लोग तंबाकू के बुरे प्रभाव से बच पाएंगे।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक्टिंग प्रतिनिधि, अरुण थापा, के अनुसार, “करों में वृद्धि करना भारत के लिए फायदेमंद है। यह लोगों की स्वास्थ्य के साथ-साथ लोगों की वित्तीय सेहत के लिए भी अच्छा है।”

 

पिछले 19 वर्षों में भारत में सिगरेट पर कर 1606 फीसदी बढ़ी है। इस लेख के दूसरे भाग में हम बताएंगे कि करों की इतनी वृद्धि भी पर्याप्त नहीं हैएवं छह स्तरीय कर ढ़ांचा इतना जटिल है कि कंपनियां मांग को बरकरार रखने के लिए इसका काफी हेरफेर करती हैं।

 

तंबाकू के इस्तेमाल को रोकने में सबसे बड़ी समस्या बीड़ी की बिक्री है। बीड़ी की एक पैकट के खुदरा मूल्य पर 7 फीसदी कर लगता है जोकि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा दिए गए 75 फीसदी के सुझाव स्तर से दसवां भाग कम है। सबसे अधिक बिकने वाला बीस सिगरेट के एक पैकेट के खुदरा कीमत पर करीब 60 फीसदी कर लगाया जाता है।

 

ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (जीएटीएस ) 2010 के अनुसार देश में 120 मिलियन धूम्रपान करने वाले लोगों में से बीड़ी पीने वालों की हिस्सेदारी 61 फीसदी है। यह मात्र एक अनुमान है। कुछ अध्ययन के मुताबिक बीड़ी पीने वालों की संख्या इससे भी अधिक है, करीब 73 फीसदी या 85 फीसदी तक भी।

 

बीड़ी में तंबाकू को बहुत ढ़ीले तरीके से बांधा जाता है इसलिए बीड़ी इस्तेमाल करने के लिए गहरी सांस लेनी पड़ती है। यही कराण है कि बीड़ी पीने वाले लोगों में दूसरी बिमारियों के अलावा फेफड़ों से संबंधित रोग, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), के विकसित होने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है।

 

लेकिन बीड़ी उद्योग लगातार सरकार से रियायतें लेती रही है।

 

बीड़ी उदयोगों का तर्क – लाखों लोगों का जीवन एवं रोज़गार इस पर निर्भर

 

नीचे लिखी गई कुछ रियायते हैं जो सरकार की ओर से बीड़ी उद्योगों को दी जाती है –

 

  • हस्तनिर्मित बीड़ी इकाइयों ( 98 फीसदी बीड़ी हाथ से बनाई जाती हैं ) जो एक वर्ष में 2 मिलियन से कम बीड़ी का निर्माण करते हैं उन्हें उत्पाद शुल्क की छूट दी गई है।
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  • बड़े बीड़ी निर्माता हस्तनिर्मित बीड़ियों पर प्रति बीड़ी 1.6 पैसे का शुल्क देते हैं जबकि मशीन द्वारा निर्मित बीड़ी पर प्रति 2.8 पैसे का शुल्क देते हैं। सिगरेट पर शुल्क 1.28 रुपए से 3.37 रुपए प्रति सिगरेट के बीच होती है।


 

अखिल भारतीय बीड़ी उद्योग परिसंघप्रतिनिधि के अनुसार देश भर में करीब 8 मिलियन लोग बीड़ी उद्योग में काम करते हैं।

 
बीड़ी पर उत्पाद शुल्क दरें * 1996 से 2013
 

Source: World Lung Foundation; WHO

 

अखिल भारतीय बीड़ी उद्योग परिसंघ के सचिव सुधीर सेबल के अनुसार “बीड़ी कर कर लगा कर एवं उसके पैकेट पर चित्र द्वारा चेतावनी दिखा कर हम बीड़ी की मांग को कम कर सकते हैं।उत्पान में गिरावट से बीड़ी उद्योग में काम करने वाले लोगों की नौकरियों पर खतरा आ सकता है। साथ ही तंबाकू किसानों एवं हज़ारो दूकाने जहां यह बेची जाती उन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।”

 

सेबल का मानना है कि बीड़ी पर करों की वृद्धि से  निरपवाद रूप से बीड़ी के अवैध व्यापार में वृद्धि होगी जिससे नकली बीड़ी बनने का खतरा बढ़ सकता है। इससे राज्य एवं केंद्र सरकार भी कर राजस्व से वंचित हो जाएगी।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि इतने तर्क पर्याप्त नहीं हैं।

 

विशेषज्ञों का दावा – बीड़ी करों को कम करना सामाजिक-आर्थिक मामला नहीं

 

वर्ष 2013 में तंबाकू उत्पादों से सरकार के केंद्रीय उत्पाद शुल्क संग्रह में बीड़ी उद्योग का योगदान 3 फीसदी से भी कम रहा है क्योंकि यह सबसे कम उत्पाद शुल्क का भुगतान करता है।

 

भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य फाउंडेशन के अध्ययन के अनुसार बीड़ी उद्योग पर करों में वृद्धि करने की निश्चित तौर पर कुछ संभावना है।

 

मोनिका अरोड़ा, निदेशक , स्वास्थ्य संवर्धन और तंबाकू नियंत्रण पहल , भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य फाउंडेशन, के अनुसार “बीड़ी पर उत्पाद कर दोगुना करने से इसकी खपत 40 फीसदी तक कम हो सकती है एवं राजस्व कर में 22 फीसदी की वृद्धि भी हो सकती है।”

 

तर्क के अनुसार, कर दरों में वृद्धि से खपत कम होने के साथ उत्पाद शुल्क में होने वाले नुकसान की भी भरपाई होगी।

 

प्रभात झा, वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान, टोरंटो विश्वविद्यालय के  केंद्र संस्थापक निदेशक, के अनुसार “बीड़ी या सिगरेट पर खर्च होने वाले पैसे अर्थव्यवस्था से गायब नहीं होगा। यह अन्य उत्पादों पर खर्च किया जाएगा जिससे रोज़गार उत्पन्न होगा।”

 

अतिरिक्त राजस्व से सरकार को बीड़ी श्रमिकों के लिए अन्य रोजगार के साधन उपलब्ध कराने में सहायता होगी।

 

पहले भी सिगरेट पर कर लगाने के पीछे सरकार का उदेश्य किसानों को तंबाकू के बजाए दूसरे फसलो के लिए प्रोत्साहित करना था।

 
विशेषज्ञों के मुताबिक एक क्रमिक संक्रमण पूंजी के लिएतंबाकू उत्पादों उद्योग के सभी वर्गों पर कर लागू करना चाहिए। इससे देश के सबसे वंचित लोगों में से बीड़ी श्रमिकों को ही फायदा मिलेगा।
 
भारत में बीड़ी श्रमिकों की स्थिति बुरी

 

टोरंटो विश्वविद्यालय के झा के मुताबिक “बीड़ी श्रमिकों पर प्रभाव ( अधिक कर एवं कम खपत ) पड़ने में वक्त लगेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है मौजूदा बीड़ी श्रमिक बेरोज़गार हो जाएगें। इसका मतलब है कि भविष्य में इस कम भुगतान वाली रोज़गार की ओर कम श्रमिक आकर्षित होंगे।”

 

पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश और कर्नाटक देश के प्रमुख बीड़ी उत्पादक राज्य हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में बीड़ी उत्पादन ही लोगों के जीवन यापन का मुख्य ज़रिया है।

 

मुर्शिदाबाद में बीड़ी श्रमिक प्रति 1,000 बीड़ी बनाने पर 100 रुपए कमाते हैं। वहीं उत्तरप्रदेश में प्रति 1,000 बीड़ी बनाने पर श्रमिकों को 90 रुपए दिए जाते हैं। वर्ष 2014 में किए एक अध्ययन के मुताबिक भारत में बीड़ी श्रमिक सबसे कम वेतन पाने वाले लोगों में से हैं।

 

भारत के रोज़गार में से बीड़ी श्रमिकों की हिस्सेदारी 1 फीसदी है लेकिन सामूहिक रूप से 0.1 फीसदी कमाते हैं।

 

सेबल के अनुसार, “वे न्यूनतम मजदूरी या ‘समझौते’ मजदूरी कमाते हैं।”‘समझौते’ का अर्थ सरकार द्वारा निर्धारिक न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी मिलना है। इस संबंध में सेबल कहते हैं कि इस मुद्दे पर स्थानीय सरकार अधिकारी से सहमती ली जाती है।

 

सेबल आगे कहते हैं कि “कम मजदूरी पर समझौते इस लिए किए जाते हैं क्योंकि उपभोक्ताओं के लिए बीड़ी की कीमत बहुत कम रखी जाती हैसाथ ही पड़ोसी राज्यों की मजदूरी के साथ समानता भी सुनिश्चित करनी होती है।”

 

सेबल मानते हैं कि स्थानीय सरकार के अधिकारियों और बीड़ी उद्योग के बीच मिलीभगत से ही बीड़ी श्रमिकों की स्थिति ठीक नहीं है। जबकि एक दिन में 1,000 बीड़ी के बांधने के लक्ष्य से उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। सुनंदा सेन एवं ब्यासदेब दासगुप्ता ने अपनी किताब, अनव्रीडम एंड वेज्ड वर्क : लेबर न इंडियाज़ मनुफैक्चरिंग इंडस्ट्री , में इसी संबंध पर चर्चा किया है।

 

अधिकतर श्रमिकों को बीड़ी बांधने के लिए तंबाकू उनके घरों पर ही दी जाती है। सुरक्षा उपायों जैसे कि मास्क एवं दस्ताने इन श्रमिकों को उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं। परिणामस्वरुप तंबाकू के गुच्छे और धूल के संपर्क में आने उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

 

मोनिका अरोड़ा कहती हैं कि “कान, गला और कम श्वसन तंत्र में संक्रमण के साथ कैंसर और तपेदिक जैसी बीमारियां होना बीड़ी श्रमिकों के लिए आम हैं।”

 

वर्ष 2006 में मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल में किए एक अध्ययन के अनुसार “तंबाकू के धूल के संपर्क में आने से बीड़ी श्रमिकों में सांस की तकलीफ, खांसी एवं फेफड़ो संबंधिति बीमारियां होने का खतरा छह गुना अधिक बढ़ जाता है।”

 

इसी तंबाकू के कारण कई महिलाएं स्त्रीरोग संबंधी एवं गर्भावस्था जटिलताओं का शिकार होती हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है क्योंकि बीड़ी श्रमिकों में से 90 फीसदी श्रमिक महिलाएं ही हैं।

 

बीड़ी श्रमिकों को अन्य रोजगार एवं नौकरियां दिलाना उनके लिए बेहतर होगा। बीड़ी पर करों में बढ़ोतरी पूरे देश के लिए अच्छी होगा।जिन्हें फायदा नहीं होगा वह बीड़ी उद्योगपति होंगे।

 

यह लेख का पहला भाग है। लेख दूसरे भाग में हम भारत में कर प्रणाली और धूम्रपान की बिक्री के संबंध में चर्चा करेंगे।
 
( बाहरी माउंट आबू , राजस्थान स्थित एक स्वतंत्र लेखक और संपादक है )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 01 सितंबर 15 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 
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