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दलितों/आदिवासियों के लिए अव्ययित राशि = आठ गुना कृषि बजट

निखिल एम बाबू,

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पूनम, दक्षिण पश्चिम मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पचकोल गांव में रहती है। पूनम भरिया समुदाय से है जिसे एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे में 44 फीसदी की गिरावट हुई है। गौर हो कि पिछले वर्ष राज्य सरकार ने 4,000 करोड़ रुपए आदिवासी कल्याण के आवंटन के लिए रखा था।

 

पिछले मानसून में भारी बारिश हो रही थी जब हीराबाई की चार वर्षीय बच्ची, शेशकुमारी की मौत हुई थी। परिवार असहाय सा बच्ची को बुखार से तपते देखता रहा। देर रात शेशकुमारी ने दम तोड़ता रहा।

 

दक्षिण पश्चिम मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पचकोल गांव में रहने वाली हीराबाई के लिए नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वहां से 25 किलोमीटर की दूरी पर है। और हरेक मानसून में भागबेल नदी का पानी सड़कों पर आ जाता है जिससे स्वास्थ्य केंद्र तक जाना मुश्किल होता है। वहां के निवासी कहते हैं कि यदी आप बीमार पड़ते हैं तो किसी भी चिकित्सा सहायता पाने की उम्मीद बहुत कम होती है।

 

अपनी बेटी को याद करते हुए हीराबाई कहती हैं कि “बुखार ऊपर चढ़ने के साथ मेरी बेटी ने हमें पहचानना भी बंद कर दिया था। और सुबह वह हमें छोड़कर चली गई”

 

हीराबाई और उनके तीन बच्चे भरिया समुदाय से हैं जो कि विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। उनकी त्रासदी का कराण मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे में 44 फीसदी की कमी होना है। गौर हो कि पिछले साल राज्य सरकार ने 4,000 करोड़ रुपए आदिवासी कल्याण के आवंटन के लिए रखा था।

 

सूचना के अधिकार (आरटीआई) अनुरोध की एक श्रृंखला के माध्यम से इंडियास्पेंड की जांच से पता चलता है कि पिछले 35 वर्षों में मध्यान्ह भोजन , छात्रवृत्ति और फसल बीमा जैसे उपायों के माध्यम से अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के जीवन में सुधार करने के लिए 2.8 लाख करोड़ रुपये (42.6 बिलियन डॉलर) निर्धारित किया गया है। इस लेख के दूसरे भाग में हम बताएंगे कि क्यों यह राशि अव्यय रहती है।

 
अनुसूचित जाति उप योजना और जनजातीय योजना के तहत राज्यों द्वारा अव्ययित राशि

Source: Response to Right to Information requests

 

नीति आयोग, योजना आयोग का नया अवतार, जो इन निधियों पर नजर रखता है, इंडियास्पेंड द्वारा की गणना की गई आंकड़ों को सत्यापित करता है। हालांकि, सीईओ अमिताभ कांत ने अपर्याप्त निधि के उपयोग के मुद्दे को संगठन से दूर रखा है। इंडियास्पेंड से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “हम  कोष के लिए केवल निगरानी एजेंसी हैं और अधिक खर्च करने की ज़िम्मेदारी राज्यों एवं मंत्रालयों की है। लेकिन हम निगरानी के लिए कदम उठा रहे हैं और वर्तमान सरकार इस ओर काम कर रही है।”

 

बार-बार योजना के दिशा-निर्देशों का होता है उल्लंघन

 

अव्ययित राशि – या तो रद्द हुआ या केंद्र सरकार को वापस दे दिया गया – भारत के कृषि बजट के आठ गुना के बराबर है। यह राशि भारत के अगले 15 वर्षों के लिए ग्रामीण सड़क निर्माण परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए पर्याप्त है और सर्बिया, नेपाल या जॉर्डन के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से अधिक है। यदि भारत को सभी 250 मिलियन अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति में 2.8 लाख करोड़ रुपए वितरित करना होता तो प्रत्येक 11,289 रुपए मिलते।

 

अव्ययित 2.8 लाख करोड़ रुपए दो फंडों के अंतर्गत आता है : जनजातीय उप योजना (टीएसपी), जो 1974-75 में शुरू किया गया था, और अनुसूचित जाति उप योजना (एससीएसपी), जो 1979-80 में शुरू किया गया था। अव्ययित 2.8 लाख करोड़ रुपए दो फंडों के अंतर्गत आते है : जनजातीय उप योजना (टीएसपी), 1974-75 में शुरू किया था, और अनुसूचित जाति उप योजना (एससीएसपी), 1979-80 में शुरू किया गया था।

 

दिशा निर्देश के अनुसार, केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर बजट का हिस्सा (अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कम से कम आबादी के अनुपात में) इन उपेक्षित वर्गों के लिए निर्धारित किया जाना चाहिए। भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के की वर्तमान जनसंख्या 16.6 फीसदी और 8.6 फीसदी है। इसलिए, केंद्रीय बजट का 16.6 फीसदी और 8.6 फीसदी ससीएसपी और टीएसपी के लिए आवंटित किया जाना चाहिए। राज्यों के लिए भी यही लागू होता है।

 

इतना ही नहीं, प्रत्येक मंत्रालय, चाहे राज्य या केंद्रीय, को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए व्यक्ति, परिवार या निवास स्थान के विकास कार्यों और कल्याणकारी योजनाओं के लिए अपने कुल धन का समान प्रतिशत निर्धारित करना चाहिए।

 
अनुसूचित जाति उपयोजना और जनजातीय उपयोजना के तहत केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा अव्ययित राशि

Source: Response to Right to Information requests

 

उदाहरण के लिए, मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूलों के निर्माण, पौष्टिक भोजन और छात्रवृत्ति और अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए इसी तरह के अन्य उपायों प्रदान करने के लिए दो रणनीतियों के तहत राशि निर्धारित की है। इसी तरह, कृषि मंत्रालय ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के किसानों को रियायती दर पर खाद-बीज और फसल बीमा उपलब्ध कराने के लिए राशि निर्धारित की है।

 

तत्कालीन योजना आयोग, अब नीति आयोग द्वारा 2006 और 2014 में जारी किए गए दिशा निर्देशों के अनुसार, यह राशि ‘अव्यपगत’ हैं। लेकिन अब खर्च में कमी से प्रयास में बाधा उत्पन्न हो रही है। रिकॉर्ड बताते हैं कि सत्ता में भले कोई भी पार्टी हो अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को शायद ही कभी इन निधियों से लाभ मिलता है।

 

अधिकांश राज्य करते हैं निधियों की उपेक्षा

 

जहां वर्ष 2005-14 के लिए एससीएसपी राशि अव्ययित रखने में आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पंजाब सबसे ऊपर हैं वहीं टीएसपी के संबंध में झारखंड, ओडिशा और आंध्र प्रदेश सबसे ऊपर हैं।

 
अनुसूचित जाति उप योजना और जनजातीय उप योजना पर सबसे अधिक अव्ययित राशि वाले राज्य

Source: Response to Right to Information requests; Data for 2005-14

 

इसके अलावा, अव्ययित राशि का प्रतिशत भी उच्च है। उदाहरण के लिए, 2014-15 में तेलंगाना के लिए  यह 61 फीसदी या 4643 करोड़ रुपए है। वास्तविक अव्ययित राशि और भी अधिक होगा क्योंकि विभिन्न सरकारों के साथ कई वर्षों के लिए व्यय पर आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

 

1980 में एससीएसपी की शुरूआत के पीछे पी एस कृष्णन, 83 वर्षीय सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और भारत सरकार के पूर्व सचिव, का हाथ था। उन्होंने उत्साहपूर्वक बताया कि किस प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रणनीति बराबर करने के लिए पत्र जारी कर  लाल टेप के माध्यम से कटौती की थी।

 

कृष्णन ने बताया कि कार्यान्वयन में उन्हें काफी मुश्किल का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा, “राजनेता और नौकरशाह सबसे पिछड़े वर्ग – दलितों और आदिवासियों – के लिए हमेशा उदासीन रहे हैं।”

 

1980 में एससीएसपी की घोषणा करते हुए पत्र में इंदिरा गांधी ने लिखा: “वे देश की कुल आबादी का 15 फीसदी का गठन करते हैं, उनका अनुपात देश के गरीब समूहों में बहुत बड़ा है, अधिकांश अनुसूचित जाति गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं।”

 

छत्तीस साल बाद भी स्थिति में खास बदलाव नहीं हुआ है।

 

आदिवासी गांवों में जीवन निर्वाह की बद्तर स्थिति

 

जब घर स्वामित्व, बिजली, शौचालय और पानी के कनेक्शन जैसी बुनियादी सुविधाओं के भी प्रावधान की बात होती है तो आदिवासियों और दलितों का महत्व अब भी सबसे कम होता है। वह प्रमुखता से सामने बाल मृत्यु दर, स्कूल छोड़ने वाले बच्चों और अत्यधिक गरीबी से संबंधित आंकड़ों में ही आते हैं।

 

उदाहरण के लिए, सभी सामाजिक समूहों (18.4) की तुलना में अनुसूचित जनजाति के बीच बाल मृत्यु दर (35.8) करीब दोगुना है। जुलाई में, इंडियास्पेंड ने विस्तार से बताया है कि किस प्रकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पिछड़े हुए हैं।

 

हीरा के दो कमरे के मकान के बगल में छत से लटकता बिजली का एक बल्ब है लेकिन यह मिट्टी के तेल से भरा है। इसमें संवाहक तार की बजाय एक बाती है। दरअसल, पचकोल, अपने सभी मुसीबतों के साथ, जड़ से मामूली रुप से बेहतर है। जड़ पचकोल से थोड़ी ही दूरी पर एक अन्य गांव है जहां अब भी बिजली, पानी और सड़क नहीं है।

 

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मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा के पचकोल में जो विद्युतीकृत आदिवासी गांव माना जाता है वहां बल्ब एक किरासन लैंप की तरह काम करता है। जब घर स्वामित्व, बिजली, शौचालय और पानी के कनेक्शन जैसी बुनियादी सुविधाओं के भी प्रावधान की बात होती है तो आदिवासियों और दलितों का महत्व अब भी सबसे कम होता है।

 

ग्रामीण कैसे करते हैं यात्रा? अपनी घोड़ी की ओर इशारा करते हुए श्रीराम बताता है कि, “हम उस पर सवारी करते हैं और यहां तक ​​कि बीमार को अस्पताल भी उस पर ही ले जाते हैं।” जड़ में एक दशक पुराने जंग लगे हुए बिजली के खंभे हैं। चुनाव के दौरान वहां बिजली लाने की बात की गई थी लेकिन ब तक वहां वायरिंग नहीं हुई है।

 

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मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में एक अन्य आदिवासी गांव है जड़ जहां अब तक सड़क नहीं बनाई गई है। श्रीराम बताते हैं कि यात्रा के लिए वे घोड़ी का इस्तेमाल करते हैं। यहां तक कि बीमारों को अस्पताल पहुंचाने के लिए भी घोड़ी का ही इस्तेमाल होता है है। गांव में बिजली, पानी की आपूर्ति या सड़के नहीं है।

 

क्या होता है अप्रयुक्त धनराशि का ?

 

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने धन खर्च करने की उपेक्षा के 35 साल के पैटर्न में कोई बदलाव नहीं किया है। जैसा कि इस लेख के दूसरे भाग में हम बताएंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले साल सबसे अधिक अव्ययित राशि देखी गई है और हम यह भी बताएंगे कि तीन वर्षों में राशि की सर्वोच्च प्रतिशत खर्च नहीं की गई है।

 

केन्द्रीय मंत्रालयों के लिए धन के प्रवाह (जनजातीय और अनुसूचित जाति उप योजना

Source: Response to Right to Information requests

 

दिशानिर्देशों के अनुसार, वित्तीय वर्ष के अंत तक जो राशि अव्यियत रहती है वह बाद में इस्तेमाल के लिए अव्यपगत केंद्रीय पूल के लिए हस्तांतरित किया जाना चाहिए।

 

लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं होता है।

 

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सरकार के लेखा परीक्षक) ने टीएसपी धन की इस 2015 ऑडिट रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि, “NLCPTF (टीएसपी धन की केंद्रीय पूल) के लिए अप्रयुक्त टीएसपी धन के हस्तांतरण की अवधारणा असफल बनी हुई है।”

 

नाम न बताने की शर्त पर नीति आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडियास्पेंड से बता करते हुए इस बात कि पुष्टि की है कि अव्ययित निधि “व्यपगत” किया जा रहा है, न कि नियमों के अनुसार अगले साल के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। राज्यों को अपनी ताजा दिशा-निर्देशों में नीति आयोग कहता है, “समिति को सूचित किया गया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए आवंटित धन का ‘खराब उपयोग’ किया जा रहा है।”

 

जनवरी 2016 में, वित्तीय वर्ष समाप्त होने में तीन माह बाकि होने के साथ, कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कुछ विभागों को व्यय 0.87 फीसदी कम रखने के खिलाफ अधिकारियों को सख्त कार्यवाई की चेतावनी दी है।

 

हीरा के घर के बाहर, ग्रामीणों के एक समूह एकत्र हुए थे। वे अपने जीवन के बारे में बात करने के लिए अनिच्छुक थे। हालांकि एक आदमी इस चुप्पी से सहमत नहीं था: “हम अपनी समस्याओं के बारे में बात करने की जरूरत है; उसके बाद ही समस्याओं का हल निकल पाएगा।”

 

यह लेख का पहला भाग है, दूसरा भाग कल प्रकाशित किया जाएगा।

 

(बाबू दिल्ली स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters के सदस्य हैं। 101Reporters जमीनी स्तर पर पत्रकारों के एक अखिल भारतीय नेटवर्क है।)

 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 19 सितंबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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