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देर से गर्भधारण, परिवार नियोजन को बेहतर प्रोत्साहन

चारु बाहरी,

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वर्ष 2007 में तानाजी जाधव (बाएं) ने दूसरे हनीमून पैकेज के लिए सहमति जताई थी। यह महाराष्ट्र के सतारा जिले में नवविवाहितों के लिए एक सशर्त नकद हस्तांतरण योजना है। इस योजना के अनुसार जाधव और उनकी पत्नी माधुरी को अपने पहले बच्चे के जन्म के लिए दो से तीन वर्ष का इंतजार करना होगा। पहले बच्चे के लिए कुछ साल इंतजार करने से जादव को अपने दो बच्चों के जन्म के लिए पांच वर्ष का इंतजार करना पड़ा है। इससे यह संकेत मिलता है कि गैर टर्मिनल गर्भनिरोधक तरीकों के साथ सामंजस्य बेहतर ढंग से परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करते हैं।

 

भारत अपने परिवार नियोजन बजट का 85 फीसदी वंध्यीकरण, 1.5 फीसदी कांडोम वितरण और अन्य गैर टर्मिनल गर्भ निरोधकों पर खर्च करता है। लेकिन महाराष्ट्र के एक जिले के सशर्त नकद हस्तांतरण कार्यक्रम के संक्षिप्त अनुभव से पता चलता है कि नवविवाहितों को देरी से बच्चे को जन्म के लिए प्रोत्साहन देने से भारत की बढ़ती आबादी पर बेहतर तरीके से रोक लगाया जा सकता है। इसके अलावा, इससे कई स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक लाभ भी मिल सकते हैं।

 

वर्ष 2007 में सतारा जिले में एक ‘दूसरा हनीमून पैकेज’ (एसएचपी) कार्यक्रम शुरु किया गया। इस कार्यक्रम के तहत नवविवाहित जोड़ों को विवाह के दो साल बाद बच्चे को जन्म देने पर 5,000 रुपए और तीन साल बाद जन्म देने पर 7,500 रुपए देने की पेशकश की गई।  वर्ष 2006-07 में भारत की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय 22,553 रुपए होने के साथ मौद्रिक प्रलोभन आकर्षक था। उस समय के जिला स्वास्थ्य अधिकारी विजय सिंह एच मोहिते ने एक सर्वेक्षण किया, जिसमें पाया गया कि जिले की 85 फीसदी महिलाओं का विवाह 17 वर्ष की आयु में हुआ है ।18 वर्ष की आयु तक वे एक बच्चे की मां बन जाती हैं। 20 वर्ष की आयु तक दूसरे बच्चे को जन्म देती हैं और परिवार को सीमित करने के लिए 23 साल की उम्र में महिला नसबंदी कराती हैं।

 

यूरोपीय आयोग से समर्थित इस सर्वेक्षण ने मोहिते को एसएचपी योजना शुरु करने के लिए प्रेरित किया था जो भारत की पारंपरिक नसबंदी केंद्रित परिवार नियोजन कार्यक्रम से एकदम अलग था। एसएचपी को बढ़ावा देने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ता लोगों को पहली गर्भावस्था में देरी के लिए कंडोम और ‘गैर टर्मिनल’ गर्भनिरोधक तरीकों के रुप में गोलियों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

 

पूणे में रिसर्च एंड ट्रेनिंग, सोसाइटी फॉर इनिश्यटिव इन न्यूट्रीशन एंड डेवलपमेंट के शोध और प्रशिक्षण विंग की निदेशक शोभा राव  के अनुसार इन तरीकों से परिचय ने विवाहित जोड़ों को दूसरे बच्चे के जन्म से पहले भी इंजतार करने में सक्षम बनाया है। राव, एशिया की नई आबादी पर किए गए अध्ययन के बाद लिखे गए पेपर ‘कैन कंडिश्नल कैश ट्रांसफ र प्रोमोट चाइल्डबियरिंग? एविडेंस फ्रॉम द सेकेंड हनिमून पैकेज इन रुरल महाराष्ट्र, इंडिया,’की सहलेखक भी हैं।

 

सतारा के बेसावडी गांव में एक छोटे से गैरेज के मालिक तानाजी जादव की उम्र उस समय 30 वर्ष थी, जब जिले से 5,000 पुरुष इस योजना में शामिल हुए थे। वर्ष 2006 में जब जाधव का विवाह माधुरी के साथ हुआ, तब माधुरी की उम्र 24 वर्ष थी। जाधव कहते हैं, “हमने निर्णय लिया कि पहले बच्चे और थोड़े पैसे के लिए हम तीन साल इंतजार करेंगे। इसके अलावा, माधुरी की उम्र भी कम थी और देखभाल के लिए हमारे साथ कोई बुजुर्ग भी नहीं था। ” हाल ही में जाधव के घर बेटा हुआ है, पहले बच्चे के पांच साल बाद।

 

कनाडा में ओटावा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और एशियाई जनसंख्या अध्ययन पेपर के लेखक कैरोल व्लास्सोफ ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया, “बड़े पैमाने पर सत्यापित है कि पहला बच्चा गर्भधारण करने में देरी काफी प्रभावी तरीके से जनसंख्या वृद्धि में कटौती कर सकता है। यह कम लागत और  दर्द रहित तरीका है जो युवा जोड़ों को परिवार शुरु करने से पहले शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक रूप स्थापित करने का समय देता है।”

 

महाराष्ट्र सरकार के स्वास्थ्य सेवा विभाग में सहायक निदेशक और अध्ययन के सह लेखक स्वप्निल लाले कहते हैं, “पहले गर्भावस्था को दो-तीन साल स्थगित करने से 20 से 30 फीसदी तक कुल प्रजनन दर में कमी देखी गई है।

 

भारत के कुल प्रजनन दर यानी एक महिला के जीवन में जन्म होने वाले बच्चों की औसत संख्या वर्तमान में 2.3 है। इसमें 20 से 30 फीसदी की गिरावट इस औसत संख्या को 2.1 तक पहुंचा सकती है, जहां जाकर यह कहा जा सकता है कि जनसंख्या न बढ़ रही है, न कम हो रही है। इसके बाद ही हम अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और स्वीडन की बराबरी कर पाएंगे, जहां की आबादी वास्तव में सिकुड़ रही है। वहां प्रजनन दर 1.9 है।

 

वर्तमान में भारत में करीब 1.3 अरब लोग रहते हैं औऱ संभावना है कि वर्ष 2022 तक यह विश्व में सर्वाधिक आबादी वाला देश हो जाएगा।

 

विश्व बैंक के अनुसार, भारतीयों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है। भारत में अब भी पांचवा हिस्सा गरीबी में रहता है।

 

वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान 130वां रहा है। इस सूचकांक में 188 राष्ट्रों के जीवन की गुणवत्ता की समीक्षा की गई है।

 

स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यावसायिक लाभ

 

रनांद गांव के अविनाश कुमार शिंदे की उम्र 27 वर्ष थी, जब उन्होंने एसएचपी योजना का हिस्सा बनने का निर्णय लिया था। अविनाश के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय उनकी पत्नी हेमा का स्वास्थ्य था। उस समय हेमा की आयु 24 वर्ष थी और शरीर का वजन औसत से नीचे था।

 

राव कहते हैं, “दूसरा हनीमून पैकेज का महत्वपूर्ण उदेश्य और लाभ गर्भधारण से पहले दुल्हनों के स्वास्थ्य में सुधार लाना है, क्योंकि युवा ग्रामीण विवाहित लड़कियों की पोषण स्थिति बुरी होती है और उनमें खून की कमी भी होती है। ”

 

कम उम्र में, विशेष रुप से बुरे स्वास्थ्य के साथ महिलाओं में गर्भ को रोकने, सहस्राब्दि विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। इस लक्ष्य के तहत शिशु मृत्यु दर को कम करके 30 तक पहुंचाना है। यह लक्ष्य भारत ने वर्ष 2012 के लिए निर्धारित किया था, लेकिन अब तक पूरा नहीं कर पाया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जनवरी 2017 में विस्तार से बताया है।

 

भारत में, 20 से 29 वर्ष की आयु में महिलाओं की तुलना में 20 वर्ष से कम आयु वर्ग महिलाओं में 1.5 गुना अधिक बच्चे को खोने का जोखिम रहता है।

 

भारत में मां की उम्र के अनुसार शिशु मृत्यु दर

Source: National Family Health Survey, 2005-06

 

हालांकि एसएचपी का हिस्सा बनने वाले 2.1 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्होंने 18 वर्ष से कम आयु की महिला से विवाह किया है। हम बता दें कि महिलाओं के लिए विवाह करने की न्यूनतम कानूनी उम्र 18 वर्ष है। लेकिन स्वप्निल लाले को शक है कि ज्यादातर लोगों ने 16 या 17 वर्ष की आयु की महिलाओं से शादी की है, जो कॉलेज के प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी। वह कहते हैं कि पहले बच्चे में देरी से उन्हें उन्हें पढ़ाई समाप्त करने का मौका मिलता है।

 

एसएचपी का हिस्सा बनने वाली एक-तिहाई महिलाओं ने शैक्षिक लाभ मिलने की बात कही है। इनमें से ज्यादातर अधिक उम्र की महिलाएं थीं, जिन्होंने 12वीं तक पढ़ाई की है और 15,000 रुपए से अधिक मासिक आय वाले परिवारों से संबंधित हैं।

 

शिंदे की पत्नी हेमा की तरह कम महिलाओं को लाभ मिला है। हेमा शिक्षिका हैं। शादी के बाद जल्द ही हेमा को वापस काम पर जाना पड़ा। तीन साल बाद जब उन्होंने पहली बेटी को जन्म दिया, तब वह घर के काम-काज में पूरी तरह अभ्यस्त हो चुकी थी और बच्ची की देख-रेख के लिए सास मौजूद थी।

 

दूसरा हनीमून प्रतिभागियों को शैक्षिक और व्यावसायिक लाभ का अनुभव

Source: Asian Population Studies paper: Can Conditional Cash Transfers Promote Delayed Childbearing? Evidence from the “Second Honeymoon Package” in Rural Maharashtra, India.

 

राव कहते हैं, एसएचपी से जुड़ा एक गुणात्मक परिणाम यह है कि  “नई दुल्हन को नए परिवार के साथ घुलने-मिलने के लिए समय मिलता है।” बातचीत में शामिल महिलाओं में से पांचवें हिस्से ने पति-पत्नी के बीच बेहतर संवाद होने का लाभ बताया है। शिंदे कहते हैं, “बच्चे को जल्दी जन्म न देने से हमें एक-दूसरे को समझने का मौका मिलता है और दोनों के बीच भावनात्मक जुड़ाव पैदा होता है। ”

 

सशर्त नकद हस्तांतरण को सफल बनाने के लिए तीन शर्तें

 

देश भर में सएचपी की तरह के कार्यक्रम को बड़े पैमाने पर विस्तार देने से भारत के परिवार नियोजन कार्यक्रम को बल मिलेगा।

 

परिवार नियोजन में पुरुषों को शामिल करना, जो कि एसएचपी की एक असाधारण विशेषता है, बहुत जरूरी है। मई 2016 में ग्रामीण महाराष्ट्र में पीएलओएस वन द्वारा किया गया एक अध्ययन दर्शाता है कि ऐसी सहभागिता से विवाहित जोड़ों में गर्भनिरोधक प्रथाओं और गर्भनिरोधक उपकरणों के उपयोग के प्रचार और प्रसार में सहायता मिली है। साथ ही यौन हिंसा की घटनाओं में भी कमी हुई है।

 

वर्ष 2009 में, मोहिते की सेवानिवृत्ति के बाद एसएचपी की गति उस वक्त धीमी पड़ गई, जब यह रफ्तार पकड़ रहा था। एसएचपी में शामिल एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता को पेपर में कोट किया गया है, “परिणाम बहुत अच्छा है क्योंकि कई नवविवाहित जोड़े आए और इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए सहायक नर्स दाइयों से पूछा। जागरुकता बढ़ रही थी लेकिन उसी समय यह बंद हो गया। ”सशर्त नकद हस्तांतरण कार्यक्रम के परिणाम दिखाने के लिए निरंतरता की जरूरत है।

 

इसके अलावा, भारत में अन्य सशर्त नकद हस्तांतरण योजनाओं की सफलताओं और विफलताओं से तीन अन्य पूर्व शर्तों को जोड़ा जा सकता है जो भविष्य में इस तरह के कार्यक्रमों की अवधारणा, डिजाइन और कार्यान्वयन में मदद कर सकते हैं।

 

1. व्यवस्था में ढीला नियंत्रण

 

लोकप्रिय सशर्त नकद हस्तांतरण योजना  जननी सुरक्षा योजना का उदेश्य वंचितों महिलाओं के बीच संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर को कम करना है।

 

वर्ष 2005 और आज के बीच, जननी सुरक्षा योजना काफी हद तक प्रसव पूर्व देखभाल और सुविधा जन्मों को बढ़ाने में सफल रहा है। इस योजना का ही परिणाम है कि मातृ मृत्यु दर प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 254 मृत्यु से कम होकर 167 हुआ है। ये आंकड़े मध्यम आय वाले देशों के 180 की तुलना में कम हैं। इस समय के दौरान, भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों 58 से कम होकर 37 हुआ है।

 

पॉपुलेशन फॉउंडेशन ऑफ इंडिया   की कार्यकारी निदेशक, पूनम मुट्टरेजा कहती हैं, “जननी सुरक्षा योजना में संसाधनों पर बरती गई ढिलाई बताते हैं कि सबसे जरूरतमंद माताओं और बच्चों को इससे लाभ नहीं हुआ है। ”

 

नाम न बताने की शर्त पर इंडियास्पेंड से बात करते हुए एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने बताया कि जननी सुरक्षा योजना में कर्मचारियों द्वारा बताई गई राशि का पूर्ण भुगतान नहीं किया गया है। वह कहते हैं, “ इस तरह की अनियमितता से योजना पर बुरा असर पड़ता है,और लोग स्वाभाविक ढंग से योजना से दूर हो जाते हैं।”

 

स्वास्थ्य योजनाओं के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए क्या है समाधान?

मुट्टरेजा कहती हैं, “ सशर्त नकद हस्तांतरण मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों के साथ ही अन्य देशों में अच्छी तरह से वितरित होते देखा गया है, यानी जहां ढिलाई से तुरंत निपटा जा सके। ”

 

2. सेवा वितरण में सुधार

 

सशर्त नकद हस्तांतरण योजना आरंभ करने के बाद सेवा के लिए मांग पैदा करना पर्याप्त नहीं है। मजबूत रसद आपूर्ति प्रबंधन का पालन करना चाहिए।

 

जननी सुरक्षा योजना के उदाहरण के साथ मुट्टरेजा कहती हैं, “जेएसवाई ने उन जगहों पर अच्छी तरह से काम किया है, जहां अच्छी सड़कें, बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य केन्द्र के लिए प्रभावी 102/108 एम्बुलेंस की सुविधाएं मौजूद हैं और जहां जाति पूर्वाग्रहों से निचले तबके के लोगों के लिए सेवा में किसी किस्म की बाधा उत्पन्न नहीं की गई। ”

 

गर्भधारण स्थगित करने के उद्देश्य से योजना के विस्तार के लिए उनकी सलाह है कि हमें परिवार नियोजन से जुड़े सेवाओं में सुधार के लिए निवेश करना चाहिए। ”

 

परिवार नियोजन सेवाओं में सुधार के लिए बजटीय आवंटन में अंतर रखने के तरीकों के साथ 1.5 फीसदी की वृद्धि करनी होगी।

 

3. संदेश को मजबूत बनाना

 

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, “हमें लोगों को यह बताने की जरुरत है कि कम उम्र में बच्चों को जन्म देने से वे ज्यादा बीमारियों के शिकार हो सकते हैं और राष्ट्र पर बोझ बनते हैं। ” उनका मानना है कि एक और सशर्त नकद प्रोत्साहन शुरु करने से ज्यादा बेहतर लोगों को शिक्षित करना है। किसी भी कीमत पर कोई नकद प्रोत्साहन योजना तभी बेहतर तरीके से काम कर सकती है, जब उसे मजबूत संदेश समर्थन मिले।

 

कमजोर संदेश से योजना का असर कितना कम रह जाता है, इसका एक अच्छा उदाहरण अपनी बेटी, अपना धन योजना है। यह एक सशर्त नकद हस्तांतरण योजना है, जो 1994 में हरियाणा में शुरु किया गया था। योजना का उदेश्य समाज में बालिकाओं और परिवार में मां की स्थिति में सुधार लाना है। लेकिन इस योजना की सही बातें लोगों तक पहुंच ही नहीं पाई। मजबूत और आकर्षक समवाद न होने से यह लोगों की मानसिकता और व्यवहार बदलने में विफल रहा है।

 

18 वर्ष की आयु तक लड़कियों का विवाह न कराने पर माता-पिता को 25,000 रुपए नकद मिलने का वादा करने अलावा, बालिकाओं के लिए एक बेहतर स्थिति का वास्तव में क्या मतलब था ?

 

अधिकांश माता पिता को आठवीं कक्षा से ऊपर लड़कियों को शिक्षित करने के पीछे तर्क समझ में नहीं आया। महिलाओं के साथ इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च के शोधकर्ताओं ने बातचीत की।

 

इस योजना के मूल्यांकन करने के लिए एक अभ्यास का आयोजन किया गया। कुछ माता-पिता ने इसे “कन्यादान कार्यक्रम” के रुप में देखा। संभवतः यही कारण है कि 53 फीसदी माता-पिता ने बताया कि वे योजना के तहत मिलने वाली राशि का उपयोग लड़की के विवाह में करेंगे। जबकि 23 फीसदी माता-पिता ने इस राशि को शिक्षा पर खर्च करने की बात कही ।

 

मुट्टरेजा कहती हैं, “माता-पिता ने सोचा एकमुश्त राशि दहेज के लिए इस्तेमाल करेंगे। व्यवहार और विचार में बदलाव के लिए सरकार को लोगों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए, विशेष रुप से पुरुषों की शिक्षा पर। ”

 

यही कारण है कि ‘अपनी बेटी अपना धन’ योजना इन 13 वर्षों के दौरान, काफी हद तक विफल रहा है। हालांकि इस योजना के बाद लड़कियों का 18 वर्ष की आयु से पहले विवाह करने का अनुपात 57 फीसदी से 41 फीसदी तक आया है। इंडियास्पेंड ने इस मुद्दे पर नवंबर 2015 में विस्तार से बताया है।

 

सशर्त नकद हस्तांतरण योजना के लिए सफलता है जब शिंदे की तरह एसएचपी के संबंध में लोग यह कहे कि इस योजना में भाग लेने का मकसद नकद प्रोत्साहन नहीं था, यह परिवार शुरु करने से पहले अपनी पत्नी को समझने का एक जरिया था।

 

(बाहरी एक स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं । राजस्थान के माउंट आबू  में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 21 फरवरी 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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