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दाल की कीमतों में कमी भारत के कृषि नीति की खामियों का करती हैं खुलासा

अभिषक वाघमारे,

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जनवरी 2017 को मुंबई के बाजार में एक दुकान पर रखी दालों के बोरे पर लगी कीमतें।

 

अच्छे मानसून से दालों, विशेष रुप से तूर दाल की बुवाई और उत्पादन बढ़िया हुई है। यही कारण है कि वर्ष 2017 में इसकी थोक और खुदरा कीमतें लगभग आधी हुई हैं। हम बता दें कि वर्ष 2015 के अंत में कुछ शहरों में दाल के दाम 200 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए थे।

 

महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख तूर-उत्पादक के कई राज्य-विनियमित कृषि बाजारों में कीमतें 4,000 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं। यह दिसंबर 2016 के बाद से 5,050 रुपए प्रति क्विंटल (425 रुपए बोनस सहित) के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 20 फीसदी कम है।

 

लगातार कई वर्षों से दाल की ‘कीमतों में उतार-चढ़ाव’ के कई कारण हैं। दाल के निर्यात पर प्रतिबंध के साथ बम्पर-फसल वर्ष में निजी एजेंसियों द्वारा संग्रहण पर प्रतिबंध है। इगर देखा जाए तो दाल के मामले में एक किस्म से कारोबार का आभाव है और यह एक बड़ा कारण है। ‘इंडियन कांउसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रीलैशन्ज’ में कृषि के लिए इंफोसिस चेयर प्रोफेसर अशोक गुलाटी द्वारा 15 मार्च 2017 को इंडियन एक्सप्रेस के इस लेख में इस पर विस्तार से बताया गया है।

 

बाजार ने हमें कैसे गलत साबित किया?

 

लगातार दो साल की सूखे के बाद पंजाब, हरियाणा, केरल और गुजरात के कुछ जिलों को छोड़कर वर्ष 2016 में भारत के अधिकांश हिस्सों में अच्छा मानसून रहा है।

 

अच्छे मानसून के बाद स्थिति में बदलाव हुआ है। यहां तक कि इंडियास्पेंड ने भी अक्टूबर 2015 में बताया था कि तूर दाल कीमतें लंबे समय तक ज्यादा रहेंगी। इसके कारण बताए गए थे-खराब मानसून, अपर्याप्त एमएसपी, प्रति हेक्टेयर दाल की खराब उपज। साथ ही लोगों का प्रोटीन के लिए अंडे और मांस की तरफ झुकाव।

 

लेकिन वर्ष 2016 में महाराष्ट्र में सामान्य से अधिक मानसून रहा है और उत्पादकता लगभग 360 किलो / हेक्टेयर से बढ़ाकर 760 किलो / हेक्टेयर हुआ है। किसानों ने रिकार्ड क्षेत्र पर दाल पर बुवाई भी की । वर्ष 2015 में किसानों को 100 रुपए / किलो से अधिक की रिकॉर्ड कीमत भी मिली थी।

 

2015 में तूर दाल की कीमत सबसे उच्च, 2017 में दाम गिरकर सामान्य

Source: Retail Prices Management System, Department of Agriculture

 

महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और गुजरात प्रमुख तूर उत्पादक राज्य माने जाते हैं। ग्रामीण जिला बाजार किसानों से सीधे और उपभोक्ताओं से अप्रत्यक्ष रुप से जुड़ते हैं, क्योंकि वे मध्यस्थों को शामिल करते हैं। मुंबई और अहमदाबाद जैसे शहरों में बड़े उपभोक्ता बाजारों में जिला बाजारों के दाल खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं को बेच दिए जाते हैं।

 

इस प्रकार जिला बाजार में तूर दाल की उपलब्धता किसानों की मिलने वाली कीमतें तय करती हैं। वर्ष 2015 में चार प्रमुख तूर-उत्पादक राज्यों के प्रमुख जिला बाजारों -अमरावती, गुलबर्गा, वडोदरा और नरसिंहपुर- में थोक मूल्य में वृद्धि हुई थी। लेकिन वर्ष 2016 में कीमतों में भारी गिरावट देखी गई ।

 

2016 में अस्थायी वृद्धि के बाद तूर की थोक कीमत एमएसपी से नीचे

Source: AgMarkNet; Prices in Rs per quintal

 

Why have prices bottomed out? Answer: No exports allowed, no futures trading

 

वर्ष 2015 में आपूर्ति में गिरावट आई और 2014 की तुलना में बाजार में दाल की कमी देखी गई थी। व्यापारियों ने किसानों को प्रति किलो दाल के लिए 100 रुपए ( जो सबसे ज्यादा है ) तक का भुगतान किया है। बिचौलिए और खुदरा विक्रेताओं ने किराने की दुकानों में कीमत 180 रुपए प्रति किलो तक कर दिया था।

 

वर्ष 2016 में महाराष्ट्र में तूर की बुवाई क्षेत्र 25 फीसदी से बढ़कर 1.53 मिलियन हेक्टेयर तक हुआ और उत्पादन में 160 फीसदी की वृद्धि होने का अनुमान है। वर्ष 2015-16 में 444,000 टन से 2016-17 में 1.17 मिलियन टन का अनुमान है।

 

तूर दाल के उत्पादन में वृद्धि का ग्राफ

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Source: Agriculture Department, Government of Maharashtra

 

महाराष्ट्र में 1.54 मिलियन हेक्टेयर के बुवाई क्षेत्र से 1.17 मिलियन टन तूर का उत्पादन हुआ है। यह भारत के कुल 4.2 मिलियन टन उत्पादन का 25 फीसदी है। हालांकि उत्पादकता या प्रति यूनिट क्षेत्र का उत्पादन  वर्ष 2007-08 की तुलना में 18 फीसदी कम है।

 

वर्ष 2016-17 में  बाजार में दाल में आवाजाही बढ़ी है। व्यापारी इसे एमएसपी से नीचे की कीमतों पर किसानों से खरीद रहे हैं।

 

किसानों पर आपूर्ति में वृद्धि के प्रभाव को कम करने के लिए, केंद्र सरकार ने दालों के लिए बफर स्टॉक उत्पादन में दस गुना वृद्धि की है। 0.2 मिलियन टन से लेकर दो मिलियन टन तक। बफर स्टॉक वो उत्पादन है, जिसे सुरक्षा उपाय के रुप में सरकार किसानों से सीधे खरीदती है।

 

आंकड़ों से नहीं पता चलता किसानों का हाल

 

हालांकि बफर स्टॉक में वृद्धि हुई है लेकिन भंडारण के लिए सीमित जगह होने के कारण सरकारी एजेंसियां ​​दालों का भंडारण करने के लिए तैयार नहीं हैं। महाराष्ट्र के परभानी जिले में यह स्थिति स्पष्ट दिखती है।

 

नाम न बताने की शर्त पर एक क्षेत्रीय कृषि अधिकारी ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “तूर के साथ किसान एक सप्ताह से अधिक समय तक भारतीय खाद्य निगम के जिला खरीद केंद्र में इंतजार कर रहे हैं। क्योंकि वहां रखने के लिए जगह ही नहीं है।”

 

वह कहते हैं, “केंद्र में उन्हें बेहतर कीमत मिलेगी। लेकिन तूर के साथ ट्रैक्टर की लागत प्रति दिन करीब 800 रुपए की आती है। यह करीब 4,000 रुपए प्रति क्विंटल के एमएसपी के बाजार मूल्य को प्रभावी रुप से कम कर देता है। ”

 

कर्नाटक में दक्षिण-पश्चिमी मानसून (जून से सितंबर) दक्षिण-पूर्वी उपखंड में 20 फीसदी कम था, जबकि पूर्वोत्तर मानसून (अक्टूबर-दिसंबर) राज्य स्तर पर 70 फीसदी कम दर्ज किया गया है। राज्य के जलाशयों में सामान्य से 37 फीसदी कम पानी है और यह इलाका चार दशकों में सबसे खराब सूखे का सामना कर रहा है।

 

कर्नाटक में पानी की कमी का प्रभाव गर्मी और सर्दी (खरीफ और रबी) की फसलों पर पड़ा है। राज्य सरकार तूर की कीमत 5,500 रुपए प्रति क्विंटल तो की ही है, 450 रुपये प्रति क्विंटल के विशेष राज्य बोनस देने की बात भी कही है। यह किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा है।

 

सिर्फ दालों के सरकारी खरीद से नहीं मिलेगी किसानों को राहत

 

न सिर्फ सरकार का समर्थन बल्कि एक मजबूत बिक्री नीति भी बेहद महत्वपूर्ण है, जैसा कि गुलाटी ने अगस्त 2016 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के इस लेख में बताया है।

 

मार्च 2017 के कॉलम में वे कहते हैं, “पिछले वर्ष में बाजार की कीमत की बजाय किसानों को भविष्य के लिए कीमत तय करके रोपण निर्णय लेना चाहिए। ”

 

अगर किसानों को भविष्य कीमत का पता होता कि उन्हें इस मौसम में एमएसपी से कम भुगतान किया जाएगा, तो वे कपास का विकल्प चुन सकते थे, जिसकी बुआई क्षेत्र में इस बार कमी देखी गई है।

 

वर्ष 2006 में दलहन के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जब वर्ष 2005 में 0.5 मिलियन टन के रिकार्ड निर्यात से घरेलू कमी हो गई थी। कुछ अपवादों के साथ प्रतिबंध हटाया नहीं गया है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक कुल घरेलू उत्पादन का निर्यात लगभग 1 फीसदी है।

 

वर्ष 2015-16 में दालों की कमी ने आयात को 5.8 मिलियन टन या उत्पादत का एक-तिहाई तक बढ़ाया है। वर्ष 2016-17 में जबकि दाल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, निर्यात पर प्रतिबंध जारी रहा है।

 

21 मार्च 2017 को बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, “जब घरेलू बाजार में भारतीय किसानों को प्रति क्विंटल 4,000 रुपए से कम मिल रहा है, दालें अब भी 10,000 रुपए प्रति क्विंटल से अधिक कीमत पर आयात किया जा रहा है।”कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा में इस बात को उठाया था।

 

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली एक सरकारी समिति ने सितंबर 2016 में सिफारिश की है कि वर्ष 2017 में तूर के लिए एमएसपी बढ़ाकर 6,000 रुपए प्रति क्विंटल और 2018 में 7,000 रुपए प्रति क्विंटल किया जाए ।

 

(इंडियास्पेंड के लिए नियमित रूप से लिखने वाले वाघमारे शोधकर्ता हैं और मुंबई में रहते हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 12 अप्रैल 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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