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तेल कीमतों में 75% वैश्विक गिरावट: प्रभाव क्यों नहीं पहुंच रहा है आप तक?

अभिषेक वाघमारे,

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गुवाहाटी, असम, जहां जून में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहां की एक व्यस्त चौक पर लगा एक होर्डिंग।

 

संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) में रिकार्ड उत्पादन, यूरोजोन और चीन और ब्राजील जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कमज़ोर मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईरान के प्रवेश से भारत के लिए कच्चे तेल की कीमत में कटौती हुई है। जुलाई 2014 में, प्रति बैरल 106 डॉलर से जनवरी 2016 में 26 डॉलर तक पहुंचा है यानि कि 15 महीने में 75 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

लेकिन फिर भी हमें अपने स्थानीय स्टेशन पर पेट्रोल या डीज़ल की कीमतों में कटौती का अनुभव क्यों नहीं हो रहा है?

 

इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि जैसा कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमत 11 सालों में नीचले स्तर पर पहुंच गई है, केंद्र और राज्य सरकार ने अपने राजस्व को संभालते हुए एवं ईंधन की कीमतों को खुदरा उपभोक्ताओं के लिए उच्च रखते हुए, उत्पाद शुल्क और मूल्य वर्धित कर में स्थिरतापूर्वक वृद्धि की है।

 

हालांकि भारत अपनी ईंधन आवश्यकता का 80 फीसदी से अधिक आयात करता है, जिसका मतलब है सैद्धांतिक रूप से खुदरा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेजी से गिरावट होते देखा जाना चाहिए लेकिन पेट्रोल और डीजल के भारतीय उपभोक्ता अब वैश्विक दर का दोगुना भुगतान करते हैं।

 

भारत क्या भुगतान करता है, भारतीय क्या भुगतान करते हैं, 2004-2016

 

 

करों का सिलसिला, तेल कंपनी के मुनाफे और अन्य मध्यस्थ

 

इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार, तीन राज्यों में पेट्रोल और डीजल कीमतों की खुदरा किमतें – असम, उत्तर प्रदेश एवं गुजरात – चालू वित्त वर्ष, 2015-16 के दौरान कम से कम 10 फीसदी की भिन्नता दर्शाता है।

 

उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में पेट्रोल की कीमतों में प्रति लीटर दो रुपए की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि के दौरान, वैश्विक तेल की कीमतें आधी हुई हैं।

 

असम, उत्तर प्रदेश, गुजरात में खुदरा पेट्रोल कीमत, 2015-16

 

 

असम, उत्तर प्रदेश, गुजरात में खुदरा डीजल कीमत, 2015-16

 

 

भारत में कीमतें अधिक रहती हैं क्योंकि तेल विपणन कंपनियां (ओएमसी) जैसे कि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड, अपना मार्जिन जोड़ते हैं, केंद्र सरकार आबकारी जोड़ते हैं, राज्य सरकार भी स्वयं के (मूल्य वर्धित) कर जोड़ती हैं और डीलरों (पेट्रोल पंप) को उनका कमीशन मिलता है।

 

इन सबका कुल हम खुदरा कीमत का भुगतान करते हैं।

 

तीन महीने के दौरान आबकारी में पांच बार बढ़ोतरी; डीजल ड्यूटी में 140 फीसदी की वृद्धि

 

आबकारी शुल्क वृद्धि, नवंबर 2015 से जनवरी 2016 तक

 

 

पिछले तीन महीने के दौरान पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में पांच बार वृद्धि की गई है। इससे पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में 34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। डीजल पर उत्पाद शुल्क में 140 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

पेट्रोल डीलरों (पेट्रोल पंप) को जिस कीमत पर तेल विपणन कंपनियां पेट्रोल बेचते हैं वो दो साल में आधा हुआ है। इसी अवधि के दौरान , खुदरा पेट्रोल की कीमतों में केवल 15 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

राज्यों द्वरा लगाए गए मूल्य वर्धित कर लगभग वैसे ही है, लेकिन केंद्र द्वारा लागाया गया उत्पाद शुल्क – दोनों बुनियादी और अतिरिक्त – 2014 और 2016 के बीच दोगुनी हुई है।

 

खुदरा पेट्रोल कीमत की अवयव, 2014 से 2016

 

 

ईंधन की कीमतों की तुलना में हम डीजल और पेट्रोल पर अधिक करों का भुगतान करते हैं

 

डीजल पर केंद्रीय करों की अनुवृद्धि पेट्रोल की तुलना में अधिक है। अप्रैल 2014 में, प्रति लीटर डीजल की केन्द्रीय कर, इसकी कीमत पर चार गुना वृद्धि हुई है – 4.52 रुपये प्रति लीटर से फरवरी 2016 में 17.33 रुपये प्रति लीटर तक।

 

खुदरा डीजल की कीमतों के घटक, 2014 से 2016

 

 

खुदरा उपभोक्ताएं पेट्रोल और डीजल की वास्तविक कीमतों की तुलना में अधिक कर का भुगतान करते हैं।

 

एक लीटर पेट्रोल के लिए जो आप भुगतान करते हैं, उसमें से 57 फीसदी सरकार को कर के रुप में जाता है। 44 रुपए प्रति लीटर डीज़ल का 55 फीसदी कर होता है।

 

यदि डीजल पर इन दो वर्षों में उत्पाद शुल्क की वृद्धि नहीं हुई होती तो आज प्रति लीटर डीजल की कीमत 32 रुपए होती, शेष अन्य कारक ऐसे ही रहते।

 

माल की ढुलाई की लागत पर तेल की कीमतों का सीधा प्रभाव और इस तरह उपभोक्ता मुद्रास्फीति, इटेग्रेटेड रिसर्च एंड एक्शन फॉर डेवलपमेंड ( एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान) के अनुसंधान द्वारा दर्शाया गया है ,जैसा कि पत्रकार और अर्थशास्त्री, स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर ने इस ब्लॉग में लिखा है।

 

तुर्की और श्रीलंका में मुद्रास्फीति पर किए गए रिसर्च में मुद्रास्फीति पर ईंधन की कीमतों के प्रभाव को रेखांकित किया गया है।

 

बिजनेस स्टैंडर्ड की इस रिपोर्ट के अनुसार कम ईंधन की कीमतों से मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 6 फरवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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