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दिल्ली के 10 बच्चों और युवाओं में से 8 के फेफड़े स्वस्थ नहीं

भास्कर त्रिपाठी,

 

नई दिल्ली: भारत की राजधानी और सबसे प्रदूषित शहर, दिल्ली के लगातार प्रदूषित हवा वाले क्षेत्रों में रह रहे हर 10 में से आठ बच्चों और 20 साल से कम उम्र के युवाओं को फेफड़े की समस्या है। दिल्ली स्थित एक संस्था, हजर्ड्स सेंटर के एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है।

 

यह जानकारी ऐसे समय आई है,जब वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर होने वाले आंकड़ों को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने नकार दिया है। 5 फरवरी, 2018 को राज्य सभा  के जवाब में पर्यावरण राज्य मंत्री महेश शर्मा ने कहा  है कि मृत्यु / बीमारी और वायु प्रदूषण के बीच प्रत्यक्ष या विशेष सहसंबंध स्थापित करने के लिए कोई ठोस डेटा नहीं था।

 

इन सर्दियों में ( 10 अक्टूबर, 2017 और 10 जनवरी, 2018 के बीच ), पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण निगरानी वाले 15 में से 11 क्षेत्रों में रह रहे 43 बच्चों और 20 साल से कम उम्र के युवाओं पर किए गए ‘पीक फ्लो टेस्ट’ से पता चलता है कि शामिल बच्चों और युवाओं में से 80 फीसदी के फेफड़े या तो अस्वस्थ हैं या फिर सामान्य से नीचे कार्य करते हैं।

 

‘पीक फ्लो टेस्ट’ फेफड़े की ताकत को मापने का एक आसान तरीका है। यूरोपीय संघ के बच्चों के बाल चिकित्सा के नमूने के लिए सामान्य मूल्य परीक्षण के लिए आधार के रूप में ‘पीक फ्लो टेस्ट’ को लिया जाता है।

 

दिल्ली के एक युवा का निरीक्षण यूरोपीय मानक के अनुसार नहीं हो सकता।“ इसका आंशिक कारण यूरोपीय संघ और भारत के बीच जनसांख्यिकीय मतभेद हो सकते हैं, लेकिन कोई देश में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाले शहर में इतने बड़े अंतर की उम्मीद नहीं कर सकता है,” जैसा कि अध्ययन में कहा गया है।

 

अध्ययन में शामिल क्षेत्रों के वायु गुणवत्ता के आंकड़ों से पीएम 2.5 के लिए लगभग 200 µg/m3 और पीएम 10 के लिए 300 µg/m3 का आधार प्रदूषण भार का पता चलता है, जो राष्ट्रीय मानक का करीब तीन गुना है। प्रदूषण भार में सिर्फ दिल्ली के स्रोतों जैसे कि परिवहन और निर्माण के लिए ही पता लगा सकता है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

 

दिल्ली जैसे एक महानगर में वायु प्रदूषण बढ़ाना ( और भी छोटे शहरों जैसे रांची ) आबादी में पुरानी अवरोधक फुफ्फुसीय रोग (सीओपीडी) का बढ़ना भी है। इस बारे में इंडियास्पेंड ने 3 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

भारत में प्रदूषण की वजह से कम से कम 27 फीसदी मौतें हुई। ये आंकड़े अन्य किसी भी देश की तुलना में सबसे ज्यादा हैं। दूसरे स्थान पर चीन का नाम है, जैसा कि एक लैंसेंट अध्ययन में कहा गया है। कम और मध्यम-आय वाले समूह प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं; प्रदूषण की वजह से 92 फीसदी मृत्यु उसी आय समूह में हुई है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए इंडियास्पेंड के 14 नवंबर, 2017 की रिपोर्ट को देखा जा सकता है।

 

हर सर्दियों में नई योजनाएं, लेकिन कोई क्रियान्वयन नहीं

 

सड़क और निर्माण धूल, बिजली संयंत्र और अन्य उद्योग ( घरेलू खाना पकाने के साथ  ) दिल्ली के वायु में कण प्रदूषण की वृद्धि के लिए सबसे बड़ा योगदानकर्ता हैं, लगभग 60 फीसदी, शेष वाहनों के प्रदूषण से । भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर द्वारा वर्ष 2015 के एक अध्ययन में ये जानकारी सामने आई है।

 

प्रदूषण से निजात पाने के लिए दिल्ली को भारत में एकमात्र शहर-विशिष्ट प्रदूषण नियंत्रण कार्य योजना, ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) दिया गया है। जैसे ही शहर की वायु गुणवत्ता में गिरावट आती है, उतनी ही इसमें कई कार्यों की जरूरत होती है। इनमें कचरा जलने पर रोक, ट्रकों को शहर में प्रवेश करने पर रोक, बिजली संयंत्रों को बंद करने, और ईंट भट्टों और पत्थर तोड़ना बंद करना शामिल है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 22 दिसंबर, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

रिपोर्ट कहती है, “तैयार की गई ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान अपनी स्थापना के समय से पूरी तरह से उपयोग नहीं किया गया है। दिल्ली में कई संस्थाएं और निकायों ने इस समस्या को कम करने के लिए जो कुछ किया गया है, उसे लागू करने की बजाय, हर सर्दियों में नई योजनाओं के लिए वकालत की जा रही है। ”

 

(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 08 फरवरी 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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