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दिल्ली में हर चार मतदाताओं में से एक का नाम काटने की आवश्यकता

सौम्या तिवारी,

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दिल्ली में लगभग चार मतदाताओं में से एक का नाम मतदाता सूची में से हटाने की ज़रूरत है  जिससे कुछ ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों के चुनावी परिणामों पर प्रभाव पद सकता है जिन्होंने  2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान बहुत करीब प्रतिद्वंद्विता देखी है ।

 

दिल्ली में 7 फ़रवरी को चुनाव होंगे और परिणाम 10 फ़रवरी को घोषित किए जाएंगे।

 

जनाग्रह, एक बेंगलुरु स्थित गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) है जो शहरों में मतदाता सूचियों पर काम कर रहा है के द्वारा जारी समुचित शहरी मतदाता सूचियाँ (पीयोआर ई ) ( प्योर ) का कहना है कि  कुल 13 मिलियन  मतदाताओं में से  2.9 मिलियन  मतदाताओं के नाम सूची से काट देना ज़रूरी है और 1. 4 मिलियन  मतदाताओं का कोई अत पता ही नही है।

 

यह खुलासा चुनौतीपूर्ण  है क्योंकि यह मतदाता जाली मतदाता हो सकते हैं जिससे जहाँ  अंतर कम है वहां ये जीत को प्रभावित कर सकते हैं । सर्वेक्षण से पता चला है कि  कुल मतदाता प्रविष्टियों में से केवल 60% त्रुटि मुक्त हैं।

 

दिल्ली में मतदाता सूची में त्रुटियाँ

 

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Source: Janaagraha

 

यह अध्ययन आठ विधानसभा क्षेत्रों में किया गया और मतदाताओं की सूची में 3200 प्रविष्टियों से अधिक को कवर किया गया था।रिपोर्ट में कहा गया है कि ” रोहिणी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में सबसे कम 9% की त्रुटि दर थी जबकि “अन्य सात एसी में 17% से 33% तक त्रुटियाँ थी।  संगम विहार निर्वाचन क्षेत्र में 33% के साथ उच्चतम त्रुटि दर दर्ज की गई है” ।

 

अध्धयन के अंतर्गत लिए गए संसदीय क्षेत्र के लिए 2013 के विधानसभा चुनाव के परिणाम

 

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Source: Election Commission, Janaagraha

 

आठ निर्वाचन क्षेत्रों में से छह में जीतने वाले उम्मीदवारों को अपने पक्ष में डाले गए कुल वोटों से कम से कम  5% के आसपास से अधिक वोट मिले हैं। और  गांधी नगर जो एक उच्च जीत मार्जिन वाला निर्वाचन क्षेत्र है वहां  मतदाता सूचियों में उच्चतम 50%  त्रुटियाँ हैं। एक अन्य निर्वाचन क्षेत्र ओखला जहां जीत मार्जिन 19% है वहां मतदाता  सूची में 47% त्रुटियाँ  हैं । तो,क्या इस तरह की  उच्च त्रुटि इस  बहुआयामी प्रतिस्पर्धा में क्या एक खास पार्टी के पक्ष में (नकली ) वोट के विक्षेपण की ज़िम्मेदार  है?

 

श्रीकांत विश्वनाथन, समन्वयक, जनाग्रह का कहना है कि, ‘इस वर्ष के शुरू में लोकसभा चुनाव से पहले  उपयुक्त वोटरों के नाम काटने से, खासकर मुंबई, पुणे और नागपुर में और उसके बाद सार्वजनिक हित मुकदमोंसे यह पता चला है कि मतदाता सूची प्रबंधन भारत में चुनावी सुधार मुद्दों में उपेक्षित  रहता है। जहां एक ओर मतदाता पंजीकरण अभियान के माध्यम से मतदाता सूची में परिवर्धन के मुद्दे को संबोधित किया जा रहा है,   वहीं नाम हटाने का मुद्दे किसी भी तरह के व्यापक समाधान से छूट गया है। ”

 

मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) प्रसाद, समन्वयक, जनाग्रह का कहना है कि : “भारत का निर्वाचन आयोग भारत के  सबसे अच्छे कार्यशील सार्वजनिक संस्थानों में से एक है, और आम तौर पर वह भारत में चुनाव सुधारों के मामले में सबसे आगे रहता है। मतदाता सूची प्रबंधन का मुद्दा सभी परिपक्व लोकतंत्र में समस्या होता ही है। हालांकि, जैसा की पता है भारत की शहरी आबादी 2050 तक 400 मिलियन से बढ़कर 800 मिलियन हो जाएगी , मतदाता सूचियों में परिवर्तनभी इतना बड़ा होगा जैसा पहले किसी भी लोकतंत्र में नहीं देखा गया है। मतदाता सूची प्रबंधन को इसलिए,एक महत्वपूर्ण चुनावी सुधार का मुद्दा मान कर इस पर चर्चा किए जाने की जरूरत है। ”

 

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